किताबों के विज्ञापन और हमारे मूर्धन्य लेखक

युवा शोधकर्ता सुरेश कुमार के कई लेख हम पढ़ चुके हैं। इस बार उन्होंने इस लेख में अनेक उदाहरणों के साथ यह बताया है कि आधुनिक हिंदी साहित्य के आधार स्तम्भ माने जाने वाले लेखक भी अपनी किताबों के प्रचार-प्रसार के ऊपर कितना ध्यान देते थे, चाहे भारतेंदु हरिश्चंद्र रहे हों या प्रेमचंद। लेख पढ़िए- मॉडरेटर

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 इस में कोई दो राय नहीं है कि किताबें हमारे जीवन और विचारों की जमा-पूंजी होती हैं। किताबों की यात्रा जितनी लंबी होगी उतना ही हमारे विचारों का फैलाव होगा। यह सही बात है कि किताबों के द्वारा ही हमारा साहित्य और विचार सैकड़ों मील की दूरी तय करता है। यदि किताबों का प्रचार-प्रसार नहीं होगा तो जाहिर सी बात है कि एक लेखक के विचार दूर तक नहीं जा पाएँगे। इधर, हिन्दी नवजागरणकालीन पत्रिकाओं को खंगालते समय एक बड़ी दिलचस्प बात पर मेरा ध्यान गया।  मैंने देखा कि 19वीं और बीसवीं सदी के लेखक अपनी किताबों का प्रचार-प्रसार बड़े ही तन-मन और बड़ी लगन से किया करते थे। नवजागरणकालीन लेखक किताबों के प्रचार-प्रसार के लिए जितना सजग दिखाई देते हैं, उतना आज के लेखक नहीं है।

नवजागरणकाल में किताबों के प्रचार का साधन पत्र-पत्रिकाएं हुआ करती थीं। यह बड़ी दिलचस्प बात है कि 19वीं सदी के महत्वपूर्ण लेखक राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द की किताबों के विज्ञापन ‘हरिश्चन्द्र पत्रिका’ में छपे थे। कोई यह भी कह सकता है कि राजा शिवप्रसाद नवजागरणकाल के बड़े लेखक थे, उन्हें अपनी किताब का विज्ञापन करने की क्या आवश्यकता थी? राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द इस बात को भलिभांति जानते होंगे कि जो किताब उन्होंने इतनी मेहनत और परिश्रम से लिखी हैं, यदि वह पाठकों तक नहीं पहुंचेगी तो उनके परिश्रम का अर्थ क्या रह जायगा। ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ जनवरी 1874 में भारतेन्दु ने श्री सर राजा राधाकान्त देव की पुस्तक ‘शब्द कल्पद्रुम’ और शिवप्रसाद सितारे हिन्द की ‘हिन्दी गुटका’ का विज्ञापन अपनी टिप्पणी के साथ छापा था। राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द की किताब का विज्ञापन इस प्रकार है :

 ‘‘हमारे गुरुवर श्री बाबू शिवप्रसाद सी.एस. आई. अपने हिन्दी गुटके की पुस्तक फिर से छापते हैं हिन्दी कविता का संग्रह और बढाया जायगा मैं भाषा के रसिकों से निवेदन करता हूं कि प्रसिद्ध कवियों की स्वाभाविक उत्तम कविता छाटकर जो लोग भजैंगे वह हम लोग बड़े हर्ष पूर्वक उस गुटके में छापैंगे जो लोग कुछ कविता भेजैं उनको उचित है कि कवि का नाम लिखैं और यह भी लिखैं किस गुण के कारण वह कविता उत्तम समझी गई है।

 हरिश्चन्द्र’’

 सर राजा राधाकान्त देव की पुस्तक शब्द कल्पद्रुम का विज्ञापन ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ में इस प्रकार छपा गया था:

‘‘बंगला और देवनागरी दोनो अक्षरों में अलग बलग छपैगा छ महीने तक 20 फर्मा(80 पृष्ठ का एक खंड) प्रति मास में मिलैगा और पचास खंड में सम्पूर्ण होने की संभावना है मूल्य प्रत्येक खंड का 1)रुपया है जिन लोगों की लेने की इच्छा हो वह कलकत्ते की शोभा बाजार में कुमार श्री उपेन्द्र कृष्ण बहादुर को या मुझे लिखौं।।  हरिश्चन्द्र’’

