• कथा-कहानी
  • चिल्लर- ‘जेण्डर विमर्श’ सिर्फ़ स्त्री विमर्श नहीं है

    हम आज भी स्त्री-पुरुष समानता की बात तो करते हैं लेकिन जैसे यह भूल चुके हैं कि इसके अलावा और भी ‘जेंडर’ हैं, वह हमारे ध्यान में ही नहीं होता। यह हमारी कल्पना से परे है कि बतौर ‘थर्ड जेंडर’ यह दुनिया उनके लिए कैसी है? सोनू यशराज की कहानी ‘चिल्लर’ इन्हीं बातों के इर्द-गिर्द बुनी हुई है। इसमें मार्मिक क्षण वह भी है जब एक थर्ड जेंडर का व्यक्ति, जिसे आमलोग इंसान का दर्ज़ा भी नहीं देते, उसकी सोच में स्त्रियों का भी संघर्ष शामिल है। यह कहानी आप भी पढ़ सकते हैं – अनुरंजनी                         

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                                                                                   चिल्लर

    अपनी आहट से पहचाने जाते हैं-सिरहाने खड़े लोग, वक़्त और मौत।
    इन तीनों से रूबरू होने का दिन था आज।
    मेरे तकिये का रेशा-रेशा बड़ी शिद्दत से इस देह पिंजरे की आज़ादी बुन रहा था।अपने होने न होने का भान कराती पसीने की गंध से तरबतऱ देह की विदाई।कुछ देर पहले खुली खिड़की के परदे हवा में घुली इस गंध और बाहर मोगरे की महक से बेजार न थे।खेलते बच्चों की उछाह,गूंजती आवाज़ से गली गुलजार थी।पहले धूप के आखिरी टुकड़े ने विदा ली और फिर मैंने।मेरा वक़्त आ गया था, सिरहाने खड़ी मृत्यु ने मुझे कसकर गले लगाया।मृत्यु वह खेल है जिसका खिलाड़ी हरेक को बनना ही पड़ता है।मृत्यु की जीत हमारी हार नहीं,जीवन की संपूर्णता के बाद वही लौटना होता है, जहाँ से आए हैं।
    हम जैसे लोगों की जिंदगी अधिक लंबी नहीं होती, शायद ईश्वर के सबसे प्यारे हों हम।
    अब देह से मुक्त हुई मेरी आत्मा इस कमरे में चेतन और जड़ सबको भीतर-बाहर निहार-बुहार रही। मेरे आसपास खड़े लोग जो कुछ देर पहले खुसफुसा रहे थे, अब मेरी निष्प्राण देह को अपलक देख रहे। मेरे मौन को अपने इर्दगिर्द इत्र की तरह लपेटे बहुत कम साजो-सामान वाला ये कमरा इसलिए यहाँ शोर और चुप्पी दोनों का भान जल्दी हो जाता था।आँगन के पेड़, पंछी के साथ ये घर, ये कमरा, जीने लायक जरूरी सामान, ये सब मेरे लिए चेतन थे।

    जीवन की घड़ी नहीं बनाई ईश्वर ने, बनाई है मृत्यु की घड़ी ।
    घर में कहीं घड़ी न थी पर जयपुर के जंतरमंतर में सूर्यघड़ी की गणना जैसे मुझे मालूम था कि खिड़कियां बंद होने के बावजूद किस समय कमरे में झिर्री और कब दरवाज़े के नीचे से सूरज का उजास और फिर चाँद की चांदनी सिमट आती है।
     पर वक़्त!!वह तो कभी मेरा था ही नहीं!!
