तन्हाई का अंधा शिगाफ़ : भाग-2

आप पढ़ रहे हैं तन्हाई का अंधा शिगाफ़। मीना कुमारी की ज़िंदगी, काम और हादसात से जुड़ी बातें, जिसे लिख रही हैं विपिन चौधरी।  पहला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। आज पेश है दूसरा भाग – त्रिपुरारि
========================================================

छोटी सीमुन्नाकी अनोखी कहानी

अक्सर बच्चे स्कूल जाने के नाम पर रोने लगते हैं लेकिन 1 अगस्त 1933 को मीतावाला चाल, बम्बई के जन्मी यह छोटी बच्ची जिसका नाम महजबीं बानों बक्श था, स्कूल जाना चाहती थी. लेकिन बच्ची की इस जिद को बाल- सुलभ हरकत मान कर अनदेखा कर दिया जाता रहा. सात साल की उम्र में महजबीं ने  माँ और पिता की ऊँगली थाम कर नियमित रूप से स्टूडियों जाना शुरू कर दिया।  साल- दर- साल फिल्म-स्टूडियो और घर के बीच का रिश्ता पुख्ता होता गया, क्योंकि परिवार की रोज़ी-रोटी बच्ची के अभिनय से ही चल रही थी. अब स्टूडियो ही उसका खेल के मैदान होता, थोड़ी बड़ी होने पर वह शूटिंग के बीच के अन्तराल में पढने के लिए बच्चों की किताबें भी अपने साथ ले जाने लगी.

महजबीं  की नानी,गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर के परिवार से थी. महजबी घर में प्यार से ‘मुन्ना’ बुलाया जाता था. पिता अली बक्श,  पारसी  थिएटर के  कलाकारऔर संगीतकार थे॰  उन्होंने एक- दो  फिल्मों में छोटे-मोटे रोल भी अदा किये, लेकिन फिल्मों  की तरफ से उन्हें  निराशा ही हाथ लगी. अली बक्श का परिवार, दादर में  रूपतारा स्टूडियो के बगल में रहता था। अली साहब अकसर फिल्म  स्टूडियों के चक्कर लगाया करते थे. उन्हीं दिनों निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट, अपनी फिल्म ‘लेदरफेस’ में हीरो की बेटी के किरदार के लिए एक छोटी बच्ची की तलाश में थे. विजय भट्ट के संपर्क में अली बक्श आये और उन्होंने  अपनी बेटी  महजबीं को फिल्मों में काम दिलाने की इच्छा जाहिर की. नियत समय पर महजबीं को स्टूडियो लाया गया। ऑडिशन के वक़्त बच्ची महजबीं न तो भयभीत हुयी  न भी आसपास की स्थितियों से अभिभूत हुयी. उसके हाव-भाव मोहने वाले थे, डायरेक्टर विजय भट्ट भी इस बच्ची से प्रभावित हुए बिना न रह सके, उसे फिल्म  में ले लिया गया। इस फिल्म के लिये महजबीं को पच्चीस  रुपये का पारिश्रमिक मिला ।  फिल्म के हीरो जयराज थे  और महताब हीरोइन का किरदार निभा रही थी. 1939 में बनी  इस  फिल्म में महजबीं  ने  जयराज की बेटी का रोल अदा  किया  था, उस वक़्त कौन जनता था चौदह साल के बाद  फिल्म  ‘मगरूर’(1950 ) फिल्म में यही महजबीं, जयराज की  हीरोइन बनेगी।  बच्ची महजबीं आर्थिक रूप से निर्भर बन चुकी थी, उसे एक फिल्म के दस हज़ार रूपये तक मिलने लगे और इस आर्थिक निर्भरता के जरिये ही वह अपने चुनाव और फैसलों पर जोर देने ही हकदार भी हुयी. पहली पढाई करने की थी. इसी जिद पर उसे स्कूल में दाखिला भी दिलवाया गया लेकिन कक्षा का समय और शूटिंग का समय एक ही होने पर यह सिलसिला थोड़े समय में ही बंद हो गया, फिर घर में ही शिक्षक हिंदी और उर्दू पढ़ाने के लिए आने लगे. तब पहली बार महज़बीं को लगा, वह दुनिया की दूसरी चीजों से ज्यादा किताबों के अधिक करीब है.

