जब युवा क्लासिक कृतियों पर लिखते हैं तो अच्छा लगता है कि वे परंपरा को समझना चाहते हैं। युवा लेखिका अनु रंजनी ने मोहन राकेश के कालजयी नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर यह लेख लिखा है, जिसमें कई नई बातें मुझे दिखाई दीं। आप भी पढ़ सकते हैं-
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आषाढ़ का एक दिन मोहन राकेश द्वारा रचित एक नाटक है जिसे ऐतिहासिक-काल्पनिक के दायरे में रखने का विचार सामने आता है लेकिन हम ध्यान दें तो पाएंगे कि यह नाटक ऐतिहासिक न होकर बिलकुल आधुनिक जीवन को प्रस्तुत करता है ।
इसे समझने के लिए हमें तत्कालीन भारतीय समाज को भी ध्यान मे रखना होगा। आषाढ़ का एक दिन 1959 में प्रकाशित हुआ। यह एक ऐसा समय था जब भारत को आज़ाद हुए बारह साल बीत चुके थे। भारत पुनर्निर्माण कि प्रक्रिया में लगा था लेकिन आम जनता का जो सपना था कि आज़ादी के बाद उन्हें सभी प्रकार कि सुख-सुविधाएं दी जाएंगी, इस पर से उनका विश्वास उठने लगा था। भारतीय जन अपनी जीविका के लिए हर संभव प्रयास कर रहे थे। यही वह समय था जब धीरे-धीरे ग्रामीण परिवेश से निकल कर लोग शहरों कि ओर पलायन कर रहे थे। पुराने रिश्ते कहीं न कहीं बिखरते चले जा रहे थे। इसी समय में अकेलापन, निराशा,घुटन जैसी समस्याएँ बड़े पैमाने पर उभर कर सामने आने लगी। यह स्वाभाविक ही था क्योंकि व्यक्ति अकेला ही शहर कि ओर जा रहा था, उसके पास पर्याप्त संसाधन तो थे नहीं जिससे वह अपने परिवार को साथ ले जा सके। इसी परिवेश में रचनाकार भी अपने मूल समाज से विस्थापित होकर शहर कि ओर जा रहे थे। ऐसी स्थिति में उन रचनाकारों के जीवन में क्या कुछ बदलाव हुए, इसकी पड़ताल यह नाटक करता है।
इस नाटक में ‘कालिदास एवं मल्लिका’ के प्रेम को आधार बना कर लेखक हमारे समक्ष भावना एवं यथार्थ का अंतर्द्वंद्व, सत्ता व साहित्यकार का संघर्ष, पितृसत्तात्मक ढांचें में प्रेमी-प्रेमिका, इनसे जुड़े विचारों को प्रस्तुत करते हैं। इस नाटक की कथावस्तु यह है कि कालिदास और मल्लिका, दोनों प्रेमी-प्रेमिका हैं। कालिदास जब तक ग्राम में है तब तक उसकी रचनात्मकता का कोई सम्मान नहीं है। एक दिन राजधानी उज्जयनी से कालिदास को सम्मानित करने का प्रस्ताव आता है, लेकिन कालिदास कि इच्छा वहाँ जाने की नहीं रहती है। वह एक सम्मान के लिए अपने ग्राम से जाने के पक्ष में नहीं रहता है लेकिन मल्लिका कालिदास को समझा कर राजधानी चले जाने के लिए राज़ी कर लेती है। कालिदास वहाँ जाकर बहुत हद तक उस दुनिया में अपने आप को ढाल लेने का प्रयास करता है, राजघराने में विवाह भी कर लेता है। वहीं दूसरी ओर मल्लिका, कालिदास के इंतज़ार मे अपना जीवन व्यतीत करती है। उसकी सारी रचनाओं को व्यापारियों से मँगवा कर पढ़ा करती है। कालिदास को काश्मीर की शासन व्यवस्था संभालने की ज़िम्मेदारी मिलती है, काश्मीर जाने के मार्ग