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मुक्तिबोध का अपूर्व आनंदमय पाठ

संजीव कुमार के व्यंग्य हम सब पढ़ते रहे हैं. वही जिसमें ‘खतावार’ के नाम से वे ख़त लिखते हैं. इस बार प्रसंग मुक्तिबोध की 50वीं पुण्यतिथि का है. यह देखिये, बौद्धिक व्यंग्य कितना मारक होता है- मॉडरेटर.
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दो शब्द
कई महीने हो गए, ख़तावार ने कोई ख़त नहीं लिखा. दीनानाथ बत्रा, मोहन भागवत, अमित शाह, योगी/महंत आदित्यनाथ जैसी विभूतियों के रहते हर बार यह हिन्दूकुलकलंक रामपदारथ आख्यान में उलझ कर रह जाता है. इससे अनुकरणीय उदाहरणों के लिए किलसते इस समाज का कितना नुकसान होता है, कहने की ज़रुरत नहीं…. और उधर पदारथ भाई को भी यह पसंद नहीं कि कोई उनकी बातें टीप कर खुद लेखक कहलाये. भाई जान ने इसे कानूनी तो नहीं, पर नैतिक स्तर पर कॉपीराइट का मामला बना रखा है. सो, हमने तय किया कि नथिंग डूइंग, इस बार प्रशस्ति-पत्र वाली अपनी आज़्मूदा विधा का, अशोक वाजपेयी के शब्दों में, पुनर्वास करना ही होगा. पदारथ भाई अपनी टुच्ची दिव्य-दृष्टि अपने ही पास रखें और कॉपीराइट को चाट-चाट कर अपनी सेहत बनाएं, मेरी बला से!
 
पर विधि का विधान कुछ और हो तो विधा की क्या औकात!
 
हुआ ये कि अपनी पचासवीं पुण्यतिथि की रात साक्षात ग. मा. मुक्तिबोध पदारथ भाई के सपने में नमूदार हो गए और उनके हवाले से भाई ने बीते १२ सितम्बर की शाम हमारी सेवा में मार्क्सवाद-फार्क्सवाद को लेकर अच्छी-ख़ासी थेथरोलोजी बघार डाली. वह थेथरोलोजी अपने-आप में कोई उद्धरणीय चीज़ नहीं, पर हमने जिस दृढ़ता से उसका विरोध किया और एक ढाल की तरह अपने प्रिय आलोचकों की रक्षा की, उसे बताने के लिए थोड़ा सन्दर्भ उस थेथरोलोजी का भी देना ही होगा जो कि हमारे मोबाइल फ़ोन में रिकार्डेड है.
 
थोड़ा सन्दर्भ
पदारथ भाई की मानें तो ११ सितम्बर की आधी रात को माचिस जलने की आवाज़ से उनकी नींद खुली. देखा कि कमरे में कोई शख्स बीड़ी जला रहा है. तीली की लौ में पथरीली तराश वाले एक चेहरे की उभरी हुई हड्डियां दिखती हैं… और बाकी के दबे-पिचके हिस्सों पर सांवला अंधेरा. पदारथ भाई चौंके कि अरे, ये तो परम अभिव्यक्ति के साथ छुपम-छुपाई खेलनेवाले कविवर मुक्तिबोध हैं! ‘मौत के पचास साल बाद यहां कैसे, महाराज?’, पदारथ भाई पूछ बैठे.
 
तब तक तीली बुझ चुकी थी और अंधेरे में सिर्फ़ बीड़ी का जलता सिरा दिख रहा था. उस सिरे के पास से आवाज़ आई, ‘स्वप्न और फैंटेसी में कोई भी कहीं भी हो सकता है. लगता है, इस युक्ति को सही ढंग से एप्रीशिएट करनेवाले नामवर को तुमने पढ़ा नहीं है.’
 
‘का बात कर रहे हैं, कवी जी,’ पदारथ भाई बोले, ‘आपके बारे में लिखी-कही हर बात हम पढ़े हैं. यहां तक कि आज के दिन जो लिखा-कहा गया, उसको भी.’
 