बाद के वर्षो में महज़बीं, निर्देशक विजय भट्ट की पसंदीदा बाल कलाकार बन गयी. इसी तरह  एक बार 1940  में ‘एक ही भूल’ के सेट पर विजय भट्ट ने महज़बीं को बेबी मीना का नाम दिया। सात साल तक  लगातार बेबी मीना अपने  पिता अली बक्श के साथ विजय भट्ट के स्टूडियो  में आती रही. बाल कलाकार के रूप में मीना कुमारी के परमर्शदाता रहे विजय भट्ट,   उस समय के प्रसिद्ध फिल्म निर्माता, निर्देशक और प्रोड्यूसर थे. मीना कुमारी के आरंभिक फ़िल्मी कैरियर में सबसे अधिक योगदान किसी का था तो वह विजय भट्ट का ही था. उन्होंने मुम्बई की  अँधेरी (पूर्व)  इलाके में  प्रकाश पिक्चर नाम से फिल्म प्रोडक्शन कंपनी की स्थापना की थी और इस बैनर ने 64  फिल्मों का निर्माण किया। उनकी फिल्मों के अधिकतर प्लाट  पौराणिक कथाओं पर आधारित  होते थी। ‘वीर घटोत्कच’(1949) और ‘श्री गणेश महिमा’ (1950) जैसी फिल्में प्रदर्शित से बेबी मीना को कुछ खास पहचान नहीं मिली और अपनी ठोस पहचान को तलाशने के लिए बेबी मीना को लगभग दस वर्षों तक फिल्म-जगत में संघर्ष करना पड़ा. बाल कलाकार के तौर पर बेबी मीना ने लगभग बीस फिल्मों में काम किया.  हिंदू देवियाँ के किरदारों में उतरती बेबी मीना, लंबे-लंबे कठिन वाक्यों को एक सांस में बोल दिया करती थी। अभिनय का जीवन ने गति पकड़ ली थी लेकिन घर में सब ठहरा और बेरौनक सा था. बेबी मीना जब घर में आती तो माँ और पिता के बीच की तकरार को सुनती लेकिन उनके मन की बातें सुनने वाला कोई नहीं था.इसी बीच कैंसर keके कारण बेबी मीना की माँ चल बसी । मन का एक कोना जैसे किसी ने कुतर लिया हो. इस कुतरे मन के अभी कई टुकड़े और भी होने थे.

विजय भट्ट की ‘बेबी मीना’ अब सत्रह साल की नवयुवती हो चुकी थी. फिल्म जगत में मीना कुमारी के आगमन के साथ  ही भारतीय सिनेमा  में नयी अभिनेत्रियों का एक खास दौर शुरु हुआ, जिसमें नर्गिस, निम्मी, सुचित्रा सेन और  नूतन  शामिल थीं।

उसी समय 1953 में ‘बैजू बावरा’ शीर्षक से नयी फिल्म बना रहे, विजय भट्ट की पहली पसंद नर्गिस और दिलीप कुमार थे, मगर उनकी पसंद फलित न हो सकी और यह फिल्म मीना कुमारी और भारत भूषण को लेकर बनायीं गयी । संगीतकार नौशाद की सलाह पर ही इन नयी प्रतिभाओं को फिल्म में लिया गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 mins
WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify WooCommerce Checkout Google Address Auto Complete WooCommerce Product Enquiry & WooCommerce Request A Quote Plugin WooCommerce Bookings Exporter | Download CSV, PDF or Email Reports Pesi Questionnaire – Multiresult Survey and Quiz WordPress Plugin Junction — External Links Controller for WordPress User Profile Elementor Voicer – Text to Speech Plugin for WordPress EuroSafe – GPSR Directive Compatibility for WooCommerce Events Shortcodes & Block Pro For The Events Calendar WooCommerce Attribute Stock – Shared Stock & Variable Quantities