देशप्रेम ब्लडी हेल! ‘रंगून’ में प्रेम है प्रेम!

‘रंगून’ फिल्म जब से आई है तब से उसको लेकर कई तरह की व्याख्याएं हो रही हैं. आज मुश्किल यह हो गई है अच्छी या बुरी के इर्द गिर्द ही फिल्मों की सारी व्याख्या सिमट कर रह जाती है. उसके बारे में अलग-अलग पहलुओं को लेकर चर्चा कम ही होती है. लेकिन अणुशक्ति सिंह की यह टिप्पणी बहुत अलग तरह से इस फिल्म को देखती है. हालांकि मैं उनकी इस टिप्पणी से सहमत तो नहीं हूँ  लेकिन यह जरूर कह सकता हूँ कि बहुत शानदार लिखा है लेखिका ने. आप भी पढ़िए- मॉडरेटर

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रंगून – भारत के पूर्व मे बसे एक नन्हें से देश बर्मा की राजधानी। जिसे अब लोग क्रमशः यांगोन और म्यांमार के नाम से जानते हैं। इस रंगून का भारत से बहुत लेना देना है। यह कहना ज़्यादा उचित होगा कि भारत की आज़ादी की लड़ाइयों से इस शहर के गहरे ताल्लुकात रहे हैं। उसी रंगून को पृष्ठभूमि मे रख कर निर्देशक विशाल भारद्वाज ने एक हमनाम फिल्म बनाई, एक फैंटेसी पीरियड ड्रामा। जिसकी नायिका अपने हाव-भाव और एक्शन स्टार वाली छवि से हिन्दुस्तानी फिल्मों की जाँबाज अभिनेत्री नाडिया के करीब दिखती है। नाम भी जूलिया है।  दो नायक हैं जिसमे एक मुंबई के पुराने फिल्म निर्माता पारसी घराने का प्रतिनिधित्व करता है तो दूसरा दिल को लूट लेने वाला पुराना फौजी, जो कि दोधारी तलवार है। दूसरे नायक के लिए यह स्टेटमेंट मेरा नहीं, फिल्म के ही एक पात्र, उर्दूदाँ अंग्रेज़ खलनायक का है।

फिल्म शुरू होती है, जहां पहले ही सीन में दुश्मन सैनिकों को मारता-काटता नवाब दुश्मनों के कब्जे मे आ जाता है। कट टू मुंबई। यहाँ, एक लड़की इमारत की दूसरी मंजिल से कूदती है, एक लड़की की जान बचाने के लिए। सब आह और वाह कर बैठते हैं। पर प्रोड्यूसर बिल्मोरिया कहता है, वंस मोर। एक्शन हीरोइन जूलिया प्रोड्यूसर तक पहुँचती है। उससे अपना प्यार जताती है। उसकी बात मानते हुए फिर से कूद जाती है। ज़्यादा खतरनाक अंदाज़ मे, फ़ानूस के सहारे। मिसेज बिल्मोरिया होने का ख्वाब आँखों मे सजाये हुए। ब्लडी हैल, ये तो बस प्यार है!

कट टू प्रोड्यूसर बिल्मोरिया की पार्टी। मुंबई की आला पार्टी जहां देशी विदेशी तमाम तरह के हुकमरान इकट्ठा हुए हैं। अंग्रेज़ मेजर जनरल ग़ालिब के शेर पढ़ता हुए महफिल मे दाखिल होता है। हिन्दुस्तानी राजा से उसकी तलवार की कीमत पूछता है। राजा कटाक्ष का मास्टर है, तल्खी से जवाब देता है। बस यहीं एंट्री होती है देशप्रेम की। ब्लडी हैल, ये भी तो प्रेम है।

बाकी बिल्मोरिया की पार्टी मे ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जो काबिले-बयां है सिवा इस सच्चाई के कि दर्शकों को पता चल जाता है कि जूलिया रूसी बिल्मोरिया की रचना है। उसने ज्वाला देवी नाम का एक अनगढ़ बंजारा पत्थर उठाया और उसे तराश कर खूबसूरत जूलिया का रूप दे दिया। रूसी पिगमेलियन की तरह अपनी ही रचना से प्यार कर बैठता है। उस पर अपना हक़ समझता है। इसलिए, जब ज़रूरत होती है बिना जूलिया से पूछे वह उसे अंग्रेज ऑफिसर हार्डी के कहने पर हजारों किलोमीटर दूर भेजने के लिए तैयार हो जाता है। वॉट द हेल, क्या ये प्यार है? शायद हाँ, पर इस प्यार का रंग थोड़ा अलग है। यह प्यार अनुशासित है। यहाँ बच्ची की तरह जूलिया को पुचकारता हुआ रूसी दिखता है। वही रूसी जिसकी हर बात जूलिया के लिए लगभग पत्थर की लकीर होती है। जूलिया जिसके अहसानों से दबी हुई है और प्यार के सहारे कर्जा उतारने की कोशिश सी करती हुई दिख रही है। ब्लडी हैल!

