पंखुरी सिन्हा की कुछ कविताएँ

पंखुरी सिन्हा की कुछ कविताएँ और उनके ऊपर राकेश धर द्विवेदी की टिप्पणी- मॉडरेटर

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पुश्तैनी संपत्ति का हिसाब

इतना राजनैतिक हो रहा था

मूल्यों के ह्रास पर लिखना

व्यक्तिगत और सामाजिक की सरहद खींचना

लोग जाने किन नैतिकताओं की सीढ़ियाँ लिए

आपकी, मेरी, हर किसी की ज़िन्दगी में आ रहे थे

ये सरहद बहुत ज़्यादा गड्ड मड्ड हो रही थी

घुल मिल रही थी

लोगों के बाहर जाने के बाद

ऐसा होने से सवाल खड़े हो रहे थे

पुश्तैनी सम्पत्ति के

माँ बाप की देख रेख के भी

वो पहले  से भी खड़े हो रहे थे

हर किस्म की सम्पत्ति के

पर अब और ज़्यादा

बहुत ज़्यादा

पहले भी थी माँ बाप की सेवा की माप जोख

नाप तौल

क़तर ब्योंत की खोज और निन्दा

आधुनिक आकार ले रही थी

यह निन्दा

अत्याधुनिक आकार ले रही थी

यह निन्दा

घरों में फूट डाल रही थी

नए परिचय पत्र लेकर आ रही थी

यह निन्दा

माँ और बेटी को नित्य नए चेहरे दिखा रही थी

यह निन्दा

एक दूसरे के भी

उनके बीच अकल्पित दूरियाँ ला रही थी

यह निन्दा

पिता पुत्री को बातों के नए आयाम सिखा रही थी

यह निन्दा

घर में घर पर

जाने क्या क्या कहर ढा रही थी

यह निन्दा

और इसी शहर में रोज़ प्रेस कन्फेरेन्सेस थे

और कोई नहीं पूछ रहा था

नेताओं से ये सवाल

कि उनके बैंक खाते में

ये इतने पैसे कहाँ से आ रहे थे

किसके थे वो पैसे?

 

टूटी शादी और हैंडल टूटा कप

 

इन दिनों मेरा घर एक भूचाल है

मेरी उम्र लगभग ४० साल है

एक टूट गयी शादी

एक हैंडल टूटे कप की तरह

मेरे आसपास मौजूद है

दरअसल, लोगों के तलाक सालों साल चलते हैं

आठ एक साल चलते हैं

विदेशी कोर्टों में

विदेशी करेंसी से भी वकील कर

विदेशी करेंसी में मुआवज़े की रकम पर

सालों साल चलते हैं

फिर मेरा तो मामला ही

विदेश में बसने से जुड़ा था

विदेश में लगभग छूट गया

मेरा घर

जिसकी छत और खिड़कियों के रंग

हमने चुने थे

कुछ ऐसे कि उसी के होकर रहेंगे

वही होंगे हमारे परिचायक रंग

अभिभावक रंग

फिर गहरी राजनीती आई

बहुत सी वक्र बातें

हमारी खिड़कियों, दरवाज़ों के आकार टेढ़े मेढ़े हुए

हम निकाले गए उसमे से लगभग

बेदखल अपनी जायदाद से

हमारा सामान छूटा

आल्मारिओं में नहीं

बिल्ट इन क्लोसेट्स में

और इन सब बातों का एक छोटा सा चिट पुर्ज़ा बना दिया

हमारी री लोकेशन एजेंट ने

जिसने उस देश में भी बसाया था

उस शहर

उस घर में भी

हाँ, ऐसा ही ह्रदय आलोड़न होता है

ऐसी ही होती है भग्न गाथा

इन सिमिलर टाइप ऑफ़ केसेस

उसने कागज़ को हल्का सा मोड़ा था फ़ोन पर

बहुत बाद में

जब वह अपने अधिकार बटोर रही थी

फाइल बना रही थी

लम्बी चौड़ी मोटी सी

दुबारा कोर्ट को जाती थीं सारी बातें

पर घर का भूचाल

इन बातों का नहीं बना था

न घर का हड़कम्प

उनकी ज़िद थी कि खाते वक़्त ही आएँगे

ये कुछ काम वाले थे

कुछ पडोसी

उन्हें कैसे पता होता था

उसके खाने का वक़्त

उन्हें कैसे पता होता था

उसके नहाने का वक़्त

उसने हिसाब छोड़ दिया था

उसने अपने बहुत सारे आस पास का हिसाब छोड़ दिया था

उसने अपने बहुत सारे अधिकारों का हिसाब छोड़ दिया था

एक बहुत बड़ा अदृश्य ज्वालामुखी था

इन सब बातों के भीतर

उसने उसके विस्फोट का भी अंदाजा छोड़ दिया था

उसने अपने इर्द गिर्द के बहुत कुछ की पड़ताल छोड़ दी थी

वह कर रही थी केवल उस कुछ का हिसाब

जो उम्मीद थी इस भूचाल को भी थमा देगा……………

 

