मृणाल पाण्डे का अथ वणिक रत्नसेन प्रबंध-4

यह जानकी पुल के लिए गौरव की बात है कि प्रसिद्ध लेखिका मृणाल पाण्डे एक कथा-श्रृंखला लिख रही हैं जो सबसे पहले जानकी पुल के पाठकों के लिए सामने आ रहा है. प्राचीन कथाओं के शिल्प में आधुनिक जीवन की गुत्थियाँ बहुत रोचक अंदाज़ में प्रस्तुत कर रही हैं. आज उस श्रृंखला की चौथी कड़ी- प्रभात रंजन

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श्रेष्ठि कन्या दंभिनी के जाने के बाद एक कौड़ी का तोता सोचने लगा, अहो, लोग बाग ठीक ही कहते हैं मरता क्या न करता?

जीवन रक्षार्थ इस चांडालिनी से उसने कैसे कह दिया कि मात्र कथा कहानियों में सुनी उस रहस्यमय चंचला हिमुली को यहाँ बुलवा सकता है ? अगर वह है भी, तो पता नहीं इस समय इंद्रप्रस्थ, किं वा मुंबा नगरी, या किसी गुप्त जगह पर न जाने किस रूप में किस प्रकार की गतिविधियों में लगी हो?

यह सोचता हुआ हताश काना तोता देवी प्रतिमा के चरणों पर जा गिरा और सुगंधित धूप घटी के धुँए से मंडित कक्ष में, आर्त स्वर में भयहारिणी स्तोत्र के छंद गाने लगा |

वह जब सातवें छंद पर पहुँचा, देवी जागृत हुईं और अचानक स्वर सुनाई दिया :

‘हे एक कौडी के कथाकार, बोल क्या कष्ट है तुझे ?’

कथाकार हीरामणि बोला : ‘हे देवि, पास में द्रव्य नहीं है, दुराशा नहीं छोडती, फिर भी यह चंचल मन कथा रचने का मोह नहीं छोड पाता | आज उसी कारण नकचढी श्रेष्ठिकन्या दंभिनी के आगे लंबी चौडी हाँक कर आपका भक्त एक अजीब उलझन में आन फँसा है |

‘अब अपने वादे के अनुसार सुमुखी हेमुली से नगरसेठ सुता का साक्षात्कार कराये बिना निरंतर कथावाचन करते हुए जीवन की भीख माँगना तो इस तोते के लिये आत्मसम्मान घटानेवाला है | और आत्महत्या पाप है |

‘हे देवि, अब आप ही या तो मुझे हिमुली से साक्षात्कार की राह बतायें अन्यथा खड्ग से सर काट कर धनिक मूर्खों तथा अकृतज्ञ कुटुंबियों के लिये निरंतर कथा रचना की पीडा से इस हीरामणि तोते को मुक्ति दिला दें |’

‘रे मूर्ख,’ देवी उवाच, ‘ इतना पढा लिखा हो कर भी तू क्या नहीं जान पाया कि चराचर प्रकृति का नियम है : सोने में गंध नहीं, ईख के डंडे में फल नहीं,चंदन वृक्ष पर फूल नहीं और मतिमान् के पास धन नहीं होते | पर इसके साथ ही पीडा भोग भी इन जीवों की नियति है | क्या परम प्रतापी नरेंद्र प्राय: अल्पायु, चंद्रमा और सूर्य ग्रहण से पीडित, और वनचर पक्षी ही नहीं, हाथी साँप और व्याघ्र जैसे शक्तिमंत जीव भी बंधन में पडते नहीं देखे जाते ?

‘सूर्य पश्चिम से उदित हो, पत्थर सी भूमि में भी कमल खिल जाये और अग्नि भी शीतल हो जाये तब भी प्रगल्भता और निर्भयता सहित कथावाचन करते रहना ही हर कथाकार की तरह तेरी भी अटल नियति है |

‘अत: हे हीरामणि, अब तुझे एक मंत्र देती हूँ उसका तू उसका सवा लाख बार जाप कर, तुझे हिमुली का दर्शन अवश्य मिल जायेगा |’

इतना कह कर देवी ने तोते के कान में सिद्ध मंत्र दिया |

देवी को प्रणाम कर और जल से आचमन करने के बाद काना हीरामणि बची हुई आँख मींच कर पवित्र मंत्र का पाठ करने बैठ गया :

‘जहाँ रात न दिवस है,जहाँ पवन ना जावे |

‘ऐसे बन में घुसी हिमुलिया, मोहे कब दरस दिखावे||

जैसे ही संपुट पाठ पूर्ण हुआ, हीरामणि तोते के कान में एक भ्रमर गुंजन सदृश्य ध्वनि उभरी और फिर एक भारी नारी कंठ दाक्षिणात्य सानुनासिक उच्चारण सहित बोला :

‘मी कर्णपिशाची बोलतोय ! हिरामन्न रे, अब जो मैं तेरे कूं कहती, उसकूं ध्यान से सुन ! तू हिमुली कूं खुप्प प्रसन्न किया रे | वो बोलती वो तेरे खातिर उस मुंबा मंदिर आने का अऊर उस सेठानी कूं मिलने का इरादा उसका | उसके ठीक एक घटी पहिले वो प्रकट हो जायेगी | चिंता करूं नका !’

हीरामणि को परम आनंद हुआ किंतु दुग्ध- दग्ध कथाकार शीतल तक्र (छाछ) को भी फूंक कर पीता है | अत: उसने उस कान से सट कर माँसभक्षी मुख से बदबूदार साँस छोडती अदृश्य कर्णपिशाची से उबकाई रोकते हुए विनम्र अनुरोध किया :

‘हे मधुरवादिनी, जाने से पूर्व बस इतनी कृपा और करें कि इस काने लँगडे अकिंचन तोते को हिमुली के स्वामी धनिक रत्नसेन की पृष्ठभूमि की बाबत जो भी उपलब्ध जानकारी हो उसे, सयाने समाचार वाचक के शब्दों में एक ‘क्विक रिकैप’ द्वारा तनिक ‘फास्ट फॉरवर्ड मोड’ में बाँच दें, ताकि सनद रहे |’

सयाने समाचार वाचकों और उन पर भरोसा रखनेवालों के लिये कुछ अश्राव्य अभद्र विशेषणों का उपयोग कर कर्णपिशाची ने एक भीषण बदबूदार अट्टहास किया | फिर उसने एक कौडी के कथाकार को बताने लगी |

अथ कोक्कास वणिक् का उपाख्यान :

