उषाकिरण खान की कहानी ‘सुखासन’

आज पढ़िए हिंदी की वरिष्ठ लेखिका उषाकिरण खान की कहानी। लोक से लेकर इतिहास, इतिहास से लेकर मिथकों तक उनके लेखन की रेंज बहुत बड़ी रही है। यह उनकी नई कहानी है-

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जिस उपवन में आकर राजा का रथ रूका था वह आश्रम था। आश्रम का हेमक्षेम सम्राट का दायित्व था, किन्तु उस पर अधिकार नहीं माना जाता। वह पूर्णतया आश्रमवासियों का होता। यहाँ बिना उनकी अनुमति के प्रवेश निषेध होता। साधारण रथ पर कुछ सेवकों के साथ दुष्यंत भ्रमण को निकले थे। इधर की आबोहवा उन्हें रास आ गई, वे ठहर गये। आश्रम बड़ा मनोरम लगा। बड़े-बड़े विटप ऐसे थे जो सीधे खड़े थे। नीचे से ऊपर तक सुचिक्कण ऊपर जाकर पत्तों के वितान। फिर घने छतनार पेड़। एक चैकोर बावड़ी, घास का हरा मैदान जहाँ इन लोगों ने अपना पड़ाव डाला था। जहाँ से आश्रम शुरू होता वहाँ लघु पादप से लेकर मझोले फूलदार पेड़ पौधे थे। रहने का प्रबंध हो जाने के बाद दुष्यंत का ध्यान आश्रम की ओर गया। वहाँ का सौष्ठव सुषमा को अधिक बढ़ाता सा लगा। कुछ बच्चे खेलते दीखे। कुछ तापसियाँ विचरती लगीं। पूर्वाह्न में साम गान की शिक्षा दी जाती हो मानो, इस प्रकार की ध्वनियाँ सुनाई पड़ीं। संध्या काल में साज तथा सुर के साथ नृत्य की झंकार सुनाई पड़ीं। उन्होंने अपने विशेष सहायक को बुलकर पूछा कि यह आश्रम किस ऋषि का है?

      ‘‘ऋषि का पता नहीं प्रभु परंतु महिलाओं को ही देखा है। एकाध युवक हैं पुरूष और कुछ बालक अन्यथा स्त्रियाँ ही हैं।’’

      ‘‘वाह! बालिकायें ही शिक्षा पाती हैं क्या?’’

      ‘‘ऐसा ही जान पड़ता है।’’ -तभी दो चार बच्चे जलाशय की ओर आये। जलाशय चैकोर था और सावधानी से चारों ओर से पत्थरों के पाये से वेष्ठित था। हाँ एक तरफ पत्थर नहीं थे। सम्भवतः पशुओं के जल पीने या स्नान करने के लिए यह उपाय किया गया था। बच्चे जलाशय तट पर बातचीत कर रहे थे। एक दसेक वर्ष का बालक जल में उतर कर तैरना चाहता था। पर साथ के दूसरे बालक और तीन बालिका रोक रही थी।

      ‘‘माता ने मनाकर रखा है इस जलाशय में तैरने से। यह गहरा और फिसलन भरा है, चलों अंदर चलकर तैरना।’’ -एक थोड़ी बड़ी बाला ने कहा। ‘‘तुम सब को तैरने आता है। मुझे भी आता है फिर डूबेंगे कैसे?’’ -उस बालक ने कहा ‘‘तर्क न करो, चलो बाला ने कहा, चलो।’’ -उनकी नोंक झोंक और कहने सुनने का अंदाज इतना अच्छा लग रहा था दुष्यंत को कि वे एकटक उन्हें निहारने लगे। दुष्यंत के तांबई मुखमंडल पर वात्सल्य भाव पसर गया। अहा, कितना सुंदर और चंचल बालक है। सोचा उन्होंने। लड़कियाँ और साथ का लड़का पूरी कोशिश कर रहा है इसको तैरने से रोकने को और वह मान नहीं रहा है। इनलोगों को अपनी ओर देखते देख वह बालक बगटूट भागा इनकी ओर।

      ‘‘प्रणाम श्रीमान।’’ -हाँफते हुए उसने हाथ जोड़े। दुष्यंत ने सर पर हाथ फेर आशीष दिया।

      ‘‘आपलोग कई दिनों से यहाँ हैं, क्या आखेट के लिए यहाँ आये हैं?’’

