श्रुति गौतम की कविताएँ

अभी हाल में ही ‘दैनिक भास्कर’ ने राजस्थान में युवा लेखकों के लिए प्रतियोगिता का आयोजन किया था जिसमें एक लाख रुपये का प्रथम पुरस्कार श्रुति गौतम की कहानी को मिला. श्रुति अजमेर में कर अधिकारी हैं. उनकी कुछ कविताएँ पढ़ते हैं- मॉडरेटर

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1) प्रयोजन

अनायास सुनी हुई उन सायास विरुदावलियों में
तुम्हारे यश का गान था, कवि।

तुम्हारे बिम्ब विधान पे अभिमान करते हुए
चूकते नहीं थे कहने में कभी भी लोग
‘महाकवि कालिदास को भी न सूझती होगी ऐसी अद्भुत उपमा।’

तब तुम्हे विनत हो हृदय से लगा लेनी चाहिए थी
कुमारसंभव की लाल ज़िल्द में जड़ी हुई प्रति
लेकिन तुम्हारे कंठ में भरे थे प्रशंसा के हार
आवरित करते थे हृदय तुम्हारा
अनावरित करते थे आखिर क्या नहीं?

तुम्हारे दुरूह शब्दों पे वही जन जिस समय
आश्चर्य से दबा लेते दांतों तले अँगुली
ठीक उसी समय तुम्हे सरलता से
कविता के नीचे लिखने थे कठिन शब्दों के अर्थ
बिना उनके अर्थ पूछे जाने की प्रतीक्षा किये
किन्तु तुम्हे प्रिय था प्रश्नों का भोग
तृप्ति होती ही न थी, ऐसी तीव्र जठर की अग्नि
के कभी जनाभाव में स्वयं से करते हुए ऐसे प्रश्न
तुम्हे अक्सर पाया गया.. खोया गया वही तुम्हे।

तुम्हारी अंगुलियों की पोर पर ठहरी थी
नृत्य की त्रिभंग मुद्रा में स्वेद स्नात भाषा
तुम्हारे फाउंटेन पेन की निब में अटके
अनेक अनोखे शब्द थे, जिनके अर्थ
जानने के लिए शब्दकोश देखते थे प्रबुद्ध
अदेखे उपमान तुम्हारी लेखनी की दृष्टि में
व्यापते थे सदा, यदा-कदा-सर्वदा
तुम्हारे अपूर्व बिम्ब विधान का अवधान
सरल नहीं था। सहज तो संभव ही नहीं

किन्तु कवि!

वेदना से विदग्ध किसी हृदय को त्राण देते यदि
सोख लेते नयनों से दुःख की अश्रुसलिला
किसी की अक्ष से डिगी हुई पृथ्वी को
तनिक आधार देते, क्या बुरा था?
कि क्रौंच-वध से जन्मे प्रथम छंद को शास्त्र
अनुष्टुप कहते है, वाल्मीकि के नयन करुणा।
किसी अन्य विधा में इतनी शक्ति है ही नहीं

‘काव्ययशसे अर्थकृते’ से इतर
कुछ अन्य प्रयोजन भी होते है, मित्र।

विरुद के तीव्र निनाद में अस्फुट ही सही
लेकिन सुनाई देंगे, निर्णय तुम्हे लेना है

कि तुम क्या सुनोगे?

कि तुम क्या लिखोगे?

2) वचन
 
 
संकल्प की अंजुरी में
भरते हुए जल, सजल थे
नेत्र। पूरते हुए
अक्षत, क्षत था हृदय।
 
 
 
यज्ञों की सुगन्धित समिधा
एकत्र करते हुए
क्या नहीं बिखरता था
हमारा मन बार बार?
 
 
 
हम सुख में रोने वाले और
दुख में मुस्कुरा उठने वाले लोग है
दसों दिशाओं में गूंजती है
हमारे करुण हृदय की प्रार्थनाये
 
अग्नि साक्षी है हमारे वचन की। 
 
 
 
3) पुकार
 
 
 
सुगन्धित स्वाहा, स्वाधाकार से
बंधे। आहुतियों की पुकार से
आ जाते है देव। अनंत दूरियों के पार। 
 
 
लेकिन होम कर अपना स्वत्व भी
तुम्हे नहीं बुला पाती। प्रेम का सत्व भी 
वाष्पित होता है। कंठ में सूख जाती है पुकार। 

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