शैलेंद्र, राज कपूर, मैँ और साहिर

कल प्रसिद्ध फिल्म पत्रिका ‘माधुरी’ पर रविकांत का लेख जानकी पुल पर आया था. उसकी प्रतिक्रिया में उस पत्रिका के यशस्वी संपादक अरविन्द कुमार जी ने एक छोटी- सी टिप्पणी प्रेषित की है. यह टिप्पणी उपलब्ध करवाने के लिए हम लेखक मित्र दयानंद पांडेय के आभारी हैं. प्रस्तुत है वह टिप्पणी- जानकी पुल.




साहिर संबंधी सामग्री के बारे मेँ: 

http://www.jankipul.com/2011/11/blog-post_27.html पर मेरे द्वारा संपादित माधुरी पत्रिका के बारे जो बहुत अच्छा लेख छपा है, उसे आप ने उद्धृत किया.. उस लेख मेँ माधुरी द्वारा शायर साहिर के बारे मेँ एक मुहिम के बारे मेँ विस्तार से लिखा गया है और कहा गया है कि माधुरी द्वारा साहिर का सारा कृतित्व भुला दिया गया. (यहाँ मैँ यह भी बताना चाहता हूँ कि फ़िल्मेश्वर नाम से मैँ ही लिखता था.) उस साहिर संबंधी मुहिम के बारे मेँ
 साहिर की एक हस्तलिखित कविता उन के और मेरे कामन मित्र मुग़नी अब्बासी ने मुझे पढ़ने को दी. उस मेँ कहा गया था कि उर्दू को मारने की मुहिम सरकार चला रही है. मुसलमान बच्चोँ को कान उमेठ कर हिंदी पढ़ाई जा रही है  ज़बरदस्ती. वह कविता सांप्रदायिक वैमनस्य से भरी थी. एक ज़माने मेँ जोश मलीहाबादी तक पाकिस्तान चले गए थे, और पंडित नेहरू आहेँ भरते रह गए थे. साहिर की तत्कलीन मानसिकता मेँ कहीँ पाकिस्तान न जा पाने का मलाल सा आभासित होता था. मैँ स्वयं साहिर का भक्त रहा हूँ. शायरी मेँ वह अव्वल थे. (लोकिन बेहतरीन शायर ही थे, अच्छे फ़िल्म गीतकार कभी नहीँ. उन की कविताएँ फ़िल्मोँ मेँ ख़ूब चलीँ, लेकिन अच्छ फ़िल्म गीत नहीँ कही जा सकतीँ. यह बड़ी बहस का विषय है, ठीक वैसे ही जैसे मेरे मित्र गुलज़ार अच्छे कवि हैँ, फ़िल्मोँ में बहुत सफल भी हैं, पर मेरी नज़र मेँ अच्छे फ़िल्म गीतकार नहीँ. ख़ैर, यह छोड़िए. केवल माधुरी मेँ छपने वाली बात तक अपने को सीमित रखता हूँ.) तो साहिर पर जो कुछ भी उन दिनोँ माधुरी मेँ छपा, वह उस कविता की प्रतिक्रिया मात्र ही था.
प्रसंगवश शैलेंद्र, राज कपूर, मैँ और साहिर:

प्यासा के एक गीत का असर था कि मैँ कई साल तक दिशाहीन रहा- यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है.  यह बात मैँ ने दिसंबर 1964 मेँ राज कपूर से अपनी पहली मुलाक़ात तक मेँ कही थी. मुझे उन से मिलाने ले गए थे शैलेंद्र. हमेँ मिला कर शैलेंद्र न जाने कहाँ चले गए. हम दोनोँ को अकेला छोड़ गए, शायद एक दूसरे को समझने का अवसर देने के लिए. राज कपूर मुझे समझना चाहते थे, उन का भक्त मैँ उन्हेँ. अपने आडोटोरियम में बैठा कर राज कपूर ने मुझ से कहा मेरी किसी भी फ़िल्म के अपनी पसंद के किसी भी गीत का नाम लो, मैँ तुम्हेँ वह दिखवाउँगा. मैँ ने आवारा का वह गीत देखना चाहा जो कुछ भोजपुरी टाइप के लोग पृथ्वीराज कपूर द्वारा लीला चिटणीस को निर्वासित करने पर किसी दूकान के थड़े पर बैठे गा रहे हैँ, गर्भवती लीला चिटनीस बारिश मेँ भीगती गिरती पड़ती जा रही है. यह सुनते ही राज कपूर चहक गए. अब तक किसी ने वह गीत नहीँ सुनना चाहा था. मुझे वह गीत दिखवा कर उन्होँ ने पूछा, कि मैँ ने वही गीत क्योँ चुना. मैँ ने कहा कि आवारा ने और इस गीत ने मेरी मानसिकता को गढ़ा है. मेरी प्रसिद्ध, बहुचर्चित और बदनाम कविता राम का अंतर्द्वंद्व  के पीछे यह गीत ही था. तभी मैँ कह बैठा कि एक और फ़िल्म गीत था जिस ने मुझे तबाह कर दिया. चौँक कर राज ने पूछा और मैँ ने बताया कि वह गीत था – यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है? सारा कृतित्व बेकार है, सब कुछ बेमानी है, केवल निराशा ही सत्य है. मेरे सारे विश्वासोँ का अंत उस गीत ने कर दिया. जब मैँ माधुरी का संपादन करने नवंबर के अंत मेँ बंबई पहुँचा तो एक ध्वस्त जीव था.

माधुरी के ज़रिए मैँ अपनी नई तलाश मेँ निकल पड़ा…
यह तलाश ही है मेरे ज़माने की माधुरी की सारी सामग्री का आधार
सोमवार, 28 नवंबर 2011
शुभ कामनाओँ सहित आप का
अरविंद कुमार
प्रधान संपादक, अरविंद लैक्सिकन – इंटरनैट पर हिंदी इंग्लिश महाथिसार

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