भारतेन्दु ने किताबों के प्रचार-प्रसार के लिए ‘हरिश्चनद्र मैगजीन’ में अच्छी शुरुआत की थी। भारतेन्दु के मन यह बात कहीं-न कहीं जरुर रही होगी कि किताबों का प्रचार-प्रसार नहीं होगा तो पाठक नई किताबों से कैसे परिचित होंगे। भारतेन्दु ने भी अपनी किताबों और पत्रिकाओं के विज्ञापन ‘हरिश्चन्दचन्द्रिका’ में छापे थे। भारतेन्दु यह भी जानते थे कि किताब के प्रकाशित होने के बाद एक लेखक की जिम्मेदारी क्या होती है? एक लेखक तौर पर भारतेन्दु किताबों की  परवरिश करना जानते थे। भारतेन्दु पाठकों की जानकारी के लिए अपनी किताबों का विज्ञापन ‘हरिश्चन्दचन्द्रिका’ में छापते थे। इसी पत्रिका में उन्होंने ‘कविवचन’ का विज्ञापन भी प्रकाशित किया था। ‘श्रीहरिश्चन्दचन्द्रिका’ अक्टूबर 1874 के अंक में भारतेन्दु की किताब ‘उत्तरार्द्ध भक्तमाल’ का विज्ञापन छपा था। इस किताब का विज्ञापन कई अंकों तक छपता रहा। भारतेन्दु ने इस किताब के विज्ञापन देते समय इस बात का ध्यान रखा था कि विज्ञापन की भाषा ऐसी हो कि सर्वसाधारण को समझ में आ जाए। प्रमाण के तौर पर विज्ञापन की भाषा का नमूना प्रस्तुत है:

भक्तमाल बनने के काल से जो जो महात्मा भक्त हुये हैं वे हैं उनके चरित्र ‘‘उत्तरार्द्ध भक्तमाल’’ के नाम से उसी छंद में संगृहीत होते हैं जिन महाशय को भक्तों के चरित्र ज्ञात हों वे कृपापूर्वक बनारस में श्री बाबू हरिश्चन्द्र को लिखैं।।

श्रीहरिश्चन्द्रचन्द्रिका के अक्टूबर 1874 के अंक में छपे ‘कविवचन’ पत्रिका के विज्ञापन की भाषा देखिए कि कितनी सरल और सहज है‘‘यह एक पाक्षिक पत्र हिन्दी साधुभाषा का अनेक विषयों से पूर्ण अतिउत्तम छपता है मूल्य केवल 6)वार्षिक है जिनको लेना हो हम लोगों को पूर्वोक्त पत्र के मैनेजर को लिखैं। हरिश्चन्द्र और ब्रदर’’

नवजागरणकालीन दौर में किताबों के प्रचार और प्रसार के लिए दो तरह के साधन थे। पहला पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञापन  द्वारा पाठकों को यह सूचना दी जाती थी कि अमुक लेखक की अमुक किताब प्रकाशित हुई है। दूसरा तरीका यह था कि किताब के अंतिम पृष्ठ पर प्रकाशक की ओर से लेखक की प्रकाशित किताबों की सूची दी जाती है। और, इस बात का आग्रह किया जाता था कि अमुक किताब इस पते पर मिलती है। नवजागरणकालीन लेखक और प्रकाशक दोनों ही किताबों के प्रचार-प्रसार पर जोर देते थे। 19वीं सदी के आठवें दशक की प्रसिद्ध पत्रिका ‘ब्राह्मण’ 15 जुलाई हरिश्चन्द्र संवत-7 अंक में मैनेजर, ‘खड़ग विलास’ प्रेस की ओर से भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की बावन पुस्तकों की सूची देकर विज्ञापन छपवाया गया था। इस विज्ञापन में इस बात का जिक्र किया गया था कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कृत पुस्तकें बिक्री के लिए तैयार हैं।

