विराट के लेखक की आत्मकथा के बहाने

आज गैब्रिएल गार्सिया मार्केज़ की पुण्यतिथि है। इस अवसर पर विजय शर्मा ने उनकी आत्मकथा ‘लिविंग टु टेल द टेल’ पर लिखा है। बीस साल पहले प्रकाशित इस आत्मकथा के बाद मार्केज़ के जीवन और साहित्य पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। उनकी आधिकारिक-अनाधिकारिक जीवनियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। लेकिन इस किताब का अपना महत्व है। विजय शर्मा जी ने सही लिखा है कि इसको पढ़ने के बाद उनके समस्त साहित्य को पढ़ने की इच्छा जाग जाती है- प्रभात रंजन

======

“The Caribbean taught me to look at reality in a different way,” he pronounced, “to

accept the supernatural as part of our everyday life.”

कन्नड की एक लोककथा है:

एक स्त्री एक कहानी जानती थी। वह एक गीत भी जानती थी। लेकिन कभी किसी को न तो कहानी सुनाती थी न ही गाना। उन्हें केवल अपने पास रखती थी। उसके यहाँ कैद हो कर कहानी और गीत बहुत घुटन अनुभव करते। वे छुटकारा पाना चाहते, भागना चाहते थे। एक दिन जब स्त्री सो रही थी उसका मुँह खुला हुआ था, कहानी उससे बाहर निकल भागी। वह एक जोड़ी जूतों के आकार में ढल गई और घर के बाहर जा कर बैठ गई। गीत भी निकल भागा और उसने एक कोट का रूप धारण किया और खूँटी पर टँग गया।

स्त्री का पति घर आया उसने कोट और जूते देख कर उससे पूछा, “कौन आया है?”

“कोई नहीं।”

“पर कोट और जूते किसके हैं?”

“मुझे नहीं मालूम,” उसने उत्तर दिया।

उत्तर से वह संतुष्ट नहीं था। उसे शक था। यह वार्तालाप बुरा था। यह झगड़े में परिवर्तित हो गया। पति गुस्से में आग-बबूला हो गया, उसने कम्बल उठाया और मंदिर में सोने चल गया।

औरत को पता नहीं चला कि क्या हुआ। वह अकेली लेट गई। किसके जूते और कोट है? वह बार-बार खुद से सवाल करती रही। परेशान और दु:खी उसने दीया बुझाया और सो गई।

शहर के सारे दीये बुझने के बाद मंदिर में जमा हुआ करते थे। और रात बातचीत करते हुए गुजारते थे। इस रात भी सारे दिए वहाँ पहुँचे, एक को छोड़ कर। देर से आने वाले दीये से सबने पूछा कि वह देर से क्यों आया?

“तुम इतनी देर से आज क्यों आए?”

“हमारे घर आज रात पति-पत्नी में झगड़ा हो गया,” लौ ने कहा।

“वे क्यों लड़े?”

“जब पति घर पर नहीं था तो एक कोट और एक जोड़ी जूते बरामदे और खूँटी पर। पति ने पूछा कि ये किसके हैं। पत्नी ने कहा कि उसे नहीं मालूम अत: वे झगड़े।“

“जूते और कोट कहाँ से आए?”

“घर की स्त्री एक कहानी और एक गीत जानती है हमारे। वह कभी कहानी नहीं कहती है और कभी गाती नहीं है किसी के लिए। कहानी और गीत का उसके अंदर दम घुटने लगा अत: वे बाहर आ गए और कोट तथा जूते बन गए। उन्होंने बदला लिया। औरत को पता भी नहीं है।”

कंबल के भीतर लेटे पति ने लौ की बात सुनी। उसका संदेह समाप्त हो गया। जब वह घर पहुँचा सुबह हो चुकी थी। उसने अपनी पत्नी से कहानी और गीत के बारे में पूछा। मगर वह दोनों भूल चुकी थी। “कौन-सी कहानी, कैसा गीत?” उसने कहा।