में ही उसका ग्राम प्रांतर भी है, वह आता भी है लेकिन मल्लिका से मिले बिना चला जाता है। इसके कुछ वर्षों बाद मल्लिका को सूचना मिलती है कि कालिदास ने राज-पाट त्याग कर संन्यास ले लिया है। इतने सालों से मल्लिका ने अपने आप को संभाल कर रखा था, लेकिन यह सुनकर वह भीतर ही भीतर टूट जाती है। फिर एक दिन अचानक कालिदास लौट कर मल्लिका के घर आता है लेकिन जब वह मल्लिका की बेटी का रोना सुनता है तब उसे ज्ञात होता है कि मल्लिका ने दूसरे पुरुष से संबंध बना लिया है और वह उसी क्षण वहाँ से निकल जाता है, मल्लिका अपनी बच्ची को गोद मे लिए देखती रहती है।
नाटक के प्रारम्भ से ही भावना और यथार्थ का अंतर्द्वंद्व सामने आने लगता है। एक ओर मल्लिका और कालिदास हैं जो भावना को ही सबकुछ मानते हैं, दूसरी ओर, अंबिका, मल्लिका की माँ, वह यथार्थ की सूचक है, उसके लिए यथार्थ ही सबकुछ है, उसका मानना है कि भावना के सहारे हम अपना जीवन नहीं व्यतीत कर सकते हैं। मल्लिका एवं अंबिका का यह संवाद इसका संकेत प्रस्तुत करता है।
“मल्लिका –मैं जानती हूँ माँ, अपवाद होता है। तुम्हारे दुख की बात भी जानती हूँ। फिर भी मुझे अपराध का अनुभव नहीं होता। मैंने भावना में एक भावना का वरण किया है। मेरे लिए वह संबंध और सब सम्बन्धों से बड़ा है। मैं वास्तव में अपनी भावना से प्रेम करती हूँ जो पवित्र है, कोमल है, अनश्वर है…
अंबिका – तुम जिसे भावना कहती हो वह केवल छलना और आत्म-प्रवंचना है। …भावना में भावना का वरण किया है। … मैं पूछती हूँ भावना में भावना का वरण क्या होता है ? उससे जीवन की आवश्यकताएँ किस तरह पूरी होती हैं?…भावना में भावना वरण । हं।”
नाटक में कालिदास का प्रवेश एक हरिणशावक के घायल बच्चे के साथ होता है। कवि को हमेशा कोमल हृदय का माना जाता है, वही रूप यहाँ कालिदास का भी सामने आता है। उसके कुछ समय पश्चात ही यह ज्ञात होता है कि उज्जयनी में कालिदास को सम्मानित करने के उद्देश्य से राज अधिकारी उसे ले जाने आए हैं। कालिदास जानता है कि इस ग्राम में उसकी प्रतिभा का कोई सम्मान नहीं, न उसके पास धन है न वैभव, फिर भी उसे उज्जयनी जाना सहर्ष स्वीकार नहीं। उसके सामने राज सम्मान व राज्याश्रय से महत्त्वपूर्ण मल्लिका है, जिसे वह अपनी ज़िम्मेदारी के रूप में समझता है लेकिन मल्लिका की ही जिद के आगे कालिदास झुक जाता है और उससे विदा लेता है।
हम प्रेम को अक्सर केवल रोमांस में ही जीते हैं, उस प्रेम की वास्तविकता क्या है? इस बारे में हम सोचते ही नहीं। और जब हमारा सामना यथार्थ से होता है तो हमारे प्रेम की बुनियाद ही हिल जाती है। वह सपना टूट कर बिखर जाता है। यही स्थिति मल्लिका और कालिदास के साथ भी हुई। दोनों अलग-अलग स्थान पर हैं, लेकिन दोनों एक दूसरे को लेकर भावना के सहारे जीते हैं। एक ओर मल्लिका है जो सोचती है कि कालीदास भी उसके ख़यालों में होगा, उसे हर पल याद