‘शूर्पारक, ज़िला ठाणा में कोक्कास नामक वणिक् रहता था | जब शूर्पारक में अकाल पडा वह सपरिवार मुंबा नगरी चला आया, और अल्प समय में ही अपनी चतुरता से बडी संपत्ति का स्वामी बना | किंतु संतान उसके घर नहीं हुई | चिंतित हो कर वह ज्योतिषी के पास गया | हाथ देख कर उसने कहा कि बुरे समय में अपने अनेक कार्यपालकों को निराधार छोड कर उसके इस भाँति पलायन करने से कुपित स्थानीय अधिष्ठात्री देवी ने तुझे शाप दिया है कि आगे जा कर तू निर्वंश रहेगा और दत्तक पुत्र ही तेरे वंश को बनाये रखेंगे |

इस शाप से निवृति कैसे होगी ? यह पूछने पर इधर उधर देख कर ज्योतिषी ने कहा कि देवी के सामने बत्तीस लक्षणों से संपन्न पुरुष की बलि देने से कल्याण होगा |

‘कोक्कास घर आया और आकर अपने परम चालाक साले सुभट से उसने कहा कि यदि तुम कल तक बत्तीस लक्षणोंवाला पुरुष मुझे ला दोगे तो अपनी आधी संपदा तुमको दे दूंगा | सुभट ने घर जा कर पत्नी से मंत्रणा की | उनका पुत्र रत्नसेन बत्तीस लक्षणों से युक्त था | पति पत्नी ने आगा पीछा सोच कर तय किया कि उसे ही कोक्कास को सौंप दिया जाये |

संतान तो अन्य भी पैदा की जा सकती है, पर धनकुबेर बनने का ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा |

प्रात: बलि के लिये नहला धुला कर वध्य के वेश में वे रत्नसेन को कोक्कास के पास ले गये, जो देवी के मंदिर में खड्गधारी वधिक के साथ उसकी प्रतीक्षा करता था |

सबने नैवेद्यसहित देवी का आह्वान किया | माता ने केश पकडे, पिता ने पैर | ज्यों ही खड्गधारी ने खड्ग उठाया रत्नसेन ज़ोर से हँस पडा |

कोक्कास ने कारण पूछा तो किशोर बोला, ‘अगर वंशवृद्धि की कामना से मेरे चाचा तुम, और धनवृद्धि की कामना से मेरे जन्मदाता मिल कर मेरे प्राण हर रहे हैं, और यह स्त्री दैवी होते हुए भी मनुष्य के रक्त माँस की कामना करती है, तो हे मेरे प्राण तुम भी इस संसार पर हँसो हँसो, जल्दी हँसो ! शोक की क्या बात है ?’

‘ भाई के उस किशोर पुत्र की बात सुन कर कोक्कास को भीषण पश्चाताप हुआ और उस बालक की बुद्धि पर गर्व भी |

यही मेरा उचित उत्तराधिकारी होगा यह सोच कर कोक्कास ने भतीजे को उसी पंडित से विधिविधान सहित पूजा करवाई और उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया |

फिर वह पंडित को दूनी दक्षिणा और रत्नसेन को अपनी सकल संपदा दे कर स्वयं तापसी दीक्षा लेकर वनवास को चला गया |

‘इस प्रसंग के बाद पारिवारिक संबंधों से विरक्त हुए रत्नसेन ने अपने माता पिता को उस संपदा का आधा भाग दे दिया किंतु इस आधार पर, कि वे तुरत वापिस शूर्पारक चले जायेंगे और फिर कभी मुंबा नगरी में नहीं दिखाई देंगे |

‘तदुपरांत स्वयं रत्नसेन मुंबा नगरी में अपना व्यवसाय कुशलता पूर्वक चलाते हुए अल्पावधि में ही सात समुद्र तेरह नदियों तक फैले वाणिज्य साम्राज्य का अधिपति बन गया |

‘वाणिज्य के प्रसार उत्थान में रत्नसेन का दाहिना हाथ बना कल्पक नाम का एक कुशल यंत्रकार, जो उसका बाल्यसखा, सहपाठी तथा एक सिद्धहस्त शिल्पकार भी था | रत्नसेन से वित्तीय सहायता मिलने पर उसने यंत्रचालित छोटे वायुयानों का आविष्कार किया, जो उडते हुए इंद्रप्रस्थ तक जाते तथा वहाँ का सचित्र विवरण एक सूक्ष्म यांत्रिक वीक्षण यंत्र से खींच कर भर लाते थे जिनसे रत्नसेन अन्य वणिकों से पूर्व यह जान पाता था कि राजधानी इंद्रप्रस्थ में महाराज तथा उनके दरबारियों सचिवों में वाणिज्य व्यापार के विषय में क्या गुप्त विमर्श और चल रहे हैं, और उन सब के अतिरिक्त कराधानादि की बाबत किस तरह के निर्णय आने वाले हैं, आदि |

‘एक दिन मुख्य मंत्रिमंडलीय सचिव ने महाराज से निवेदन किया कि गुप्तचरों ने कुछ यांत्रिक यान इंद्रप्रस्थ आते, राजभवन पर मँडराते तथा कुछ समय बाद दक्षिण पश्चिम दिशा को जाते देखे हैं | महाराज ने यानों का पीछा करवाया तो वे मुंबा नगरी के रत्नसेन वणिक् के हाते में घुसते पाये गये | और अधिक पडताल से यह तथ्य भी प्रकाशित हुआ कि रत्नसेन के पास कल्पक नामका एक अतिकुशल यांत्रिक विशेषज्ञ है, जो इन वीक्षण यंत्र से युक्त उन टोही यानों का निर्माता है |

‘व्यवहारकुशल राजा ने रत्नसेन को दंडित करने की बजाय स्थिति के अनुरूप पहले उसके सहोदर समान कल्पक को राजदरबार में सादर बुलवाया | उससे बात करने के उपरांत उसकी कला तथा ज्ञान से प्रभावित हुए महाराज ने वणिक् रत्नसेन को थाल भर वज्र मुक्ता पद्मरागादि तेरह प्रकार के रत्नों सहित रेशमी दुकूल भीजते हुए कहलाया कि वे उसके मुख्य यांत्रिक कप्तान को राजमहल का मुख्य अभियंता नियुक्त करना चाहते हैं | अनुमति है ?’