‘आज का दिन…,’ एक आह भरकर मुक्तिबोध ने छोटा पॉज़ लिया, फिर बोले, ‘आज के दिन का तो जैसे एक ही एजेंडा था. यह सिद्ध करना कि मैं मार्क्सवादी था ज़रूर, पर ग़लती से था. मुझमें जो कुछ अच्छा था, उसका कोई सम्बन्ध मार्क्सवाद से नहीं. इस बात ने मुझे इतना बेचैन कर दिया कि बीड़ी के चार बण्डल ख़त्म करके भी चैन न मिला और मैं नरक से निकल कर इधर टहलने आ गया.’
 
‘आप और नरक में? आपके जैसी पुण्यात्मा को तो स्वर्ग में अकोमोडेशन मिलना चाहिए था!’
 
‘अरे, कहां! वहां अकोमोडेशन का पूरा काम डोमा जी उस्ताद के हाथ में है. कवियों-चिंतकों को पहले थौरोली क्रॉस एग्ज़ामिन करता है मिस्टर गुप्ता की मदद से, फिर उनके वैचारिक रुझान के आधार पर उचित जगह भेज देता है. स्वर्ग उन्हें ही मिलता है जो व्यवस्था के लिए कभी ख़तरा नहीं बने. अपने अज्ञेय जी को स्वर्ग मिला, मेरी आंखों के सामने की बात है. उनके बारे में मैंने ग़लत थोड़े ही लिखा था कि जैनेन्द्र में तो फिर भी मुक्तिकामी सामाजिक ध्वन्यर्थ थे, आगे चलकर अज्ञेय में वे भी लुप्त हो गए. कोई आश्चर्य नहीं कि डोमा जी उस्ताद ने उन्हें स्वर्ग का पास देने में उतनी देर भी नहीं लगाई जितने में अज्ञेय एक छोटी कविता लिख लेते थे.’ मुक्तिबोध ने ठहरकर फिर एक आह भरी और कहा, ‘उन्हीं अज्ञेय को आज एक आलोचक ने ‘गहरे दायित्व-बोध’ और ‘मनुष्यता से गहन और बिनाशर्त प्रतिबद्धता’ का उदाहरण बताया है. और वह ऐसे कि यही प्रतिबद्धता उन्हें बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाक़ों तक ले गयी. वाह! दायित्व-बोध का एंटी-कम्युनिस्ट उदाहरण ढूंढने की कैसी बेताबी है! रांगेय राघव का बंगाल के अकाल में भटकना या नागार्जुन का जनता के हर आन्दोलन में कूद पड़ना या रामविलास का अपनी किताबों की रॉयल्टी और पुरस्कार-राशि किसी अच्छे मक़सद के लिए दे देना इस आलोचक को भला क्यों याद आएगा! वह पीछे कह आया है कि ‘मार्क्सवाद अपने-आप ऐसे किसी दायित्व-बोध का स्रोत नहीं हो पाता’. बात एक हद तक ठीक भी है. मार्क्सवाद दायित्व-बोध का स्रोत बने, यह उतना स्वाभाविक नहीं, जितना यह कि दायित्व-बोध मार्क्सवाद को अपनाने की वजह बने. पर आलोचक इतनी मासूमियत के साथ यह बात कह नहीं रहा. उसे तो साबित करना है कि मैं जो ‘इन द थिक ऑफ़ थिंग्स’ होना चाहता हूं, हर घटना-परिघटना में जो एक निजी दायित्व अनुभव करता हूं, वह मार्क्सवाद के असर से नहीं, बल्कि अपने ‘पुराने अस्तित्ववादी संस्कारों’ की वजह से. मार्क्सवाद स्रोत नहीं बन पाता, अस्तित्ववाद बनता है. मतलब साफ़ है. आलोचक यह नहीं कहना चाहता कि कोई विचार-व्यवस्था खुद में दायित्व-बोध का स्रोत नहीं हो सकती. वह तो बस मार्क्सवाद पर यह आरोप लगाना चाहता है और इस तरह मुझे मार्क्सवाद के पाले से अगवा करके कहीं और ले जाना चाहता है. ऐसे प्रशंसक मिल जाएं तो रामविलास जैसे निंदकों की क्या ज़रुरत? उन्होंने भी तो मुझे मार्क्सवाद के पाले से खदेड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी! दोनों ही मेरी उस विचारधारा को, जो मेरी जीवनधारा की तरह रही, मेरा अन्तरंग मानने से इनकार करते हैं.’
 
