लवली गोस्वामी के उपन्यास ‘वनिका’ का एक अंश

सुपरिचित कवयित्री लवली गोस्वामी ने पहला उपन्यास लिखा है उसी उपन्यास ‘वनिका’ के कुछ अंश पढ़िए-

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लवली गोस्वामी

अध्याय -1

अभी इस जगह पर

मैं अभी एक पुलिसवाले के गनपॉइंट पर हूँ। चारों तरफ़ ताबड़तोड़ गोलियाँ चल रही है। मेरे जैकेट की जेब में एक रिवाल्वर है, मैं उसे निकालने के लिए हाथ बढ़ाती हूँ, लेकिन निकाल नहीं पाती। कैसे निकालूं? आखिर मैं किसी फिल्म में तो हूँ नहीं, जहाँ रिवाल्वर कहीं से मिलते ही कहानी के पात्र को उसे चलाना आ जाता है और उसका निशाना भी कभी ग़लत नहीं होता। मैं चुपचाप हाथ खड़े कर देती हूँ। आखिर मैं कोई अपराधी नहीं हूँ! इस वक्त मेरा दिल धौंकनी बना हुआ है। ज़िन्दगी के तमाम अच्छे बुरे पल अभी इस समय मुझे याद आ रहे हैं। लेकिन मैं अभी मर कैसे सकती हूँ! मैंने अभी ही तो ज़िन्दगी शुरू की है। इसके पहले तो मैं बस ज़िन्दगी की तैयारी ही करती रही थी। स्कूल जाना, यूनिवर्सिटी जाना। ढंग की नौकरी ढूंढ़ना। ये ऐसे काम थे जिनके आगे मैंने कभी कुछ सोचा ही नहीं! क्या मैं आज ही मर जाऊंगी? नहीं-नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए। अभी तो मुझे बहुत जीना है। मुझे प्यार करना है। शादी करनी है। अपने बच्चे और फिर उनके बच्चों को बड़ा होते देखना है।

अगर मैं अभी मर गई, तो कभी अपनी विशलिस्ट पूरी नहीं कर पाऊँगी। कभी मिकेलांजलो के डेविड को नजदीक से नहीं देख सकूंगी। कभी यूरोप घूमने नहीं जा सकूंगी और कभी संसार के आखिरी समन्दर के तट पर पत्थर पर बैठ कर डूबते सूरज को नहीं देख सकूंगी। मेरी माँ और छोटा भाई मेरे बिना क्या करेंगे? यह सोच कर मुझे बहुत ज़ोर-से चिल्ला कर रोने का मन हुआ।

यह सब बेहद अजीब है। लेकिन मैं चकित नहीं हूँ, अजीब चीजें मेरे साथ बचपन से होती रही हैं। जैसे सड़क पर चलते हुए कोई अनजान सुन्दर औरत मुझे देख मुस्कुरा देती और अभिवादन में सिर झुकाती। एक बार मैं चलते–चलते ठोकर खाकर गिर गई तो न जाने कहाँ से एक बूढी औरत आई और उसने मेरी खरोचों पर हाथ फेरा। मेरे सारे घाव तुरंत उसी समय ठीक हो गए। मैं कुछ कहती, इससे पहले वह स्त्री न जाने कहाँ गायब हो गई। ऐसा नहीं है कि इन अजीब बातों के बारे में मैंने किसी को बताया नहीं। मैंने अपनी माँ को बताने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने हँस कर टाल दिया। उन्हें लगा, मैं अधिक कल्पनाशील बच्ची हूँ और जानबूझ कर कहानियाँ बना रही हूँ। अधिक बोलने पर लोग मुझे पागल समझने लगते, इसलिए मैं धीरे-धीरे चुप होती गई।

आज मेरे साथी, जोकि मेरे किडनैपर्स भी हैं,  मेरी सुरक्षा करने की कोशिश कर रहे हैं। सामने पुलिस और हम लोगों के बीच जबरदस्त फायरिंग चल रही है। अभी कुछ देर पहले एक गोली मेरी पोनिटेल को छूकर निकली। मैं डर कर चीख पड़ी। क्या मैं इतने सदमे में हूँ? कि यह भी तय नहीं कर सकी कि मुझे भागना चाहिए या नहीं?

मैं यानि मुग्धा शर्मा, एक साधारण युवती आज नामी–गिरामी आर्ट कलेक्टर पी. सी. छब्बर का निजी संग्रहालय लूटने आई हूँ। यह संग्रहालय राजस्थान के एक पहाड़ी महल में है। जी नहीं, आप गलत समझ रहे हैं। मैं पेशेवर अपराधी या चोर नहीं हूँ। और जैसा कि थोड़ी देर पहले मैंने आपको बताया, मुझे इस रिवाल्वर के उपयोग की ज़रा भी जानकारी नहीं है, जो इस वक्त मेरी जेब में है। मैं छब्बीस बरस की एक साधारण-सी लड़की हूँ। पेशे से वायरोलॉजिस्ट हूँ। एक रिसर्च संस्थान में काम करती हूँ। मैंने कभी एक अमरूद भी नहीं चुराया है। मैं अनाथ हूँ और मुझे मेरी माँ की सबसे प्रिय सहेली ने पाला है। कल तक मेरी ज़िन्दगी सींक की तरह सीधी और आसान थी। आज वह टैरो कार्ड के ‘हैंग्ड मैन’ की तरह पेड़ से उलटी लटक रही है।

जो मेरे साथ इस लूट में शामिल हैं, वे मेरे किडनैपर हैं। जिनसे हम लड़ रहे हैं, वह पुलिस है। लेकिन यह भी मेरी बुरी हालत बताने के लिए काफी नहीं है। जिस रिसर्च पर मैं महीनों से काम कर रही थी, वह मुझे बिना किसी को बताये हमेशा के लिए मेरे किडनैपर्स के हवाले करना पड़ेगा। ये लोग मुझे एक ऐसी यात्रा पर लेकर आए हैं, जिसका कारण और गंतव्य दोनों ही मुझे मालूम नहीं है। पिछले १२ घंटे में कई ऐसी बातें हुई हैं, जिनपर विश्वास करना मेरे लिए नामुमकिन है। वैसे तो मेरी पूरी जिंदगी पर ही विश्वास करना मुश्किल है। मेरी ज़िन्दगी में हुई कई घटनाओं का सिरा अगर जोड़ा जाए, तो आपको मालूम होगा कि मैंने एक अविश्वसनीय ज़िन्दगी जी है।