भूलने से पहले कहानी कह देनी चाहिए, गीत गा लेना चाहिए।

000

जादूई यथार्थवाद का जनक कौन है इस पर बहस हो सकती है कुछ लोग मिग्युएलईन्जेल अस्टूरिअस को इसका जनक मानते हैं तो कुछ अन्य मलयालम लेखक ओ. वी. विजयन को इसका प्रणेता स्वीकार करते हैं लेकिन इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि कोलंबिया के उपन्यासकार, बीसवीं सदी के एक सबसे प्रमुख लेखक गैब्रियल  मार्केस ने जादूई यथार्थवाद को न केवल नई ऊँचाई दी वरन इसे लोकप्रिय बनाने, इसके प्रचार-प्रसार में प्रमुख भूमिका निभाई। जैसा जादूई उनका लेखन है वैसी ही एक जादूई व्यक्तित्व वाली एडिथ ग्रॉसमैन जैसी अनुवादक भी उन्हें मिली जिसने उनके काम को इंग्लिश में अनुवादित करके विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाया। ग्रॉसमैन का काम मूल से किसी दृष्टि में कम नहीं है। वह वही आस्वाद देता है जो किसी सर्जना से प्राप्त होता है। मार्केस के लगभग सारे काम को उन्होंने अनुवादित किया है। मार्केस ने विपुल लेखन किया है और हिन्दी का पाठक उनसे और उनके काम से बखूबी परिचित है।

17 अप्रिल 2014 को उनका निधन हो गया। विश्व की तमाम भाषाओं के साथ हिन्दी में भी उन पर श्रद्धांजलि लेखों की बाढ़-सी आ गई। ‘एकांत के सौ वर्षों’ का अंत निश्चित था फ़िर भी पाठक-आलोचक गमगीन थे। खुद मैंने तीन भिन्न पत्रिकाओं के लिए उन पर अलग-अलग श्रद्धांजलि लेख लिखे, जिन्हें पाठकों ने सराहा। लेकिन सबसे अधिक प्रसन्नता हुई जब एक गुणी संपादक ने कहा कि मेरा लेख पढ़ने के बाद उनके मन में मार्केस पढने की इच्छा फ़िर से जाग्रत हुई और उन्होंने अपनी लाइब्रेरी से निकाल कर उनकी आत्मकथा दोबारा पढ़नी शुरु की। ये संपादक हैं प्रयाग शुक्ल, वे न केवल एक कुशल संपादक हैं वरन बहुत उत्तम कोटि के लेखक और अनुवादक भी हैं। साहित्य के साथ-साथ संगीत तथा विभिन्न कलाओं पर उनकी पकड़ अनूठी है। मैंने पहले मार्केस की आत्मकथा ‘लिविंग टू टेल द टेल’ लाइब्रेरी से लाकर पढ़ी थी। मगर एक बार जमशेदपुर पुस्तक मेले में मेरी एक दोस्त ने यह पुस्तक मुझे भेंट की। पुस्तक दोबारा पढ़ी और जो समझ में आया, पढ़ते समय जो उद्गार मन में आए उन्हीं में से कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत है।