मुक्तिबोध एकदम रौ में बोले जा रहे थे. अंधेरे में भी उनके चेहरे की उत्तेजना को महसूस किया जा सकता था. दूसरी बीड़ी सुलगाने के लिए रुके तो माचिस की रोशनी में पदारथ भाई ने उनकी कनपटी के पास से बहता पसीना देखा. भावावेश की निरंतरता को ब्रेक करने से शायद उन्हें आराम मिले, इस ख़याल से पदारथ भाई बीच में कूद पड़े (वैसे उनके द्वारा बतायी गयी यह वजह सफ़ेद झूठ से ज़्यादा कुछ नहीं; मुझे पूरा विश्वास है कि पदारथ भाई अपनी बकवास शुरू करने का मौक़ा ही तलाश रहे थे. खैर!). बोले, ‘हम समझ गए मुक्तिबोध जी, आप अपूर्वानंद के लेख की बात कर रहे हैं. पर ऊ लेख न तो एतना चर्चा के लायक है, न एतना टेंशन खाने के लायक. बताइये, जो लेखक साफ़-साफ़ ई झूठ बोल रहा हो कि गुजरात से लेकर तमाम दूसरे संघर्षों में वामपंथी दल निष्क्रिय रहे हैं, उसके बात को कोई सीरियसली काहे लेगा? ऐसे लोग को हम खूब देख चुके हैं. वामपंथी दल किसी प्रोग्राम में अपना झंडा लेके पहुंचें त बोलेंगे कि हम इस झंडे के साथ जुटे मजमे में काहे जाएं? और झंडा बिना लिए पहुंचें त बोलेंगे कि वाम दल उसमें शामिल नहीं थे, उनके कुछ लोग आये, पर व्यक्तिगत हैसियत में आये थे. दिखोगे त बोलेंगे, दिखे काहे? नहीं दिखोगे त बोलेंगे, थे ही नहीं. असल में ई सब व्यवस्था का एजेंट लोग है जिसके आंख में वामपंथी दल का बचा-खुचा साख भी खटक रहा है.’
 
इस बात पर बीड़ी को दुबारा सुलगाने के लिए दियासलाई रगड़ते मुक्तिबोध रुक गए, ‘नहीं-नहीं, एजेंट-वेजेंट वाली भाषा इन लोगों के बारे में इस्तेमाल करने से बचो. अव्वल तो ऐसे आरोपों में सीधे-सीधे कोई तथ्य नहीं होता, और दूसरे, आरोप लगाकर हम तार्किक उत्तर देने की ज़िम्मेदारी से कन्नी काट जाते हैं. मैं भी कविता में रात गए निकलने वाले प्रोसेशन में सबको शामिल भले ही दिखा दूं, बहस में मैंने इस युक्ति से कभी काम नहीं लिया. बहस में तो तथ्यों और तर्कों से ही बात होनी चाहिए.’
 
‘पर उसके लिए दूसरे के बात में भी कोई दम होना चाहिए!’
 
‘दम तो है! वामपंथी दल निष्क्रिय रहे या सक्रिय, यह तुम जैसे आजकल के कार्यकर्ता जानें, पर इस आलोचक की और बातों के बारे में तो मैं कह सकता हूँ कि वे हवा में नहीं हैं. उसकी बातों के पीछे एक निश्चित समझ है. वह यह कि इतिहास के गतिशास्त्र को, उसके नियमों को पा लेने के दावेदार, भविष्य का नियत नक्शा अपने सामने रख कर उस दृष्टि से महत्वहीन ठहरने वाली अनेक घटनाओं-परिघटनाओं के प्रति असंवेदनशील हो जाते हैं. यह भी कि ऐतिहासिक नियतिवाद इच्छा-स्वातंत्र्य को बेमानी बता कर मानवीय नैतिकता के प्रश्न को भी निरर्थक ठहरा देता है—अगर आप मानते हैं कि कुछ ऐसा है जिसे होना ही है, वह हमारी इच्छा या निर्णय पर निर्भर नहीं है, तो हमारे कर्म के बारे में नैतिक जजमेंट संभव ही नहीं. वह न नैतिक होगा, न अनैतिक, वह परा-नैतिक होगा. ये अपने-आप में बहुत लचर तर्क नहीं हैं. आइसा बर्लिन, कार्ल पॉपर आदि ने इस पर काफ़ी लिखा है.’
 