बीसवी सदी में हिन्दी लेखकों ने किताबों के प्रचार-प्रसार पर खूब जोर दिया था। इस सदी का बड़े से बडा लेखक अपनी किताबों के प्रचार-प्रसार के लिए संजीदा दिखाई देता है। बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में हिन्दी साहित्य में कई बड़ी पत्रिकाओं का जन्म हो चुका था। बीसवीं सदी के पहले और दूसरे दशक में जिन पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ उनके अधिकांश संपादक हिन्दी के नामी लेखक हुआ करते थे। इस दौर में किताबों के विज्ञापन पत्र-पत्रिकाओं में बड़े जोर-शोर छापे गए थे। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से लेकर प्रेमचंद की किताबों के विज्ञापन ‘सरस्वती’, ‘गृहलक्ष्मी’, ‘चांद’,‘माधुरी’, ‘सुधा-,‘हंस’ और ‘त्यागभूमि’ में छपे थे।

बीसवीं सदी में किताबों के विज्ञापन की भाषा बड़ी  चुटीली और आकर्षित करने वाली हुआ करती थी। लेखकों को पता था कि यदि विज्ञापन का असर पाठक पर डालना है सर्वसाधारण को आकर्षित करने वाली भाषा गढ़नी होगी। बीसवी सदी के प्रसिद्ध लेखक मुंशी प्रेमचंद की किताबों के विज्ञापन ‘हंस’ तथा अन्य पत्रिकाओं में खूब छपते थे। हंस फरवरी 1933 में मुंशी प्रेमचंद के ‘कर्मभूमि’ उपन्यास के विज्ञापन की भाषा को देखिए :

 ‘‘यह उपन्यास अभी इसी माह में प्रकाशित हुआ है और हाथों-हाथ बिक रहा है। गबनमें एक गृहस्थ घटना को लेकर श्री प्रेमचंदजी ने अनोखा और सुंदर चित्रण किया था। और इसमें राजनीतिक और सामाजिक  दुनिया की ऐसी ह्दयस्पर्शी घटनाओं को अंकित किया है,कि आप पढ़ते पढ़ते अपने को भूल जायँगे। यह तो निश्चय है, कि बिना समाप्त किये आपको कल न होगी। इससे अधिक व्यर्थ है। दाम सिर्फ 3)पृष्ठ संख्या 554 सुन्दर छपाई बढ़िया कागज़, सुनहरी जिल्द।’’

‘गबन’ उपन्यास के विज्ञापन की भाषा तो और मारक तथा चुटीली थी। ‘गबन’ के विज्ञापन को पढ़ने के बाद निश्चित तौर पर पाठक बुक स्टोर की ओर भागता होगा। हंस जुलाई 1933 के अंक से ‘गबन’ का यह विज्ञापन आपके समक्ष प्रस्तुत है :

  ‘‘औपन्यासिक सम्राट् श्रीप्रेमचंदजी की अनोखी मौलिक और सबसे नई कृति ग़बनकी प्रशंसा में हिन्दी,गुजराती, मराठी तथा भारत की सभी प्रान्तीय भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं में कालम-के-कालम रंगे गये हैं। सभी ने इसकी मुक्त कंठ से सराहना की है। इसके प्रकाशित होते ही गुजराती तथा और भी एकाध भाषाओं में अनुवाद शुरु हो गये हैं। इसका कारण जानते हैं आप? यह उपन्यास इतना कौतुहल वर्धक, समाज की अनेक समस्याओं से उलझा हुआ, तथा घटना परिपूर्ण है कि पढ़ने वाला अपने को भूल जाता है।

 अभी अभी हिन्दी के श्रेष्ठ दैनिक आजने अपनी समालोचना में इसे प्रेमचंद के उपन्यास में इसे सर्वश्रेष्ठ रचना स्वीकार किया है, तथा सुप्रसिद्ध पत्र विशाल भारतइसे हिन्दी उपन्यास-साहित्य में इसे सर्वश्रेष्ठ रचना माना है। अतः सभी उपन्यास प्रेमियों को इसकी एक प्रति शीघ्र मंगाकर पढ़ना चाहिए।’’