वर्षों से कैंसर से जूझते गैब्रियल गार्सिया मार्केस की जिजीविषा गजब की थी। इसके साथ ही उनके पास थी गजब की जीवंतता। ऐसा मस्तमौला फ़क्कड़ व्यक्ति ही ‘लीफ़ स्ट्रोम’, ‘नो वन राइट्स टू द कर्नल’, ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’, ‘क्रोनिकल्स ऑफ़ ए डेथ फ़ोरटोल्ड’, ‘ऑटम ऑफ़ द पैट्रियार्क’, ‘लव इन टाइम ऑफ़ कॉलरा’ जैसी महागाथाएँ लिख सकता है। मकांडो जैसे काल्पनिक स्थान को वास्तविक से भी अधिक वास्तविक रंग दे सकता है। उनका अंतिम उपन्यास था ‘लव एंड अदर डीमन्स’। इस पर और इस पार बनी फ़िल्म पर आजकल जोरों से काम कर चल रहा है। मार्केस की कहानियों के अलावा उनका यही उपन्यास मैंने सबसे पहले पढ़ा था और चकित रह गई थी। वर्जित प्रेम और प्यार में पागल होना की बात को सिद्ध करता यह उपन्यास अपनी मार्मिकता में बेजोड़ है। इसी तरह उनकी कहानी ‘सफ़ेद बर्फ़ पर लाल खून की लकीर’ और ‘संत’ कहानी के अनुवाद के दौरान बहुत गहन और शब्दातीत अनुभव हुए। ‘संत’ एक पिता के सत्ता के गलियारों में भटकने की त्रासद कथा है। जबकि ‘सफ़ेद बर्फ़ पर लाल खून की लकीर’ मस्तमौला युवक-युवती की प्रेम में मरने-जीने की मार्मिक कहानी है। ‘पानी जैसी बहती रोशनी’ और ‘सपनों की सौदागर’ को नहीं भूल सकती हूँ। ‘पानी जैसी बहती रोशनी’ खेल-खेल में होने वाले हादसे से दहलाती है, तो ‘सपनों की सौदागर’ मार्केस के जादूई स्पर्श से साकार होती है। सुनामी का चित्रण सबसे पहले मैंने मार्केस के यहाँ ही पढ़ा-देखा बहुत बाद में टीवी, अखबारों में देखा-पढ़ा। एक बार मार्केस का चस्का लग जाए तो बस आप पढ़ते चले जाते हैं। आज तक तय नहीं कर पाई कि मुझे ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ और ‘लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा’ में से ज्यादा अच्छा कौन लगता है। ‘लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा’ उपन्यास ज्यादा अच्छा लगता है या इस पर आधारित इसी नाम की फ़िल्म।

गैब्रियल गार्षा मार्केस के साक्षात्कारों तथा उन पर लिखे छिट-पुट लेखों से उनके उपन्यास से भी अधिक रोचक जीवन की झाँकी मिलती रही थी। मगर जब 2002 में उन्होंने खुद अपना जीवन शब्दों में पिरोना शुरु किया तो उनके जीवन की धूम मच गई। एक साल के भीतर यह किताब स्पेनिश भाषा से अनूदित हो कर इंग्लिश में उपलब्ध थी। मार्केस अपनी कहानी तीन भागों में लिखने की योजना बनाए हुए थे। पाठकों को बेसब्री से बाकी के दो हिस्सों की प्रतीक्षा थी मगर कहानी सुनाने वाला ही सो गया और अब कभी उन दो हिस्सों की भरपाई नहीं हो सकेगी। उनकी जीवनियाँ तो खूब लिखी जाएँगी मगर अब और आत्मकथा न होगी।