करता होगा, उसके इंतज़ार में रहती है कि वह वापस मल्लिका के साथ जरूर आएगा। यहाँ तक कि जब उसे कालिदास के विवाह की सूचना मिलती है तब भी उसे इस बात पर यकीन नहीं होता। वहीं दूसरी ओर कालिदास है जो अलग ख्याल बनाए बैठा है कि जब सारी स्थिति सामान्य हो जाएगी तब वह मल्लिका के पास वापस जाएगा, और सब कुछ पहले की तरह हो जाएगा। उसकी सोच में यह दूर-दूर तक नहीं शामिल है कि मल्लिका की जिंदगी आगे बढ़ गयी होगी। जब उसके सामना यथार्थ से होता है तब वह बिना मल्लिका से कुछ कहे, एक तरह से उससे छिप कर, क्रोध में मल्लिका के घर से बाहर निकल जाता है। यही भावना और यथार्थ के अंतर्द्वंद्व को सामने रखता है।
साहित्यककर यदि सत्ता के संरक्षण में जाता है तब ऐसे में वह कितनी मौलिक रचना कर पता है यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है। इस नाटक का उद्देश्य कालिदास के साहित्यकर्म को प्रस्तुत करना नहीं है लेकिन फिर भी जितना ज़िक्र आया है उसके आधार पर हम ‘सत्ता और साहित्य /साहित्यकार’ के संबंध और उसके संघर्ष को समझ सकते हैं। साहित्यकार का सत्ता के संरक्षण मे जाने से क्या प्रभाव होता है इसे कालिदास की जीवन घटनाओं से समझा सकता है। कालिदास के उज्जयनी चले जाने के बाद उसकी मानसिक स्थिति बदलने लगती है। उसकी प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। इसे कालिदास स्वयं स्वीकारता है-” तुम्हें बहुत आश्चर्य हुआ था कि मैं कश्मीर का शासन संभालने जा रहा हूँ? तुम्हें यह बहुत अस्वाभाविक लगा होगा। परंतु मुझे इसमें कुछ भी अस्वाभाविक प्रतीत नहीं होता। अभावपूर्ण जीवन की वह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। संभवतः उसमें कहीं उन सब से प्रतिशोध लेने की भावना थी जिन्होंने जब-तब मेरी भर्त्सना की थी, मेरा उपहास उड़ाया था।” यह साहित्यकार की उस प्रवृत्ति की ओर एक इशारे के रूप में भी देखा जा सकता है कि किस प्रकार साहित्यकार समाज से हटकर स्वकेन्द्रित हो जाता है।
दूसरी स्थिति यह होती है कि मन के स्तर पर तो वह मल्लिका से जुड़ा रहता है लेकिन अपनी भौतिक जरूरतों के अनुरूप वह काम करता है। राजकुमारी प्रियंगुमंजरी से विवाह भी करता है लेकिन इस नए परिवेश में उसका साहित्यकर्म प्रभावित होता है। अंत में वह स्वयं कहता है कि “लोग सोचते हैं आईने उस जीवन और वातावरण में रहकर बहुत कुछ लिखा है परंतु मैं जानता हूँ कि मैंने वहाँ रहकर कुछ नहीं लिखा।”
कालिदास ने जो भी रचनाएँ कीं उन सब में उसका ग्राम और मल्लिका की याद शामिल है। वह कहता है “जो कुछ लिखा है वह यहाँ के जीवन का ही संचय था। ‘कुमारसंभव’ की पृष्ठभूमि यह हिमालय है और तपस्विनी उमा तुम हो। ‘मेघदूत’ के यक्ष की पीड़ा मेरी पीड़ा है और विरह-विमर्दिता यक्षिणी तुम हो- यद्यपि मैंने स्वयं यहाँ होने और तुम्हें नगर में देखने की कल्पना की। ‘अभिज्ञान शाकुंतल‘ में