उदाहरण के लिए इसी घटना को ले लीजिए। एक बार कॉलेज में मैं और मेरी सहेलियाँ एक हिस्ट्री-ट्रिप पर पास के जूनागढ़ में एक मध्यकालीन राजा का महल देखने गई थीं। हमने अपने बैग्स लगेज काउंटर पर जमा करा दिए। हमें नंबर वाले छोटे टोकन मिले। टोकन लौटाने पर हमें अपने बैग वापस मिल जाते। मैंने टोकन जीन्स की जेब में रख लिया। वहाँ हमें एक बेसिक मोबाइल फोन जैसा डिवाइस दिया गया। उसके साथ एक सस्ता ईयरफोन भी था। मैंने उसे कान में लगाया और वह डिवाइस ऑन की। उसमें बस एक ही सॉफ्टवेयर लोड था। मैंने सॉफ्टवेयर शुरू करने के लिए ओके का बटन दबाया। सॉफ्टवेयर ने एक पुरुष की आवाज में अभिवादन किया और भाषा का विकल्प पूछा। मैंने हिंदी का विकल्प चुना। यह एक ऑडियो गाइड था, जो महल के एक–एक हिस्से और पास से गुजरने वाली हर चीज़ की डिस्क्रिप्शन बता रहा था। महल में हर जगह नंबर लिखे बोर्ड लगे थे। जैसे ही आप नंबर के पास पहुँच कर वही नंबर फोन में दबाते, वह सॉफ्टवेयर उस जगह की पूरी जानकरी देता था। मैं महल देखते हुए और ऑडियो सुनते हुए घूमने लगी।

ऑडियो हर चीज़ की बारीकियाँ बता रहा था। जैसे महल का यह हिस्सा किसलिए इस्तेमाल होता है, कोई पेंटिंग जो वहाँ लगी है वह किस पेंटिंग की कॉपी है, अगर ओरिजिनल है तो किस चित्रकार ने बनाई है। मैं वास्तु और इतिहास से मुग्ध होकर देखती-सुनती घूम रही थी। मेरे सहपाठी भी आस-पास ही थे।

मैं अपने सहपाठियों के साथ परकोटे पर बने शेड से नीचे की घाटी को देख रही थी। जब तेज़ धूप लगी, तो मेरा ध्यान इस बात पर गया कि सूरज सर पर आ गया है। मैं छाया में जाने के लिए सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी। परकोटे की सीढ़ियाँ जहाँ खत्म होती थी, उसके ठीक सामने, एक छोटा-सा दरवाज़ा था। यह दरवाज़ा उतना अलंकृत नहीं था, जितना कि महल के बाक़ी दरवाजे थे। मैं जब वहाँ से गुजरी, इस दरवाजे का सादापन देखकर आकर्षित हुई। किसी अज्ञात प्रेरणा ने जैसे मेरे कदम रोक लिए हो। मैं वहाँ ठिठकी। तभी मेरी आडियो फ़ाइल पॉज हो गई। मैंने सोचा, शायद मुझसे गलती से पॉज का बटन दब गया होगा। मैंने उसे दुबारा चालू करने के लिए ‘प्ले’ बटन दबाया।

तब, पहले फोन से एक मधुर धुन सुनाई दी। फिर एक स्त्री की बहुत मधुर आवाज आई।

 “मुग्धा, इस तरफ़ आओ।” उस स्त्री स्वर ने कहा।

मैं संगीत और इस पुकार से मंत्रमुग्ध-सी हो गई — जैसे किसी सम्मोहन में होऊं। मैंने एकदम नहीं सोचा कि फोन में इस तरह एक सॉफ्टवेयर से कोई मुझसे बात कैसे कर सकता है? उसी सम्मोहन की दशा में मैं उस सादे एकाकी दरवाजे की तरफ़ बढ़ी। मेरे हाथ लगाते ही दरवाज़ा खुल गया। वहाँ हलकी रोशनी थी। आवाज और पुकार के सम्मोहन से बंधी मैं बिना रुके आगे बढ़ती ही जा रही थी। मुझे महसूस हो रहा था, जैसे कोई मुझे लगातार पुकार रहा हो। आगे एक गलियारे को पार करके मैं एक अजीब-से गोल कमरे में पहुँची। वहाँ ज़मीन पर एक चाकू रखा था, हल्की रोशनी में भी चमकता हुआ।

अध्याय -2

अ वॉक डाउन द मेमरी लेन

 

 

मैं आगे की कहानी बताऊँ, इससे पहले आप का यह जानना ज़रूरी है कि मेरे माता–पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। मेरे बचपन में उनकी मृत्यु हो गई थी। मुझे मेरी माँ की सहेली सरला शर्मा ने पाल-पोसकर बड़ा किया है। मैंने अपने माँ–बाप को सिर्फ़ तस्वीर में देखा है।

अब फिर से उस गोल कमरे की बात —

क़ायदे से इस वक्त कोई भी आम इन्सान यह सोचेगा कि इस टूरिस्ट स्पॉट में ज़मीन पर पड़े इस चाकू का क्या अर्थ है? किसने इसे यहाँ रखा होगा? यह यहाँ कैसे आया होगा? लेकिन जाने क्यों, मैं यह जिज्ञासा महसूस नहीं कर रही थी। न जाने उस जगह में, उस माहौल में, ऐसा क्या था कि मुझे लगा, मैं दुःख और अवसाद से इस कदर घिरी हुई हूँ कि मेरे जीवन का कोई अर्थ नहीं है! मुझे एक आदमी की दर्द-भरी चीख सुनाई दी। फिर एक औरत के सिसकने की आवाज आई। फिर किसी ने मेरा नाम पुकारा। मैंने सामने देखा, तो मुझे अपने असली माता–पिता के चेहरे दिखाई दिए।

अनुभा कौशल और समर्थ कौशल।

मुझे महसूस हुआ कि वे दोनों मुझे अपने पास बुला रहे हैं। वे मुझे देख मुस्कुरा रहे थे। बीच-बीच में रो भी रहे थे। मैं भी कुछ रोती, कुछ मुस्कुराती-सी बुदबुदाई।

“क्या आप मेरे माँ–पापा हैं?”