‘लिविंग टू टेल द टेल’ को पूरी तरह से आत्मकथा की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है, यह इसके पार जाती विधा है। इसमें संस्मरण और रेखाचित्र की झलक भी मिलती है। इसमें धड़कता है उस समय का बोगोटा और अराकटाका का इतिहास और भूगोल। खुद को राजनीति न जानने वाले का दावा करने वाले युवा मार्केस तत्कालीन राजनीति का शब्दश: चित्रण करते हैं। यह जीवनी मात्र एक परिवार की कथा न रह कर पूरे देश-समाज की कथा बन जाती है। बीसवीं सदी के तीसरे और चौथे दशक का पूरा करैबियन संसार यहाँ उपस्थित है। यहाँ हुई राजनैतिक हत्या और उसके बाद चली मारकाट की दास्तान कोलंबिया के गृहयुद्ध की जीती-जागती तस्वीर प्रस्तुत करती है। मार्केस के अनुसार वे लोग स्पेन से स्वतंत्रता के साथ शुरु हुआ वही गृहयुद्ध अभी भी लड़ रहे थे। लिबरल्स और कंजरवेटिव्स के बीच की लड़ाई ने हजारों जाने ले लीं। गाबो के जीवन पर सबसे अधिक प्रभाव डाला लोकप्रिय नेता जॉर्ज एलिसर गैटान की हत्या ने। लेखक के अनुसार इसी दिन 9 अप्रिल 1948 को कोलंबिया में बीसवीं सदी प्रारंभ हुई। इस दिन की आगजनी और लूटपाट में वे उपहार में प्राप्त अपना टाइपराइटर खो बैठते हैं। टाइपराइटर जिसे पहले ही दिन उन्होंने गिरवी रख दिया था। उनके दोस्त मारियो वर्गास लोसा ने भी अपना टाइपराइटर गिरवी रखा था। मगर उसके गिरवी रखने के पीछे दूसरी रोचक कथा है।

जिंदगी में प्रारंभ से दोस्तों के बीच गैबिटो और गाबो के नाम से प्रेमपूर्वक पुकारे जाते मार्केस स्त्रियों से खूब प्रभावित रहे। उनकी माँ-नानी उनके जीवन को दिशा देने में प्रमुख भूमिका निभाती रही हैं। युवा मार्केस के जीवन में उनकी प्रेमिका-पत्नी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस आत्मकथा का प्रारंभ भी इसी बात से होता है जब 23 साल के मार्केस को उनकी माँ अपने घर अराकटाका का पैतृक मकान बेचने के लिए अपने संग ले जाती हैं। इस यात्रा ने उनका जीवन बदल दिया। उनके बचपन की स्मृतियाँ सजीव हो उठीं, पाठक उनके परिवार, बचपन और परिवार के बाहर उनके एक विस्तृत परिवार से परिचित होता है। और देखता है कि कैसे वे लेखन की ओर शिद्दत से मुड़ गए। वे यादों की रंगीन बारात सजाते चलते हैं जिसमें भूत-प्रेत और इंद्रियातीत अनुभव हैं, साथ ही है उनके कवि-लेखक, गायक बनने की बारीक दास्तान। इस यात्रा और बाद के चित्रण में उनकी माँ एक ऐसी महिला के रूप में उभरती हैं जिसमें प्रतिउत्पन्नमतित्व, गर्व तथा विट का गजब संयोग है। माँ लुइसा अपने जमाने में इलाके की सबसे खूबसूरत युवती थीं। उनकी माँ की घ्राणशक्ति अनोखी थी और वे कहती कि ईश्वर उन्हें उनके लोगों के विषय में सब कुछ बताता रहता है। माता-पिता के प्रेम और विवाह पर मार्केस ने ‘लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा’ की कथा बुनी है। वहाँ भी नायिका की घ्राण शक्ति बहुत तीव्र है। स्त्रियों की घ्राण शक्ति होती ही बड़ी तीव्र है।

इस नॉस्टाल्जिक यात्रा में वे अपने नाना को याद करते हैं जो ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ के कर्नल हैं। इस उपन्यास को सर्वेंटिस के डॉन खिसोटे के बराबर का सम्मान और लोकप्रियता प्राप्त है। यह उपन्यास बहुत सारी अन्य बातों के साथ-साथ स्मृति और विस्मृति का मिश्रण है। वे कहते हैं कि उनकी स्मृति बहुत कमजोर है मगर असल में मार्केस कुछ नहीं भूलते हैं। नाना ने तीन-चार साल के मार्केस को समुद्र दिखाया था और उनके मासूम प्रश्न के उत्तर में कहा था कि समुद्र के उस पार कोई तट नहीं होता है। बच्चे ने एक बड़ी सच्चाई को जाना था। यहीं ननिहाल में बचपन में उन्होंने कई स्त्रियों से कहानियाँ सुनी थी। इन कहानियों में लोक होता था, मिथ होता था, विश्वास होता था और होता था कल्पना का विपुल संसार। लेखक मार्केस यह विपुल संसार बाद में खुद रचते हैं।