‘लीजिये. आप तो खुदे अपूर्वानंद से बहुत प्रभावित दिखलाई पड़ रहे हैं.’ पदारथ भाई ने थोड़ी हताशा के साथ टोका.
 
‘नहीं, प्रभावित होने न होने की बात नहीं है. मैं तो सिर्फ़ यह बता रहा हूँ कि मार्क्सवाद के ख़िलाफ़ दार्शनिक आपत्ति की एक परम्परा यह भी रही है, और इसमें भी सत्यांश है. पर इसकी दिक्क़त यही है कि खुद मार्क्स और मार्क्सवादियों के लेखन और जीवन में मानवीय कर्तृत्व और व्यक्तिगत नैतिकता को लेकर जो सैद्धांतिक और व्यावहारिक प्रसंग मिलते हैं, उनकी ओर से यहां निगाह फेर ली गयी है. सफ़ेद-स्याह में चीज़ों को देखने वाले ये लेखक-विचारक इस बात की व्याख्या कैसे करेंगे कि दार्शनिक स्तर पर ठेठ भौतिकवादी होते हुए भी कम्युनिस्टों के यहां प्रतिबद्धता जैसी प्रत्ययवादी/आदर्शवादी धारणा पर इतना भरोसा किया जाता है? फिर यह भी सोचो कि इतिहास का एक गतिशास्त्र मार्क्सवाद के पास अवश्य है, पर क्या एक कम्युनिस्ट शोषण-उत्पीड़न की मुखालफ़त यही सोच कर करता है कि वह इतिहास की गति के साथ है? क्या क्रान्ति उसके लिए एक नैतिक स्वप्न नहीं, हवा को पीठ देकर किया जाने वाला मैनिपुलेशन है? ऐसा सोचना खुद में कितना ग़ैर-ईमानदार और अनैतिक है, कहने की ज़रूरत नहीं.’
 
पदारथ भाई को फिर मौक़ा मिला, ‘जरूरत काहे नहीं है! कहिये, जोर-जोर से कहिये. इन लोगों को बेनकाब करना जरूरी है.’
 