      ‘‘नहीं पुत्र, मैं यूँ ही भ्रमण पर निकला हूँ। आखेट करवा होता तो सघन वन की ओर जाता। इस उपवन में रावटी गिराकर नहीं रहता।’’

      ‘‘हाँ, यहाँ आखेट वर्जित है। माता ने किया है। फिर मेरे मित्रगण भी तो हैं, उन्हें न छेड़ना।’’

      ‘‘कभी नहीं। मैं आदेश का पालन करूंगा।’’ -दुष्यंत ने विनत होकर कहा। उनके सहायकगण मुस्कुरा रहे थे। वे मन ही मन उदास थे कि हमारे सम्राट को संतान ही नहीं है। बालकों से स्नेह करते समय उनकी पीड़ा छलक जाती है। महाराज वीतराग होते जा रहे हैं। सचमुच आखेट इत्यादि में मन नहीं रमाते हैं। अलबत्ता आश्रमों को, उनके कुलपतियों, आचायों तथा छात्रों को खुलकर दान देते हैं। वर्ष में चार बार किसी न किसी आश्रम के पास सप्ताह भर जरूर रहते हैं। राजकाज से अभी मन हीं उचटा है, न जाने क्या होगा इस देश का यदि ऐसा कुछ इस कठिन समय में हो जाता तो। बाहरी आक्रमणों से सीमा की रक्षा, अंदरूनी जनजातियों से स्नेह सौहार्द बढ़ाना आवश्यक होता है। वनोपज न हो तो मात्र धान्य से जीवन नहीं चलता। दुष्यंत संतुलन बनाकर चलने वाले सम्राट थे।

      ‘‘श्रीमान् आपलोग इसी तड़ाग में स्नान करते हैं न?’’ -उस बालक ने पूछा।

      ‘‘हाँ पुत्र!’’ -दुष्यंत ने कहा।

      ‘‘आप सब तैरना जानते हैं न?’’ -उसने सबों की ओर इंगित कर कहा।

      ‘‘हाँ, हम सब तैरना जानते हैं।’’ -सहायक ने कहा।

      ‘‘तो हम स्नान करते तैरते यदि डूबने लगे और चिल्लाये-बचाओ बचाओ तो बचा लेंगे कि नहीं?’’ दुष्यंत हो हो कर हँसने लगे। सहायक ने लपक कर कहा।

      ‘‘क्यों नहीं?’’ -उसे इस बालक पर प्यार आने लगा। इसी के कारण सम्राट आज खुलकर हँसे। तबतक बालक के सारे संगी साथी निकट आ गये थे।

      ‘‘आपकी माता ने आदेश दिया है कि इस तड़ाग में आप स्नान न करें, यह सच है?’’ -दुष्यंत थे।

      ‘‘जी आदेश तो है। पर आपको पता है माता जो सबके लिए कठोर है मेरे प्रति कुछ अधिक ही हो गई हैं। अब देखिये मैं बड़े तालाब में तैरूंगा तभी तो बड़ा हो सकुंगा?’’ -दुष्यंत को फिर हँसी आ गई। आप बड़े होंगे तब आप स्वयं बड़े तड़ाग मंे तैरने लगेंगे। माता का यह कठोर लगने वाला आदेश कोमल है। उन्हें आपकी सुरक्षा की चिंता है।’’

      ‘‘फिर तर्क में उलझा रहे हो श्रीमान् को।’’ -बड़ी बालिका ने कहा।

      ‘‘आपका नाम क्या है पुत्र?’’ -दुष्यंत ने पूछा

      ‘‘भरत है मेरा नाम’’

      ‘‘माता और पिता का नाम?’’

