गीत चतुर्वेदी: नया संग्रह नई कविताएँ

इस साल पुस्तक मेले में एक बहु प्रतीक्षित कविता संग्रह भी आया. गीत चतुर्वेदी का संग्रह ‘न्यूनतम मैं’. गीत समकालीन कविता के ऐसे कवियों में हैं जिनकी हर काव्य पंक्ति में कुछ विशेष होता है. निस्संदेह इस बड़बोले समय में गीत की कविताएँ बेआवाज में दिल में आकर घर कर जाती हैं. कविता में बौद्धिकता एवं भावना का संतुलन क्या होता है यह गीत की कविताओं से सीखा जा सकता है. कोई शक नहीं है कि गीत ने समकालीन कविता को एक बौद्धिक मुहावरा दिया है. आज उनके इसी नए संग्रह से कुछ कविताएँ- मॉडरेटर

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आधी रात

 

मैं आधी रात निकल पड़ती हूं घर से.

मुझे उससे मिलने जाना है

जो महज़ रात को प्रकट होता हो भले,

लेकिन दिन से भी अधिक सुंदर है जो.

 

मैंने प्रेम की पादुका जड़ दी है अपने पैरों में

घोड़े की नाल की तरह.

जाने कितनी पीड़ा सह.

 

मैं आधी रात निकल पड़ती हूं घर से.

नहीं, किसी का डर नहीं है मुझे.

अपने धनुष पर पांचों बाण चढ़ाए

मेरी रक्षा के लिए मेरे साथ-साथ चलता है

अचूक धनुर्धर कामदेव.

 

अब तो महाकाल भी उससे नज़रें नहीं मिलाते

 

एक क्षण की खोज

 

मेरे पास कोई दर्शन नहीं

बस, इंद्रियां हैं. 

पेसोआ

 

सितार के तार की तरह

पेड़ की डाल की तरह

घास की नोंक की तरह

 

जब भी किसी कवि को छुओगी

उसमें कंपन होगा.

 

कवि का मन समझना है

तो उसका चलना देखो

जब वह चलता है तब महज़ उसकी पतलून चलती है

पैर तो हमेशा स्थिर रहते हैं

बरसों पुराने या ताज़े एक क्षण में.

जिसके होने को नकारने में

बीत जाता है उसका जीवन.

 

कितनी मामूली होती है कवि की खोज.

वह ताउम्र महज़ एक क्षण खोजता है

जिसे उसने जिया या शायद कभी न जी पाए.

 

मेरे कूदने से पानी में जो छपाक हुई थी

वह तुम थीं. क्षणजीवी.

कूदने से पहले मैं तुम्‍हें नहीं जानता था.

छपाक के बाद से तुम्‍हें खोजता फिरता हूं.

 

और हेराक्लिटस ने क़सम दी है:

तुम एक ही नदी में दो बार नहीं कूद सकते.

 

नूरी बिल्गे जेलान की फिल्मों के लिए

 

बरसों पहले, अपनी बढ़ी हुई दाढ़ी मेरे कंधों पर चुभाते हुए, मेरे पुरुष ने मुझसे कहा था – जब सबसे ठंडी रात आएगी, तुम इस लैंपपोस्ट के नीचे आ जाना : यहां एक पत्थर है, तुम इस पर बैठ जाना : न भी बैठना, तो भी अपने मन को यहां ज़रूर बिठाले रखना : चारों ओर कोहरा होगा : तुम्हारी सांसें कोहरे के कैनवास पर ब्रश के स्ट्रोक्स की तरह होंगी : सबसे ठंडी रात में भी तुम अपने दस्ताने उतारोगी और अपने ठंडे हाथों से अपने पेट का स्पर्श करोगी : तुम्हारी नाभि के पास मेरी छुअन से बनी पेंटिंग्स होंगी : मेरे स्पर्श के चित्र को तुम ब्रेल लिपि में पढ़ोगी : तुम्हारे नाक की हिमभूमि पर सिहरन होगी : सबसे ठंडी रात साल में एक बार आएगी : हमारे जीवन की सबसे ठंडी रात जीवन में सिर्फ़ एक बार आएगी

 

मैं तब से अपनी आंखें मूंदे यहां खड़ी हूं

वादे के मुताबिक़ एक लैंपपोस्ट के नीचे

कोहरे के टुकड़े को हाथों से हटाकर

दूर तक देखने की कोशिश करती हुई

 

मेरे कपड़े ठंड से लड़ रहे हैं : उन पर जमा हो रहा गीलापन बेहद अनुभवी है : वह गीलापन एक गीली आवाज़ में ही कहता है : मेरी मानो, घर लौट जाओ : अभी इससे भी ठंडी कई रातें आएंगी : गर्मास अभी क़र्ज़े पर चढ़ी हुई रहेगी

 

मुझे नहीं पता, वह कौन-सी रात होगी

मैं सर्दियों की शुरुआत में ही यहां खड़ी हो जाती हूं

मेरी देह तापमान मापने वाला यंत्र बन जाती है

 

ऐसा लगता है, कोई इस तरफ़ आ रहा है

 

जो आ रहा है, वह भी कोहरा ही है

 

मेरी स्‍त्री,

तुम इतनी दूर पहुंच चुकी हो,

स्मृति की दृष्टि से भी ओझल

कि अब तुम्हारा चेहरा नहीं पहचान सकता

 

तुम्हें सिर्फ़ एक चेहरे से याद भी नहीं कर सकता

 

इस तरह बनता है अतीत से हमारा रिश्ता

कि जिन चीज़ों को देख तुम्हारी याद आती है

वे चीज़ें तुम्हारे चले जाने के बाद

वजूद में आई थीं

 

बस एक रेखाचित्र है सर्द सुबह का

एक आकृति है बिंदुओं से बनी हुई

आज एक आंख है

बीता हुआ कल एक दृश्य

दोनों के बीच एक धुंधला-सा ध है

कुछ खो गया का ख है

कुछ मिट गया का म है

 

जिस चेहरे को मैंने चूमा था

अब वह मेरी स्‍मृति में नहीं है 

फिर भी तुम्‍हारी तारीफ़ में यह ज़रूर कहूंगा : 

कोहरे का नक़ाब तुम पर फबता है

 

 

चित्र: अनुराग वत्स

परिचय : 27 नवंबर 1977 को मुंबई में जन्मे गीत चतुर्वेदी की ताज़ा किताब उनका कविता संग्रह “न्यूनतम मैं” है, जो कि राजकमल प्रकाशन से आया है. इससे पहले 2010 में “आलाप में गिरह” प्रकाशित. उसी वर्ष लम्बी कहानियों की दो किताबें “सावंत आंटी की लड़कियां” और “पिंक स्लिप डैडी” आईं. उन्हें कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, गल्प के लिए कृष्ण प्रताप कथा सम्मान मिल चुके हैं. “इंडियन एक्सप्रेस” सहित कई प्रकाशन संस्थानों ने उन्हें भारत के सर्वश्रेष्ठ लेखकों में शुमार किया है. उनकी रचनाएँ देश-दुनिया की सत्रह भाषाओँ में अनूदित हो चुकी हैं. उनके नॉवेला “सिमसिम” के अंग्रेजी अनुवाद (अनुवादक: अनिता गोपालन) को “पेन अमेरिका” ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित “पेन-हैम ट्रांसलेशन ग्रांट 2016 अवार्ड किया है. गीत भोपाल में रहते हैं. उनका ईमेल पता है : geetchaturvedi@gmail.com

 

 

 

 

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