इस पूरी यात्रा के दौरान माँ परेशान है क्योंकि बेटा वह भी परिवार का सबसे बड़ा बेटा लेखक बनना चाहता है। सारी दुनिया में कदाचित कोई माता-पिता अपने बच्चे को लेखक बनने देना चाहता है। माँ क्या जवाब दे उसके पिता को? अराकटाका में रविवार 6 मार्च 1927 को मार्केस को जन्म देने वाली माँ हर समय पिता-पुत्र के बीच ढ़ाल बन कर खड़ी रहती है। यात्रा की समाप्ति पर वह बेटे की नियति स्वीकार चुकी है। मगर मुश्किल है कि यह बात वह अपने पति को कैसे बताएगी-समझाएगी। ‘लिविंग टू टेल द टेल’ आत्मकथा में करीब एक सौ पन्नों के बाद वे खुद और परिवार के सामने घोषणा करते हैं कि वे एक लेखक बनने जा रहे है, कुछ और नहीं बस लेखक। इसी तरह एक दिन ओरहान पामुक ने भी तय कर लिया था कि वे केवल लेखन करेंगे। मो यान ने भी सोच लिया कि वे किस्सागो बनेंगे। वैसे मार्केस ने एक साक्षात्कार में कहा था कि मैं लेखक बनना चाहता था यह बात मैं जब पैदा हुआ तब से ही जानता था, उनकी यही बड़ी-बड़ी बातें हाँकने की अदा मुझे लुभाती है। वे कह सकते थे, मैं पैदा होने के पहले से जानता था मैं लेखक बनूँगा।

इस किताब से गैब्रियल गार्सिया मार्केस की स्मृति का कायल होना पड़ता है। वे एक-एक दिन का हिसाब सिलसिलेवार ढ़ंग से कथा में पिरोते चलते हैं। इस जीवंत कथा को शुरु करने पर पूरा किए बिना छोड़ना कठिन है, हालाँकि हिन्दी के पाठक के लिए करैबियन लोगों और स्थानों के नाम थोड़ा अटकाव पैदा करते हैं। मार्केस का जीवन संयोगों, दोस्तों के संग-साथ से दशा-दिशा प्राप्त करता है। भयंकर गरीबी के बावजूद जीवन मस्ती में कटता है। गरीबी जीवन के आड़े नहीं आती है। उनके जीवन में आए दिन त्रासदी घटती रहती है। रात-रात भर दोस्तों के साथ गाते-पीते घूमा करते मार्केस की तमाम परेशानियाँ हैं मगर वे भौतिक से ज्यादा मानसिक परेशानियाँ हैं। एक लेखक के संघर्ष की कहानियाँ हैं। उनके कई उपन्यासों और कहानियों के पीछे की सच्चाई, उसे लिखते समय उनकी मानसिक दशा को यहाँ देखा जा सकता है। कई बार उन्हें अपने लिखे पर संदेह होता मगर मित्रों का विश्वास उनके लेखक पर से कभी नहीं डिगता है। वे अपनी रचनाओं को प्रकाशन पूर्व कई मित्रों को पढ़ने के लिए दिया करते। पढ़ कर मित्र बेवाक टिप्पणी किया करते। मित्र भी ऐसे-वैसे नहीं थे अपने समय और भविष्य के महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। उन लोगों का एक गुट था जिसमें लेखक, फ़ोटोग्राफ़र और डांसर शामिल थे। इस समूह के लोग आजीवन उनके मित्र बने रहे। ज़बाला, जर्मेन वर्गास, एलवारो सेपेडा सामुडिओ, एलवारो मुटिस, प्लिनिओ मेंडोज़ा से उनका संबंध सदैव बना रहा।