“हाँ मुग्धा, हम ही हैं।” मेरे पिता समर्थ कौशल बोले।

“क्या आपने मुझे बुलाया? फोन में आपकी आवाज थी माँ?” मैंने माँ को देखकर पूछा।

“हाँ, मैंने ही तुम्हें आवाज दी थी! मुग्धा, आओ! हमारे पास आ आओ! हमारे सीने से लग जाओ!”

माँ ने वात्सल्य में भरकर बांहें फैला दी। मैं किसी अबोध बालक की तरह उनसे लिपटने के लिए आगे बढ़ी। लेकिन उनकी देह तो जैसे हवा से बनी थी। मैं उन्हें छू नहीं पा रही थी।

“माँ!!” मैंने प्रश्नसूचक नज़रों से माँ–पापा की तरफ़ देखा।

“तुम्हारी देह तुम्हें हमसे अलग कर रही है, मुग्धा। उस दुनिया को छोड़ दो! इस देह से मुक्त हो जाओ! फिर हम सब यहाँ साथ रहेंगे। फिर कभी कोई हमें अलग नहीं कर सकेगा।” मेरी माँ अनुभा बोली।

मुझे ठीक लगा। मुझे लगा, मुझे अब जीवन की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं हमेशा से जो चाहती थी, वह मुझे मिल रहा है। मैंने पास पड़ा चाकू उठा लिया। मैंने अपना हाथ काटने की कोशिश की ही थी कि तभी मेरे माता–पिता की आकृति को चीरती, एक सजी-धजी अजनबी स्त्रीकाया हवा में प्रकट हुई। उसने मेरी आँखों के पास हथेली खोली। उसकी हथेली में कोई बैंगनी पाउडर था। उसने उस पर फूंक मारी। मैं तुरंत बेहोश हो गई। यह सब बहुत तेज़ी से हुआ। उस स्त्री ने सही समय पर मुझे आत्महत्या करने से रोका था, फिर भी मेरी कलाई में चाकू की खरोंच का ज़रा-सा निशान बन ही गया था। मैं पाउडर के प्रभाव से तुरंत बेहोश हो गई। इसके साथ ही मेरे हाथ से छूटकर चाकू वहीं गिर गया। मैं ज़मीन पर गिरने ही वाली थी कि उस स्त्री ने मुझे थाम लिया। इसके बाद जब मुझे होश आया, तो मैं अपनी टूरिस्ट बस में एक खिड़की के शीशे से सर टिकाये बैठी थी और मेरी सहेलियाँ दिन-भर के ट्रिप के बारे में बातें करते हुए हंस रही थीं।

मेरा सर भारी था।

“मैं यहाँ कब आई?” मैंने बगल में बैठी लड़की से पूछा।

“तुम कब आई, तुम्हें ही मालूम होगा न। हमें नहीं मालूम। जब हम यहाँ आए, तो तुम सीट पर बैठी, खिड़की के कांच पर सर रखे सो रही थी।” वह मुँह बिचका के बोली।

मैं अक्सर ‘बुली’ की जाती थी। मेरी सहपाठिनों ने मेरा नामकरण भोंदू, वीयर्ड और न जाने क्या-क्या कर रखा था। मैंने सीट से उचक कर सर उठा कर पूरी बस को देखा। वहाँ मेरे सहपाठियों और टीचर्स के अलावा कोई नहीं था। सब सामान्य ढंग से हंस रहे थे और बातें कर रहे थे। फिर मैंने अपनी कलाई देखी। वहाँ ज़रा-सी खरोंच थी। यानि चाकू वाली बात सपना या मेरा भ्रम नहीं था। मैं किसी से इस बारे में बात करना चाहती थी, लेकिन न जाने क्यों मुझसे कुछ कहा नहीं गया। बचपन से जब भी मैं कुछ अजीब होता देखती और किसी से कहने की कोशिश करती थी, लोग मेरा मजाक उड़ाते थे।

फिर भी मैंने अपनी सहपाठीन तृष्णा से पूछा, “अच्छा सुनो, क्या महल में मिले फोन में कोई म्यूजिक बजा या किसी औरत की आवाज सुनाई दी थी?”

“नहीं तो! हमारे फोन में तो मेल गाइड की आवाज थी। क्यों तुम्हारे में कुछ स्पेशल था क्या?”

तृष्णा ने व्यंग से कहा। फिर वह मुड़ी और चार-पांच सीट पीछे तक आवाज सुनाई दे, इतना चिल्ला कर बोली:

“अरे, सुनो सब! मुग्धा मैडम को महल में स्पेशल ट्रीटमेंट मिला! इनके फ़ोन में कोई औरत थी और उसने इनको म्यूजिक भी सुनाया! हा हा!… क्या वह तुम्हारी मरी हुई माँ थी, मुग्धा?”

तृष्णा ने चिढ़ाने के लहजे में कहा और सब खी–खी करके हंस पड़े। मैं रुआंसी हो गई। आंसू छिपाने के लिए मैंने खिड़की की तरफ़ मुँह फेरा और सोने का नाटक करके आँखें बंद कर ली। वह बचपन था, जब मैंने सोचा था कि इससे अजीब मेरे साथ क्या हो सकता है। आज, अभी, मुझसे कोई कहे कि उसने आसमान से हाथी बरसते देखा या तालाब में बतख की जगह ऊंट तैरते देखे, तो मुझे रत्ती-भर भी अजीब नहीं लगेगा।

अभी इस जानलेवा भिड़ंत के समय मैं बुरी तरह डरी हुई हूँ। मुझे मर जाने का डर नहीं है। डर है अपनी पालने वाली माँ सरला शर्मा और भाई अनूप से फिर न मिल पाने का। मुझे कुछ करना होगा, मैं उन्हें इस दुनिया में अकेला छोड़कर नहीं मर सकती। थोड़ी देर पहले मैंने गोलियों से डर कर कान बंद कर लिए और झुक कर मलबे में छिप गई थी। जब मैंने फायरिंग के बीच आँखें खोली, तो वह आदमी जो मेरी सुरक्षा करने की कोशिश कर रहा था, अब मेरे बगल में लाश बनकर पड़ा और मैं पुलिस वाले के गन पॉइंट पर थी। यह सब एक बुरे सपने सपने जैसा है, एक ऐसा सपना जिससे आप निकलना चाहें, लेकिन निकल न सकें। आप सोच रहे होंगे,  मेरे साथ यह सब कैसे और क्यों हुआ? मैं आगे आपको यही बताना चाहती हूँ।

अध्याय -3

रात जैसी एक रात

 

 

 