‘उनसे भी अधिक व्यवहारकुशल रत्नसेन जानता था कि वणिक् अथवा सलाहकार को यथासंभव राजा की अगाडी और राजकीय सचिव की पिछाडी से दूर ही रहना चाहिये |

‘उसने विनम्रता से कृतज्ञता ज्ञापन सहित निवेदन किया कि प्रजा के अन्नदाता तथा प्राणदाता होने से सबके पिता हैं महाराज | वह तथा आर्य कल्पक तो उनकी ही संतान हैं | जब चाहें आ सकते हैं |

‘बस उनके इस दूसरे पुत्र का काम तथा नियमित राजकर भुगतान बाधित न हो, एतदर्थे यदि महाराज अकिंचन को मुंबानगरी तथा इंद्रप्रस्थ के बीच के आकाशीय मार्ग पर अपने यात्री यान उडाने का एकाधिकार दे दें, तो आर्य कल्पक राजसेवा के लिये तुरत मुक्त किये जा सकेंगे |

‘राजाज्ञा से यही किया गया |

‘कल्पक के साथ उसके आविष्कृत थलचर यानों में उससे कुछ और भी विशेष उपकरण जोडवा कर रत्नसेन ने राजाधिराज तथा उनके मंत्रिमंडलीय सचिवों को उनके पदानुसार उपयुक्त यान भेंट में भेजे | इससे प्रसन्न हो कर महाराज ने रत्नसेन को राजकीय थलचर यान बनाने को भी अधिकृत कर दिया |

‘राजा अब नित्यप्रति अपने प्रिय सलाहकारों सचिवों सहित इंद्रप्रस्थ तथा पास के जनपदों, वन उपवनों में रत्नसेन के उस यान में जब इच्छा हुई जाने में समर्थ हुए, जो एक विशेष कल घुमाते ही गरुड यान बन कर आकाशीय यात्रा भी कर लेता था |

‘जब जब हठात् जा कर महाराज किसी भी राजकर्मचारी को दुराचार या व्यभिचार में लिप्त पाते, उसे प्राणदंड दिया जाने लगा | यह बात भ्रष्टाचार में आकंठ निमग्न अनेक ईर्ष्यालु सामंतों तथा भ्रष्टाचारी क्षत्रपों को नहीं भाई | वे महाराज के विरुद्ध समवेत षड्यंत्र रचने लगे |

‘एक बार जब महाराज सैर को निकले, तो उससे पहले प्रतिपक्षियों के उत्कोच से मतिभ्रमित कुछ गुप्तचरों ने यान के परीक्षण के बहाने उस विशेष कल को राजकीय गरुड यान से बाहर लेजा कर छिपा दिया, जो गरुड यान को थलचर यान में बदल कर धरती पर लाती थी | फिर अंगुष्ठ से उन्होने राजकीय पताका फहरा कर चालक दल को सूचित किया कि यान सुरक्षित उडने को तैयार है |

‘उडते उडते जब यान समुद्र के पास था, तो सूर्यास्त निकट देख कर उसे थल पर लौटाने की आज्ञा हुई | तब वायुयान चालक कल्पक को खोजे से भी अपनी वह कल न मिली | यान दुर्घटनाग्रस्त हुआ और कल्पक को छोड यान के शेष सभी यात्री मृत्यु को प्राप्त हुए |

‘दस दिन के राजकीय शोक के बाद जब नये राजा के सिंहासन पर विराजे उन्होने यांत्रिक विमान दुर्घटना की पडताल का आदेश किया | तब तक साक्ष्य मिटा दिये गये थे और न्यायाधीश ने कल्पक को ही इस आधार पर पकडवा मँगवाया कि वही कैसे बच निकला ? राजधानी लाये जाने पर उसे पहले बहुत पीटा गया, फिर कारागार भेज दिया गया |

‘चतुर रत्नसेन विचलित हुआ किंतु राजकीय न्यायालय के सामने वह असहाय था | बहुत विचार करने के उपरान्त उसने गुप्त रूप से कारागार अधीक्षक को पहले प्रचुर धनराशि देकर उपकृत किया फिर उसके हाथों मित्र कल्पक को देने के हेतु कारागार मुक्ति की एक विस्तृत योजना भेजी | उस योजना के अनुरूप कारागार में कल्पक ने मिट्टी से एक सुंदर भवन का प्रारूप बनाया | उसके बारे में कारागार अधीक्षक से बार बार सुन कर नये राजा ने कल्पक को कारागार से बाहर निकाला और अपने लिये वैसा ही भवन बनाने को कहा |

‘कल्पक ने शीघ्र ही भवन बना कर तैयार किया |

‘प्रसन्न हो कर राजा ने कहा, माँग क्या माँगता है !

‘कल्पक ने कहा महाराज अब मैं पुन: अपने सहोदर सखा तथा स्वामी रत्नसेन के पास लौट जाना चाहता हूँ | कभी भी आवश्यकता हुई तो महाराज की तन मन धन से यथेष्ट सेवा को प्रस्तुत रहूंगा |

‘इस प्रकार कल्पक राजाज्ञा से कारागार से मुक्त हुआ और बिछडे मित्रों रत्नसेन तथा कल्पक का मधुर मिलन हुआ |

‘दोनो ही मित्र विभिन्न कारणों से अब भी परिवारहीन और असंपूर्ण व अविवाहित रहने की ठान कर सुखपूर्वक व्यापार में लग गये |

‘अनेक वर्ष बाद जबतक मध्यावस्था को प्राप्त रत्नसेन विश्व में राजकीय, थलचर, गगनचर वाहनों का सबसे बडा निर्माता- विक्रेता बन कर प्रसिद्ध हुआ, मुंबा नगरी में एक अन्य उदीयमान् नक्षत्र बन कर वणिक् तथा नगरसेठ दंभिनी के पिता अंबष्ठ भी स्थापित हो गये थे | नगरसेठ अंबष्ठ को रत्नसेन के बारे में भारी जिज्ञासा थी कि इतना सुरूप सुपुरुष अविवाहित ही नहीं, नारी विरत कैसे ? क्या कारण है कि इतने बडे व्यापारिक साम्राज्य के लिये, पितृॠण चुकाने तथा वंश चलाने के लिये कभी उसे संतानोत्पत्ति की सहज अभिलाषा नहीं हुई ?

‘अंबष्ठ ने रत्नसेन को नौ प्रकार का सोना एक थाल में भर कर भेजा | साथ में न्योता भी | कभी आर्य रत्नसेन कृपा कर निकटवर्ती द्वीप में मित्र कल्पक सहित उनके नव निर्मित स्वामि प्रासाद में पदार्पण करें और भोजनादि सहित तांबूल ग्रहण से उनका मान बढायें |

‘पत्र लेते हुए दूत से मितभाषी रत्नसेन ने कहा, ‘अच्छा !’