शर्मीले, 1982 के नोबेल पुरस्कार से नवाजे मार्केस की पुस्तक ‘लिविंग टू टेल द टेल’ रोचकता में मार्केस के किसी उपन्यास की तुलना में उन्नीस नहीं ठहरती है। यहाँ भी उनके सारे पात्र पैशन और विचारों के गर्व से संचालित होते हैं, दोस्ती के लिए जान की बाजी लगा सकते हैं। यहाँ अनोखी बातें जिंदगी की दैनन्दिनी का हिस्सा हैं। यह पहला भाग उनके पहली बार देश छोड़ कर यूरोप (जेनेवा) जाने पर समाप्त होता है। मर्सडीज बार्चा जिसे वे तेरह वर्ष की उम्र से लुभाने का प्रयास कर रहे थे इस पुस्तक के अंत में उनके विवाह प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है। 23 वर्ष के मार्केस की यह कहानी उनके बचपन की यादों से प्रारंभ हो कर उनके युवा और प्रौढ़ होने तक की कथा, ‘कमिंग ऑफ़ एज’ की कथा कहती है। लेखन व्यक्ति को अमरत्व प्रदान करता है। बचपन की एक-एक चीज और व्यक्ति को देख कर स्मरण कर मार्केस लिखने को व्याकुल हो उठते हैं, वे लिखने की ऐसी तलब अनुभव करते हैं ताकि मरे नहीं। और लिख कर मार्केस सच में अमर हो गए। वे लिख कर जीवन का कर्ज उतारते हैं।

‘देयर आर नो थीव्स इन दिस टाउन’ में अपना खाका खींचते हुए वे लिखने के दौरान अपने कठोर परिश्रम और अनुशासन की बातें लिखते हैं। बिना परिश्रम और अनुशासन के लेखन संभव नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि इस संघर्ष में वे विजयी हो कर निकलते हैं। लेखकीय जीवन के पहले बीस सालों में मात्र चार किताब लिखने वाले मार्केस कहते हैं कि वे साहित्य के बारे में बात नहीं करते हैं, क्योंकि वे नहीं जानते हैं कि साहित्य क्या है। अगर वे साहित्य के बारे में नहीं जानते हैं तो भला कौन जानता है साहित्य के विषय में? जीवन में जादूगर बनने की चाहत रखने वाले मार्केस अंतत: शब्दों के जादूगर बने वैसे उनका कहना है कि अच्छा होता यदि वे एक टेररिस्ट होते। बचपन से उनकी इच्छा थी कि मित्रों द्वारा प्यार किए जाए। उनकी यह इच्छा भरपूर पूरी हुई। वे कहते हैं कि शब्द मित्र हैं, इन्हीं शब्दों ने उन्हें ढ़ेर सारे मित्र दिए। इसी ने उन्हें नोबेल तथा अन्य पुरस्कार दिए, उन्हें अमर किया। पुस्तक में समय-समय पर मित्रों के कहे कथन उधृत हैं जो दिखाते हैं कि मित्रों को मार्केस के महान लेखक होने में रत्ती भर भी शक नहीं था। मजे की बात है, ऐसा युवा संभावनाशील रचनाकार हवाई जहाज में बैठने से डरता था। वे अपने सेक्स संबंध को खुले में लाते हैं। शादीशुदा मार्टीना फ़ोन्सेका से उनका स्कूल के दिनों में ही संबंध बनता है मगर समाप्त भी हो जाता है। उनके समाज में यौन संबंध का हमारे देश जैसा निषेध नहीं है। इसीलिए वे अपने पिता के संबंधों का भी जिक्र करते हैं। उनके एक सौतेले भाई को उनकी माँ ने अपने बच्चों की तरह पाला था।