      ‘‘माता को सभी माता कहते हैं नाम नहीं पता। पिता के विषय में नहीं जानता।’’

      ‘‘आदेश का पालन किया जाता है, माता के आदेश की कभी अवज्ञा नहीं करनी चाहिये।’’ -कहते हुए कब दुष्यंत ने भरत को गोद में भर लिया, वह चुपचाप उनके कंधे घेरकर सट गया यह न जाना। परंतु आश्रम के बच्चों को यह आश्चर्य का विषय लगा। भरत कभी किसी की गोद में नहीं चढ़ता। दुष्यंत के सहायकों को भी आश्चर्य हुआ कि सम्राट अनजान वनवासी बालक को गोद में लेकर आनंदित हैं। उनके मन में एक बात आई कि प्रभु संतानहीन हैं। इस बालक में उन्हें अपना संतान सुख मिला है संभवतः!

      बालक भरत की देहगध कमलपत्र सी लगी दुष्यंत को, रंध्र रंध्र में समाया सुगंध पहचाना सा लगा। यह सब कुछ ही पल घटित हुआ कि बालक सरसराकर उतर गया। उतर कर दौड़ता हुआ तड़ाग के पूर्वी कोने पर पहुँचा। वहाँ तीन चार सिंह शांवक जल पी रहे थे। सिंहिनी पसरी लेटी थी। बालक को उधर जाते देख दुष्यंत घबड़ा कर दौड़ने को हुए। सहायक दौड़ पड़े कि बड़ी बालिका ने वर्जित किया।

      ‘‘श्रीमान् ये सब भरत के मित्र हैं। दौड़ते हुए रूक गये सभी और चकित होकर देखा भरत दो शावकों को गलबहियों दिये झूल रहा था। सिंहिनी पूर्ववत पसरी हुई चिंताविहीन पड़ी थी। दुष्यंत ने अपने आपको चिकोटी काटी, क्या जो कुछ देख रही थी आँखें वह सत्य है?’ सब कुछ सत्य था। थोड़ी ही देर में कोई आयु प्राप्त तापसी आई तथा सभी बालक बालिकाओं को डाँट कर ले गई। भरत के साथ पीछे लगे शावकों को भी दो चार चपत लगा गई। कोलाहल सुन सिंहनी ने सर उठाकर कुछ पल देखा फिर ऐसे लेट गई मानो यह प्रतिदिन की घटना हो। नगरवासी सेवक और स्वयं सम्राट को अवाक् छोड़ बालक बालिका आश्रम की ओर चले गये। मोटे जूट के बने रावटी में अपनी रवाट पर लेटे दुष्यंत को वर्षों पहले का वन भ्रमण याद आया। सम्राट के मुकुट को धारण करने के कुछ दिनों बाद का पहला वसंत था। भ्रमण और आखेट के उद्देश्य से कुछ मित्र तथा विश्वस्त सेवकों के साथ मिलकर निकल पड़े दुष्यंत। राजसी ठाठ से बचकर निकलने की अपनी आदत के अनुसार उन्होंने वन के किनारे पड़ाव डाला था दूसरे दिन वे अकेले चुपचाप आखेट को निकले। एक मृगी घास चर रही थी। उसका गहरा रंग और चितकबरी काया दूर से ही आकर्षित कर रही थी। दुष्यंत ने सोचा कि इसके चर्म की आसनी बहुत संुदर लगेगी। तीर की नोंक उसी की दिशा में सीधी थी, अब कमान से वह निकल अनजान हिरनी को बेधने वाली थी कि एक युवती गोद में मृगछौने को लेकर अनायस प्रकट हो गईं। दुष्यंत ने द्रव्यंचा ढीली की, हाथ नीचे कर लिया। अपलक उस अनिंध संुदरी को देखने लगा। संभवतः निकट ही कोई आश्रम है। तभी उसकी दृष्टि घूमी। वह कभी सौष्ठवपूर्ण युवक की ओर देख रही थी कभी उनके धनुष को। दो युवतियाँ भी दौड़ती हुई आ गईं। हिरणी रचना छोड़ चकित भीत सी उन युवतियों के पास चली गई।