    मेरे जाने के मात्र पाँच मिनट बाद एक पिता-पुत्री मेरे सिरहाने खड़े थे।वे जयपुर से आये थे।अपनी बेटी की शादी के लिए उसकी जन्मपत्री के दुष्ट ग्रहों को मनाने,अनुकूल करने के लिए मेरा आशीर्वाद ही असहाय पिता के लिए अंतिम उपाय था।ऋषिकेश में निवास करने वाले मेरे समर्थ गुरु से उन्होंने मेरा नाम सुना था पर मेरा पता किसी को नहीं मालूम था।अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखवाने आये उस सिद्ध ज्योतिषी पिता ने बड़ी जद्दोजहद से खोजा था मेरे घर का पता। अजमेर की संकरी,चलते-चलते गुम हो जाती गलियों के भीतर,सड़कों,बाजारों से अछूता एक छुपता-छुपाता घर।घर जो हमेशा मेरी पहचान छुपाने के लिए सारी खिड़कियां बंद रखता था।सच तो यह है कि ये दुनिया छद्म छल वाली वह भेदिया है जो अपने प्रयोजन सिद्ध करने के लिए कभी व्यक्ति की पहचान छुपाती है तो कभी सब खोल कर रख देती है।
    मैं आत्मिक रूप से मेरे सिरहाने खड़े उस पिता के उमड़ते-घुमड़ते-बदलते विचारों को देख रहा हूँ।मेरे मृत शरीर के सामने औचक खड़ा ये पिता अपने जीवन और उसकी खटास को अनुभव करता है,उनके भीतर द्वन्द चल रहा है।एक लाख पत्रियाँ देख चुके ज्योतिषाचार्य पिता ने अपने सटीक उपायों से कितने जजमानों को विवाह,नौकरी,सुख दिलाया और यहाँ दीया तले अँधेरा है।साथ ख़डी पुत्री सुनंदिनी एक ठहरी हुई अपराजिता के फूल सी स्त्री है जो इस कमरे में हाल ही में घटित जीवन- मृत्यु को तटस्थ भाव से देख रही है।वह एक प्रतिष्ठित फर्म में मैनेजर है पर उसका इस उम्र में मैनेजर के पद तक पहुंचना समाज में चर्चा का विषय नहीं है,चर्चा तो उसकी बढ़ती उम्र और शादी न होने की है।कोई इसका कारण उसका दबा रंग बताता है,कोई बेडौल शरीर।मानो शादी जैसा पवित्र बंधन सिर्फ रूप और देह के मापदंडों पर टिका हो।सुनंदिनी को अपने विचारों से मेल खाता न सही,मानसिक स्तर पर बराबर हो ऐसा युवक तो चाहिए।पर समाज का दबाव है कि येन-केन-प्रकारेण यानी बेमेल भी हो तो भी उसका विवाह ज़रूरी है।मानो परिवार की प्रतिष्ठा सिर्फ विवाह की बात पर टिकी है।जैसे समाज की भूमिका व्यक्ति विकास के लिए नहीं सिर्फ गठबंधन देखने वाली तमाशबीन की हो।
    पैंतीस वर्षीय सुनंदिनी कमाल का पियानो बजाती है,यात्राएं करती है।यायावरी में नये शहर,नए लोग,जायके,पहनावा,रहना-गाना और स्थानीय कला के ठिकाने मिलते हैं।इन सभी में उसकी दिलचस्पी किसी दिन किताब की शक्ल में आ सकती है।खुशियों भरा जीवन जी रही है सुनंदिनी।और तो और अपने दोस्तों संग अनाथ बच्चों की मदद भी करने से नहीं चूकती।पर माता-पिता उसके विवाह की चिंता में घुल रहे हैं।कई बार बिना बात उससे उलझ पड़ते हैं।एक आयु के बाद अभिभावक अपनी संतान के प्रति सामाजिक आडम्बरों और रिवाजों को थोपने को ही अपने जीवन का एक मात्र उदेश्य मान दुखी होते रहते हैं।
    मेरा आत्म कोई भी घटना स्पर्श कर सकता है।कुछ साल पहले जब सुनंदिनी के माता-पिता अच्छे खाते-पीते धनी परिवार के लिए हाथ आये छोटे रिश्ते ठुकरा रहे थे,तब दौसा में रहने वाली सुनंदिनी की नानी ने चेताया था –
    औसर चूक्यां नै मौसर नहीँ मिलै।(चूक होने पर अवसर नहीं मिलता।) माँ रोज़ रात को सोने से पहले कहती थी-इब ताणी तो बेटी बाप कै ही है माने अभी कुछ नहीं बिगड़ा।माँ हर हाल में ईश्वर को धन्यवाद कहती थी।उसे अपने भगवान से कोई शिकायत नहीं थी।
    इधर मेरे मृत शरीर देखकर नहीं बल्कि निढाल पिता को देख सुनंदिनी विचलित हो गई है।छोटी गहरी आँखों वाली शांत सुनंदिनी के भीतर अचानक विचारों का ज्वार उठा है और वह इस कमरे से लगते आँगन में आ ख़डी हुई है।बाहर चुप्पे से खड़े हैं पीपल,नीम और बड़।वे अपने दोस्त की मृत्यु का शोक मना रहे हैं।बेचैनी भाँपते सुनंदिनी के छोटे बाल मंद हवा में भी उड़ रहे हैं।
    आह,हैरान हूँ मैं,जाने सुनंदिनी को क्या हुआ,वह मेरे आत्म से वार्तालाप को उत्सुक है।शायद जीवन के सत्य,मृत्यु की जीवटता से टकराये।
    सुनंदिनी प्रश्न करती है-क्या विवाह होना जरूरी है?