‘बात की गंभीरता को कम न करो, मित्र. ज़रूरत अपशब्द कहने की नहीं, इस बात की है कि इनकी आला दर्जे की बौद्धिकता प्रदर्शित करती बातों की फांक को पकड़ा जाए. अब यही देखो, आलोचक की ये बात तो ग़लत नहीं है कि मेरे अन्दर उन इलाक़ों में जाने की बेचैनी दिखती है जो बेकार मानकर छोड़ दिए गए हैं. यहां वह, निस्संदेह, मार्क्सवाद के संकीर्ण संस्करण द्वारा छोड़ दिए गए इलाक़ों की बात कर रहा है. पर समस्या ये है कि वह उसी संस्करण को मार्क्सवाद बताने पर आमादा है. ऐसा वह किसी का कृपापात्र बनने या किसी को बदनाम करने के लिए कर रहा है या नहीं, इसमें मेरी दिलचस्पी नहीं है. मेरी चिंता बस यह है कि ऐसा करके वह मेरे संघर्ष, मेरी तलाश को–जो कि मार्क्सवाद को उसके संकीर्ण संस्करण से छुटकारा दिला कर उसका निजसत्व बहाल करने के लिए थी–बेमानी बनाए दे रहा है. उसकी बातें पढ़कर कोई मुझे समझना चाहे तो उसे लगेगा कि मैं जीवन भर बालू में से तेल निकालने का मूर्खतापूर्ण प्रयास करता रहा. उसे यह भी लगेगा कि मैं जहां कहीं मार्क्सवाद की चिरपरिचित स्थापनाओं के साथ दिखता हूं, वहां असंगत हूं–अगर अपने सोच में सुसंगत होता तो उन स्थापनाओं के साथ न होता. यह आलोचक, कुछ इस अंदाज़ में जैसे मेरे ही सोच की तार्किक निष्पत्ति को सामने रख रहा हो, यह भी कहता है कि ‘मार्क्सवाद के पतनशील वर्ग और उत्थानशील वर्ग की अवधारणा के दायरे से निकलना होगा’. मेरा सारा सृजनकर्म और विचारकर्म इस अवधारणा के साथ है. जहां इतिहास के विराट फलक पर चीज़ों को समझना हो, वहां इस अवधारणा के बगैर मेरा काम चल नहीं पाता. तो ज़ाहिर है, यह आलोचक संगति की अपनी ही बनायी एक स्थूल धारणा के आधार पर मेरे सर्जक व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों में आंगिक संगति के अभाव की ओर संकेत करता हुआ, वस्तुतः, मुझे ध्वस्त कर रहा है भले ही उसकी भंगिमा प्रशंसात्मक हो, या फिर अपना एक मुक्तिबोध गढ़ कर उस इम्पोस्टर को मेरे नाम पर चलाने की जुगत में लगा है. मैं तुम्हें धर्मवीर भारती के ‘अंधायुग’ की अपनी समीक्षा का यह अंश सुनाता हूँ जहां एक रोचक संयोग से मैं न सिर्फ़ वर्गों की ऐतिहासिक भूमिका की बात कर रहा हूँ, बल्कि दायित्व नामक उस चीज़ की भी बात कर रहा हूँ जिसे यह आलोचक ‘मनुष्यता के प्रति बिनाशर्त प्रतिबद्धता’ से निकले परम निरपेक्ष मूल्य के रूप में रखता है और जिसके बारे में उसका दावा है कि वह ‘संसार को एक सही दिशा में ले जाने या दुरुस्त कर देने की इच्छा से पैदा नहीं हो सकती.’ मैंने लिखा था: “श्री भारती ने अपनी फैंटेसी के अंतर्गत व्यक्तियों द्वारा उभारे गए (उन्हीं के शब्दों में) जिन निष्क्रिय सत्यों, तटस्थ सत्यों और अर्ध-सत्यों को उद्घाटित करने का प्रयत्न किया है, वे सत्याणु, वस्तुतः, कुछ प्रवृत्तियाँ सूचित करते हैं—ऐसी प्रवृत्तियाँ जो संस्कृति और समाज के नेतृ-वर्ग की हैं…. इस वर्ग के शासन-प्रशासन-अनुशासन में चलने वाली सभ्यता ह्रास-ग्रस्त है. उसका ह्रास अवश्यम्भावी है. किन्तु, सामाजिक रूपान्तरों के घटना-क्रम विकसित करने वाली शक्तियां कौन-सी हैं, इसका क्रम-उल्लेख प्रस्तुत काव्य में नहीं है. इसका कारण यह है कि लेखक के मनोलोक में ऐसी किन्हीं शक्तियों की स्थिति की जानकारी या ज्ञान-संवेदना का अभाव है. इस अभाव के फलस्वरूप, मानव सुलभ आशात्मक भविष्यवाद का एकमात्र आधार वे क्षण हैं जहां मनुष्य मनुष्य हो जाता है. यह संवेदनात्मक व्यक्ति-मानव अपनी संवेदनाओं के सामान्यीकरण के द्वारा ही मुक्ति और दायित्व (उन्हीं के शब्दों में) के प्रयास करेगा…. श्री भारती को जानना चाहिए था कि भिन्न-भिन्न वर्गों में मुक्ति या दायित्व की कल्पनाएँ भिन्न-भिन्न होती हैं. दायित्व की जो कल्पना एक श्रमिक की है, वह धनिक की नहीं. जो मजदूर की है, वह पूंजीपति की नहीं…. इसलिए जिस ‘दायित्व’ और ‘मुक्ति’ की कल्पना को सभ्यता के अवलंब के रूप में श्री भारती प्रकट करते हैं, वह व्यक्ति-मानव की शुभेच्छा में एकरूप, किन्तु विभिन्न वर्गावस्थाओं में भिन्न स्वरूप है.” ऐसी बातें कहने वाले मुझ जैसे विचारक को तो ‘जनसत्ता’ में छपे उस आलोचक की कसौटी पर बिलकुल खरा नहीं उतरना चाहिए. फिर पता नहीं क्यों वह मेरा प्रशंसक है! उसकी कसौटी पर तो दायित्व-सम्राट अज्ञेय जी ही खरे उतरें, यह उचित होगा. पर विडंबना देखो, अज्ञेय के लिए उसने अशोक वाजपेयी के जिस पदबंध—‘मार्मिक तात्कालिकता’—का उपयोग किया है, उसका प्रयोग अशोक ने अज्ञेय से मेरा फर्क़ बताने के लिए किया था. अशोक के शब्द हैं: “अज्ञेय की तरह मुक्तिबोध तटस्थ या यायावर नहीं हैं…. उनकी मानवीय प्रतिमा कितनी भी विकृत क्यों न हो, उसमें हमेशा मार्मिक तात्कालिकता होती है…. (कुछ उदाहरण दिए हैं)… स्पष्ट है कि मुक्तिबोध की मानवीय प्रतिमा कभी वैसी अमूर्त नहीं होती जैसी अज्ञेय की बाद की कविता के मिथिकल संसार में होती है.” चलिए, जो मार्मिक तात्कालिकता अज्ञेय की कविताओं में नहीं थी, वह किसी आलोचक को उनके कर्म में मिल गयी. इससे अच्छी बात क्या होगी!’
 