खुद मार्केस को विश्वास नहीं होता है जब एक-के-बाद-एक उनकी दो कहानियाँ प्रकाशित हो जाती हैं और मित्र उन्हें सर्वोच्च लेखक के आसन पर बैठा देते हैं। लेकिन इससे भी अधिक आश्चर्य की बात होती है जब इन कहानियों की उस समय के कोलम्बिया के सर्वाधिक प्रसिद्ध आलोचक एडुअर्डो ज़लमिआ बोर्डा नोटिस लेते हैं। बोर्डा ने ‘नई और मौलिक प्रतिभा’, ‘गार्षा मार्केस एक नया और नोटेबल लेखक जन्मा है’ जैसे शब्दों से उन्हें नवाजा। ‘इवा इज इन्साइड हर कैट’, ‘आईज ऑफ़ ए ब्लू डॉग’ उनकी शुरुआती कहानियाँ हैं। उन्होंने अपनी एक कहानी ‘वन डे आफ़्टर सटरडे’ लिख कर एक प्रतियोगिता में भेज दी और उन्हें पुरस्कार स्वरूप तीन हजार पीसोज (वहाँ की करेंसी) मिले। शब्दों में जादू होता है, यह देखना हो तो मार्केस को पढ़ना काफ़ी होगा।

बोगोटा और कार्टेजेना में प्रेस में काम करते हुए पत्रकारिता का जोखिम भरा जीवन जीते हैं मार्केस। सेंसरशिप के बावजूद कभी नाम के साथ और कभी बेनामी लेखों में सत्ता-शक्ति की बखिया उधेड़ते हैं मार्केस। पत्रकारिता करते हुए इस दौरान जो कालजयी काम उन्होंने किया, वह है कोलंबिया की नौसेना के एक जहाज के डूबने और 28 दिन बाद बच निकले व्यक्ति पर किया उनका काम। जिससे पत्रकार के रूप में उन्हें खूब प्रसिद्धि मिली। प्रसिद्धि के साथ-साथ उन्हें सत्ताधारियों का कोपभाजन भी बनना पड़ा। कई स्थानों पर भटकना पड़ा। यह लड़ाई करीब एक दशक तक चली और अखबार बंद कर दिया गया। इस जहाज का एक नाविक तूफ़ान में बह गया था काफ़ी दिनों के बाद जब वह गाँव पहुँचा तो उसके परिवारजन चर्च में उसकी आत्मा के लिए प्रार्थना कर रहे थे। असल में मार्केस ने ‘द स्टोरी ऑफ़ ए शिपरेक्ड सेलर’ में खोज निकाला था कि कोई तूफ़ान नहीं आया था। जहाज गैरकानूनी सामान ले जा रहा था और उस पर जरूरत से अधिक सामान लदा हुआ था। मगर अधिकारियों का संस्करण कुछ और था। मार्केस का संस्करण अधिकारियों को घेर रहा था, इसे वे कैसे पसंद करते। बात काफ़ी बढ़ गई और जब मार्केस यूरोप में थे तानाशाह गुस्टावो रोजस पिनिला (1953-57) की सरकार ने अखबार ही बंद कर दिया। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।

पत्रकारिता से वे शिद्दत से जुड़े थे और खुद को सदैव एक पत्रकार मानते थे। उन्होंने स्वीकार किया है कि पत्रकारिता ने उन्हें रोजमर्रा की घटनाओं-सच्चाइयों पर साहित्य रचने में मदद की है। दिन में वे रिपोर्टर का काम करते और रात को साहित्य रचते। बोगोटा, कार्टिजेना में वे पत्रकार रहे।  बोगोटा के अखबार ‘एल एस्पैक्टैडोर’ के लिए काम करने लगे। उन्होंने ‘एल यूनिवर्सल’, ‘एल हेराल्ड’ आदि कई अखबारों में काम किया। उस समय तक पत्रकारिता कॉलेज में नहीं पढ़ाई जाती थी इसे काम करते हुए सीखना होता था। मार्केस का सौभाग्य था कि उन्हें इस क्षेत्र में बड़े अच्छे गुरु मिले जो किसी तरह की रियायत नहीं देते थे।