यही पर्याप्त था |

समुचित पूर्वसूचना भेज कर फिर अगले सप्ताह ही दोनो मित्र नगरसेठ अंबष्ठ के द्वीप प्रासाद में गये | उनका बडा सत्कार किया गया |

घर के भीतर जाने पर मुख प्रक्षालनादि के बाद दोनो अभिन्न मित्रों को घर की महिलाओं द्वारा सोने की थाली में बत्तीस प्रकार के शाकाहारी व्यंजनोंवाली गुर्जर प्रदेश की दिव्य रसोई परोसी गई |

भोजनोपरांत सुगंधित तांबूल पत्र थमाते हुए अंबष्ठ ने रत्नसेन के आगे अपनी इकलौती पुत्री दंभिनी से विवाह का प्रस्ताव रखा |

‘कुछ देर मौन रह कर रत्नसेन ने कहा : ‘ मेरा सौभाग्य, कि आपने मुझे इस योग्य समझा | किंतु मित्र जान कर गोपनीय तथ्य बताता हूँ |

‘हमारे परिवार को देवी का शाप है कि हम निर्वंश रह कर दत्तक पुत्रों से ही वंश चलायेंगे | या तो पत्नी होगी नहीं, हुई तो बचेगी नहीं, ऐसा एक मेरे दत्तक पिता कोक्कास जैसा ही सीमंतिनीनिर्मूल मांगलिक दोष मेरी कुंडली में भी है | अत: अपनी इस कमनीय सुंदर किशोरी दुहिता को मुझे न दें |

‘रही बात परस्पर व्यापारिक हित रक्षण की, सो मैं वचन देता हूं कि यदि आप मेरी ओर सच्ची मैत्री का हाथ बढाते हैं तो मैं आपके वाणिज्य कार्यों को किसी प्रकार न बाधित करूंगा, न अन्य को करने दूंगा |

‘इसी वचन की अपेक्षा मैं आप से भी करता हूँ | ’

द्वार की ओट में खडी अंबष्ठ की अनुभव परिपक्व माता ने पुत्र को इशारा कर भीतर बुलाया और कहा कि वे लोग विवाह संबंध बनाने की बात यहीं समाप्त करें | एक तो वर की आयु अधिक है, चाल ढाल कुछ स्त्रैण, और सौ बात की एक बात यह कि वैवाहिक ग्रह भी टेढे हैं | अपनी इकलौती धेवती को इस मांगलिक दोषवाले अज्ञात कुलशील के श्रेष्ठि को वे नहीं देंगी | अत: वह संबंधादि की बात न बढाये, हाँ, इस सत्पुरुष से मैत्री अवश्य रखे |

माता का वचन न टालनेवाले नगरसेठ अंबष्ठ ने वैसा ही किया | और रत्नसेन को आश्वस्ति दी कि वे भी उनके व्यापार क्षेत्र का कदापि उल्लंघन न करेंगे और आवश्यकता पडने पर दोनो एक साथ ही एक दूसरे के व्यापारिक वाणिज्यीय हितों की रक्षा करेंगे |

‘एक दिन वहाँ ठहर कर दोनो मित्र प्रसन्न मुख से तांबूलादि ग्रहण कर पुन: मुंबा नगरी चले गये |

‘अब कालांतर में उसी कन्या का विवाह छल से तुमने जब सुनास जैसे दुकानदार के पुत्र से करा दिया, वह आज क्यों न तुम्हारे पंख नोंचने की कामना करे ?’ कह कर कर्णपिशाची ने पुन: एक बदबूदार अट्टहास किया |

अहो ! मृत्यु भय के बीच भी मुए कथाकार की जिज्ञासा जागृत रहती है |

जो एक आँख ठीक थी उसे मार कर एक कौडी के तोते ने पूछा-

‘समय कम होते हुए भी आर्ये, उस स्त्री विरत धनकुबेर की बाबत जान कर मुझ कथाकार में यह जानने की  अतीव उत्सुकता जाग उठी है दंभिनी का रिश्ता फेर देनेवाले वणिक रत्नसेन का उस छलनामयी कही जानेवाली हिमुली मत्स्यगंधा से किस प्रकार संबंध बना ?’

 ‘हीरामन्नि रे,’ अचानक बिफर कर कर्णपिशाची गरजी |

’तू तो उंगली पकडाई तो कलाई पकडता है ? आँख वाँख नईं मारने का, क्या ? अबी अपुन इतनाहीच बताने को अधिकृत |

‘जाते जाते इतना ही कहूंगी कि तुझमें भी मेरी आर्या हिमुली जैसा साहस होता तो तू इस कानी लँगडी दशा को प्राप्त होता ही नहीं |’

कर्णपिशाची अलोप हुई |

हीरामणि किंचित लज्जित तो हुआ, किंतु अहो रे कथाकार ! लज्जा भाव फुर्र हुआ और साँस रोके हिमुली की प्रतीक्षा शुरू |

उचित समय पर मंदिर के गर्भगृह को अपनी दिव्य देह परिमल से सुगंधित करती दिव्यालंकारभूषिता हिमुली जयलक्ष्मी सी उदित हुई |

उसके देवदुर्लभ सौंदर्य से हक्का बक्का काना तोता कुछ पल ठगा चित्रलिखित सा रह गया | स्वभावगत प्रगल्भता जाने कहाँ उड गई |

‘कहो हीरामणि, कैसे हो?’ कुछ क्षण बाद सहजता से मुस्कुराती हिमुली ने ही उससे पूछा |

-‘तुमको क्या बताऊँ आर्ये ’, दु:ख से अभिभूत स्वर में प्रगल्भ कथाकार हिमुली से बोला, ‘मेरा तो भाग्य ही खराब है | पहले कुटुम्बियों ने मार कर विकलांग किया फिर..’

‘वह सब मैं जानती हूँ, यह भावुक पूर्वरंग छोडो, सीधे कथानक को आगे ले चलो ! अब पहले युग की लंबी औपन्यासिक रचना लोकप्रिय नहीं, यह युग लघु कथा का ही है |

‘इसके अतिरिक्त मुझे अन्य भी अनेक कार्य निपटाने हैं | अत: अधुना स्मरण का कारण संक्षेप में बता जाओ !’

-तनिक हकबका कर एक कौडी का वह कथावाचक, अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने पंख नोंचे जाने से बने पृष्ठभाग के घाव दिखा कर हिमुली को यथासंभव संक्षेप में बताने लगा कि उस उत्पीडक दंभिनी ने उससे किस हेतु कैसा दुर्व्यवहार किया है | और यदि वह यह सिद्ध न कर पाया कि सबसे बडा पंडित वह नहीं, वरन् आर्या हिमुली हैं, वह यहाँ आ कर उसे पुन: निर्ममतापूर्वक अपने नखों से विदीर्ण करने लगेगी | यदि उसे घर भी ले जाया गया तो वहाँ वह उसे सुख से रहने न देगी और वन में रहा, तो उसके कुटुम्बी जन |

गुरुस्वरूपा आर्या ही अब उसकी रक्षा कर सकती हैं, यही जान कर सिद्ध मंत्रपाठ से उसने उनको यहाँ बुलाया है |

‘ मैं प्राय: पुरुषों से द्वेष करती हूँ,’ हिमुली ने कहा, ‘ किंतु परिवार- परित्यक्त, पौरुष का अतिरिक्त दंभ न पालनेवाले, पारदर्शी किंतु कूटनीति में सिद्धहस्त पुरुष, विशेषकर कथाकार और समाचार वाचक मुझे प्रिय हैं | मेरी ही भाँति तुम सब भी पाँच पिताओंवाले जो हो |’

‘वह कैसे ?’ एक कौडी के तोते ने पूछा |

‘ सुनो, शास्त्रानुसार शरीर, अन्न तथा प्राण जो दे और उनकी रक्षा करे वह पिता होता है | इसलिये हमारा पहला पिता बनता है राजा, दूसरा कुबेर, तीसरा चाण्डाल, चौथा धोबी और पाँचवाँ बिच्छू |’

-वह कैसे आर्ये ?