लेकिन उससे पहले मैं यह बताती हूँ कि मैं यहाँ कैसे पहुँची। अचानक ही एक दिन मैंने पाया कि मैं एक रेगिस्तान में फटे चीथड़ों में चली जा रही थी। मेरे पैर में चप्पल नहीं है। रेत में जलकर मेरे पाँव पूरी तरह जामुनी–काले पड़ गए हैं। मुझे प्यास लगी है।

“कोई है?” मैं जोर से आवाज देती हूँ।

कोई जवाब नहीं आता। मैं थक कर वहीं रेत पर धम्म-से बैठ जाती हूँ।

थोड़ी देर बैठे रहने के बाद मैं फिर हिम्मत करके उठती हूँ। आगे बढ़ती हूँ। कुछ कंटीली झाड़ियों के अलावा दूर–दूर तक किसी जीवित चीज़ का निशान नहीं दिखता। मेरे सर पर तेज़ चमकता लगभग चीत्कार करता सूरज आग बरसा रहा है। मेरे गले में इतनी प्यास है कि लगता है, यह प्यास, दांत और जीभ सहित मुझे अन्दर खींच कर, मुझे मेरे ही पेट में पटक देगी। मेरा सर चकरा रहा है। पाँव टेढ़े–मेढ़े पड़ रहे हैं। हर क़दम के साथ मैं बालू की तरफ़ थोड़ा और झुकती जा रही हूँ। अब गिरी कि तब गिरी।

धड़ाम!!

मैं रेत और गरमी से और नहीं लड़ सकती। अब मेरा आधा शरीर बालू में धंसा है। आधा चेहरा भी बालू में धंसा है। बालू से स्पर्श पाकर मेरा शरीर जल रहा है। मैं मर रही हूँ। या फिर मैं अग्नि की शय्या में सो रही हूँ। आग धीरे-धीरे मुझे जला रही है, मैं धीरे–धीरे अन्दर धंस रही हूँ। यह शय्या मुझे खा रही है। रेत के कण आग के असंख्य नुकीले दांत हैं। मैं इनमें इतना फंस चुकी हूँ कि बाहर निकल नहीं सकती। मैं दर्द और जलन से बिलबिला रही हूँ, लेकिन रेगिस्तान ने बिलबिलाने की ताकत भी मेरी देह से छीन ली है। मेरी आत्मा चीत्कार करना चाहती है, लेकिन देह ने समर्पण कर दिया है। मैं आधी बेहोशी, आधी जाग के बीच हूँ। निस्सहाय। तभी अचानक मुझे महामृत्युन्जय मन्त्र सुनाई देता है। मेरी आंखें खुलती हैं। यहाँ कोई रेगिस्तान नहीं है। यह एक सपना है, जो मैं पिछले कई साल से लगातार देखती आ रही हूँ। जो मन्त्र मुझे सुनाई दिया, वह मेरे ही फोन की रिंगटोन थी। लेकिन मेरा फोन कहाँ है? मैं कहाँ हूँ? यह कौन सी जगह है?

स्वप्न से मेरी आँखें खुलीं, तो सर में भारीपन और तेज़ दर्द महसूस हुआ। मैंने सर उठाया और सामने की तरफ़ देखा। आगे अंधकार था। मेरी नज़र धुंधली–धुंधली सी आगे के अंधकार को टटोलने की कोशिश करने लगी। मैं एक कमरे में हूँ। सामने की दीवार पर अलमारी बनी है। उस पर एक जलती लालटेन रखी है। उसकी रोशनी में मैंने देखा कि वहाँ एक छोटी टेबल और लोहे की एक कुर्सी रखी थी। लोहे का एक दरवाज़ा था, जो बंद था। और कुछ भी नहीं था। मैंने हाथ से अपना सर छूना चाहा। लेकिन मेरे हाथ बंधे थे। मैंने अपने पैर देखे, वे भी बंधे थे। मैं छटपटाई। मैंने हाथ-पैर रस्सी से निकालने की कोशिश की। इससे मेरी कलाई और पिंडलियों में बने खरोचों के निशान पर रस्सी से रगड़ खाने की वजह से दर्द शुरू हो गया। मैंने दर्द से हारकर यह कोशिश बंद कर दी।

बाहर चल रही हवा की सांय–सांय अन्दर कमरे में भी गूंज रही थी। अन्दर ठंड थी। मैंने आज ऑफिस के लिए घर से निकलते समय, आसमानी पेंसिल स्कर्ट पहनी थी। मेरी खुली जख्मी टांगों को दरवाजे की दरारों से छनकर आती हवा छूती, तो लगता, जैसे किसी ने जख्म पर गोयठा रगड़ दिया है। उन पर लगा खून अपने थक्के बना चुका था। ज़ख्म गहरे नहीं थे। बस ऊपरी चमड़ी छिली हुई थी। मेरे हाथों, पैरों और कपड़े में थोड़ा-बहुत सूखा कीचड़ लगा था।

कमरे में कहीं से किसी जानवर की सड़ी हुई लाश की तेज़ गंध आ रही थी। मुझे जोर की उबकाई आने लगी। डर वैसे भी मेरे अन्दर एक अजीब उबकाई वाली स्थिति पैदा कर देता है। यहाँ तो इतनी गंध थी कि कोई और वक्त होता, तो भी मैं उल्टी कर देती। अभी तो मुझे ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे मेरे पेट में एक बड़ा-सा ब्लैकहोल है। मैं कितनी भी उलटी करूंगी, यह बाहर नहीं आएगा। इस डरावनी जगह की सारी मनहूसियत, डरावनापन और अंधकार जैसे मेरे पेट में अन्दर घुसे ब्लैकहोल में समाता जा रहा है। मैंने इधर–उधर देखने की कोशिश की। मुझे कोई इन्सान नहीं दिखा। यह एक बड़े कमरे जैसी जगह थी। इतनी बड़ी नहीं कि इसे हॉल कहा जाए, इतनी छोटी भी नहीं कि इसे कमरा मान लिया जाए।

