किंब, कांगड़ी और मेवों का मौसम

लोहड़ी को आमतौर पर पंजाबी संस्कृति का त्यौहार माना जाता है. लेकिन इस लेख में लेखिका योगिता यादव ने यह बताया है कि किस तरह लोहड़ी जम्मू की संस्कृति का भी अहम् हिस्सा रहा है. तो इस बार जम्मू से हैप्पी लोहड़ी- मॉडरेटर 
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 एक बार रेवाड़ी के मेरे एक उम्रदराज परिचित ने पूछा, ‘जेएंडके की राजधानी क्या है? उनका सवाल सामान्य जागरुकतावश था किंतु मैंने जब कहा कि गर्मियों में श्रीनगर और सर्दियों में जम्मू, तो वे हैरान, बड़े कौतुक से बोले, ‘तो क्या राजधानी वहां भागती रहती है? और हम सब खिलखिला कर हंस पड़े। खुशी, खुशबू और शोखी की ऐसी ही खिलखिलाहट बिखर जाती है जम्मू में, जब पीरपंजाल की पर्वत श्रृंखला बर्फीले शॉल की बुक्कल मार कर बैठ जाती है। जम्मू में सर्दियों में फैशन दिखाना हो तो उसका सबसे बेहतर प्रतीक है शॉल। नोटों की गड्डियां खर्च दीजिए पर शॉल का फैशन खत्म नहीं होगा। पश्मीना शॉल, सेमी पश्मीना शॉल, रफल का शॉल, कान्नी शॉल, जामावार, फिर उस पर सूईं की कढ़ाई, आरी की कढ़ाई, तिल्ले की कढ़ाई, तिल्ला भी कई तरह और कई रंग का। कढ़ाई में भी बेल बूटों का डिजाइन, फुलकारी का डिजाइन, कढ़ाई से पूरा भरा हुआ शॉल और न जाने कितने डिजाइन, कितने रंग, कितनी अदाएं, कितने ढंग। यहां शॉल सिर्फ फैशन ही नहीं है, बल्कि इसमें परंपरा की गर्माहट भी है। कई हुनरमंद हाथों का हुनर भी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जम्मू-कश्मीर की अस्मिता भी। करवा चौथ पर सासू मां को दिया जाने वाला बहू का उपहार भी है शॉल। सही मायनों में करवा चौथ के बाद से ही जम्मू में ठंड और ठंड का अंदाज शुरू हो जाता है। बदलने लगता है खानपान, फैशन और दफ्तर आने जाने का समय भी। यह अक्टूबर का अंत और नवंबर की शुरूआत ही होती है जब दरबार श्रीनगर से जम्मू आ जाता है। अर्थात करवा चौथ के बाद या आसपास का समय। दरबार मूव होते ही सचिवालय में कार्यरत जम्मू के डोगरे वापस घरों को लौट आते हैं तो कश्मीरी बर्फीली जिंदगी छोड़कर जम्मू की रौनक में शामिल होने लगते हैं। बड़े-बड़े अधिकारी और मुलाजिम सरकारी क्वार्टरों में नए पर्दों, नए बिस्तरों के साथ एडजस्ट हो जाते हैं, वहीं छोटे मुलाजिम यहां गलियों में किराए का छोटा-मोटा मकान ढूंढने निकल पड़ते हैं। इस दौरान कभी देर रात राष्ट्रीय राजमार्ग से होकर गुजरने का मौका मिले तो देखिएगा गुज्जर-बक्करवाल भी अपने माल मवेशियों के साथ इसी बनिहाल कार्ट रोडÓ से जम्मू की रौनक भरी जिंदगी की ओर लौट रहे होते हैं। बर्नार्ड कार्ट रोड जिसे रोजमर्रा की भाषा में बीसी रोड कहा जाता है का नाम ही इसलिए पड़ा क्योंकि उस दौरान सचिवालय का रिकॉर्ड और अन्य जरूरी सामान बैलगाडिय़ों पर  लदकर जम्मू से श्रीनगर और श्रीनगर से जम्मू आया जाया करता था।