शकुंतला के रूप में तुम्हीं मेरे सामने थीं। मैंने जब-जब लिखने का प्रयत्न किया तुम्हारे और अपने जीवन के इतिहास को फिर -फिर दोहराया। और जब उससे हट का लिखना चाहा, तो रचना प्राणवान नहीं हुई। ‘रघुवंश’ में अज का विलाप मेरी ही वेदना की अभिव्यक्ति है और…” इसलिए यही सोचकर कि उज्जयनि में भी कालीदास के ग्राम जैसा वातावरण निर्मित हो सके इसलिए राज्यकर्मियों सहित प्रियंगुमंजुरी भी उस के ग्राम आकार वहाँ के पेड़-पौधे, जानवर, पत्थर, इन सबका नमूना ले जाने आती है।
कालिदास को यदि एक रचनाकार के रूप में न देखकर एक व्यक्ति के रूप में विश्लेषित किया जाए तो हमारे सामने पितृसत्तात्मक संरचना में बना हुआ एक पुरुष सामने आता है और वैसा ही व्यक्तित्व (पितृसत्तात्मक ढांचे में निर्मित) मल्लिका का भी उभर कर आता है। पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष के जीवन में एक स्त्री की क्या और कितनी उपयोगिता रहती है? केवल उतनी ही जितनी की आवश्यकता पुरुष को हो। कालिदास के जीवन में यही उपस्थिती मल्लिका की है। वह केवल अपनी जरूरत पर ही स्त्री को अपने निकट आने की अनुमति देता है। कालिदास जब तक ग्राम प्रांतर में है, उज्जयनी जाने के पहले, वह भावनात्मक संबल के लिए मल्लिका से जुड़ा हुआ है। उज्जयनी से लौटकर आता भी है तो अपनी जरूरत, अपनी इच्छा के अनुसार ही। मल्लिका की इच्छाएँ, उसकी जरूरत का शायद उसे ख्याल नहीं। और यह जानने के बाद कि मल्लिका दूसरे पुरुष की एक बेटी की माँ बन चुकी है, उसी क्षण वह पुनः मल्लिका को छोड़ कर चला जाता है। क्या प्रेम में हमारा यह दायित्व नहीं बनता कि हम सारी परिस्थितियों पर अपने साथी से कम से कम बात तो करें। लेकिन काइ बार शायद अहम अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
इस नाटक में कहीं भी मल्लिका की अपनी पहचान उभर ही नहीं पाई है। वह केवल एक प्रेमिका और अंत में एक माँ के रूप में ही सामने आई है। इस पितृसत्तात्मक समाज में एक आदर्श नारी/प्रेमिका है मल्लिका। वह एकनिष्ठ है, त्यागी है, बलिदानी है और यह सब कुछ उसे सहज लगता है। वह इस ढांचे में इस तरह रच-बस गयी है कि उसे सचेत करने के लिए अंबिका व विलोम दोनों की कोशिश नाकाम हो जाती है। अंत में मल्लिका की जो स्थिति होती है वह भी इसी समाज की देन है जिस कारण वह विलोम के साथ रहने पर विवश होती है। यहाँ एक बात और ध्यान योग्य है कि तीनों अंक का अंत मल्लिका के रोने से हुआ है। प्रथम अंक में कालिदास के उज्जयनी जाने पर रुदन, दूसरे अंक में मल्लिका के टूट जाने का रूदन और तीसरे अंक में हमेशा के लिए कालिदास के चले जाने पर रुदन। यह इस बात को सूक्ष्मता से प्रस्तुत करता है कि इस समाज में रोना स्त्रियों के हिस्से में ही है ।