भय, दर्द और घबराहट में उबकाई नियंत्रित करते हुए मैंने याद करने की कोशिश की कि मैं आखिर यहाँ कैसे पंहुची। जैसा कि मैंने आपको पहले बताया, मैं मुग्धा शर्मा, अंतरराष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त वायरोलाजिस्ट हूँ। इस समय पूरी दुनिया एक संक्रामक महामारी के खतरे से लड़ रही है, जिसका इलाज किसी के पास नहीं है। यह वायरस, रेस्पीरेशन सिस्टम को निशाना बनाता है। इसके संपर्क में आने के दो दिन बाद लोग सांस फूलने और बुखार की वजह से मर जाते हैं। यह महामारी कुछ–कुछ इक्कीसवीं सदी के उन्नीसवें साल में फैले कोविड की महामारी की तरह ही है। अंतर बस इतना है, उसमें करीब–करीब सत्तानबे-अट्ठानबे प्रतिशत लोग इन्फेक्ट होने के बाद भी बच जाते थे, जबकि इस महामारी में बचने वालों का प्रतिशत उससे बहुत कम है। पूरी दुनिया के चिकित्सक और जीव विज्ञानी इसका हल ढूंढ़ना चाहते हैं, लेकिन कोई भी अब तक इसका हल ढूँढ़ने के करीब नहीं पहुंचा है। जहाँ तक मेरी बात है, वह कुछ अलग है। मुझे मेरे सपने में भी इस वायरस के संभावित वैक्सीन ही नज़र आते हैं। मैंने इस पहेली को हल करने के लिए साल भर से दिन-रात का कोई पहर नहीं देखा। मैं पागलों की तरह काम करती थी। सिर्फ़ खाने और सोने के लिए घर जाती थी। घर जाकर भी मैं पांच–छः घंटे से अधिक नहीं सो पाती थी। किडनैपिंग की रात जब मैं नौवें माले के टॉप फ्लोर में बनी अपनी लैब से निकली, तब रात के साढ़े बारह बज रहे थे। देर रात का समय था, इसलिए सब लोग घर जा चुके थे। सिर्फ़ ऑफिस का रात का चौकीदार गोरखा रौशन ही इस समय ड्यूटी पर होता है। मैं कैब बुक करके बाहर आई। मैंने देखा कि वह अपनी कुर्सी पर नहीं था। हालाँकि उसकी कुरसी के पास थोड़ी रोशनी दिखाई दे रही थी। शायद वाशरूम गया होगा। मैंने एक बार चारों तरफ़ देखा। घोर अँधेरे में वह ज़रा-सी रोशनी वाली जगह ऐसी दिख रही थी, जैसे अन्धकार के समन्दर में उजाले की छोटी कश्ती। युक्लिप्टस के पत्ते और डालियाँ हिलतीं, तो रोशनी का दायरा भी हिलता। अंधकार आगे बढ़कर रोशनी की नैय्या डूबो देना चाहता था। मैं तेज़ चल रही थी। मुझे अपनी ऊबर कैब के लिए इस रिसर्च इं‍न्स्‍टिट्‌यूट के बाहर वाली रोड तक जाना था। मोबाइल एप में कैब आने में बस एक मिनट का समय दिखा रहा था।

अधिकतर यह होता था कि रौशन मुझे देखते ही उठ खड़ा होता और मुझे बाहर वाली सड़क तक छोड़कर आता। वह अक्सर कहता था कि मुझे अब अपने लिए कार ले लेनी चाहिए, लेकिन मैं लगातार काम की वजह से इस खरीद को टालती जा रही थी, जिसका मुझे अभी अफ़सोस हो रहा है। दूर से सड़क एकदम ख़ाली दिख रही थी। मेन गेट पार करके जैसे ही मैं कम्पाउंड के पार बाहरी सड़क पर आई, किसी ने मेरे मुँह पर कपड़ा रखकर मेरे मुँह–नाक को जोर-से दबाया। इसके बाद मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। फिर आगे मुझे कुछ याद नहीं है।

मेरे सर में अब भी बहुत दर्द था। लेकिन मैंने खुद को संयत किया। डर पर काबू पाने की कोशिश करने के बाद मैं अपने चारों ओर के वातावरण को ध्यान से देखकर समझने की कोशिश करने लगी। कई बार आँखें खोलने और बंद करने के बाद जब मैंने आँखों को सिकोड़ कर देखा तो टेबल पर मुझे मेरा पर्स पड़ा दिखाई दिया। उसमें मेरा मोबाइल भी होगा, जो थोड़ी देर पहले एक बार बजा था। अगर मैं किसी तरह उस तक पहुँच जाऊं, तो शायद मदद के लिए किसी को बुला सकूं, किसी को कोई मैसेज या कॉल कर सकूं। मैंने कुर्सी हिलाने की कोशिश की, लेकिन वह एक खंभे से बंधी हुई थी। थोड़ी-बहुत खड़-खड़ की आवाज के अलावा मेरी कोशिशों का कोई परिणाम नहीं निकला।

इतने में कमरे में मौजूद एकमात्र दरवाजे के पार कुछ हलचल हुई और कुछ आवाजें सुनाई दीं। मैंने कुर्सी और शरीर हिलाना बंद कर दिया। शायद ये मेरे किडनैपर होंगे। मुझे नहीं मालूम, ये लोग कौन हैं और मुझे यहाँ क्यों लेकर आए हैं। लेकिन अगर इन्हें मुझे मारना होता या मेरा बलात्कार करना होता, तो अब तक कर चुके होते। मेरे कपड़े सही-सलामत हैं और शरीर में मामूली खरोचों के अलावा कोई और दर्द नहीं है। मतलब इन्हें मुझसे कुछ और चाहिए। लेकिन क्या? मेरे घर वालों से फिरौती? या फिर ये ह्युमन ट्रैफिकिंग से जुड़ा कोई रैकेट है? मैंने आँखें बंद करके बेहोश होने का अभिनय किया, जिससे जब वे अन्दर आएं, मैं उनकी बातें सुन सकूं। मुझे दरवाज़ा खुलने की आवाज आई और फिर कुछ लोग अन्दर आए। मैं सिर एक तरफ़ लुढ़काए, केशों के बीच अपना चेहरा गाड़कर अचेत होने जैसी मुद्रा बना, चौकन्नी होकर, सुनने की कोशिश करने लगी। मेरे चेहरे पर अचानक तेज़ रोशनी आई। पता नहीं, उन्होंने रोशनी के लिए क्या इस्तेमाल किया था, जिसकी वज़ह से यह बहुत तेज़ रोशनी पैदा हुई थी। मेरी आँखें बंद थी, लेकिन फिर भी बंद आँखों को यह असह्य-सी प्रतीत हो रही थी।

“मुझे पता है, तुम होश में हो मिस मुग्धा, यहाँ चारों तरफ़ कैमरे लगे हैं। हमें दिखाई दिया कि तुम होश में आई थी। और फिर हमें अन्दर आता जानकर तुमने यह नाटक किया। इसलिए हमसे बात करो। इसमें ही तुम्हारी भलाई है!”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। वैसे ही एक्टिंग करती रही। कौन है यह आदमी? इसे मेरा नाम पता है! आखिर ये मुझसे क्या चाहता है?