      ‘‘आप यहाँ आयुध लेकर क्या कर रहे हैं महोदय?’’ -एक युवती ने पूछा।

      ‘‘आप आखेट वर्जित वन में हैं।’’ -दूसरी ने कहा

      ‘‘क्षमा करे मुझसे भूल हुई।’’ -युवक ने तीर तूणीर सें रख दिया और धनुष काँधों पर निःशब्द जाने को मुड़ा कि युवतियों की आत्र्र पुकार सुनाई पड़ी। यह तुरत मुड़ा कि देखा एक काला भ्रमर मृगछौने पकड़े युवती के मुखमंडल पर मँडरा रहा है। उसके हाथ से हिरण फिसलकर गिर पड़ा और इधर उधर उछलने लगा। दुष्यंत ने अपने उत्तरीय से झटके मार कर भँवरे को हटा दिया, युवतियों की जान में जान आई। आभार से नत आँखें दुष्यंत को बाँध रही थीं मानो। तीर तरकस में रह गये, सम्राट घायल हो गये। आश्रम की बाला शकंुतला को सर्वस्व निछावर कर दिया। सम्राट् थे। गांधर्व विवाह कर प्रकृति के सामने स्वीकार किया युवती पत्नी को। आश्रम के तथा शकंुतला के अभिभावक कहीं भ्रमण पर निकले थे। सम्राट ने पूरे आन बान और शान से विदाई का भरोसा दिया तथा राजधानी की ओर चल पड़े। राजधानी के समाज ने सुना वन में जिस आश्रमवासी ऋर्षि की कन्या को चुना है, जिसका पाणिग्रहण किया है उसका जन्म विवादास्पद है। वह कण्व की पुत्री नहीं है। उसे पट्टमहिषी कैसे बनाया जायगा। सम्राट् स्वयं के मनोरंजन के लिए उन्हें रख सकते हैं किन्तु पट्टमहिषी कदापि न बनायें। यह गरिमा के अनुकूल नहीं है। इस रानी को प्रजा स्वीकार नहीं करेगा।

      कण्व आये, नियति चक्र का खेल देख हतप्रभ रह गये। युवती बेटी पर क्रोध तो आया परंतु कत्र्तव्य भी याद आया। उन्होंने सम्पूर्ण विनम्रता से पाणिग्रहीता पत्नी को स्वीकार करने का आग्रह किया सम्राट से। सम्राट विवश थे। राजसभा में वे मौन रह गये।

      ‘‘परंतु मैं विवश नहीं हूँ।’’ -सबकुछ सुनकर आई हुई माता ने कहा। मेनका शकंुतला की माता थी। उसने उद्घोष किया- ‘‘हे पालनकत्र्ता पुरूष ऋर्षि कण्व, पाणिग्रहण करने वाले सम्राट दुष्यंत यह माँ अपनी बेटी का पालन कर लेगी। तुमलोगों को इसके द्वार आना पड़ेगा, यह नहीं है आश्रित किसी की। चलो बेटी।’’ -ठगे से देखते रहे थे दुष्यंत शून्य में ताकेत से, प्रजा की ओर याचक हो बारंबर। प्रजा कठोर दंड लेकर खड़ी थी। प्रजा समाज था जो भावना नहीं देखता। कुछ नहीं कर सके सम्राट। पट्टमहिषी के लिए चुनी गईं राजपुत्रियाँ आईं पर संतान से वंचित रहे। बार बार स्मरण हो आता कि शकुंतला गर्भवती थी। संतान तो हुई होगी, उसकी ही तरह की सुघड़ पुत्री किंवा मुझ सा पुत्र। आह! क्या हुआ होगा।

