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  • स्त्रीवादी दुविधा

     यह सवाल बहुत वाजिब है कि क्या स्त्रीवादी होने का मतलब केवल स्त्री हक़ तक ही सीमित है या इसमें सभी मनुष्य शामिल होते हैं। इसके जवाब सबके पास अलग-अलग हो सकते हैं। इसी विषय पर होती दुविधाओं को आज हमारे समक्ष शिवानी प्रिया रख रही हैं। शिवानी हिन्दी साहित्य की विद्यार्थी रह चुकी हैं और अब दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की पढ़ाई कर रही हैं तथा इग्नू से जेंडर डेवलपमेंट से स्नातकोत्तर की पढ़ाई भी कर रही हैं। इन्होंने ‘टेस्ट ऑफ़ फेमिनिज्म’ के तहत कई लड़कियों के संघर्ष को हमारे सामने लाया है। आज उनका यह संक्षिप्त लेकिन ठोस लेख पढ़िए- अनुरंजनी

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                                             स्त्रीवादी दुविधा

    बचपन में लगता था कि शायद मैं स्त्री हूँ ही नहीं क्योंकि ये समाज मुझे जिस तरह रहने, चलने, उठने, हँसने कुल मिलाकर प्रतिक्रिया करने को कह रहा था वो मेरी प्राकृतिक अवस्था नहीं थी। ये समझने में कि ये अपेक्षित व्यवहार असल में एक ट्रेनिंग का भाग है समय लगा। और इस ट्रेनिंग को जितना समझ उतना ही अपने स्त्रैण गुण के करीब खुद को पाया। बी.ए. में स्त्री विमर्श पढ़ते वक्त समझ का एक और स्तर खुला, कुल मिलाकर जितना पढ़ती गयी उतना ही खुद को और समझती गयी। पर क्या स्त्री का अपना कुछ प्राकृतिक व्यवहार हो सकता है? ये लेख दो विषय की पड़ताल करता है, पहला “स्त्री होना क्या केवल ट्रेनिंग है, आखिरकार एक प्राकृतिक व्यवहार क्या है स्त्री का?” और दूसरा “संघहर्षों में चयन की समस्या”। आपको इस लेख में जवाब कम प्रश्न ज्यादा मिलेंगे।

    ये समाज पितृसत्तात्मक है, इस बात में कोई दोराय नहीं है, किंतु कई लोग, तथाकथित बुद्धिजीवी भी ये कहते हुए सरलता से मिल जाएंगे कि पितृसत्ता ही ठीक है, या कि स्त्रैण गुण असल में ‘सबमिसिव’ या ‘पैसिव’ ही है, जहाँ वे फ्रायड के सिद्धांत को सही ठहराते नज़र आते हैं। और सिमोन के सिद्धांत के अनुसार अगर ये मान लिया जाए, कि “स्त्री पैदा नहीं होती अपितु बनाई जाती है”, तो यह सिद्धांत भी पूर्णतः सही नहीं लगता है। ये सिद्धान्त इस ओर इशारा करता है कि स्त्री का कोई सार्वभौमिक गुण है ही नहीं। रेडिकल स्त्रीवाद जैविक नियतिवाद (biological determinism) को स्वीकारते हुए अपने सिद्धान्त को गढ़ते हैं और उसी से स्त्री उपेक्षा का कारण समझने-समझाने की कोशिश करते हैं। उनके पास स्त्री-मुक्तिकरण का जो उपाय मौजूद है वो है समाजिक पुनःसंरचना। इस बात को स्वीकार करते हुए कि समाजिक पुनःसंरचना कई स्तर पर अवश्य ही स्त्री-मुक्तिकरण की तरफ काम करेगी। लेकिन साथ ही इस बात को मानना भी उतना ही आवश्यक है कि इस पुनःसंरचना में जो व्यवहार स्वीकार किये जाएँ, ‘नॉन-जेंडेर्ड’ मनुष्य के वो क्या केवल पुरुष के होंगे, क्योंकि हम ये मान कर चल रहे हैं कि स्त्री बनाई गई है, ऐसे में स्त्री की सार्वभौमिकता प्रश्न चिह्न में पहुँच जाती है, और साधारण मानव की परिकल्पना ‘पुरुष’ को स्वीकारती है। तथापि इस सिद्धांत का भी पूर्ण समर्थन नहीं किया जा सकता।

    यह मानते हुए कि जब बात शोषण की चल रही हो तो ‘जेंडर पहचान’ समस्त पहचानों में सबसे अहम हो जाती है, इस बात पर भी सूचना चाहिए कि ‘इंटरसेक्शनलिटी’ अर्थात अलग-अलग पहचान जैसे कि सेक्सुअल प्राथमिकता, धर्म, जाति, नस्ल, वर्ग (जिस आधार पर समाज बँटा है) इसका बहुत अहम असर शोषण की परिधि पर पड़ता है। मोइरा गेटन्स कहती हैं “सेक्स इज़ इटसेल्फ जेंडर्ड” अर्थात जेंडर उतना भी निर्मित नहीं है जितना रेडिकल स्त्रीवाद मानते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वे बुद्धिजीवी ठीक हैं जो यह मानते हैं कि स्त्रैण गुण असल में ‘सबमिसिव’ या ‘पैसिव’ है? इसका जवाब इतना सरल नहीं है जितना वे अपेक्षा कर रहे हैं। असल में एक स्त्री का स्वाभाविक व्यवहार या पुरुष का वास्तविक व्यवहार कैसे समझा जाए? क्या ये उनकी संस्कृति, पर्यावरण इत्यादि से प्रभावित हैं? और हमारे साथ वे लोग भी हैं जो स्वयं को किसी ‘बायनरी’ यानी स्त्रैण और पौरुष गुण की परिधि में नहीं देखते। अर्थात वास्तविकता और सार्वभौमिकता की खोज हमें इतिहास की गहराई में लिए चले जाता है यानी कि इन सवालों के जवाब हमें ऐतिहासिक परीक्षण द्वारा ही मिल सकता है। हालांकि इस लेख का उद्देश्य किसी प्रकार का उत्तर देना नहीं अपितु अलग-अलग स्त्रीवादी सिद्धान्तों में उलझे विचारों को आपके समक्ष रखना है।

    स्त्रीवाद के भिन्न सिद्धान्त ना तो पूरी तरह गलत हैं, ना पूरी तरह सही। मेरे विचार में  सामाजिक इंटरसेक्शनल स्त्रीवाद के क़रीब अधिक सोचने की ज़रूरत लगती है। यदि हम बदलाव की चाह रखते हैं तो  हमें हर समस्या लगभग एक ही स्तर पर प्रभावित करनी चाहिए, चाहे वो दलित समस्या हो, वर्ग समस्या हो, पर्यावरण से जुड़ी दिक्कत हो या कोई भी। कहीं पढा था मैंने “आपको अपना (बैटल) संघर्ष चुनना होता है, आप सारे संघर्ष नहीं चुन सकते” और यहीं एक स्त्रीवादी मात खा जाती है, स्त्री हर रूप से और हर हालत में अधिक शोषित व प्रभावित है, इसीलिए एक स्त्रीवादी दुविधा यही है कि कैसे संघर्षरत होते हुए स्वयं को संचालित करें। इस लेख का एकमात्र यही उद्देश्य है कि मैं अपने मन में चल रहे सवाल और उनके जवाबों तक पहुँचने के अपने रास्ते आपके साथ साझा कर सकूँ। और साथ ही अपनी संघर्षों से जुड़ी दुविधा आपके समक्ष रख सकूँ।

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