अध्याय -4

परछाइयों की दौड़

 

 

 

 

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। वैसे ही एक्टिंग करती रही। आँखें नहीं खोली।अचानक मेरे शरीर से कई लीटर बर्फीला पानी टकराया। लगा, जैसे किसी ने मेरी पूरी देह को बर्फ के चिलचिलाते कुंड में डाल दिया हो। मुझे इसकी बिलकुल उम्मीद नहीं थी। मैं थोडा चौंकी। फिर भी मैंने बेहोश होने का नाटक जारी रखा। मेरे केशों ने मेरा चेहरा ढंक रखा था। मैंने अपने आप को एकदम स्थिर किये रखा। ज़रा भी नहीं हिली। उनकी तरफ़ से कोई आवाज नहीं आई। शायद वे लोग इशारे में बातें कर रहे थे।

“अगर तुम आँखें नहीं खोलोगी, तो मजबूरन हमें तुमको पैर में गोली मारनी पड़ेगी! शायद इससे तुम अपना यह नाटक बंद कर दो!”

फिर से वही आवाज आई। मैंने कोई हरकत नहीं की। इतने में गोली चलने की आवाज आई। लगा, मेरे दाहिने कान के पास किसी ने झन्नाटेदार बम फोड़ दिया हो। उनमें से किसी ने शायद मुझे डराने के लिए मेरे कान के पास से रिवाल्वर फायर किया था। मैं डर और आवाज की तीव्रता से चीख पड़ी।

“अब ठीक है!” उसी आवाज ने कहा।

“कम से कम अब हम बात कर सकते हैं!”

मैंने आँखें खोल दी थी। सामने देखा, रोशनी इस तरह से की गई थी कि मैं सिर्फ़ सामने मौजूद लोगों की आदमकद छायारेखा ही देख पा रही थी। जैसे किसी ने उन्हें कार्डबोर्ड के पुतले-सा काट कर रोशनी के आगे खड़ा कर दिया हो। उनका चेहरा, वेशभूषा, कुछ भी साफ़ नहीं दिख रहा था। वे आठ-दस लोग थे। जिसमें से एक, उसी कुरसी पर बैठा हुआ था, जिसे मैंने थोड़ी देर पहले टेबल के पास रखे देखा था। बाकी सात उसके दोनों ओर हाथ बांधे बॉडीगार्ड्स की तरह खड़े थे। वे सब काले सूट और काले जूते पहने थे। उनके कानों में सीक्रेट एजेंट्स की तरह माइक्रोफोन के घुंघराले तार लगे दिख रहे थे। मैंने जोर डालकर देखने की कोशिश की कि क्या उन्होंने काले चश्मे भी पहने हैं। शायद अभी रात के समय यह ज़रूरी नहीं था। मुझे चश्मे नहीं दिखे। वैसे भी मैं उनकी आँखें देख नहीं पा रही थी, तो यह कोशिश गैर ज़रूरी थी। ऐसे लोग चश्मे पहनते ही इसलिए हैं कि लोग उनकी आँखों की मूवमेंट्स न देख सकें। लोग यह न जान पाएं कि वे कहाँ देख रहे हैं। उनका पहनावा एकदम फिल्मों में दिखने वाले हाई प्रोफाइल सिक्युरिटी एजेंट्स जैसा था। आखिर ये कौन लोग हैं? मुझसे क्या चाहते हैं? क्या ये कोई सरकारी एजेंट हैं? अगर ऐसा है, तो मुझे ऐसे गैर कानूनी तरीके से अपहरण करके क्यों लाते? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। तभी उनमें से एक बोला:

“मैं सीधे मुद्दे पर आता हूँ। तुम शायद यही सोच रही होगी कि तुम यहाँ क्यों हो? और हम कौन हैं? यह भी कि हम तुमसे क्या चाहते हैं? हम कौन हैं, यह जानना तुम्हारे लिए ज़रूरी नहीं है। लेकिन यह ज़रूर तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण है कि हम तुमसे क्या चाहते हैं। हम जानते हैं कि तुम मिरेकल रिसर्च इंस्टिट्यूट में बतौर वायरोलोजिस्ट काम करती हो। और यह भी कि तुम्हारा काम मूलतः इस बात का इलाज ढूंढ़ना है कि कोशिका में अनचाहा ग्रोथ क्यों होता है। कैसे एक स्वस्थ कोशिका एक जहरीले ट्यूमर का रूप ले लेती है। इन शॉर्ट, तुम कैंसर और ऑटो-इम्यून बीमारियों के इलाज की राह ढूंढ़ रही हो। लेकिन हमारे लिए जो ज़रूरी है वह ये कि अभी संसार में जो महामारी फैली है, तुम उसका इलाज ढूंढ़ने वाली टीम की हेड भी हो। हम यह भी जानते हैं कि तुम इस गुत्थी को सुलझाने के बहुत करीब हो, शायद आने वाले कुछ दिनों में तुम इसे हल भी कर लोगी। हम सिर्फ़ इतना चाहते हैं कि तुम अपनी अब तक की रिसर्च और उसका आउटकम हमारे हवाले कर दो। साथ ही, हमें तुम्हारी माँ का दिया हुआ तुम्हारा पुश्तैनी लॉकेट भी चाहिये, जो हमें तुम्हारे शरीर और तुम्हारे फ्लैट में कहीं नहीं मिला।”

“और मैं ऐसा क्यों करूँ?”मैंने पूछा।

“क्योंकि अगर तुमने ऐसा नहीं किया, तो इससे तुम्हारे परिवार पर खतरा आएगा। यह देखो।”

उसने एक लैपटॉप आगे किया। उसमें दो भाग में विभाजित स्क्रीन दिख रहा था। मैंने गौर से देखा। उसमें मेरा गाँव वाला घर दिख रहा था, जिसके एक कमरे में सरला माँ सो रही थी, दूसरे में मेरा छोटा भाई अनूप। एक नकाबपोश इन्सान उसके पलंग के ठीक सामने खड़ा था। उसके हाथ में बन्दूक थी, जिससे उसने माँ के सिर पर निशाना लगा रखा था। भाई के कमरे में दो लोग थे। दोनों नकाबपोश थे। वे चुपचाप उसकी निगरानी कर रहे थे। यह पहले की रिकार्डेड फूटेज थी, यानि इन्होंने ज़रूर उन्हें बंदी बना रखा होगा।