 

—————– दोनों कवितायेँ पंखुरी सिन्हा के कविता संग्रह ‘बहस पार की लम्बी धूप’ से

पंखुरी सिन्हा की कविताओं पर राकेश धर द्विवेदी की टिप्पणी

मानवीय संवेदनाओं की कोख से जन्मी कवितायेँ

 

 

‘बहस पार की लम्बी धूप’ युवा कवि और कथाकार पंखुरी सिन्हा का द्वितीय काव्य पुष्प है, जिसमें ८६ कवितायेँ हैं. कविताओं से गुज़रते हुए उनमें भोगे हुए यथार्थ की समृद्धि दिखाई देती है, जिसे कवियत्री ने कैनवास पर सफलता पूर्वक काव्यात्मक खूबसूरती में ढ़ाला है. जैसा कि विश्वनाथ त्रिपाठी ने भूमिका में लिखा है, ‘उनमें जिए हुए जीवन की संवेदनाओं का ताप है, यह ताप ऐकान्तिक है, यानि उनका अपना है, लेकिन वह स्थितियों की, संबंधों की, उलझन एवं रगड़ से पैदा हुआ है. वह सिर्फ विश्वसनीय नहीं, मर्मान्तक भी है’. उपरोक्त पंक्तियाँ पूरे काव्य संग्रह की कथा वस्तु का निचोड़ है.

 “ज़िन्दगी दहकती रही, जैसे बांस के बने फट्ठे पर”, लेखिका ने अपने और औरों के इमीग्रेशन सम्बन्धी संघर्ष और अस्थाइत्व को बेहद खूबसूरत शब्दों में व्यक्त किया है. किसी बिखरी हुई प्रेम कथा और एक अजन्मी बेटी की कथा को कवियत्री ने इन शब्दों में व्यक्त किया है, “दमकती रही वह बनकर मेरे अक्षरों की आवाज़”…….

कभी लगता है, कवयित्री अपनी ही आप बीती सुना रही हैं, बिखरी हुई प्रेम कथा केवल उनकी ही है, बाकी के बिखराव से या तो वो नहीं जुड़ पा रहीं, या पाठक नहीं देख पा रहा हर कहीं बिखरा हुआ विच्छेद, कि तभी वे तनकर खड़ी हो जाती हैं और व्यवस्था से लड़ने का प्रयास करती हैं और उसे बदलने का भी. कहने का तात्पर्य, कि ये कवितायेँ एक करीबी पाठ की मांग करती हैं, जिसके बाद ये दुनिया में हर कहीं प्रेम पर  मंडरा रहे संकटों के बादलों का सुंदर और जीवंत वर्णन करती हैं.

अव्यस्था और अराजकता के खिलाफ उनकी आवाज़ को इन शब्दों में सुनिए, “आश्चर्य था, उन बहुत छोटी जगहों, जहाँ से हम आते थे, वहां भी नहीं थी ऐसी अनुमति, किसी प्राध्यापक को, कि पीछा करे किसी छात्रा का”…………आश्चर्य शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ, प्रवासी समाज में व्याप्त नस्लवाद और भेद भाव को दर्शाती हैं. यह एक कविता पहली दुनिया के तथाकथित सभ्य समाज और व्हाइट कालर जॉब्स करने वाले लोगों, जैसे स्वनाम धन्य प्रोफेसरों के दिमागी दिवालियेपन को दर्शाती है. पहली दुनिया में लगातार घट रही दुर्घटनाओं के साथ साथ पक्षपात की बर्बर कहानियो को उजागर करती है. साथ ही, तीसरी दुनिया के एक छोटे शहर से अमेरिकी दुनिया की तुलना कर, यह कविता पहली दुनिया में व्याप्त कई किस्मों की समस्या को सत्यापित करती है.  धन का समुच्चय पहली दुनिया को अब तक वह संवेदनशीलता नहीं दे पाया है, जिसके होने का यह दुनिया दावा करती है. इस पहली दुनिया की अपनी रूढ़ियाँ, अपनी विकृतियां, और मानसिक बीमारियों की झलकियां मिलती हैं, इन कई कविताओं में. फिर भी, मोहभंग और आकर्षण, प्रवासी अनुभव का नास्टैल्जिया और विदेशीपन एक साथ चलते हैं इन कविताओं में अंतर धारा की तरह. जैसे कि, ‘एक कविता शिकागो पर’. यहाँ, विदेशी जीवन के रंगभेद के साथ साथ, तमाम किस्मों की पेंचीदगियों से भरी उठा पटक देखी जा सकती है. यह एक चक्र वात है, एक किस्म का तूफ़ान, जिसमें आदमी दो किस्म की पहचानों में बंट जाता है.