‘आषाढ़ का एक दिन’ रंग निर्देश, नाट्य योजना के रूप से भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। यह नाटक तीन अंकों में विभाजित है। पहले अंक में कथा का परिचय और उद्घाटन, दूसरे अंक में कथा का विकास और चरमोत्कर्ष और तीसरे अंक में कथा का अंत है। यह तीन अंकों वाला विभाजन वास्तव में एक अंकवाले यूनानी नाटकों में प्राप्त कथा के विकास से जुड़े तीन बिन्दुओं पर आधारित है-आरंभ, मध्य और अंत।
नाटककार ने संवाद योजना का एक नया रूप प्रस्तुत किया है। इस नाटक के पात्रों के संवाद जितना ऊपरी धरातल पर प्रस्तुत हुए हैं उससे भी सघन संवाद वे स्वगत बोलते हैं। इस दृष्टि से यह नाटक अभिनेयता के स्तर पर चुनौतीपूर्ण है। न केवल पात्र बल्कि दृश्य योजना भी बहुत कुछ अभिव्यक्त करती है। मोहन राकेश ने ध्वनि संकेत, रंग सज्जा का प्रयोग करते हुए संकेत में कथावस्तु को प्रस्तुत किया है। तीनों अंक की शुरुआत मल्लिका के घर के प्रकोष्ठ से होती है। एक तरह से यह प्रकोष्ठ ही सारी स्थिति को सांकेतिक रूप में व्यक्त करता है। कालिदास के उज्जयनी जाने के विषय पर मल्लिका का ध्यान इस ओर नहीं जाता है कि वह लौट कर आएगा या नहीं। कालिदास पर उसे कोई संदेह नहीं है। इस तरह से देखा जाए तो प्रथम अंक में प्रकोष्ठ को हम उम्मीद का सूचक मान सकते हैं। दूसरे अंक में कालिदास ग्राम प्रांतर आता है लेकिन मल्लिका के सामने आना उचित नहीं समझता। मल्लिका कालिदास के संबंध में जिस उम्मीद में थी वह उम्मीद कहीं न कहीं टूटती प्रतीत होती है। इसी टूटन का प्रतीक है इस अंक में वर्णित प्रकोष्ठ। तीसरे अंक में प्रकोष्ठ पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है। यही परिणति मल्लिका और कालिदास के प्रेम की भी होती है।
‘आषाढ़ का एक दिन‘ यह शीर्षक इस नाटक के लिए सार्थक प्रतीत होता है। नाटक की शुरुआत भी आषाढ़ की बारिश से होती है और अंत भी आषाढ़ की बारिश के साथ ही होता है। प्रथम अंक में मल्लिका आषाढ़ की बारिश में भीग कर आती है, यह भीगना बारिश के साथ साथ प्रेम में भीगना भी है। यह नए जीवन की शुरुआत होने को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करता है। वहीं नाटक के तीसरे अंक में आषाढ़ की बारिश कीचड़ में लथपथ, गिर जाने का बिम्ब प्रस्तुत करती है। इन बिंबों के माध्यम से मोहन राकेश परिवर्तन को प्रस्तुत करते हैं।
मोहन राकेश ‘यथार्थवादी नाट्य शिल्प’ पर इस नाटक को प्रस्तुत करते हैं। नाटक का कथ्य तत्कालीन मानवीय समस्याओं से जुड़ा हुआ है। वे तत्कालीन समस्याओं पर बात करने के लिए पात्र इतिहास से चुनते हैं। इस तरह से मोहन राकेश यूरोप के यथार्थवादी नाट्य शिल्प को एक नया मोड़ देते हैं। मोहन राकेश ने इस नाटक में कविता के तत्त्व को भी समाहित किया है। कविता में जिस मार्मिकता, गहनता की आवश्यकता होती है वह मार्मिकता और गहनता इस नाटक में भी है।
इस तरह से यह नाटक कई स्तरों से महत्त्वपूर्ण प्रतीत होती है जो अब हमारे सामने एक ‘क्लासिक कृति‘ के रूप में मौजूद है।