  हिंदी नवजागरणकाल की कोई भी पत्रिका उठा के देख लीजिए, उसमें किताबों के सैकड़ों विज्ञापन मिल जायंगे। इस दौर के लेखकों में आपसी मतभेद भले ही कितना भयंकर रहा हो लेकिन किताबों के प्रचार-प्रसार में एक दूसरे का बड़ा सहयोग करते थे। यह बड़ी दिलचस्प बात है कि पांडेय बेचैन शर्मा उग्र की किताबों के विज्ञापन पंडित बनारसीदासजी चतुर्वेदी ने ‘विशाल भारत’ में छापे थे। हिन्दी के आलोचक और विद्वान इस बात से भालि-भांति परिचित हैं कि बनारसीदासजी चतुर्वेदी ने श्री उग्र के साहित्य के विरुद्ध घासलेटी आंदोलन छेड़ रखा था। उन्होंने जिन किताबों के विरुद्ध आंदोलन चला रखा था, उन्हीं किताबों का विज्ञापन भी अपने पत्र ‘विशाल भारत’ में छापा था।

 ‘चांद’ पत्रिका में हिन्दी साहित्य के बड़े-बड़े लेखकों की किताबों के कलर विज्ञापन पूरे पृष्ठ पर छपते थे। विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक से लेकर जे.पी. श्रीवास्तव की किताबों के विज्ञापन छापे गए। चूंकि रामरख सिंह सहगल खुद प्रकाशक और संपादक थे। वे इस बात से बाखूबी परचित थे कि प्रचार-प्रसार से किताबों की बिक्री पर क्या प्रभाव पड़ता है।

मैं देखता हूं जब युवा लेखक अपनी किताबों का प्रचार-प्रसार सोशलमीडिया के माध्यम से करते हैं तो हिन्दी के एकाध लेखक उन पर आत्मप्रचार का दोष मढ़ने से नहीं चूकते हैं। ऐसे लेखकों का तर्क होता कि एक लेखक को आत्म प्रचार  करने से बचना चाहिए। आप सोचिए कि यदि प्रेमचंद जैसे बड़े लेखक ने इनकी तरह सोचा होता कि मैं हिंदी का बड़ा लेखक हूं,  इस नाते मुझे किताबों के प्रचार की क्या जरुरत है? कितने ही पाठक उनकी किताबों का पढ़ने से वंचित रह जाते। आज सोशलमीड़िया और इंटरनेट का दौर है। इस बात को आज भले ही स्वीकार करने में थोड़ी हिचक महसूस हो लेकिन सच बात यह कि सोशल मीडिया और इंटरनेट हमारे जीवन शैली का अहम हिस्सा बन चुका है। यदि कोई लेखक इस प्लेटफार्म से अपनी किताबों की सूचना पाठकों तक पहुंचता है तो उसे आत्म प्रचार से जोड़कर पता नहीं क्यों देखा जाता है। यदि कोई लेखक डिजिटिल माध्यम से किताबों के प्रचार पर जोर देता है तो इसमें बुरा क्या है? हिन्दी साहित्य के लेखकों इस बात को संजीदा होकर समझना होगा कि आज का पाठक सारी सूचनाओं को इन्टरनेट के माध्यम से पा लेना चाहता है। यदि उसको कोई सामग्री इंटरनेट पर नहीं उपलब्ध मिलती तो वह उसके लिए अतिरिक्त प्रयास तब तक नहीं करता, जब तक वह उसके लिए बहुत जरुरी न बन जाए। यदि पाठक के हित का ख्याल रख आज का युवा लेखक अपने प्रचार का माध्यम बदल रहा तो इसमें आत्म प्रचार जैसी तो कोई बात नहीं। आज का युवा लेखक अपनी किताब को लेकर संजीदा हैं और, अधिक से अधिक पाठक तक अपनी किताब या बात पहुंचना चाहता है, यह तो इन्टरनेट की दुनिया के विभिन्न प्लेटफार्म का सदुपयोग करना ही कहा जायगा चाहिए। बीसवीं सदी के लेखक अपनी किताब के प्रचार के बारे में संजीदा होकर सोचते थे। आज की तरह उन्होंने किताबों के प्रचार-प्रसार को आत्मप्रचार से जोड़कर बिल्कुल नहीं देखा था। आप सोचिए बीसवीं सदी के लेखकों जमाने में यदि सोशल मीडिया जैसा सहज और सुलभ साधन मौजूद होता तो वे निश्चित ही इस प्लेटफार्म का उपयोग करते।

(सुरेश कुमार नवजागरणकालीन साहित्य के गहन अध्येता हैं। इलाहाबाद में रहते हैं। उनसे 8009824098 पर संपर्क किया जा सकता है)

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