‘हैंडल टूटा कप’ एक मर्म स्पर्शी कविता है, लेकिन इस में अंतर्निहित डार्क ह्यूमर गुदगुदाकर दर्द में हँसाने वाला है. ४० साल की उम्र में टूटी शादी के लिए एक हैंडल टूटे कप का बिम्ब, और घर के लिए भूचाल का बिम्ब दुनिया की ५० प्रतिशत आबादी का सच दर्शाता है।  कोर्ट कचहरी के बवालों और प्यार की फजीहत का चित्रण एक साथ भावुक और यथार्थ वादी है.

अधिकाँश कविताओं में बहुत कुछ अपने आप बोल देने की ताक़त है. जैसे, चक्र व्यूह के रचयिता कविता आधुनिक ज़िन्दगी में उलझनें पैदा करने की कथा कहते हुए, पुरातन बिम्बों को जीवंत करती है. संग्रह में स्त्री विमर्श की कई कवितायेँ हैं, जो औरत पर आयी अधिकाधिक जिम्मेदारियो की बात करती हैं. एक तरफ उसके कन्धों पर मर्द के साथ बाहरी दुनिया में किस्म किस्म की भागेदारी और हिस्सेदारी आयी है, दूसरी ओर घर से वह कतई मुक्त नहीं हुई. ‘तलाक के बाद की औरत’, ‘काबू में लड़कियां’, ‘लाल बिंदी से रश्क’ कुछ ऐसी ही कवितायेँ हैं.

संग्रह मनुष्यता के साथ-साथ, प्रकृति के नष्ट होने की चिंताओं से लबरेज है. ‘धोबिनिया, खंजन, हजमिनिया’, चिड़ियों की उपस्थिति, अनुपस्थिति तलाशने के माध्यम से अपना पक्षी प्रेम व्यक्त करती है. उनके विलुप्त होते जाने का दुःख, और कभी अचानक सामने आकर शांति प्रदान कर देने  का सुख, आश्वस्ति की तरह ‘एक समूचा वार्तालाप’ शीर्षक कविता में कूकता है. ये कवितायेँ मनुष्य के बहुत स्वार्थी, लोलुप और आधिकारिक हो जाने की त्रासदी को व्यक्त करती हैं. इन कविताओं में प्राकृतिक सौंदर्य के क्षरण का कष्ट बड़ी खूबसूरती से उजागर हुआ है. इन कविताओं की एक मंशा भी है—ये  कंक्रीट का जंगल बनती इस दुनिया को पशु-पक्षी से मैत्री की सलाह देती ये कवितायेँ, महादेवी वर्मा के गिल्लू की याद दिलाती हैं. १६० पृष्ठ के इस काव्य संग्रह की सारी कवितायेँ मन में बहुत गहरे उतरती हैं. इन कविताओं के माध्यम से पंखुरी ने भावनाओं के परवाज़ को पंख देने का सार्थक प्रयास किया है. कुछ कविताओं में ऐसा प्रतीत होता है कि कवयित्री ने कोई बुरा सपना देखा है, वे अचानक उठीं और दुःस्वप्न की लकीरों को कैनवास पर उतार दिया, और पुनः सो गयी अथवा उठकर चल पड़ीं। भाषा प्रांजल और छपाई सुंदर है. काव्य संग्रह निश्चित रूप से संग्रहणीय है, और पाठक को बांधे रखता है.

बोधि प्रकाशन, १५० रुपए

——-राकेश धर द्विवेदी

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