प्रेम में डूबी सब स्त्रियाँ महुआ घटवारिन क्यों हो जाती हैं?

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी पर बनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ के ऊपर बहुत अच्छा लेख लिखा है युवा लेखिका उपासना झा ने- मॉडरेटर

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मीता! पहली कसम याद है न तुमको। कोई चोरी-चकारी का माल नहीं ले जाना था क्योंकि तुम जानते थे कि ‘ये महल, चौबारे यही रह जाएंगे सारे’। तुम्हारे भोले मन में भीषण गरीबी और अकेलापन भी कोई मैल जमा न पाया था। अनपढ़ भले थे तुम लेकिन अनगढ़ नहीं, तुम जानते थे कि खुदा के पास जाना है एकदिन तो गठरी भारी नहीं करनी है।

गाड़ीवानी करते-करते अपने और आस-पास के सब जिल्ले, गाँव, सड़क, पगडंडी तुम्हारे परिचित साथी बन गए थे। बाँस-लदनी कर एक बार पकड़े जाने पर तुमने दूसरी कसम उठायी थी कि अब कभी बाँस न लादूँगा गाड़ी में, याद है न मीता। उन दो कसमों को तुमने निभाया भी, भले घाटा सहना पड़े।

गाड़ीवानी करना जीवन जीने जैसा भी है न मीता, कई बार पहचानी सड़क में अनजाने गड्ढे मिल जाते हैं तो कभी लीक छोड़ कर चलना पड़ता है। जो लीक पर चले तो जीवन में प्रेम ही न हो, उसका गीत ही न हो।

कितना नैराश्य और करुणा है तुम्हारी इस एक पँक्ति में, जैसे अबतक जिये तुम्हारे जीवन के सारे दुख अपनी पूरी शिद्दत से उतर आए हों ‘न कोई इस पार हमारा, न कोई उस पार’

गाड़ी में दम साधे बैठी हीरा की बड़ी-बड़ी आँखें लोर से भर आयी थीं मीता, उसका भी तो कोई न था। कहा भी तो उसने ‘मेरी पूरी दुनिया है और जिसकी पूरी दुनिया होती है उसका कोई नहीं होता है’

अपने विषाद में भी एक पतली लकीर खींच ली थी हीरा ने, अभिनय करने और नाचने से उसे कुछ देर सब भूल जाता था ठीक वैसे ही जैसे तुम्हें गाड़ीवानी सब दुख भुलाए रखती थी।

याद है न मीता, हीरा को लेकर जब टीशन से निकले थे तो रह-रहकर पीठ में कैसी गुदगुदी होती थी, गाड़ी से कैसी खुशबू उठती थी बार-बार। ऐसा तो पहले कभी न हुआ था। भोले बाबा के मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर तुमने क्या गुहार लगाई थी ‘इस बार बचा लो भगवान, भूत-जिन्न जो भी है उससे, परसाद चढ़ाऊंगा।’

गाड़ी में सोयी हुई हीरा का मुँह पहली बार देखकर तुम्हारे मुँह से ‘इस्स, ये तो परी है!’ और ऐसी महीन आवाज़ उसने कभी न सुनी थी, फेनूगिलासी। उसके अभावग्रस्त जीवन में हीरा का आना और वह यात्रा जो बमुश्किल तीस घण्टे की थी पूरे जीवन भर की निर्ममता का प्रसाद थी।

प्रेम में हर कोई हीरामन होता है, भोला और भावुक। प्रेम में हर कोई हीरा होती है, दूसरे के हित में दुख सहने की अपार क्षमता रखने वाली। अपने नौटँकी कम्पनी की साथी नर्तकी नगमा से कहती भी है हीरा ‘हम लैला होने का अभिनय तो कर सकते हैं, लैला हो नहीं सकते’। सच की कैसी गहरी चोट है इन पंक्तियों में लेकिन जीवन का कसैलापन उसे अहसास दिलाता रहता है ‘रहेगा इश्क़ तेरा ख़ाक में मिलाके मुझे’।

प्रेम में डूबी सब स्त्रियाँ महुआ घटवारिन क्यों हो जाती हैं मीता उनके सौदागर जल्दी नहीं आते और आ भी गये तो उन्हें संग नहीं ले जाते हैं। उनका मन बरसात की कोसी नदी जैसा भरा हुआ रहता है, एक लहर आयी नहीं कि बस छलका। टीशन पर बैठी हुई हीरा भी तो कहती है न मीता-  ‘ तुम्हारा जी बहुत छोटा हो गया है। क्यों मीता? महुआ घटवारिन को सौदागर ने खरीद जो लिया है!’

दप-दप कलेजा जलता है हीरामन का। रेल गयी ऐसा लगता है दुनिया ही खाली हो गयी है। आज उसने तीसरी कसम उठाली है; अबसे किसी कम्पनी की बाई की सवारी नहीं लेगा।

उपसंहार: तीसरी कसम वर्ष 1966 में आई एक फ़िल्म थी। शैलेंद्र, रेणु जी, सुब्रत मित्र, बासु भट्टाचार्य, राजकपूर और वहीदा रहमान ने मिलकर इस बहती हुई कविता के अलग-अलग छंद लिखे थे। रेणु जी की कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम’ पर आधारित यह फ़िल्म व्यवसायिक रूप से असफल रही थी, कहा जाता है कि शैलेंद्र इस दुख से उबर न सके और बीमारी के बाद अगले वर्ष यूंकि मृत्यु हो गयी। इस फ़िल्म में राजकपूर ने अपने सम्पूर्ण फिल्मी करियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय किया है। इस फ़िल्म के लिए उन्होंने बस एक रुपया पेशगी ली थी और वही उनकी फीस भी रही। ग्रामीण भोले हीरामन के रूप में वे विश्वसनीय लगे वहीं वहीदा अपने देशज सौंदर्य और नृत्य-निपुणता के कारण हीरा बाई के रूप में अत्यंत प्रभावी। सिनेमेटोग्राफी इस फ़िल्म को वह कोमलता और यथार्थ दे पाती है जिससे कहानी सच्ची लगती है। पेड़ो से छन कर आती धूप की प्राकृतिक चमक फ्रेम्स में जान भरती है। शैलेंद्र के लिखे गीत और रेणु जी के संवाद फ़िल्म को भारतीय सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों में एक होने का गौरव देते हैं। फ़िल्म से जुड़े हर पक्ष पर पर्याप्त शोध और मेहनत की गई। नबेन्दु घोष ने पटकथा लिखी और शंकर-जयकिशन ने संगीत किया। पंडित लच्छू महाराज ने वहीदा के लिए नृत्य-निर्देशन किया।

यह फ़िल्म एक ऐसी कथा रचती है जो जीवंत लगती है, जो घट सकती है ऐसा यकीन होता है। मशहूर निर्देशक ख़्वाजा अहमद अब्बास ने इसे सैलूलाइड पर लिखी कविता बताया था.

उपासना झा

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