खैर रूसी की तोती चल पड़ती है। टू रंगून वाया अरुणाचल। साथ है जनरल हार्डी के द्वारा तैनात जाती जमादार नवाब मलिक। नवाब और जूलिया साथ सफर करते हैं। जूलिया के न चाहते हुए भी नवाब उसके साथ बने रहते हैं। न जूलिया को खडूस नवाब पसंद है, न नवाब को खूबसूरत पर बचकानी जूलिया। पर इश्क़ हो जाता है। यहाँ न जूलिया को पता है कि आगे क्या होगा, न नवाब जानता है कि इस इंकलाब का हासिल क्या होगा। दोनों दुनिया से अलग खोये हुए हैं पर खुश हैं। ये इश्क़ है।

फिर अचानक से रूसी आ जाता है। अपनी जूलिया को ढूंढते हुए। प्यार और हक़ का नगीना साथ लेकर। जूलिया फिर से रूसी की चमकती दुनिया मे खो जाती है। पिता के न होने की अपनी कसक को रूसी की मंगेतर होने के अपने ख्वाब के सहारे दूर करती हुई। पर दिल है तो दिल, दिल का क्या कीजे?

उसका दिल उसकी आँखों से दिखता है, जो हमेशा नवाब सी सूरत तलाशता है। इश्क़ की ताप जो है न वो सबसे पहले रक़ीबों को झुलसाती है। बस नवाब का इश्क़ रूसी को भी दिख गया। उसने एक मोम की गुड़िया गढ़ी थी जिसमे अब जान आ गयी थी। इस गुड़िया ने अब अपने रचयिता से इतर सोचना शुरू कर दिया था। ये तो इश्क़ का असर है। न न सॉरी करता हुआ इश्क़।

यही वह असर है जो जूलिया को नवाब को छुड़ाने के लिए मजबूर कर देता है। नवाब को भी इश्क़ है, पर यह तौलना मुश्किल है कि ज़्यादा किस्से? जूलिया से या देश से?

नवाब देश के लिए शहीद हो जाता है। जूलिया नवाब के लिए जान दे देती है। देश नाम की किसी चिड़िया से उसका कोई लेना-देना था ही नहीं। वह तो बस नवाब के साथ-साथ उसके हिस्से आया था। जो पहले नवाब का था, फिर उसका हो गया।

रूसी अब तक बस रचयिता था जिसे अपनी रचना से प्यार था। पर जाती जूलिया उसके अंदर के पिता को प्रेमी मे बदल जाती है। जो पहले नवाब का था, फिर जूलिया का, वह आखिर में बस रूसी का रह गया। यही तो इश्क़ है।

रंगून मे जो भी है बस प्यार है। गुलज़ार के खूबसूरत अल्फ़ाज़ों मे विशाल भारद्वाज के संगीत से सजा प्यार। इस इश्क़ की कहानी के साथ चलते नवाब, जूलिया और रूसी हैं। जिन्हें बेहद खूबसूरत साथ मिला है जुल्फी (सहर्ष शुक्ला) और बच्चे के आगे देशप्रेम को रखने वाली मेमा (लिन लाइश्राम) का। कोई किरदार किसी से छोटा नहीं है। इस फिल्म मे इश्क़ इस कदर फैला हुआ है कि साफ पता चल रहा है निर्देशक शूट किए गए हर सीन से प्यार कर बैठा है। इतना प्यार कि एडिटिंग वाली कैंची चलाने से कतरा गए। बस, यहीं थोड़ी गड़बड़ हो जाती है। बेहतरीन अदाकारी और अरुणाचल के खूबसूरत नज़ारों से सजी यह फिल्म बीच-बीच मे बोर करने लग जाती है। कई बार बस खत्म होते होते रह जाती है। पर फिर ब्लडी हैल कैसे कहते? ब्लडी हैल!

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