‘ पहला : जिस शासकीय न्याय की हम सादर पालना करते हैं, हम उसके नियंता राजा की संतान हैं | दूसरे : हमारा हृदय हर अवस्था में कुबेर के समान दानी रहता है, इसलिये हम कुबेर के बच्चे हैं | तीन : हर निपट अंधेरे और निषिद्ध क्षेत्र में घुस कर जलती चिताओं तथा राख के मध्य कुत्तों कापालिकों से भी उनका भाग छीन कर निरंतर कथावस्तु के अंश जमा करने वाले हममें कहीं चाण्डाल का अंश भी है | फिर जब रचना करते हुए अपने विवेक के घाट हम उन मलिन, अपवित्र बहुरंगी विवरणों को सडाप् सडाप् पछोरते हैं, तब जीवन में हर घर की, हर प्रकार की मलिनता से परिचित धोबी हमारा चौथा पिता बन जाता है | और अपने पंचम पिता, बिच्छू से सोते हुए राजा से रंक तक को अपनी तडपा देनेवाली नोंक से चिहुँक कर जगा सकने की दुर्लभ क्षमता हमको मिली है |

‘इन पाँच गुणों की समवेत महिमा से ही हम-तुम वह हैं जो कि हैं | समझे !’

-‘हाँ आर्ये’, अवरुद्ध कंठ से कहते हुए एक कौडी के काने तोते ने हिमुली को शीश नवाया |

‘ इन्हीं गुणों का प्रताप है कि मैं युग युग से कभी श्रेष्ठिवरों के वाणिज्य कार्य में समुद्र पार जा कर भी उनका हाथ बँटाती हूँ और कभी चिरंतन राजधानी इंद्रप्रस्थ जा कर संसदीय सौध से उनके लिये हितकारी गुप्त सूचनायें एकत्र कर लाती हूं | सबसे बडी बोली दे कर क्रय करने की क्षमता वाले को, वह राजकीय अराजकीय जिस भी वर्ग का हो, उसके प्रतिस्पर्धी राजाओं राजकीय कर्मचारियों या सेठों के विषय में हर उस प्रकार की ऐतिहासिक जानकारी मैं पलक झपकते अपने करतल पर दिखा सकती हूँ जो उनके लिये अवेध्य सुरक्षा कवच बनाता है |

‘संक्षेप में कहूं, तो हे एक कौडी के कथाकार मैं इस प्रकार सारे राष्ट्र का योगक्षेम वहन करती हुई सबका साथ सबका विकास का आश्वासन देती हूँ | मेरी हर कार्यविधि या समाचार स्रोत सदैव गुप्त रहेंगे | उनके विषय की पूछताछ नहीं की जा सकती |

‘राजकाज क्षेत्र में मैं द्विमुखी विषकन्या- धनलक्ष्मी हूं |

‘वाणिज्य विपणन क्षेत्र में मैं चंचला हूं |

‘युद्धक्षेत्र में मैं काली- कराली हूं |

‘गृह में मैं मन किया तो लक्ष्मी , मन न किया तो अलक्ष्मी हूं |

‘कलाओं में मैं राजा, कुबेर, धोबी, चाण्डाल और बिच्छू जैसे पाँच पिताओं वाली पंचमुखी विश्वरूपा सरस्वती हूं |

‘जनसभाओं में अनिर्वाचित आरक्षित श्रेणी की सरपंच |

‘और कुछ ?’

अभिभूत हीरामणि ने पुन: शीश नवा दिया, आपने तो मुझे कुरुक्षेत्र में कृष्ण ने अर्जुन को जैसा विश्वरूप दिखाया ..’ कंठ अवरुद्ध होने से शेष शब्द बाहर नहीं आ पाये |

‘ तो फिर ठीक है, दंभिनी आती होगी अत: तुमको आश्वस्त कर अब मैं दैव प्रतिमा के पीछे खडी होती हूँ, रक्षार्थ प्रकट हो जाऊंगी,’ कह कर हिमुली अदृश्य हो गई |

उसके अलोप होते ही द्वार से जोर जोर से नाटकीय स्वर में बोलती सर से पैरों तक सुवर्ण आभूषणों से लदी सुनास की घरवाली दंभिनी ने प्रवेश किया |

-‘कहो कथाकार, कहाँ है तुम्हारी महापंडिता हिमुली मत्स्यगंधा ? तत्काल उसे उपस्थित करो, अन्यथा तुम्हारे पंख और मेरे हाथ !’

-‘उसकी कोई आवश्यकता नहीं,’ कहती हुई हिमुली देव प्रतिमा के पीछे से उदित हो गई |

स्तंभित चकित कुछ पल उस लोल लोचनी का चंद्रमुख ताकती रह गई श्रेष्ठिकन्या दंभिनी भी | पर शीघ्र अपने को संयत कर नामगुणानुरूप बोली, ‘तो तुम ही हो इस एक कौडी के तोते के कथनानुसार इस विश्व की सबसे बडी पंडिता ? मैं तो तब तक नहीं मानूंगी जब तक तुम इसे सप्रमाण शीघ्र सिद्ध न करो !

‘ मेरे पास समय अधिक नहीं | और यदि तुम भी मुझे आश्वस्त न कर पाईं, तब तो फिर मेरे हाथों अपने इस इस काने लँगडे शिष्य हीरामणि का पंख लुंचन निश्चित जानो |’

तोते ने परम आश्चर्य से देखा कि दंभिनी के कठोर उद्धत वचनों को सुन कर भी आर्या हिमुली के उद्भासित आनन पर विकार नहीं उपजा |

शीतल मंद मधुर स्वरों में उसने दंभिनी से कहा, ‘ अपने श्वसुरकुल को तो तू तिनके समान मानती है | और तेरे श्रेष्ठि अंबष्ठ की पितृसत्ताक परंपरा कुछ ऐसी ही है कि उससे उपजी युक्ति और तर्क तेरे मन में किसी भी स्त्री, विशेषकर सुंदर महिला को देखते ही उसके ज्ञान तथा चरित्र पर तुरत शंका उठाना सहज मानने लगता है |

‘तू जान कि तू अकेली नहीं | अपनी इस दीर्घ आयु में अनेक युगों से मैं इस प्रकार शंका का साक्षात्कार कथाकारों, समीक्षकों,समाचारवाचकों, रसिकों, राजपुरुषों तथा श्रेष्ठिवर्ग तक के मध्य करती रही हूँ |

‘तेरे तिक्त नीम सरीखे इन वचनों पर न मुझमें अचरज उपजा है न ही अमर्ष भाव | किंतु क्या स्वयं तू जानती है, कि अपने जिस संभ्रांत परिवार पर तुझे इतना अभिमान है वह तीन पीढी पूर्व कैसा निपट निर्धन था ?