    नहीं
    मेरा विवाह नहीं होगा तो मुझ जैसी सक्षम लड़की बेचारी क्यों मानी जाती है?
    मेरे पास इसका जवाब नहीं है।समाज के दोगलेपन का मैं खुद शिकार हूँ।
    कमरे में भीड़ बढ़ती जा रही है।दुनियावी हिसाब-किताब अपनी गद्दी पर फिर से विराजमान है ।

    पता नहीं मेरा आत्म पंछी इस कमरे में और कितनी देर फड़फड़ाएगा।
    अभी-अभी जड़ हुई देह के पूरे जीवन की कहानी मेरे सामने आ रही।
    मेरे जन्म के तीन महीने से सात साल तक बस माँ ही मेरी दुनिया थी।और हमारी दुनिया में शामिल थे रेडियो,टीवी,अखबार,किताबें और माँ के उगाये फलदार पेड़ों पर बैठे पंछी।पगडंडी पर रुनझुन करती रम्भाती गाय,सड़कों पर बेसब्र ट्रैफिक,कंधे से कंधा मिलाते घरों के बाहर खेलते बच्चों का शोर, बतियाते,ठहाके लगाते पड़ोसी,लुकाछुपी करती मिलती नज़रें….ओह्ह्ह इन सबसे कितनी दूर था मेरा ठौर।पर जितना दायरा सिकुड़ा उतना मैं खिलता गया। 
    रिश्तेदार,पड़ोसी तो क्या मेरे पिता भी अरसे बाद मुझसे मिले।शादी के छः महीने बाद ही पिता गर्भवती माँ को छोड़ कर अपने दो दोस्तों के साथ सऊदीअरब चले गए,फिर तब लौटे जब माँ मरणासन्न थी।
    पिता के सऊदी जाने के दो साल बाद ही खबर पहुंची थी क़ि पिता ने वहाँ एक अमीरन से शादी कर ली और तीन बच्चों के बाप बने।पर पिता के इस शर्मनाक कदम से पहले माँ को दुःख भरा अचरज दिया मैंने।वह मेरे जन्म के तीन महीने बाद तक यह तय नहीं कर पाई क़ि मैं लड़का हूँ या लड़की।सात साल तक मीलों दूर बैठे पति से विलग,एक युवा माँ का दर्द बरसों से मेरे सीने में जमा है।अकेली पड़ गयी माँ अंदर ही अंदर घुलती रही।पर माँ तो दुनिया की सबसे ताकतवर इंसान होती है न।उसके करोड़ों जतन और अखंड जोग ने मेरा जीवन संवार दिया।
    सारे नाते-रिश्तों के तानों और गिद्ध दृष्टियों,भीड़ भरी बस्ती से दूर अपनी अलग दुनिया में(स्कूल और हमउम्र बच्चों का साथ मेरे भाग्य में न था।)माँ ने मुझे अक्षर ज्ञान से लेकर गणित और विज्ञान  भी पढ़ाया,मेरे व्यक्तित्व विकास में कोई कसर न छोड़ी।हाँ दिल पर पत्थर और जुबान पर ताला रखने का गुण किसी किताब में न था, वह मैंने अपनी देवी समान माँ से सीखा।
    पिता के आने पर घर में भूकम्प जैसा बवाल मचा, पर माँ के शांत होते ही सब शांत हो गया।मेरे असामान्य जीवन की भनक किसी को न लगे,इसकी चिंता मेरे कोमल ह्रदय के कुठाराघात से अधिक थी।इस सबके बीच मुझे मामा के एक परिचित के पास भेजा गया जो नैनीताल के पास कोसानी के गांधी आश्रम में रहते थे।कितना सुंदर था कोसानी जिसके पहाड़ इतने पास कि उन्हें जी भर कर छू लो।छोटी सी नदी का पानी इतना नीला जैसे आकाश बिछा हो।पर गाँधी आश्रम के कायदे मुझे रास नहीं आये।मेरा बालमन विद्रोह कर बैठा।फिर वहां से ऋषिकेश के एक उपचार ध्यान केंद्र भेजा गया।पावन मनोहारी गंगा ने माँ की तरह मुझे अंक में भर लिया।केंद्र में अनूठे ध्यान सत्र थे।आती-जाती सांस को आनापान विधि से देखने से मुझे खुद को स्पष्ट रूप से समझने और स्वीकार करने की शक्ति मिली।और यहीं एक समर्थ गुरु ने मेरी सुप्त चेतना को जागृत किया।