फ़िल्म हो या जीवन, राज कपूर हर चीज़ ग्रैंड चाहते थे

हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के सबसे पहले शोमैन राज कपूर की आज पुण्यतिथि है. उनकी फ़िल्मों का जलवा ऐसा है कि आज भी उनके काम और स्टाइल की मिसाल दी जाती है. उनके पुत्र ऋषि कपूर की इसी साल प्रकाशित आत्मकथा खुल्लम खुल्ला में उन्होंने एक अध्याय अपने पिता को समर्पित करते हुए उनके सिनेमाई क़द और पिता के रूप में उनके स्वभाव और व्यवहार का ज़िक्र किया है.

ऋषि कपूर के अनुसार वे बचपन में अपने पिताजी से बहुत डरते थे, ख़ासकर जब वे देर रात में नशे में धुत्त हो घर लौटते थे. हर रात ऋषि को डर होता था कि जाने आज किस बात पर पिता माँ से लड़ बैठेंगे. हालाँकि ऋषि कपूर तब बच्चे ही थे लेकिन तब भी उन्होंने ख़ुद से वायदा किया था कि वो ख़ुद कभी अपने बच्चों को इस तरह आतंकित नहीं करेंगे. एक बार राज कपूर ने उन्हें सिगरेट पीते हुए पकड़ लिया था और झन्नाटेदार थप्पड़ सबके सामने रसीद कर दिया था. फिर ऋषि कपूर कभी उनके सामने सिगरेट नहीं पी पाए. अपने पिता का डर बड़े होकर भी उन्हें रहा पर एक दिन नशे में चूर ऋषि कपूर रात को शौच से लौटते हुए अपने कमरे की बजाय राज कपूर के कमरे में आकर उनके साथ सो गये. सुबह उठने पर ख़ुद को उन्होंने शेर की माँद में पाया, पर फिर राज कपूर के साथ काम करके ऋषि का डर अपने पिता के लिए सम्मान में बदल गया. राज कपूर काम में इतने बिज़ी रहते थे कि कभी अपने बच्चों की पी टी ए मीटिंग में उनके स्कूल भी नहीं गये थे.

ऋषि बताते हैं कि हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में उनके पिता का वो मुक़ाम था कि लोग उनसे मिलने और साथ काम करने को तरसते थे. नरगिस से लेकर वैजयंतीमाला तक के साथ राजकपूर के अफ़ेयर्स से ऋषि वाकिफ़ थे. न सिर्फ़ देश में बल्कि विदेशों में भी उनके चाहने वाले भारी संख्या में थे. रशिया और चीन में उनकी फ़िल्मों की धूम रहती थी. सन् 74, 76, 78 और 80 में मॉस्को फ़िल्म फ़ेस्टिलव में राज कपूर को एक राजा की तरह मिले ट्रीटमेंट के ऋषि स्वयम् गवाह रहे. एक ज़माने में चीन में उनकी फ़िल्में मुफ़्त दिखाई जाती थीं.

फ़िल्में हों या निजी जीवन, राज कपूर हर चीज़ ग्रैंड चाहते थे, यही वजह थी कि पूरी फ़िल्मी क़ौम उनके बर्थडे पार्टी का किसी त्योहार की तरह इंतज़ार किया करती थी. शराब पानी की तरह बहती थी और हर बड़े से बड़ा व्यक्ति उसमें आमंत्रित होता था. उनके होली उत्सव भी बहुत चर्चित रहता था. इतनी बड़ी शख़्सियत होते हुए भी कलाकारों के लिए उनके मन में बहुत सम्मान था. कभी वे भैंसों के तबेले चले जाया करते थे, ग्वालों के लोकगीत सुनने के लिए, उनके साथ हारमोनियम बजाते और नाचते-गाते. दशहरा पे बांग्ला गीत सुनने के लिए हर बरस उनका शिवाजी पार्क जाना निश्चित था.

अपने पिता को याद करते हुए ऋषि उनके मित्रों की सूची में दिलीप कुमार को सबसे ऊपर रखते हैं. वे मानते हैं कि फ़िल्मी कंपटीटर होते हुए भी उनके आपसी प्यार में कोई कमी नहीं थी. यहाँ तक कि जब राज कपूर अपने आख़िरी वक़्त में हॉस्पिटल में दाख़िल थे तब दिलीप साहब पाकिस्तान में थे पर राज कपूर  की तबीयत ख़राब है ऐसा  सुनते ही उन्हें देखने फ़ौरन दिल्ली आ पहुँचे थे. राज कपूर का हाथ थामे दिलीप साहब ने कहा “राज अब उठ भी जाओ, तुमने बहुत ड्रामा कर लिया. तुम हमेशा से शो स्टीलर रहे हो और अब तुम हेडलाइंस बना चुके हो इसलिए अब उठ भी जाओ. मैं पाकिस्तान से कबाब खा कर लौटा हूँ, वही जो तुम और मैं बचपन में खाया करते थे. उठो हम वही खाने चलेंगे.” ऋषि ने उन्हें अपने पिता के सामने रोते हुए देखा पर राज कपूर फिर कभी न उठे. बस अपनी और अपने काम की बेहतरीन यादें हमारे लिए छोड़ गये.

– दिव्या विजय

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