किशोरी जी तो चली गई अब ढूँढते रहिए सुर!

कल किशोरी अमोनकर के निधन के बाद हमने बहुत कुछ पढ़ा. बहुत कुछ जाना. एक लेख यह भी पढ़ लीजिये. नॉर्वे प्रवासी डॉ. प्रवीण कुमार झा ने लिखा है. वे शास्त्रीय संगीत के गहरे ज्ञाता हैं और और मेरे जैसे शास्त्रीय ज्ञान से हीन लोगों को उनकी भाषा में समझाना-सिखाना भी वे बखूबी जानते हैं. किशोरी अमोनकर को अंतिम प्रणाम के साथ प्रवीण जी का यह लेख- प्रभात रंजन

==================

“क्या मैं कोई कोठेवाली लगती हूँ आपको?”

किशोरी जी के गायन के बीच एक फलाँ ऑफिसर की पत्नी ने पान मँगवाने के लिए आवाज दी, तो वो भड़क गई। ऐसे कई किस्से हैं।

जब मैं पुणे में पढ़ता था, तो पंडित जोशी जी को निमंत्रण देना आसान था। उनका गुस्सा झेल जाते। उल्हास कशलकर जी भी ‘स्पिक मेकै’ के लिए गायन करते। पर किशोरी ताई के पास जाने की हिम्मत न होती। उनकी कई शर्तें थी कि ऐसा माहौल, ऐसी तैयारी, ऐसी गाड़ी, ऐसी ऑडिएन्स। एक अलग ही रूतबा था। एक महिला गायिका के लिए यह रूतबा बड़ी चीज है। लोग कहते हैं, वो केसरबाई केरकर से मिलती-जुलती थी मिज़ाज़ के हिसाब से। मैं कहता हूँ कि वो केसरबाई, विलायत खान साहब और कुमार गंधर्व, तीनों मिलाकर एक थी।

केसरबाई केरकर भी जयपुर-अतरौली घराने से थी, जहाँ से किशोरी जी की माँ थी, तो यह समानता तो आनी ही थी। उन दिनों महिला गायिकाओं का पायदान नीचे होता, पर किशोरी जी ने कभी अपना कद नीचे नहीं होने दिया। वो घर में घंटों रियाज कर लेंगीं, पर उस प्रोग्राम में नहीं गाएँगी जहाँ उनकी इज्जत न हो।

इस मामले में वो कुछ-कुछ विलायत खान साहब के स्वभाव की थी। उन्होनें आकाशवाणी में गाना छोड़ दिया था जब ‘क्लास-सिस्टम’ आया। उनकी अपनी निर्धारित फीस थी। जो उनको ऐफॉर्ड कर सकें, बुलाएँ। नहीं तो वो घर पर रियाज करेंगें। किशोरी जी की भी यही शर्त थी। हिंदुस्तानी संगीत है, कोई ऑरकेस्ट्रा पार्टी नहीं, कि मोल-भाव करो। जैसे विलायत खान साहब अवार्ड लेने से इंकार करते, वैसे ही किशोरी जी ने भारत-रत्न न मिलने पर कहा था, “जिस कैटगरी के अवार्ड में सचिन तेंदुलकर हों, उस कैटगरी से मुझे बाहर ही रखिए।”

ऐसा ही कुछ-कुछ कुमार गंधर्व वाली बात। वो भी कुमार गंधर्व जी की तरह घरानों में विश्वास नहीं करतीं। किशोरी जी किसी एक घराने की थी ही नहीं। उनकी माँ जयपुर घराना, एक गुरू भिंडीबाजार घराना, एक गुरू आगरा घराना। वो कहतीं कि घराने संगीत को बाँध देते हैं। यह भी इत्तेफाक ही है कि कुमार गंधर्व जी और किशोरी जी, दोनों की आवाज अचानक से २५ वर्ष की उमर में कुछ वर्ष के लिए चली गई। कुमार गंधर्व जी को टी.बी. हो गया, और किशोरी जी की अपने-आप चली गई। जैसे भगवान परख रहे हों। और जब वापस आई, तो दोनों की आवाज ने मिसाल कायम कर दी। यह चमत्कार ही तो है।

मैनें भले ही उन्हें इन तीन हस्तियों से जोड़ा हो, पर गायन के तौर पर मुझे उनमें उस्ताद अमीर खान की छवि दिखती है। दोनों के सुनने के लिए श्रोता में भी धैर्य चाहिए। इनका आलाप लंबा होता है। यह बंदिश पर नहीं, सुर पर ध्यान देते हैं। इन्हें एक सुर मिल जाता है, उसी को पकड़ कर घंटों गा सकते हैं। पर ध्यान रखें, इन्हें सुर मिल जाता है। सबको सुर नहीं मिल पाता, ढूँढते रह जाते हैं। किशोरी जी तो चली गई। अब ढूँढते रहिए सुर!

More From Author

युवा शायर #3 आलोक मिश्रा की ग़ज़लें

अपने राम नायक हैं, अधिनायक हैं, दाता हैं, भारत भाग्य विधाता हैं!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

जानकी पुल को सहयोग करें

Jankipul : A Bridge of World's Literature एक नयी शुरुआत! मेरा कॉलम #Jankipul के लिए " जनहित में जारी सब पर भारी" आपकी टिप्पणी की अपेक्षा रहेगी