पर ये परिणाम घर वालों के,समाज के पलड़े के अनुरूप न था।उनकी दृष्टि में मुझे इस पार या उस पार लगना था। अंततः मुझे एक तांत्रिक के पास कलकत्ता भेजा गया जो मेरे लिए किसी डरावने सपने की तरह था।दरअसल तंत्र बुरा नहीं है,यह तो मनुष्यता से देवत्व की ओर बढ़ने का मार्ग है पर इसका गलत प्रयोग अंततः इसे नष्ट कर देता है।मैं वहाँ से किसी ईश्वरीय शक्ति के बलबूते कैसे भाग निकला,यह आज तक रहस्य है मेरे लिए।
    जब सब ओर से मेरे तथाकथित सामान्य न होने की सूचना मिली तब मुझे वहीं भेज दिया गया जहां मेरी तरह के और लोग थे।अक्सर ये लोग अपने जैसे बच्चों की तलाश में बस्तियों में नाचते-गाते टोह लेते हैं,लेकिन मैं खुद इन तक पहुँचाया गया।मुझे शामिल करने के बाद नाच-गाना,सामूहिक भोज,एक दिन के लिए आराध्य देव अरावन से विवाह की रस्म की गयी।और फिर गुजरात के महेसाणा में कुलदेवी बहुचरा देवी के आशीर्वाद दिलाने ले जाया गया।
    किस्मत ने जो कटघरे बनाए थे,उसे समझने जितनी उम्र पकी न थी मेरी।मुझे उनके चमत्कार सिक्के तक पता थे।बड़े लोग उन चिल्लरों के लिए नोट खर्चते थे।सुना था उनके हाथ से दिया गया एक रुपये का सिक्का दौलत के दरवाजे खोल देता है।मैंने सड़कों पर हाथ झटकते,घरों में अवसरों पर नाचते-गाते और उससे अलहदा अखबारों और टीवी में उन लोगों को अपनी बुद्धि और साहस के बल पर आगे बढ़ते देखा था।कुछेक साल वे मेरे कौतुहल के विषय थे, बाद में जैसे- जैसे जिंदगी समझ आने लगी,आँख नम करने वाले उनके अंतहीन संघर्ष और कभी न खत्म होने वाली उनकी जिजीविषा मेरा संबल बनी।
    पिता को असाध्य रोग होने पर परदेस और अमीरन के घर से त्यक्त होने में देर न लगी।जब तक पिता जिंदा थे,छुप-छुपाकर साल छः महीने में एक बार मुझसे मिलने आते।पर वह मोह का धागा बचपन में ही अपना सिरा खो बैठा था और कशमकश की सुई दोनों ओर से चुभ रही थी।मैंने न जाने कब से धरती को माँ मान सारा दिन बिना चप्पल उसका स्पर्श और रात को उसकी खुरदरी गोद में विश्राम करना सीख लिया था।पिता की याद आते ही एक उजाड़ पार्क के कतारबद्ध पेड़ों का आलिंगन करता और जब उनके पत्ते झूम कर कोमलता से मुझे सहलाते,मैं फफक पड़ता।न जाने कितने दिन निरभ आकाश की नीरवता में कसमसाया।निपट अकेलापन मुझे सालता,उसे एकांत क्षण में बदलने में बरसों लगे।मेरे जैसे अन्य लोगों के बीच में मैं खुद को अजनबी महसूस करता।मुझे सजने-धजने और कहीं आने-जाने,मजमा लगाने में कोई रुचि नहीं थी।मैंने सिद्ध संतों का सानिध्य पाया था और उनसे यक्ष और गंधर्व की संगीत साधना,अर्जुन के वृहन्नल्ला बनने की कथा,चित्रकूट में चौदह वर्षो तक प्रतीक्षा करने के बाद सियाराम से मिला वरदान,ब्रह्मा की छाया होने की कथाएं सुनी थी।शिवपुराण में वर्णित है कि सृष्टि की रचना के लिए शिव ने ब्रह्मा को आधे नर आधी नारी बनाने को कहा।शिव के अर्धनारेश्वर रूप से मुग्ध ब्रह्मा ने ठीक ऐसे स्वरूपों की रचना की।जिसे देख शिव ने कहा कि मैंने बराबर संख्या यानि आधी संख्या नर और आधी संख्या स्त्री की कही थी।आप उन्हें गढ़ें और ये अर्धनारेश्वर स्वरुप मेरे गणों में शामिल हो,हमेशा मुझे प्रिय रहेंगे। कितना सुंदर मिथक है ये,हमारे धरती पर होने का।विज्ञान के शब्दों में कहें तो क्रोमोजम्स डिसआर्डर के कारण यह स्थिति उत्पन्न होती है।