‘तुझे बता दूं कि आज रत्नों से लेकर स्वर्ण के भांडारों, जल और थल तथा नभ में वायु तरंगों के एकछत्र अधिपति बन बैठे तुम्हारे विश्व विख्यात पिता अंबष्ठ के निपट धनहीन पितामह सिंधुल ने, कभी पथ पर फेंके गये एक मृत चूहे से इस व्यापार साम्राज्य को रचा था |

‘क्या ?’

तोते की ओर बढते हाथ हठात् खींच कर दंभिनी ने विस्फारित नेत्रों से पूछा |

‘तू मेरे ज्ञान की परीक्षा लेने की इच्छा रखती है न ? तो पास आ, और हीरामणि सहित मेरी हथेली पर लगे इस दिव्य वीक्षणपटल पर विगत देख |’

अथ अंबष्ठ परिवार का उपाख्यान :

हिमुली ने अपनी कमल पत्र सदृश्य वह हथेली हीरामणि तथा दंभिनी के आगे फैला दी, जिसमें जनश्रुत्यानुसार न जाने कितने ऐसे- वैसे गुप्त प्रकरणों की अनमोल सवाक् गाथायें उत्कीर्ण थीं |

तो पाठको, हिमुली मत्स्यगंधा के हस्तपटल पर चलायमान् प्रथम दृश्य में हिमुली के कंधे पर बैठे एक कौडी के कथाकार तथा उसके कंधे से सट कर खडी नगरसेठ दुहिता दंभिनी ने एक साथ तमाशा देखना शुरू किया है आप भी उनके साथ इसे देखें सुनें |

शुरुआत होती है वहाँ से, जहाँ हथेली पर कर्नाटक के उरंगपत्तन में तैलप नामक राजज्योतिषी की सवारी आ रही है |

हिमुली बताती है कि यह तैलप उस युग में ज्योतिष का प्रकांड ज्ञाता, और कुछ भी दिखा तो तुरत उसका फलाफल विचार कर बताने में समर्थ महाज्ञानी है |

‘और यह रहे तेरे पितामह सैंधुल, जिसे कूडे के ढेरों से बीन कर उच्छिष्ट अन्न खाने के कारण सर्वभक्षी सिंधुल कह कर पुकार कर दुरदुराया जाता था | ’

हथेली पर कण कण कर उभरता है : गुर्जर देश से आया धूलधूसरित युवक सर्वभक्षी सिंधुल, परदेस में काम न पाने से अपना लोटा डोर लिये भूखा प्यासा उदास मुख लिये पेड तले बैठा राह तकता |

दंभिनी तथा तोते ने एक साथ तैलप को कहते सुना ‘अरे ये देखते हो, झाडी के पास वह जो मरा चूहा है इसे लेकर यदि आज ही कोई व्यवसाय शुरू करेगा तो शीघ्र ही प्रभूत धन का स्वामी बनेगा |’

यह कह कर सवारी के हथेली के बाहर होते ही सिंधुल तुरत लपका, उसने पूंछ से पकड कर चूहे को उठाया और बाज़ार की ओर चला |

तोते ने दंभिनी की दबी सुबकी सुनी | उसे आनंद हुआ |

कट टु बाज़ार , हिमुली ने यवन भाषा में नख दर्पण की मार्फत हथेली से कहा |

चित्र बदला |

बाज़ार में सिंधुल अब एक एक अनाज गोदाम के तुंदियल तिलकधारी स्वामी से मिल रहा था, जो अपनी पालतू बिल्ली के लिये खुराक ढूँढता था | ‘ला रे इधर दे’, कहते हुए सिंधुल से उसने वह मरा चूहा एक पैसे में खरीद लिया |

अब पास की दुकान से सिंधुल उस चूहे के पैसे से थोडा गुड खरीदता दिखा | फिर उसने अपने लोटे में डोर लगाई और बावली से उसमें ठंडा जल भर कर गुड के दोने तथा जल सहित राजपथ पर जा बैठा |

‘दादा जी अब भी कुछ खाते पीते क्यों नहीं ?’ स्वभाव के विपरीत आर्द्र स्वर में दंभिनी ने हिमुली से पूछा |

कट टु राजपथ, उसे उत्तर देने की बजाय हिमुली ने वीक्षण यंत्र को आदेश दिया | फिर जो दिखा वह दंभिनी के प्रश्न का उत्तर था |

हथेली पर उभरे राजपथ पर कतार की कतार राजा के माली काम कर के धूप में घर जाते थे | सिंधुल उन सबको नि:शुल्क वह गुड और शीतल जल दे रहा था | उससे खुश हो कर बदले में वे उसे राजा की वाटिका के अंजुलि भर सुगंधित पुष्प देते थे | जब तक गुड समाप्त हुआ उसके पास गठरी भर फूल जमा हो गये जिनको तनिक और पैसे में मंदिर जानेवालों को बेच कर सिंधुल ने कुछ और गुड लिया और आगे बढा |

इससे पहले कि हथेली खाली होती, कट टु बगिया, हिमुली उवाच |

अब सिंधुल मालियों को सीधे बगिया में जा कर गुड जल बाँटता दिख रहा था | और इससे उस पर और भी अधिक प्रसन्न होकर माली इशारे से आधे पेडों के फूल उसके चुनने के  लिये छोड रहे थे |

‘कालांतर में उनको बाज़ार में बेच कर सिंधुल ने पहले से भी दस गुना पैसा पाया’ हिमुली उवाच |

‘फास्ट फॉरवर्ड में आगे चलो,’ फिर उसने वीक्षण यंत्र से कहा |

अगले चलचित्र में सिंधुल एक बडा मिट्टी का घडा पानी के लिये खरीदता दिखता था | पर यह क्या ? जब वह गुड खरीद रहा था हठात् भारी आँधी आई जिसमें धडाम धडाम की ध्वनि सहित कई पेड धराशायी होते दिखे |

अब सिंधुल भागने लगा |

कहाँ को ?

कट टु बगिया |

राजकीय बगिया में भी भीषण आँधी से कई पेड व भारी टहनियाँ गिर गईं थीं | फूल यत्त तत्र बिखर गये थे | पर उनको राजभवन का माल खा खा कर शिथिल शरीर बन गये राजकीय माली हटा नहीं पा रहे थे |

‘अरे कोई है ?’ उनका मुखिया बार बार उच्च स्वर में पूछ रहा था, ‘जो इस कबाड को उठायेगा ? कोई है ?’

