कवयित्री उज्ज्वल तिवारी की पाँच कविताएँ

उज्जवल तिवारी पेशे से वकील हैं. जोधपुर में रहती हैं. छपने की आकांक्षा से अधिक मन की भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए कविताएँ लिखती हैं. इसलिए अभी तक उनकी कविताएँ कहीं प्रकाशित नहीं हुई हैं. पहली बार जानकी पुल पर आ रही हैं. सधी हुई और सुघड़ कविताएँ- मॉडरेटर

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।।१।।

आँख में मणिकर्णिका

ये मेरी आँखें नहीं
मणिकर्णिका घाट है

यहाँ हर दिन अपनी चिताओं पर
स्वप्न नग्न लेट जाते हैं
धूँ -धूँ कर जलते राख हो जाते हैं

अगले कुछ दिनों तक इन आँखों में
घूमती रहती हैं उनकी आत्माएं

मैं अश्रु-समुद्र में उनकी अस्थियाँ विसर्जित कर
अपने ह्रदय को शापित होने से बचा लेती हूँ

और दो घूँट गंगाजल पी लेती हूँ

।। २ ।।

मैं प्रेम कहानियों सी रोचक नहीं

मुझे भूलना बहुत आसान है
शायद तभी लोग भूल जाते हैं मुझे

या अधूरा पढ़ कर छोड़ देते हैं
बगैर उस पृष्ठ को मोड़े
जहां तक कहानी पढ़ी जा चुकी है
छोड़ देते हैं उस किताब की तरह
जहां तहां दराज़ों में

फिर याद भी नहीं करते
कि उसे कहाँ रख छोड़ा था

मैं प्रेम कहानियों सी रोचक नहीं

।। ३ ।।

सब रंग अजान में

जब देह का छुआ दाग-सा लगने लगे
जब स्वप्न के भीतर स्वप्न दिखने लगे
करवट बदलते ही रातें बीतने लगे

तुम जोर से चीखती टिटहरी की आवाज़ सुनकर
अपने कानों पे हथेली धर देना

या देर रात तक झींगुरों की आवाजों का पीछा करना
खिड़की से झरती चांद की रौशनी में
अधूरी किताब खत्म करना

चांद को छूकर गुज़रते बादलों की गिनती करना
पर तुम सोना मत
एक क्षण को भी मत सोना

वरना स्वप्न में ये स्वप्न तुम्हें घाव देंगे
देह के दाग और गहरे से भी गहरे हो जायेंगे

तुम भोर के तारे से बतिया लेना
रात काटना आसान हो जायेगा

आसमान के बदलते रंगों को ध्यान से देखते रहना
धीरे-धीरे सब रंग सुबह की अजान में घुल जायेंगे

और तुम्हारे लिये जीना आसान हो जायेगा

।। ४ ।।
मध्यान्तर में

जीवन के मध्यान्तर में हुई तुमसे मुलाकात फिर से लौटा लाती है मुझे अतीत के गलियारों में जबकि बदला कुछ भी न था : तुम लगभग वैसे ही थे और मैं भी वैसी ही, भीतर से।

पाठशाला के पहले कालांश की सी तन्मयता से
तुमने मुझे सुना-जाना। कुछ माह बीतने के बाद भी
दूसरे कालांश सी एकाग्रता बनी रही
धीरे-धीरे तीसरे और चौथे कालांश बीतने तक तुम्हारी रुचि मुझमें कम और मध्यान्तर में मिलने वाली आज़ादी और खेलों की तरफ बढ़ने लगी

मैं फिर से एक मध्यान्तर से दूसरे मध्यान्तर पर पहुंच गयी
घाणी से तेल निकालते, आँखों पे पट्टी बांधे
बैल की भांति शून्य से शून्य तक की यात्रा में रहने लगी

मूर्खों की भांति अकेले उस कक्षा में बैठी जिसमें अंतिम कालांश
के बाद छुट्टी की घंटी कभी सुनाई नहीं देती।

।। ५ ।।
गंध

कभी-कभी मुझे तुम्हारी देह से पहाड़ों पर लगी बिच्छू बूटी जैसी गंध आती है। मैंने तुम्हें कहा नहीं पर वो कसैली गंध जब मेरे नथुनों को छूती है तो पूरे मुँह का स्वाद कसैला हो जाता है।

क्या तुम कभी पहाड़ों पर अकेले गये हो?
क्या तुमने वहाँ की वनस्पतियों से
घाटी में फैली गंध को छुआ है?

(तुमने उस गंध को मफलर की तरह अपने गले से लपेटा था
या फिर उस गंध को घर लौटते समय अपनी जेबों में भर लाये थे)

मुझे ये गंध अजीब लगती है– नाक से सीधे दिमाग में घुस जाती है। कनखजूरे सी रेंगने लगती है।

तुम केंचुली-सा इस गंध को उतार कर फेंक क्यों नहीं देते
नामालूम किसी जन्म में तुम उन पहाड़ी जंगलों में
वनैले साँप की योनि में घूमते होंगे

ना जाने अमरबेल से,
किसी हरियल वृक्ष से लिपटे रहे हों बरसों
उसके पूरे सूख जाने तक

मुझे तुम्हारी देह से उस कसैली गंध को मिटा देना है। एक रोज़ मैं लोबान का धुआं तुम्हारी देह पर मल दूँगी और फिर वो गंध कभी न आयेगी

मुझ तक।

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