    मुझे इस ठौर पर परम्परानुसार गुरु मिले।वे मेरे मन को समझते थे।मेरा मौन सधता जा रहा था।भीतर की यात्रा की ओर मुड़ते हुए मैंने जाना अपने होने का मूल,इस क्षणिक दुर्लभ जीवन का उद्देश्य।इसलिए जल्द ही मैंने अपनी जैसी स्थिति को अस्वीकारते,बिसूरते,गालियाँ भरते,आपस में लड़ते-भिड़ते,मारते-कूटते बच्चों को सम्भालना और पढ़ाने की चुनौती को जस का तस स्वीकार किया।सतत सीमित साधनों से खुद को ज्ञान में,बेध्यानी के ध्यान में,योग में डुबो लिया,न..न…उबार लिया।
    धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष  के चार स्तम्भ में से काम भावना और कामना के जंगल से मुक्त था मैं।कभी-कभी मैं किसी पुराने किले,पहाड़ पर घूमने चला जाता तो कभी नदी किनारे।जहां घंटों एकांत में बैठ एक लंबा सुकून बैग में भरकर वापस अपने घर लौट आता।भीतर की शांति और आनंद में निमग्न,स्वयं से मुक्त दोपहर बाद घंटे भर लोगों से मिलता,उनकी आंखों में व्यथा पढ़ता और वे लौट जाते।लोग कहते मेरी दृष्टि में शांति है,मेरे देखे वे दो पल उन्हें सुकून पहुंचाते हैं।उनके बिगड़े काम बन जाते हैं।इस सब के लिए उन्हें मुझे या किसी को भी रुपये देने की मनाही थी।मुझे एक सच्चे संत ने कहा था कि सिद्धि उसे मिलती है जो बदले में कुछ नहीं चाहता।कुछ भी नहीं !
    मैंने जिन बच्चों को पढ़ाया है,वे आज अच्छे पदों पर हैं।उनमें से कोई भी हमारे ‘जेंडर’ का पुराना काम नहीं करता।2016 में नौशीन स्कालरशिप लेकर डॉक्टर बना।जीनम प्रोफ़ेसर है,ईशान सायक्लोजी में एम्ए कर रहा है,पुष्पा ने हम सबके लिए स्वयम सहायता समूह और गरिमा गृह बनाया है।क़ानून सुधरे,सरकारी मदद बढ़ी पर उसी रफ़्तार से समाज की सोच नहीं बदली ।
    ओह,कब बदलेगी सबकी सोच।इस मौन के पीछे छिपे शोर को कौन सुनेगा ?
    अपने जीवन के सबसे अधिक उर्जावान वर्षों में चिल्लर की तरह खर्च होते अक्सर मुझ जैसे लोग…और वह लडकी सुनंदिनी भी।समाज उनकी उपयोगिता, इस दुनिया को सुंदर बनाने में उनके जीवन की सार्थकता,बहुत देर से जानता-समझता है।ये दुनिया,ये जीवन मनु के अलिखित नियमों का साक्षी भर नहीं है, उससे बहुत आगे है।
    कहने को अब मेरी कहानी खत्म हुई।पर मुझे उम्मीद है इसे सुनने-गुनने के बाद इक़ नई इबारत जरूर लिखी जाएगी।यदि समाज चाहे तो इस भौतिक युग में मुझ जैसे लोगों का काम और कामना से निस्पृह जीवन सबके लिए वरदान बन सकता है।
    अलविदा !!
    मैं जा रहा हूँ उस दुनिया में जहाँ जेंडर,फार्म का एक कॉलम मात्र है।

    उस दुनिया में जहाँ थर्ड जेंडर के प्रति लोगों की कटाक्षपूर्ण भाव भंगिमा नहीं है और उन्हें सामान्य व्यक्ति के तौर पर अस्वीकार करने का अहंकारी मन और बुद्धि भी नहीं।
    उस दुनिया में जहाँ मैं और मेरी माँ पहचान छुपाने के लिए अभिशप्त नहीं ।

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