अलग-अलग बोलियों को बोलने वाले जम्मू-कश्मीर के ये सभी बाशिंदे जम्मू में आकर ऐसे मिल जाते हैं जैसे खिचड़ी में घी। जिसके बाद सौंधी सी महक हर गली से उठने लगती हैं। कहीं पकता है मक्की का टोडा (मोटी रोटी), कहीं हरा धनिया मिला चावल का टोडा, कहीं खमीरों पर रखे गलगल के अचार की महक तो कहीं शीर चाय के साथ खाई जा रही कश्मीरी रोटियों की। पुरानी सिटी की गलियों में हलवाई बड़े-बड़े कड़ाहों में पकाने लगते हैं सुंड। सुंड जम्मू का खूब स्वादिष्ट, सेहतमंद मिष्ठान्न है। और शुभता का प्रतीक भी। जो सर्दियों में अमूमन हर घर में बनती है। सुंड असल में मेवों का मिश्रण हैं। जिसमें काजू, बादाम, छुआरे, मग$ज (खरबूजे के बीज) आदि सभी मेवों को मोटा काटकर देसी घी में फ्राई किया जाता है। फिर नारियल का चूरा, खसखस और सुंड के साथ इसे फिर से देसी घी में फ्राई करते हुए मिक्स किया जाता है। सोंठ जिसे स्थानीय बोली में सुंड कहा जाता है, का इस्तेमाल होने के कारण इसे नई मां को जरूर दिया जाता है। थोड़ा, बहुत नहीं किलो के माप में। सास ने पांच किलो सुंड खिलाई या दस किलो या बहू के मायके से पंद्रह किलो सुंड आई इससे ही पता चलता है कि घर में आए नए मेहमान की कितनी खुशी मनाई जा रही है। रिश्तेदारों में सुंड बांटकर यह खुशखबरी भी बांटी जाती है। सर्दियों में एक कटोरी सुंड के साथ गरमागरम दूध पिया जाए तो उससे बेहतर नाश्ता और क्या हो सकता है। जितना स्वादिष्ट नाश्ता उतनी ही सेहतमंद हो जाती है इन दिनों जम्मू की दोपहर। मैदानी इलाकों में जहां इस दौरान धुंध का साम्राज्य पसरा होता है वहीं जम्मू में ठंडी धूप खिलती है। आंवले और नींबू के साथ-साथ सर्दियों में यहां कई तरह के देसी खट्टे फल आ जाते हैं। जिनके बारे में कहा जाता है कि यह सर्दियों में रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करते हैं। पीले या नारंगी रंग के ये सभी फल अलग-अलग स्वाद के हैं जिन्हें खाने का खास और मुख्तलिफ अंदाज है। यहां का किन्नू संतरे से ज्यादा रसदार और सस्ता है। जबकि किंब की खटास…. तौबा तौबा। किंब इतना खट्टा फल है कि यदि इसे रस सहित ग्रहण किया जाए तो कड़वाहट देने लगता है। इसलिए किंब को दो हिस्सों में काटकर पहले उसका रस निचोड़ दिया जाता है। ग्रामीण इलाकों में अब भी सरसों के तेल के साथ कोयला जलाकर उसका धुआं देने के बाद इसे खाया जाता है, जिससे इसकी ठंडी तासीर कम हो जाती है। फिर धनिये और हरी मिर्च की खट्टी-मीठी चटनी को किंब की फंाकों पर लगाया खाया जाता है। जबकि गलगलÓ का इस्तेमाल अचार के रूप में किया जाता है। किंब, किन्नू और संतरे का स्वाद तभी है जब इन्हेंं धूप में खाया जाए, वरना जुकाम होना तय है।
इन दिनों कड़म का अचार भी खूब खाया जाता है। कड़म खाना डोगरों ने कश्मीरियों से सीखाÓ यह उतना ही सही है जितना यह कि दालें खाना कश्मीरियों ने डोगरों से। डोगरे यानी जम्मू के मूल निवासी दालों के शौकीन हैं। यहां हर रोज दिन वार अलग-अलग दाल बनती है। बुधवार को साबुत मूंग, वीरवार को अरहर, शुक्रवार को मां-छोले यानी उड़द-चने की दाल, शनिवार को काले चने और रविवार को राजमा। रविवार को राजमा बनना तो तय है। होटलों, ढाबों, रेस्टोरेंट, शादी-पार्टियों में राजमा नहीं तो कुछ नहीं। राजमा के शौकीन जानते हैं कि स्वाद के मामले में सर्वश्रेष्ठ है भद्रवाह का राजमा। गहरे लाल रंग के छोटे-छोटे दाने। जिन्हें मुट्ठी में दबाकर फूंक मारें तो हल्की नमी छोड़ जाएं। भद्रवाह के राजमा, आरएस पुरा का बासमती चावल और अनार दाने की खट्टी चटनी सर्दियों की गुनगुनी दोपहर में इससे बेहतर कुछ और हो सकता है क्या! राजमा सदाबहार है, लेकिन सर्दियां आते ही