सरला माँ मेरी असली माँ नहीं है। उसने मुझे बस पाला है। मेरी असली माँ अनुभा कौशल उनकी सहेली थी। एक दिन की बात है, मेरी माँ मुझे लेकर सरला शर्मा के दरवाजे पर प्रकट हुई। सरला शर्मा बहुत दिन बाद घर आई अपनी सहेली को देखकर खुश हुई। उसका सत्कार किया। देर रात तक वे दोनों बचपन की बातें करती रहीं। फिर माँ ने रात-भर उसी घर में रुकने की इच्छा ज़ाहिर की, जिसे सरला शर्मा ने सहर्ष मान लिया। सुबह जब सरला शर्मा चाय देने गई, तो कमरे में उसकी सहेली नहीं थी। सिर्फ़ उसकी बच्ची यानि मैं थी। मेरे पास एक सोने की एक चेन पड़ी थी, जिसमें एम्बर जैसा दिखने वाला एक लॉकेट था। पास ही एक खत था, जिसमें लिखा था कि एक दिन मेरी माँ अपनी बेटी को लेने ज़रूर आएगी। तब तक सरला शर्मा ही उसका पालन–पोषण करे। जो नेकलेस वह छोड़कर जा रहीं है, उसे किसी क़ीमत पर मुझसे अलग न किया जाए और जब बेटी बड़ी हो जाए, तो उसे माँ की निशानी और विरासत के तौर पर यह नेकलेस दे दिया जाए। माँ ने मेरे लिए अपनी और मेरे पिता की एक तस्वीर भी छोड़ी थी।

मुझे एकदम समझ नहीं आ रहा था कि इन लोगों को मेरे रिसर्च के बारे में इतना कैसे पता है? और भला बीस हज़ार से भी कम के उस मामूली आभूषण में इनकी इतनी क्या रुचि है ?

“लेकिन वह नेकलेस तो अब मेरे पास नहीं है।” मैंने कहा

“क्या? फिर वह कहाँ है?”

“मुझे कैसे मालूम होगा! पढ़ाई के अंतिम साल मैंने फीस भरने के लिए उसे एक लोकल लोन शार्क को उन्नीस हज़ार में बेच दिया था।”

“किसे बेचा था? बताओ वरना माँ और भाई की मौत की जिम्मेदार तुम होगी!”

“दामोदर नगर के चौराहे के पास वाली जूलरी शॉप में बेचा था। तुम मुझसे उसके बदले पैसे ले लो। लेकिन मेरे परिवार को कुछ नहीं करना।”

“तुम समझती हो, हम तुम्हें यहाँ पैसे के लिए लाये हैं, मुग्धा। तुम्हारी रिसर्च और तुम्हारी माँ का पेंडेंट हमारे लिए दोनों चीजें बहुत ज़रूरी है, और हमें दोनों चाहिए। हमारे पास अधिक समय नहीं है। जब तक दोनों चीजें हमें मिल नहीं जातीं, तुम हमारी मेहमान रहोगी, और उन्हें हासिल करने में हमारी मदद करोगी।”

“और अगर उसने वह पेंडेंट किसी और को बेच दिया हो तब? क्या तुम मुझे मार डालोगे?” मैंने पूछा।

“हम धरती के अंतिम आदमी से भी वह लॉकेट हासिल कर लेंगे। इसकी चिंता तुम मत करो। बस हमसे झूठ बोलने की कोशिश मत करना!”

“मैं समझ नहीं पा रही उस मामूली से लॉकेट के लिए तुम इतने बेचैन क्यों हो? और तुम मेरी माँ को कैसे जानते हो?”

मेरे मन में सवालों की सुनामी आई हुई थी। मैं सबके जवाब चाहती थी।

अध्याय -5

एक अनजाने सफ़र की शुरुआत

 

 

 

“तुम्हारा काम सवाल पूछना नहीं है! इन सवालों का जवाब हम तुम्हें नहीं दे सकते। यह हमें अंदाज़ा नहीं था तुमने वह नेकलेस बेच दिया होगा! तुम्हारे लिए कपड़े हैं। पहन लो और अपनी हालत सुधार लो। सबसे पहले हम पेंडेंट ढूँढ़गे, फिर तुम्हारे रिसर्च सेंटर जाएंगे। हमें नहीं पता तुम सच बोल रही हो या झूठ, इसलिए जब तक डाटा और पेंडेंट हमें मिल नहीं जाते, तुम भी हमारे साथ रहोगी और मिशन में भी हमारे साथ चलोगी।”

“लेकिन मैं यह कैसे मान लूं कि तुम डाटा और पेंडेंट मिलने के बाद मुझे और मेरे परिवार को छोड़ दोगे?” मैंने पूछा।

धीमी हंसी के साथ वह आदमी बोला:

“हमारी बात मानने के अलावा क्या तुम्हारे पास कोई और रास्ता है? क्या तुम अपने परिवार वालों की मौत की जिम्मेदार होना चाहती हो? अगर नहीं, तो हम जैसा कहते हैं, वैसा करो। तुम्हारे लिए जो नए कपड़े हैं, तुम इन्हें पहन लो। हम नहीं चाहते तुम्हारे जख्म और फटे कपड़ों को देखकर किसी को शक हो और बेकार में हमें और खून बहाना पड़े। हम जैसा कहते हैं, करते जाओ तो तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी और अगर तुमने कोई चालाकी करने की कोशिश की, तो तुम और तुम्हारा परिवार, दोनों बेमौत मारे जाएंगे। हम थोड़ी देर में वापस आएंगे। अब चुपचाप कपड़े पहनो और मिशन के लिए तैयार हो जाओ।”

मेरे मन में कई सवाल थे। ये लोग कौन हैं? इन्हें मेरा मामूली-सा दिखने वाला पुश्तैनी लॉकेट क्यों चाहिए। क्या मेरी जैविक माँ की इनसे कोई पहचान है? यह मेरे साथ क्या हो रहा है? और वह कौन-सा मिशन है, जिसका ये लोग ज़िक्र कर रहे हैं। लेकिन मैं समझ गई थी, इनसे कुछ पूछने का कोई मतलब नहीं है। ये लोग मुझे कुछ नहीं बताएँगे।

