मीना कुमारी और तन्हाई का अंधा शिगाफ़ : भाग-1

ख़ुद ही को तेज़ नाख़ूनों से हाए नोचते हैं अब
हमें अल्लाह ख़ुद से कैसी उल्फ़त होती जाती है
– मीना कुमारी

भारतीय सिनेमा की मशहूर अदाकारा मीना कुमारी के बारे में हम सब टुकड़ों-टुकड़ों में बहुत कुछ जानते हैं। लेकिन बहुत कुछ है जो अनकहा है, अनसुना है। आज उनके जन्मदिन के मौक़े पर हम एक नया सीरीज शुरू कर रहे हैं, जिसका नाम है- तन्हाई का अंधा शिगाफ़। इस सीरीज के तहत हिंदी की लोकप्रिय कवयित्री विपिन चौधरी, मीना कुमारी की ज़िंदगी, काम और हादसात से जुड़े कई पहलुओं पर बात करेंगी। आज पेश है पहला भाग – त्रिपुरारि
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इन्हीं लोगों ने ले लीना जीवन मेरा

“औरत होना बहुत कठिन है, स्त्री और धरती को बहुत कुछ सहना पड़ता है।” यह वाक्य दुर्गा खोटे ने फिल्म ‘काजल’ में माधवी का किरदार निभा रही मीना कुमारी से कहा था. फिल्म के परदे पर और परदे से बाहर मीना कुमारी के हिस्से का सच यही था. मीना कुमारी ने धरती की तरह अनेकों दुःख सहे. हमारे समाज की पितृसत्तात्मक सरंचना, किस तरह एक आत्मनिर्भर और सजग स्त्री को धीरे-धीरे दम तोड़ने पर मजबूर कर देती है, मीना कुमारी के समूचे जीवन को इस सत्य के आलोक में देखा जा सकता है.

एक परंपरागत भारतीय स्त्री को जिन मानवीय मूल्यों के साथ देखा जाता है, फिल्मों में मीना कुमारी स्त्री उन्हीं मूल्यों का प्रतिनिधित्व करती रही. जिस तरह स्त्री के पास ढेर सारा अनकहा दुःख होता है, ठीक उसी तरह ‘ट्रेजेडी क्वीन’, मीना कुमारी के करीब त्रासदी, दुर्भाग्य, शोक का एक विशाल समुद्र था, जिसमें उस समय के अनेक बड़े निर्देशकों ने अपने हाथ-धोकर अपनी-अपनी किस्मतें चमकायी.

सिनेमा जगत की यह जग-जाहिर विडम्बना है कि वह अपने प्रतिभाशाली नायक-नायिकाओं पर ऐसा तमगा लगा देता है, जिससे वे ताउम्र बाहर नहीं आ पाते. उनके निजी जीवन में तांक-झाँक करने में तो माहिर मीडिया उनके काम को लेकर  कम ही गंभीरता दिखाता आया है. जबकि ये नायक-नायिकाएं, अपने समय की विभीषिकाओं को विभिन्न किरदारों में उतार कर एक ऐसा प्रति-संसार रचते हैं, जिसमें करोड़ों दर्शक, पीढ़ी दर पीढ़ी विचरण करते रहे हैं.

मीना कुमारी एक ऐसी नायाब नायिका का नाम है, जिनका अभिनय, प्रेम की तरह मन के एक सुरक्षित कोने में संजोया जा सकता है. वे दर्शकों के मन-भीतर इस तरह बैठ जाती हैं कि मन का वजन पहले से कई गुना भारी हो उठता है।
थाली में जलते दीपक की तेज़स्विता में, नीची नज़रों और उन्नत ललाट पर सुर्ख बिंदी में मीना कुमारी की छवि, दर्शकों को एकबारगी जड़ कर देती है. पर्दे पर तब यह नायिका, प्रकृति की सबसे सुन्दर कृति के रूप में नज़र आती है ।

मीना कुमारी होना आसान नहीं है, जीवन के तमाम माल-असबाब नज़दीक होते हुए भी मीना कुमारी को काँटों पर चलना पड़ता है. मीना कुमारी को अपनी पहली प्रसिद्ध फिल्म ‘बैजू बावरा’ की मासूम हंसी से लेकर, ‘साहब बीवी और गुलाम’ की छोटी बहू  की हंसी की विदुप्ता के सफ़र से गुज़ारना पड़ा था. याद कीजिये फिल्म “छोटी बहू’ की भर्रायी हुयी कटाक्ष करती हंसी, जब वह पति से पूछती है,

‘क्यों जी, किस मुहं से तुमने मेरी तुलना दूसरी बहुओं से की’?