कट टु बाज़ार गली |

सिंधुल वापिस बाज़ार आ कर गली में कंचे खेलते छोकरों को गुड का लालच देता दिख रहा था | फिर उनको उसने साथ लिया और फिर वानर सेना सहित पलटा |

कट टु बगिया |

लडकों की मदद से आनन फानन में सब टूटी लकडियाँ उठवा कर सिंधुल ने सडक किनारे रखवा लीं थीं और गाहक की प्रतीक्षा करता था, कुछ ही देर में हथेली पर एक गाहक आ भी गया |

यह गाहक कहता सुना गया कि वह राजकीय कुम्हार था | राजा के यज्ञ के लिये उसको बहुत सारे मिट्टी के बरतन बना लाने का आदेश मिला था | किंतु बडा आँवा गर्म करने को उसे काफी लकडियों की आवश्यकता थी |

पर हा हंत, उसने सिंधुल से कहा | उसकी नकटी बीबी दो दिन पूर्व किसी प्रेमी के साथ भाग गई | अरे चार लात ही तो मारी थीं | पति था, यह तो मेरा सहज अधिकार बनता था | उस पर इतना गुस्सा कि उस दुर्मुख के साथ चल दी ?

हा दुर्भाग्य सिंधुल ने कहा |

उसकी करुणा से द्रवित कुम्हार सिंधुल को बताने लगा कि किस प्रकार इस समय जब उसे मदद की आवश्यकता थी ईंधन बीनने या आँवा गरम करने का काम भी उसी पर आन पडा था | ‘हा नारी की जात !’ दोनो पुरुषों ने एक साथ कहा |

फिर राजकीय कुम्हार ने फटाफट वह सारी लकडी मुँहमाँगे दाम पर खरीद ली |

कट टु श्रेष्ठि बाज़ार |

यहाँ सिंधुल नवीन वस्त्रों में दिखा | धनागम बढ रहा था यह उसकी वेशभूषा और मुख की चमक व हाव भाव से स्पष्ट था |

‘यह सिंधु देश, कांबोज, गाँधार, यवन तथा कैकय देश से शहर में माल बेचने आये घोडों के परदेसी सौदागर हैं,’ हिमुली ने सर्वभक्षी सिंधुल के कंधों पर हाथ रख कर मित्रभाव से बात करते लंबे चौडे शरीरवाले पुरुषों के लिये बताया | वे चेहरे से ही बाहरी लगते थे | सबके सर पर यवन देश की पगडियाँ और कमर में इस्पाती कटारें बँधी थीं |

‘अब देखो इनसे सिंधुल सेठ कैसे दोस्ती करता है’ हिमुली ने जोडा |

कट टु मदिरालय |

अब सिंधुल सुंदर चषकधारी गणिकाओं के साथ उन पुरुषों के साथ हँसी ठठ्ठा करता था |

दंभिनी ने दीर्घ श्वास ली | उसका चेहरा कुछ उतर गया था माथे पर स्वेद बिंदु थे | कानी आँख के बावजूद तिरछी नज़र से उसका अवसाद देख हीरामणि हँसा |

‘अभी यह तो कुछ नहीं, तेरे पितामह की महिमा गाथा और भी आगे जाती है, यह तो झलक मात्र है |’ हिमुली ने हीरामणि की ओर इस तरह भाव व्यक्त न करने के लिये एक अर्थमय दृष्टि डालते हुए नगरसेठ की बेटी से कहा |

कट टु गणिका आवास विलास |

यहाँ गणिकाओं के नृत्य गायन से प्रारंभ हुई आकर्षक गोष्ठी में यह विशेष रूप से दृष्टव्य था कि हँस हँस कर सब अभ्यागतों को मदिरा पान के लिये प्रेरित करता सिंधुल स्वयं न पी रहा था न ही वह किसी गणिका से कामुक व्यवहार कर रहा था | फिर भी उसके प्रति गणिकाओं के परम आदरमय हाव भाव से स्पष्ट था कि इस रसरंजन गोष्ठी के सारे खर्चा पानी का स्रोत सर्वभक्षी सिंधुल ही था | जिसके एकाग्रता से अपने नये मित्रों पर ध्यान टिकाये नेत्रों से स्पष्ट था कि उसका ध्यान घोडों की बाबत बह चली जानकारियों पर ही केंद्रित था |

उसका कार्य सिद्ध हुआ जब वे भाडे की सुंदरियों के हाथों अनवरत दिये जा रहे मदिरा चषक पी पी कर मत्त हुए | अब बात चली कि इस खेप में इस बार कितने हिरणरंगी ॠष्य घोडे, कितने चाँदी से उज्वल कर्क अश्व, कितने कृ्ष्णवर्णी, कितने चितकबरे थे | कहाँ उनका स्मारण (गणना) होनी थी, किस तरह का अंकन (दाघ) कर उनको बोली के लिये कहाँ प्रस्तुत करने की योजना थी ?

लटपटी वाणी में धंधे के रहस्य उजागर करते उन्मत्तों से सिंधुल को शीघ्र ही यह भी पता चल गया कि अगले भौमवार को नगर में घोडों का एक अन्य चतुर बडा यवन व्यापारी अरब देश से पाँच सौ बहुमूल्य सैंधव घोडे बेचने ला रहा था जिनका कोई सानी किसी आस पास के देश के राजा की घुडसाल में न था|

संपूर्ण जानकारी पाते ही सिंधुल ने मदिरा वाहिका गणिकाओं को पास बुलाया | फिर कुछ और सुवर्ण मुद्रायें दे उनके कानों में कुछ गोपनीय वार्ता करने के उपरांत स्वयं हथेली के दृश्य से बाहर चला गया |

अब हिमुली की हथेली पर गणिकालय के उस कक्ष में से सम्मानित श्रेष्ठियों, राजकीय कर्मचारियों तथा गणिकाओं के बीच अनेकों प्रकार की नितांत अशोभनीय अंतरंगता के गर्हित दृश्य सामने आने लगे |

हिमुली ने पुन: अर्थमय दृष्टि से एक बार पान की तरह पीली पडी दंभिनी को देखा फिर कौडी के तोते को देख मुस्कुरा कर बोली :

‘कट टु घास मंडी |’

अगले दृश्य में घास मंडी में पुन: नितांत साधारण वस्त्रों में खडा सिंधुल घर जाते गरीब घसियारों को नि:शुल्क जल गुड देता उनके धन्यवादी शब्द सहास ग्रहण करता था | स्पष्ट था कि कुछ समय बाद वे भी पट गये | सिंधुल ने स्वयं भी मंडी से काफी घास खरीदी और गली के छोकरों को पुन: गुड खिला कर उसे गोदाम में रखवाया |