वे लोग कमरा खाली करके जा चुके थे। उनमें से एक ने जाते समय मेरे हाथ खोल दिए और मुझे पानी के दो पाउच के साथ कपड़े का बैग और एक जोड़ी जूते दिए। मैंने उस समय उसे करीब से देखा। उसने चेहरे पर सफ़ेद मास्क पहना हुआ था। वह मास्क सतह पर चमकीला था, जैसे सिरेमिक का हो। शायद बाकी सब ने भी ऐसे ही मास्क पहन रखे होंगे। रोशनी के साए में दूर से देखने पर कद–काठी में वे सब आदमी एक दूसरे की फोटोकॉपी लग रहे थे। जैसे एक ही सांचे से ढाल कर निकाले गए हों।

पानी देखकर मुझे ख्याल आया कि न जाने कब से मैं बहुत प्यासी हूँ। मैंने घटाघट एक पाउच का पूरा पानी पी लिया। दूसरे पाउच से मैंने अपने चेहरे और खरोचों की सफाई की। फिर मैंने उनके दिए कपड़े–जूते पहन लिए। मुझे वे फिट आए। शरीर से चिपका हुआ काले लेदर का बॉडी सूट जैसे मेरे लिए ही बनाया गया हो। इनको मेरा साइज़ कैसे पता है? कई सवालों की तरह यह सवाल भी अभी बेमानी है।

मैं तैयार होकर कुर्सी पर बैठ गई और उनका इंतज़ार करने लगी।

जिस तरह से इन लोगों ने मेरी माँ का ज़िक्र किया था, मैं सोच में पड़ गई थी कि क्या ये लोग मेरी माँ को जानते थे? बचपन में मैं जब भी सरला माँ से अपनी असली माँ-पिता के बारे में सवाल करती थी, वे मुझसे सिर्फ़ इतना ही कहती कि वे एक–एक करके दुर्घटनाओं में मारे गए। अधिक पूछने पर वे मुझे यह कहकर टाल देती थी कि क्या मैं तुम्हें प्यार नहीं करती कि तुम हमेशा अनुभा के बारे में पूछती रहती हो? फिर मैंने पूछना छोड़ दिया और अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हो गई। लेकिन मेरे मन से मेरी माँ और पिता को लेकर सवाल कभी गए नहीं थे। मैंने एक-दो बार उनके बारे में पता करने की कोशिश की, लेकिन मेरे हाथ कोई खास जानकारी नहीं लगी।

मैं सिर्फ़ इतना ही पता कर सकी कि मेरी माँ अनुभा कौशल एक समृद्ध जमींदार की बेटी थी, जिन्हें मेडिकल पढ़ने के दौरान एक विजातीय मनुष्य से प्रेम हो गया था। पिता ने उनका यह प्रेम स्वीकार नहीं किया और वे अपने पिता की मर्जी के खिलाफ़ मेरे पिता समर्थ कौशल से ब्याह करके कहीं और जाकर बस गई। फिर उन दोनों में अलगाव हुआ और मेरी माँ मुझे लेकर अलग रहने चली आई। स्वतंत्र भारत में जमींदारी नहीं बची। उससे जमा किये गये धन का भी धीरे धीरे करके नाश हो गया। जब तक माँ वापस अपने घर आई, उनकी माँ की मृत्यु हो गई थी। पिता ने तब भी उन्हें स्वीकार नहीं किया। फिर कुछ दिन बाद किसी दुर्घटना में वे भी चल बसे। ठाकुर साहब के जाने के बाद उनका घर खंडहर बन गया। रिश्तेदार बची–खुची सम्पत्ति हड़प गए। मुझे यही कहानी बताई गई थी। इससे अधिक कुछ भी मुझे मालूम नहीं था।

माँ इन्ही हालात में अपनी सहेली के पास मुझे छोड़कर कहीं गायब हो गई। वह कहाँ गई? क्यों गई? यह किसी को मालूम नहीं था। बहुत बरस बाद मैंने अख़बार में पढ़ा कि अनुभा कौशल नामक एक औरत, जो किन्ही के साथ लगकर तस्करी का काम करने लगी थी, पुलिस से भागते समय मध्य हिमालय के किसी हिल स्टेशन में एक कार दुर्घटना में मारी गई है, लाश का कुछ पता नहीं चला। सबने मान लिया कि जंगल में कोई जानवर उनकी लाश उठा ले गया होगा और खा गया होगा। सबके साथ मैंने भी मान लिया कि वे मर चुकी हैं, वैसे भी उन्होंने अपनी मर्जी से मुझे छोड़ा था। इतना तो मुझे मालूम था।

मेरे ख्यालों की यह श्रृंखला तब टूटी, जब बाहर दरवाज़ा खोलने की आवाज आई। थोड़ी देर में दो लोग अन्दर आए और मुझे बाहर चलने का इशारा किया। बाहर बड़ा-सा खुला हॉल था। यह किसी पुराने वेयरहाउस का मुख्य भाग लग रहा था। बहुत सारे कार्डबोर्ड इधर–उधर बिखरे पड़े थे। कहीं–कहीं से छत चू रही थी। पानी टपकने की आवाज भी उस बियाबान में इतनी साफ़ थी कि इससे सिहरन हो रही थी। मैं चुपचाप एक तरफ़ खड़ी हो गई। मुझे बहुत डर लग रहा था। इतने में हॉल का बड़ा दरवाज़ा खुला और एक वैन अन्दर आई। उसमें से दो आदमी उतरे। उनके भी चेहरे ढंके हुए थे। उन्होंने वैन का पिछला दरवाज़ा खोला और उसमें से एक औरत और एक लड़का बाहर आए।

यह औरत और कोई नहीं, मेरी माँ सरला शर्मा थी। ये लोग उन्हें और मुझसे दो साल छोटे मेरे भाई अनूप को बंदी बनाकर यहाँ ले आए थे। मुझे जीवन में पहली बार भयानक डर का एहसास हुआ। अपने जीवन की अंतिम निधियों को खो देने का डर। रुलाई का एक गोला मेरे अन्दर उबला। यह दोनों मेरे जीवन के अंतिम स्तम्भ हैं। इनके अलावा इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है। मैं किसी कीमत पर इन्हें नहीं खोना चाहती।

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