1950-60 के दशक में हिंदी सिनेमा की अदाकारा मीना कुमारी ने अपने प्रभावशाली अभिनय से करोड़ों दर्शकों का जो स्नेह पाया वह अद्भुद है, आज तक उनके अभिनय की गहनता को कोई अभिनेत्री छू नहीं सकी है. अपने अभिनय कौशल से किरदारों को संवेदनशील और अदम्य गरिमा प्रदान करने वाली मीना कुमारी जैसी ज़हीन अभिनेत्री को ‘ट्रेजेडी क्वीन’ का खिताब देकर, दर्द से उनके निजी जीवन का रिश्ता जोड़ कर, उनकी अभिनय क्षमता का ‘द एंड’ कर देने की प्रवृति बहुत दुखद है. जबकि मीना कुमारी के जीवन और अभिनय, के कई पहलुओं पर गंभीरता से बात होनी अभी बाकी है. मीना कुमारी, अपने छोटे से जीवन और कद्दावर अभिनय से यह सिद्ध कर गयी कि उनका कद, उनके लघु जीवन-काल से कहीं अधिक बड़ा है.

मीना कुमारी को महज़ चालीस साल की उम्र मिली, जिसमें से अधिक समय, उनके शुरूआती संघर्षों, प्रेम- विरह- अलगाव और बीमारी में ही बीता. खुशियाँ, मानों उन्हें अपना चेहरा दिखा कर लौट गयी. उसका जीवन दुखों की ऐसी प्रयोगशाला रहा, जिसमें मौजूद सारे रसायन समाज की तरफ से रखे गए थे और यही कारण था कि  नफ़ासत, अति-सहनशीलता और सवेंदनशील स्वभाव की मल्लिका मीना कुमारी का जीवन उत्तरोतर आत्मघाती बनता चला गया. फिल्म स्क्रीन पर उनके आंसू मन को द्रवित करते, वहीँ उनके निजी जीवन का दुःख, इंसानी जीवन की विडंबनाओं का हल्फनामा बन गया था. पांच फीट तीन इंच की मीना कुमारी के चौड़े ललाट के मध्य में उकेरी गयी सुर्ख लाल की बिंदी में, दुःख इस तरह नत्थी हुआ दिखा था मानों वही उनकी पुख्ता पहचान हो.

मीना कुमारी, यानी चेहरे पर दुख की गरिमामयी उपस्थिति, आँखों में दुःख का तरल रूप, आवाज़ में दुःख की थरथराहट. सिनेमा में स्त्रीत्व की वास्तविक प्रतीक मीना कुमारी, ऐसी स्त्रियों का किरदार निभाती रही, जो बुरे वक़्त को अपने भीतर सोख लेती हों और समय आने पर अपना सर्वस्व बलिदान करने का जोखिम भी ले सकती हों.

1950- 60 के उस दौर में नर्गिस और मधुबाला जैसी सशक्त अभिनेत्रियां ‘मदर इंडिया’ और ‘मुग़ल ए आज़म’ में अभिनय कर इतिहास का हिस्सा बन चुकी थी. लेकिन फिल्म क्षेत्र में एक मुकम्मल भारतीय स्त्री की बात अगर कहीं चलती तो सिर्फ मीना कुमारी का नाम ही सबके ज़हन में आता क्योंकि  एक सचेत भारतीय स्त्री की  गहरी, जटिल और विरोधाभासी आत्मा को प्रतिबिंबित करने की कला, सिर्फ मीना कुमारी के पास ही दिखाई देती थी.

जीवन की त्रासदियों में खुद को कैद करने का हुनर भी मीना कुमारी के ही हाथ लगा था. सिनेमा की आबो-हवा में पली-बढ़ी मीना कुमारी, लाइट- कैमरा-एक्शन और पैकअप में घिरी मीना, उम्र-भर परिस्तिथियों से लड़ने के लिए हाथ-पाँव मारती रही.

