क्या ‘रंगून’ कंगना की सबसे यादगार फिल्म होगी?

‘रंगून’ फिल्म या तो हंटरवाली नाडिया जैसे किरदार के कारण चर्चा में है या कंगना रानाउत के कारण. फिल्म के ट्रेलर, गानों से लेकर फिल्म को लेकर दिए गए अपने इंटरव्यू वगैरह में कंगना ने जिस तरह से बातें की हैं वह ‘रंगून’ को लेकर एक ख़ास तरह की दिलचस्पी पैदा करने वाला है. अज फिल्म रिलीज हो रही है. कंगना के बारे में यह लेख लिखा है दिव्या विजय ने- मॉडरेटर

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कंगना ने ‘पिंकविला’ को दिए अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि उनकी आने वाली फिल्म ‘रंगून’ में  ‘बैकलेस सीन्स’ को फिल्माने के दौरान उन्हें बॉडी-टेप का इस्तेमाल करना आवश्यक नहीं लगा और  न ही अन्तरंग दृश्यों को फिल्माते हुए उन्हें झिझक हुई. बॉडी-टेप ऐसा टेप होता है जिसे सितारे अक्सर अपने कपड़ों को सेट रखने के लिए अथवा एक्सपोज़र वाले दृश्यों में अपनी देह के उन अंगों को ढकने के लिए करते हैं जिन्हें वे छिपाना चाहते हैं. कंगना के इस बयान ने हेडलाइंस की शक्ल इख्तियार कर ली है. सारी लीडिंग वेबसाइट्स इस खबर को उत्तेजक तस्वीरों के साथ छाप रही हैं. हिंदी के अख़बार तो एक कदम आगे हैं. उन्होंने इस सीधे-सपाट बयान का यह निष्कर्ष निकाला कि कंगना को बिना कपड़ों के इंटिमेट सीन्स करना अच्छा लगता है. शब्दों को यूँ घुमा देने से अर्थ किस प्रकार बदल गए हैं.

कंगना एक ऐसी अभिनेत्री हैं जिन्होंने ‘मेल-डोमीनेटिंग’ इंडस्ट्री में अपनी मज़बूत जगह बनाने के साथ अपनी शर्तों पर काम करना चुना है. अपनी सेक्स-लाइफ, प्यार, ब्रेकअप, इंडस्ट्री के सफेदपोश चेहरों के पीछे की कुत्सित मानसिकता के बारे में कंगना जिस बेबाकी से बात करती आई हैं उसके बाद यह बयान उनके ‘टेक’ को और मज़बूत करता है. छद्म-स्त्रीवाद की विरोधी कंगना गोरेपन की क्रीम का विज्ञापन लाखों रूपये मिलने के बावजूद ठुकरा देती हैं और विवाह-संस्था के प्रति अपने संशय बिना हिचकिचाहट के दर्ज़ कराती हैं.

अगर कंगना अपनी नग्न पीठ की तरह अपनी देह के बाकी अंगों के साथ भी उतनी ही सहज हैं तो इसमें अचरज की क्या बात है. ‘जब वी मेट’ में एक संवाद था कि अकेली औरत खुली तिजोरी की तरह होती है. कंगना कहती हैं कि वो अपने शरीर को खुली तिजोरी की तरह ट्रीट नहीं करतीं. सवाल यह है कि स्त्री-देह को तिजोरी समझना ही क्यों चाहिए. हाड़-मांस से बने उसके शरीर को उतनी ही सहजता से लिया जाना चाहिए जितना किसी पुरुष के शरीर को लिया जाता है. कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि सामान्य शिष्टाचार को ताक पर रख दिया जाए परन्तु अगर अपने काम और देह के प्रति कोई स्त्री इतनी ईमानदार और सहज है तो यह वाकई काबिले-तारीफ बात है.  यह उस दोगले व्यवहार से बेहतर है जहाँ दबी-ढकी स्त्री को इस तरह से शूट किया जाता है कि उसके अंग विशेष पर कैमरे का फोकस रहे.

‘मेथड एक्टिंग’ की पैरोकार कंगना क्वीन की सफलता के बाद दिए इंटरव्यू में बताती हैं कि इस किरदार की तैयारी में उन्हें लगभग छ महीने लगे जिसमें उन्होंने किरदार को पूरी तरह आत्मसात कर लिया था. वह उसी किरदार को जीने लगी थीं और यह प्रक्रिया कभी-कभी उनके लिए भयावह हो उठती थी. अपने किरदारों को इतनी गंभीरता से लेने वाली कंगना के लिए बॉडी पर टेप चिपकाना या नहीं चिपकाना विचार का मुद्दा नहीं है. किरदार के भीतर जाने के लिए और दृश्य में अपने सह-अभिनेता के साथ अंतरंगता महसूस करने के लिए अगर उन्हें बॉडी-टेप के बगैर स्पर्श की आवश्यकता है तो यह सिर्फ उनके कम्फर्ट लेवल की बात है. शाहिद के साथ अन्तरंग दृश्य देने से पूर्व जब सेट पर उपस्थित कुछ लोग बॉडी टेप के इस्तेमाल को लेकर बतंगड़ बना रहे थे तब तक कंगना बिना बॉडी-टेप के दृश्य के फिल्मांकन के लिए तैयार हो चुकीं थीं. यही कंगना की शख्सियत का ‘स्वैग’ है.

 

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