अपने राम नायक हैं, अधिनायक हैं, दाता हैं, भारत भाग्य विधाता हैं!

आज रामनवमी है. भगवान राम का जन्मदिन. हमारे शहर सीतामढ़ी में आज के दिन से रामनवमी का मेला शुरू होता है एक महीने का. खैर, आज दिल्ली विश्वविद्यालय में सीआईसी के विद्यार्थी नन्दलाल मिश्र ने यह व्यंग्य लिखा है राम नाम की महिमा पर- मॉडरेटर

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राम नाम की महिमा

कुछ समय पहले की बात है। सरकार नई थी सो कुछ न कुछ नया करने में लगी थी। इसी सिलसिले में समय के साथ एक और नया काम हुआ। एक नगर का नाम ग्राम हुआ। थोड़ी चहल-पहल दिखी, थोड़ा ट्विट-फ़्विट हुआ। औपचारिकता तब जाकर संपूर्ण हुई जब थोड़ा-बहुत हो-हंगामा भी हुआ। अधिकतर जनता ने शेक्सपीयर को उद्धृत किया- नाम में क्या रखा है?

पश्चिम का उद्धरण सुन एक भक्त का हृदय कुरेद उठा, कहा- नाम में ही सब रखा है। कितने उदाहरण दूँ- एक या अनेक। जनता बोली- एक से ही चल जाएगा, शेष-अशेष सब टल जाएगा। ‘तो सुनो’, भक्त ने कहा- अपने ‘राम’ को ही ले लो। कहा है- राम से बड़ा राम का नाम। भक्त क्रांतिकारी किन्तु भावुक था, सुरों में बह गया। मुखड़े से अंतरे में ढह गया। साथ-साथ भीड़ भी गाने लगी। नर-नारियां करतल ध्वनि सुनाने लगी। और यथावत प्रवचन शुरू हो गया।

सेवक ने अपना कथन सोदाहरण सिद्ध किया- पुराना किस्सा है, रामधन जी स्वर्ग की अदालत में पेश किए गए। उन पर निर्धनों से अमानवीय व्यवहार का तथाकथित आरोप था। जीते जी कभी उन पर सुनवाई नहीं हुई थी। लोग यही कहते रहे, यहाँ से छूट गए… भगवान के घर नहीं बच पाओगे। कुछ दिनों बाद खबर आई, वे बरी हो गए। जिज्ञासा को शांति मिली- सब माफ हो गया क्योंकि रामधन जी के नाम में स्वयं ‘राम’ थे। इसलिए संतों ने कहा है- राम से बड़ा राम का नाम।

तब से रामधन जी की तर्ज पर कोटि-कोटि नामों में ‘राम’ का निवेश हुआ। रामधन से नाथूराम तक तरह-तरह के नाम रखे गए। किसी ने अंत में जोड़ा किसी ने आरंभ में। भक्त भोला था सो बह गया, भजन-कीर्तन ही में रह गया। दुनिया बहुत आगे तक गयी, इस नाम से अपार धन-धाम की कमाई हुई। आज राम नाम से धर्म है, व्यवसाय है; भक्ति कम अधिक शक्ति है, राजनीति है। तुलसी कह गये- कलियुग केवल नाम अधारा। यहाँ राम-नाम की ही लूट है। सो जितना लूट सके है, मानुष तू लूट ले।

कभी राम नाम से पत्थर तैर गया था। आज राम नाम से व्यक्ति, विचार, संस्था, मंदिर, कॉलेज, अस्पताल, कंपनी, सरकार सब तर रहे हैं। एक कबीर के राम हुए, एक तुलसी के भी नाम हुए। तब राम नाम सिर्फ भक्ति तक सीमित था। अब राजनीति को उद्वेलित कर रहा है। राम मंदिर अधूरा है। किन्तु चुनावी वादों में वह पूरा है। राम नाम से चुनाव लड़े जाते हैं। और जीते भी जाते हैं। राम एक नारा है। राम एक विचारधारा है। डूबती नैया का इकलौता सहारा है राम। गाया है- तेरा राम जी करेंगे बेड़ा पार, उदासी मन काहे को डरे… सो हम डरे नहीं अड़े हैं, आज भी संग राम के खड़े हैं- मंदिर यहीं बनायेंगे।

लेकिन मनुष्य क्या जाने कि राम नाम की सत्ता भी स्थायी नहीं है। होइहें सोई जो राम रुचि रखा। को जाने सिया-राम गति। हर मृत्यु की गवाही ‘राम नाम सत्य’ से है। कलियुग में भी कहावत चला आया है- आया राम, गया राम। एक दिन सबकी यही गत होनी है। जो भजा उसकी भी, जो न भजा उसकी भी। राम-राम कहने वाले तथाकथित सेक्युलर की भी। जय श्री राम गरजने वाले व्यथित कम्युनल की भी। किन्तु यहाँ भी अधिकांश लोग रम-खुदैया हैं, वह दोनों पालों में झूलते हैं। सावन में भी, फागुन में भी।

वैसे अपने राम नायक हैं, अधिनायक हैं। वह दाता हैं, भारत भाग्य विधाता हैं। भिखारी सारी दुनिया, दाता एक राम। नरों में उत्तम हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। उनके नायकत्व को ओढ़ने वाले मशहूर हो गये, घर-घर लटक गए। किन्तु राम स्वयं रोम के वासी हैं- रोम-रोम में बसने वाले राम… पंडित के घाट हैं राम, बनिया के बाट हैं राम। गिनती के साथ हैं राम। रामे जी राम, दूए राम दू, तीने राम तीन… राम से राम लीला है। मेला है। विजय-पथ के रथ हैं राम। लोकगीतों के नेपथ्य हैं राम। एही ठैयां झूलनी हेरानी हो रामा। आहे रामा…

राम मिलन हैं। राम विरह हैं। वाह हैं, आह हैं। हाय भी हैं। बाय भी हैं। मिले तो राम-राम, चले तो राम-राम। ‘हे राम’ संबोधन कारक का एक जगत-प्रसिद्ध उदाहरण है। हर किताब, हर व्याकरण में मिलेगा। सरकारें बदली हैं, शहरों के नाम बदले हैं, मगर यह उदाहरण नहीं बदला। पुराना ही रहा। गांधी के प्राण भी इसी संबोधन से छूटे। गाँधी जी ने रामराज्य का सपना देखा। ऐसा रामराज्य जिसमें राजा भी राम हो, प्रजा भी राम। मंत्री भी राम, संतरी भी राम। सच पूछिये तो उन्हें सब जन प्रिय थे। किन्तु हरिजन से उन्हें विशेष स्नेह था। राम हरि के ही अवतार हुए। यह उनकी एक कथा है। कहा है- हरि अनंत, हरिकथा अनंता। अपने घर एक बुजुर्ग हैं, सबसे अकसर कहते हैं- अपने-अपने राम को देखो। सो मैं चला अपना राम देखने। अब आपकी इच्छा, राम भजिये चाहे कपास ओटिए।

नंदलाल मिश्र

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