‘आप कहते हैं कि आपको उसकी कसौटी पर खरा नहीं उतरना चाहिए, त सचाई है कि खरा उतरते भी कहां हैं?’ पदारथ भाई बोले, ‘आलोचक महोदय यही तो कहना चाहते हैं कि वर्गीय दृष्टि पर अपनी बात टिकाने वाला मुक्तिबोध असली मुक्तिबोध नहीं है. लिखा ही है कि ‘और चीज़ें बासी हो सकती हैं, इंसानी रिश्ता बनाने की यह तड़प नहीं.’ मतलब तो यही है ना कि आपका विचारधारात्मक आग्रह, सभ्यता-समीक्षा-फमीक्षा सब बासी हो गया है! फिर आप रह ही कहां गए? आपका टीकाकार ख़तम त आपका रचयिता भी ख़तम! अशोक जी तो पहले ही कह गए हैं कि दोनों में कोई फर्क नहीं है! मने कुल मिलाके आपके पचासवें पुण्यतिथि पर आपको पूरा खतम कर देने का इंतजाम किया है भाई लोग.’
 
‘हां, शायद यही सच है… शायद यही सच है,’ ऐसा कहकर मुक्तिबोध ने एक ज़ोर का सुट्टा मारा और ढेर सारा धुंआ उगल दिया. पदारथ भाई ने अनुभव किया कि धुंए के उस गुबार के साथ खुद मुक्तिबोध भी धुंए में तब्दील होकर ऊपर की ओर उठते चले गए और अचानक कमरे में मौत का-सा सन्नाटा छ गया. पदारथ भाई ने आंखें मल-मलके देखा, पर कमरे में कोई दिखा नहीं. फिर उन्होंने सुंघवा कुत्ते की तरह नाक ऊपर उठा कर वातावरण का जायज़ा लिया, पर बीड़ी के धुंए की भी कोई महक न मिली. थक कर पदारथ भाई बिस्तर पर निढाल हो गए.
 
असली बात यानी हमारा पराक्रम
 
सारी बात सुनकर हमने पदारथ भाई को मुख़्तसर-सी झाड़ लगाई, पर समझिये, वह लौंगिया मिर्च किंवा नावक के तीर जैसी असरदार थी. वही बताने के लिए हमें मजबूरन उपर्युक्त ब्योरे आपके सामने परोसने पड़े. हमने कहा – (१) आप शुद्ध बकवास करते हैं. मरा हुआ आदमी, वह मुक्तिबोध ही क्यों न हो, भला सामने कैसे आ सकता है? निष्कर्ष : यह मजमून अविश्वसनीयहै. (२) अगर आप कहते हैं कि वह सपने में आये थे, तो इसका मतलब ये बातें उनकी नहीं, खुद आपके मन की हैं. यानी एक ऐसे आदमी के मन की जो अभी तक मार्क्सवादी बना हुआ है और इस पर शर्मिन्दा भी नहीं. ऐसे बेशर्म आदमी की बातें मैं क्यों मानूं? निष्कर्ष : यह मजमून शर्मनाक है. (३) वह लेख मैंने भी पढ़ा है. मुझे तो ऐसी कोई बात नज़र ही नहीं आयी जो आपके मन में बैठे मुक्तिबोध जी को नज़र आ गयी है. निष्कर्ष : यह मजमून निराधार है.
 
अपने प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद की रक्षा में इस्तेमाल किया गया यह नावक का तीर कितना कामयाब था, यह इसी से समझिये कि पदारथ भाई की ज़ुबान से विरोध का एक लफ्ज़ न निकला और जनाब ने अविलम्ब फ़ोन बंद कर दिया.
लेखक संपर्क- sanjusanjeev67@gmail.com 
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