जम्मू की रसोई में कुल्थ की दाल का महत्व सबसे ज्यादा बढ़ जाता है। कुल्थ यहां की देसी दाल है जिसकी तासीर खूब गर्म होती है। पौष्टिकता में यह मांसाहार से भी बढ़कर है। यह बदला हुआ खानपान ही है जो जम्मू की सर्दियों से मुकाबला करता है। इसी तरहच्बच्चे बीमार न हो इसके लिए माएं सर्दियों मेंच्बच्चों को दूध में छुआरे उबाल कर देती हैं। या फिर दूध का काढ़ा बनाकर। काढ़ा बनाने के लिए दूध में सुंड डालकर उबाली जाती है, जिसका जिक्र अभी ऊपर हुआ है।
ये सब तो घरेलू उपचार हैं, लेकिन ठंड से बचने के लिए बेहतर है कि शाम होते ही कांगड़ी सुलगा ली जाए। कांगड़ी धधकती नहीं है, धीमे-धीमे सुलगती है। इसलिए लेने वाले इसे बिस्तर में लेकर भी बैठ जाते हैं। जबकि कश्मीर में तो लोग इसे फिरन में साथ लेकर भी चलते हैं। यह एक पोर्टेबल हीटर से भी बढ़कर है। क्योंकि आंच भीतर के मिट्टी के कटोरे में होती है जबकि पकडऩे के लिए लकड़ी का खास हेंडिल युक्त सांचा बना होता है। जैसे गांव-देहात में दही मक्खन रखने के लिए रस्सी का बना छीकाÓ टंगा होता था। जहां मौसम ही जिंदगी और मौसम ही मौत हो वहां जीने की गर्माहट है कांगड़ी । इसलिए तो आज भी कश्मीरी शादियों में बेटियों को दहेज में दी जाती है यह। सलमे-सितारों से सजी खूबसूरत कांगड़ी। अब जहां सब कुछ बदल गया है, रूम हीटर से लेकर कार हीटर भी मौजूद है वहां कांगड़ी अब भी जम्मू की जिंदगी से पूरी तरह बर्खास्त नहीं हो पाई है। न ही कश्मीरी संस्कृति से। अब भी हर घर में एक कांगड़ी है। पर कभी-कभी यह सावधानी हटी, दुर्घटना घटी का भी सबब बन जाती है। मेरी एक मित्र लाइट जाने के बाद अंधेरे में मोमबत्ती लेने के लिए दौड़ी तो कांगड़ी उसके पैर पर उलट गई। जिसकी गर्म राख नायलॉन के मोजे को चीरती हुई त्वचा को जला गई। वहीं एक दूसरी बुजुर्ग महिला कांगड़ी लिए बिस्तर में बैठी थी और उनकी शॉल का कोना धीरे-धीरे कांगड़ी में सुलगता रहा। फिर शॉल का क्या हुआ होगा अंदाजा लगाया जा सकता है।
सर्दियां इतनी खुशगवार भी नहीं हैं। यहां अकसर पस्सियां गिरने अर्थात लैंड स्लाइडिंग के हादसे पेश आते रहते हैं।

हादसों और हिम्मत के इसी सर सर्द मौसम में पिरोए जाते हैं मेवों के हार। ढेरों आशीषों और शुभकामनाओं के साथ। नाती-पोतों और नव विवाहितों के लिए। लोहड़ी जम्मू के बड़े पर्वों में से एक है, जिसकी तैयारी काफी धूमधाम से शुरू होती है। सरकारी पोस्टरों में भी नव वर्ष के साथ लोहड़ी की भी बधाई दी जाती है। लोहड़ी से जुड़ी परंपराओं का पूराच्गुच्छा है। जिसमें साज सज्जा है, खेल हैं, उत्सव है। ऐसी ही एक परंपरा है मेवों के हार बनाने की। रंगीन बताशों के साथ मूंगफली, किशमिश, काजू आदि पिरोकर कई-कई लडिय़ों के हार पिरोए जाते हैं लाडलों के लिए। जिनमें बीच में लटकता है बड़ा सा गोला। खास बात यह कि हार जितना लंबा, स्नेह और संपन्नता उतनी अधिक। फिर चाहें उन्हें पिरोते हुए सुईं कई बार अंगुलियों में चुभ जाए। इसी तरह नव विवाहित जोड़े को भी पहली लोहड़ी पर उनके कद के आकार के हार पहनाए जाते हैं। फिर ढोल और बाजों के साथ जश्न मनता है और बांटी जाती है पूरे मोहल्ले में लोहड़ी। 
योगिता यादव, जम्मू

911, सुभाष नगर ; जम्‍मू

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