लगभग तीस साल के फ़िल्मी करियर में मीना कुमारी ने 99 फिल्मों के अभिनय किया. ‘बैजू’ बावरा के रिलीज़ होने के तुरंत बाद, मीना कुमारी ने निर्देशक कमाल अमरोही से प्रेम-विवाह किया, हनीमून के दौरान ‘पाकीज़ा’ फिल्म बनाने के बारे में विचार हुआ. चौदह साल के बाद पूरी होने वाली यह फिल्म उनकी ‘सिग्नेचर-मार्क’ फिल्म बनी.

इक्कीसवी सदी के बरक्स, 50-60 की स्त्री, अपने स्वाभिमान की लडाई में इतनी मुखर नहीं हुई थी. 1960 में पश्चिम में स्त्री-मुक्ति की लहर उठ रही थी, वही हिंदी फिल्म उद्योग स्त्री की परम्परागत कहानी सुना रहा था। सिनेमा जगत स्त्री- अस्मिता की नयी परिभाषा से सर्वथा अछूता था, पितृसत्ता के ठस नियम-कानून स्त्री पर दबाव बनाये हुये  थे. फ़िल्मी- कहानीकार, स्त्री-स्वाभिमान का उजियारा पक्ष लेकर अभी उपस्थित नहीं हुए थे। सिनेमा में स्त्री-छवि को परम्परावादी सोच के साथ चित्रित किया जा रहा था जिसमें त्याग ही स्त्री की एकमात्र पूंजी थी. इसी परम्परागत सोच का जामा, अभिनेत्री मीना कुमारी को भी उढ़ाया गया और वह हिंदी सिनेमा में ‘भारतीय स्त्री’ का आइकॉन बन कर उभरी. उस दौर में भारतीय स्त्री की दशा को दर्शाते हुए मीना कुमारी ने जो भी किरदार अदा किये वे सदा याद किये जायेंगे. ‘परिणीता’ फिल्म की ‘ललिता, ‘शारदा’ की शारदा, ‘साहब बीवी और गुलाम’ की ‘छोटी बहू’, ‘भाभी की चूड़ियाँ’ की ‘गीता’, ‘आरती’ में आरती गुप्ता, ‘काजल’ की  ‘माधवी’, ‘दिल एक मंदिर’ की ‘माधवी’  के किरदारों को निभाते हुए मीना कुमारी ने उस दौर की महिलाओं की स्थिति को साफ़ किया जिसमें एक औसत भारतीय स्त्री, पितृसत्ता के दुश्चक्र में पिसती हुयी देखी गयी जिसके पास अपना कोई मुकम्मल व्यक्तित्व नहीं उभर सका था, परिवार के साथ नत्थी इस स्त्री के निजी दुःख- तकलीफ- हंसी- ख़ुशी की  कहीं कोई जगह नहीं थी.

यह सोचा जा सकता है कि इन किरदारों को निभाती हुयी मीना कुमारी, अपने जिए किरदारों के दुखों को अपने भीतर उतारती चलती होंगी, इससे जरूर उनके निजी दुःख में इज़ाफा होता रहा होगा क्योंकि भीड़ में तन्हा होने की पहचान, उन्हें बचपन में ही हो गयी थी, यह बात अलग है कि बचपन में वह उसे परिभाषित नहीं कर पाती थी लेकिन युवाकाल ने उन्हें इस दुःख को समझने की आँख दे दी थी.

मीना कुमारी के फ़िल्मी-जीवन को मुख्यतः चार भागों में बंटा जा सकता है. पहला ‘बेबी मीना’ के रूप में उनका शुरूआती काम, जिसकी अवधि 1939 से 1945 तक रही. दूसरा ‘मीना कुमारी’ के रूप में स्टारडम की राह, जिसपर मीना 1946 से 1952 तक बिना रुके चली, फिर हिंदी फिल्म सिनेमा में एक चमकते हुए तारे के रूप में 1952 से 1956 तक का समय जब हिंदी सिनेमा में वे पूरी तरह छा गयी और उसके बाद 1957 में मीना कुमारी का ‘ट्रेजेडी क्वीन’ के रूप में पूर्ण रूप से स्थापित होना.

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