परिवार ने उन्हें कानून पढ़ने के लिए बोगोटा भेजा था और वे अच्छे नम्बरों से पास भी होते जा रहे थे मगर उनका मन कोर्स की पढ़ाई में नहीं लगता था। इस समय वे स्पैनिश भाषा में अनुवादित सारा साहित्य भकोस रहे थे। मार्केस ने सारे जीवन जितना लिखा उससे कई गुणा अधिक पढ़ा। उस समय वे स्पेनिश साहित्य के अलावा जॉर्ज लुई बोर्गेस, डी.एच लॉरेंस, अल्डोस हक्सली, ग्राहम ग्रीन, विलियम आइरिश, कैथरीन मैन्सफ़ील्ड, काफ़्का आदि पढ़ने में डूबे हुए थे। अराकटाका और बोगोटा एक ही देश के दो स्थान हैं मगर दोनों की भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक तथा वैचारिक संरचना बिल्कुल भिन्न है। मार्केस लिखते हैं कि अराकटाका ऊष्मा से भरपूर, परिवार और दोस्तों के प्रेम से लबरेज है जबकि बोगोटा एंडीज का एक सुदूर, विषादमय शहर है, जहाँ 16वीं शताब्दी से अनिद्रा से ग्रसित वर्षा निरंतर गिर रही है। इसी विषादपूर्ण वातावरण में उनकी बौद्धिक और भावात्मक विकास की यात्रा प्रारंभ होती है जो आजीवन चलती रहती है। जीवनानुभव, बालपन की स्मृतियाँ साहित्य की थाती बन कर खुलती-खिलती रहती हैं। वे कल्पना और वास्तविकता का ऐसा सम्मिश्रण करते हैं कि पढ़ने वाला चकित रह जाता है। ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सोलिट्यूड’ का बनाना कत्लेआम वास्तविक होते हुए भी पाठक पर जादूई प्रभाव उत्पन्न करता है। मित्र की हत्या आगे चल कर ‘क्रॉनिकल ऑफ़ ए डेथ फ़ोरटोल्ड’ में विकसित होती है। यहीं उन्हें ‘द जनरल इन हिज लेबिरिंथ’ का मसाला मिला था। इस आत्मकथा में वे एक पत्रकार और कहानीकार के रूप में दीखते हैं मगर इस दौरान हुए अनुभव उनके आगे के कई उपन्यासों का कथानक बनते हैं।

खुद गैब्रियल मार्केस, उनका जीवन और उनका लेखन लार्जर दैन लाइफ़ फ़ोर्स है, ‘लिविंग टू टेल द टेल’ उनकी आत्मकथा भी लार्जर दैन लाइफ़ फ़ोर्स है। पाठक को वे वह अनुभव कराते हैं जो उन्होंने अनुभव किया, वो दिखाते हैं जो उन्होंने बचपन और युवावस्था में देखा। इसे पढ़ने के बाद एक बार फ़िर से गैब्रियल गार्सिया मार्केस का समस्त साहित्य पढ़ने की इच्छा जाग्रत हो उठती है।

000

० डॉ विजय शर्मा, 326, न्यू सीताराम डेरा, एग्रीको, जमशेदपुर – 831009

      Mo. 8789001919, 9430381718

      Email : vijshain@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 mins
WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify Sharp Gallery for WordPress Woo Advanced Product Shipping Easy Select and Share Pro Slick Slider Addon for WPBakery Page Builder Sonoran – Responsive WordPress Coming Soon Plugin Ultra Portfolio – WordPress Multimedia Responsive Carousel with Image Video Audio Support – WordPress Plugin Album Gallery – Ultimate WordPress Photo Gallery Plugin WooCommerce PDF Invoice, Packing Slip & Shipping Label Payment Addon for UserPro