      ‘‘क्या विचार रहे हैं सम्राट? आश्रम से आमंत्रण आया है बालिकाओं का सामगान सुनने। चलेंगे न?’’ -सहायक ने पूछा

      ‘‘हाँ हाँ चलेंगे’’ -दुष्यंत चल पड़े। आश्रम में चंदन तिलक लगाकर स्वागत किया गया। बालिकाओं का गान मंत्रमुग्ध करने वाला था। शकुंतला ने देखा और पहचान गई। चपल नवयुवक श्लथ युवक के परिवत्र्तित रूप में बढ़े श्मश्रु में भी वही तो था। मुखमंडल पर स्थाई उदास भाव आँखें थकी थकी। क्या यही वह प्रतापी राजा है जिसने आर्यावत्र्त की सीमा को ब्रह्मवत्र्त तक सुरक्षित कर लिया है? इन्हें हुआ क्या है? मन में कुछ टूटा पर सँभल गई। यह युद्ध कौशल में प्रवीण सम्राट नहीं एक वंचित पिता है, एक निर्बल पुरूष है शकुंतला भीतर से भीग गई, आद्र्र हो आई।

      बालक भरत दुष्यंत की गोद में बैठा था। उतर कर भागा ‘‘नानी आ गईं, नानी आ गईं।’’ -कहते। दुष्यंत के सामने मेनका खड़ी थीं। उन्हांेने चरण छूए।

      ‘‘प्रणाम माता’’

      ‘‘ऐसे कैसे रूप में पधारे सम्राट?’’ -मेनका ने प्रश्न किया।

      ‘‘मैं गुप्त भ्रमण को निकला था।’’

      ‘‘प्रयोजन?’’

      ‘‘मन की शांति।’’

      ‘‘मिल गई?’’

      ‘‘आपसे मिलकर सफल मनोरथ तो होगा माता।’’ -सबकुछ देख तापसी माता शकंुतला के झर झर आँसू बह निकले।

      ‘‘माता, मैं चरणों में तब तक पड़ा रहूंगा जबतक आप मुझे क्षमा न करेंगी।’’

      ‘‘क्षमा तुम्हें वह करेगी जिसको वंचना मिली, जिसका अपमान हुआ, मैं नहीं। शकंुतला आगे आओ।’’ -दुष्यंत ने उस तापसी को देखा और दृष्टि नीची कर ली। तेज सहन न हुआ।

      ‘‘पुत्र भरत, ये तुम्हारे पिता हैं सम्राट दुष्यंत।’’ -भरत माँ से लिपट गया। संभ्रम से दुष्यंत की ओर देखने लगा।

      ‘‘माता आदेश दें, मैं अभी इन्हें ले जाऊँ।’’ -मेनका से कहा सम्राट ने।

      ‘‘आप अपने पुत्र को ले जायें, इनका संस्कार अपने अनुरूप करें। मेरा आपका इतना ही संबंध था।’’ -शकुंतला ने दृढ़ होकर कहा। सम्राट घुटनों पर बैठ गये।

      ‘‘मुझे क्षमा करें। मेरी प्रजा को क्षमा करें।’’-

      ‘‘क्षमा कर दिया उसी उसय परंतु मैं यहाँ इस आश्रम से कहीं नहीं जाऊंगी , मेरी तरह की अनेक कन्यायें हैं जिन्हें मेरी आवश्यकता है। आप प्रस्थान करें राजन!’’

      ‘‘माता, मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा’’ -भरत ने चिपककर कहा।

      ‘‘आपको माता का आदेश मानना चाहिए भरत। आप जायें आर्यावत्र्त को आपकी प्रतीक्षा है। आशीर्वाद है कि सबल सम्राट् हों, सबल पुरूष भी हों।’’

      शकुंतला ने अपने जीवन के दोनों पुरूषों को विदा किया और साम गान करती बालिकाओं के बीच सुखासन में बैठ गई।

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