अगली सुबह के दृश्य में सिंधुल आयु के अनुरूप किसी के गले में हाथ डाल तो किसी के चरण छू कर मित्र बने घसियारों से अनुरोध करता दिखाई दिया, कि बस एक दिन कुछ घटियों तलक वे उससे पहले नगर में किसी भी घोडा व्यापारी को अपनी घास न बेचें | साथ ही वह हर घसियारे को मुट्ठी में छिपा कर कुछ देता भी जाता था | हाथ खोल कर देखने के बाद सभी घसियारे उसकी बात मान सहमति में सर हिलाने लगते थे |

‘कहना न होगा कि इसके बाद सिंधुल उस विदेशी व्यापारी को अपनी दुर्लभ घास सामान्य से कहीं ऊंचे दाम पर बेच कर कितना मालामाल हुआ होगा |’ हिमुली बोली |

‘इस समय तक मैं स्वयं भी बडे व्यापारियों की बैठकों से गुप्त भागीदारी की महिमा से वणिक समुदाय में क्षिप्र गति से ऊपर उठते इस मेधावी युवक की चतुराई के विषय में अनेक समाचार पा कर उत्सुक हो उठी थी | मैं ने अपने लाभ की डोर उससे जोडने की सोची |

‘सेठों ही नहीं, नगर की सभी विख्यात कुटनियों गणिकाओं के बीच भी मेरी गहरी पैठ थी | ‘गणिका परिसंघ की संचालिका निपुणिका मेरी गहरी मित्र थी |

राजकीय शिष्टमंडलों से अच्छे गाहक भेजने की एवज में मेरा दस प्रतिशत् का उसके गणिकालय के चढावे में दाय भाग अनेक वर्षों से अलग रहता था |

‘निपुणिका से मैंने कहा कि मैं नगरवधुओं को सिंधुल से और भी ऊँचे मूल्य देने में सक्षम परदेसी गाहक दिलवा सकती हूँ | पर शर्त है कि वह स्वयं गाहकों से भावताव न करे, बस उनसे यही कहे कि आर्या हिमुली ही हमारी अधिकृत मध्यस्थ हैं |

‘अब आएगा उष्ट्र पर्वत तले, यह सोचती हुई मैं अब उसके संदेश की प्रतीक्षा करने लगी | मैं जानती थी कि सिंधुल सेठ जब कभी इंद्रप्रस्थ से कर्नाटक देश तक अपने फैलते व्यापारिक काम के अगले चरण में पहुँचेगा, तब वह पहले पत्तन के राजकर्मचारियों को फल, मिष्ठान्नादि दे कर प्रसन्न करेगा | फिर जब बात रूपवती गणिकाओं पर आये तब उस बिंदु पर वह मेरे साथ स्वयमेव संपर्क करेगा |

‘वह दिन भी आया | हमारा सौदा पटा | फिर तो झडी लग गई |

कुछ समय बाद कई अतिरिक्त गुप्त जानकारियाँ भी मैंने सिंधुल सेठ को उसके व्यवहार से प्रसन्न हो कर दे दीं | ‘जल्द ही नगर में पत्तन पर एक तस्कर सामुद्रिक जहाज पकडा गया और सिंधुल उसे मेरी मदद से सस्ते में खरीदने में सफल रहा |

मुझे तब तक अपुष्ट जानकारी मिल चुकी थी, कि प्रकटत: सामान्य फटे पालवाले उस जहाज़ में गांधार इस्फहान का अफीम तथा तुरुष्क देश के हथियार थे | किंतु मेरा तत्कालीन मालिक डरपोक तुनुकमिजाज़ निकला जो जोखिम मोल लेकर सौदा नहीं करना चाहता था | मैं उसकी कायरता से इतनी विरक्त हुई, कि उसे त्याग कर मैंने वह सारी जानकारी सिंधुल को बेच दी |

‘जहाज़ के माल की बिक्री से कमाया लाखों का माल लेकर अपने गाँव वापिस जाता हुआ उदार सिंधुल सेठ मुझे भी खूब मालामाल कर गया | उसकी मेरी मैत्री उसके जीते जी बनी रही |

‘सो लली दंभिनी, भली तरह जान ले कि तेरे इस अतल अथाह पारिवारिक कोष का ऐतिहासिक मूल कहाँ है और उसका आधार किस प्रकार बना |

‘स्पष्टत: तू नहीं चाहेगी कि जनहित में मैं यह सब सार्वजनिक कर दूं | अत: मुझे चुप रखने को तू अविलंब इस कथाकार तोते से क्षमायाचना करने के बाद उसे मुझे दे और बिना पीछे मुडे अपने घर को प्रस्थान कर |

मेरा हृदय विशाल है | अत: जाते जाते तेरा अवसाद मिटा कर तुझे उपकृत करने को अब मैं एक योजना बताती हूँ | सुन |

‘मुझे दिव्य दृष्टि से दिख रहा है कि तेरी कुक्षि में सुनास के जुडवाँ पुत्र पलते हैं | वे तेरी बडी हुंडी बन सकते हैं | तू अपना भला करना चाहती है तो यह मूर्खसुलभ हठ तथा गर्व त्याग कर ठंडे मन से मेरी बात सुन |

‘जन्मोपरांत अपने जुडवाँ पुत्रों में से एक को पतिकुल को तथा दूसरे को अपने पिता को दत्तक के रूप में दे कर तू पति सहित एक महान् वाणिज्य साम्राज्य की स्वामिनी बन सकेगी | बदले में हीरामणि अब मेरा |

‘तीन बार बोल, स्वीकार है ?

‘स्वीकार है, स्वीकार है, स्वीकार है | आपसे बडा ज्ञानी पंडित इस निखिल ब्रह्मांड में कोई नहीं |’ दंभिनी सिंधुल का अंश थी | तुरत समझ गई कि वृहत्तर हित किसमें है |

उसने हीरामणि तोते की एकमात्र टाँग तले उसके पंजे पर शीश नवाया, हिमुली के चरण स्पर्श किये, और बिना मुडे घर को चली गई |

इस प्रकार नगरसेठ की पुत्री दंभिनी के गर्वत्याग तथा हीरामणि तोते के उद्धार का का यह प्रबंध समाप्त हुआ |

(अगली बार उपसंहार- आख्यान -5)    

इस श्रृंखला की पिछली कड़ियों को पढने के लिए नीचे अलग-अलग लिंक्स पर जाएँ:

http://jankipul.com/2017/02/8871.html

http://jankipul.com/2017/02/%e0%a4%ae%e0%a5%83%e0%a4%a3%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%88.html

http://jankipul.com/2017/02/9048.html

 

 

 

 

 

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