• समीक्षा
  • गुलज़ार को संपूर्णता में सामने लाने वाली किताब

    यतीन्द्र मिश्र की किताब ‘गुलज़ार सा’ब: हज़ार राहें मुड़ के देखीं’ पर यह टिप्पणी लिखी है कवि-लेखक यतीश कुमार ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    इक इक याद उठाओ 

    और पलकों से पोंछ के वापस रख दो … गुलज़ार 

    दूध की ख़ाली बोतल की तरह आपके दरवाज़े पर खड़ा हूँ, जैसा हास्यबोध गुलज़ार का हो सकता है, एक आम पाठक या सिनेमा प्रेमी नहीं जानता, वो तो जानता है एक धीर-गंभीर शायर को, एक बेहद संवेदनशील पटकथाकार को, समुद्र की गहराई लिए पंक्तियों के रचयिता को, तो कभी प्रतिबद्ध फ़िल्मकार को! लेकिन इस किताब ने हम जैसे आम पाठक को अपने हरदिल अज़ीज़ गीतकार को ज़रूरत से ज़्यादा समझने की ढील दी। आश्चर्य हुआ यह जानकर भी कि यह सिनेमा जीवन, लेखक के लगभग बीस साल की कड़ी शोधपूर्ण मेहनत का प्रतिफल है। 

    अपने नज़्मों को हाँड़ी पर पड़े ढक्कन की फड़फड़ाहट का नाम देने वाले गुलज़ार,उसकी भाप को अपनी लिखाई कहते हैं। शुरू के पन्नों में ही पता चल जाता है कि इस फ़लसफ़े को पन्नों पर उतारने वाले यतीन्द्र अपनी पूरी तैयारी के साथ उतरे हैं। हाँड़ी की वो बुड़बुड़ सुनते हुए भाप का वो भभका उनको भी लगा है, जिसकी जलन में अफ़सानों के दर्द और संवेदनाओं को सही माने देने में उनकी सजगता साफ़-साफ़ दिखाई देती है। परिष्कार और निथार की जिस परम्परा से गुलज़ार गुजरे हैं, उसी गली में यतीन्द्र को टहलते देखना एक सुखद अनुभव है।

    इकतारे पर बाबा फ़रीद और बुल्लेशाह के नग़में, पाकिस्तान में काला और दीना में बिताई आठ साल के उम्र तक के बचपन की यादें, कीर्तन और गुरुबानी की अनुगूँजें, दिल्ली तक उन्हें सुनाई पड़ती रहीं और आज भी यादें कचोटती हैं मन को, जिसका ज़िक्र कई जगहों पर इस किताब में  बड़ी संजीदगी के साथ आता है।

    शुरू में ही `द गार्डनर’ टैगोर की कविताओं की किताब का जादू उनकी पठनीयता को अलग आयाम दे गया। बॉर्डर को आग की लकीर बताने वाले गुलज़ार की स्मृति में इंसानी दर्दों के मिमियाने की आवाज़ पार्टीशन की शक्ल में एक ख़ौफ़नाक घटना की तरह है, जो आज भी उन्हें  दहला जाती है। इस बात को उनकी कहानियों से जोड़कर यतीन्द्र इस दर्द को माकूल मापने की कोशिश करते हैं। लेखक ने गुलज़ार की परेशानी, जज़्बा, दर्द सबको उनकी ही कविताओं की पंक्तियों से जोड़ने की बहुत शोधपरक कोशिश की है। यह तभी मुमकिन है जब आप किसी के लिखे में पूरी तरह उतरते हैं। शोध भरी नज़रों के साथ उतरने की यतीन्द्र की मेहनत यहाँ साफ़ दिख रही है। माँ को कैसे याद करते हैं?  माँ के बारे में क्या सोचते हैं गुलज़ार ? यतीन्द्र उनकी कविता से उसे जोड़ते हुए उनके जज़्बों को नज़्मों के द्वारा उद्धृत करते हैं, जिसका एक टुकड़ा मैं यहाँ उदाहरण के लिए प्रेषित कर रहा हूँ ताकि इस प्रयोग को आप बेहतर समझ पाएँ।

    `जाने किस जल्दी में थी जन्म दिया, दौड़ गई

    क्या ख़ुदा देख लिया था जो मुझे छोड़ गई।’ 

    कविता में पोट्रेट बनाना और मेटाफ़र को ब्रश की तरह  गुलज़ार किस तरह इस्तेमाल करते हैं, यतीन्द्र ने बखूबी उनकी ही कविता की पंक्तियों से समझाया है। 

    मोटर गैराज की नौकरी से शुरू किये गये संघर्ष की यह यात्रा एक अच्छे मेज़बान, एक सच्चे दोस्त, बेहतरीन शायर, सय्यार दिग्दर्शक तक कैसे पहुँचती है, यतीन्द्र की लिखी इस किताब से पता चलता है, जो कि उनके लम्बे शोध का प्रतिफल भी है। यह पक्ष इस किताब को इस मायने में ख़ास बनाता है कि आप इसे किसी भी पन्ने से कहीं से भी पढ़ सकते हैं। गुलज़ार को गुलज़ार कहने के लिए हल्फ़ों का जो जामा, जो साँचा चाहिए उसका पैरहन यतीन्द्र ने ओढ़ रखा है इसलिए कई बार लगता है, यतीन्द्र नहीं गुलज़ार ख़ुद बतिया रहे हैं। 

    आज भी 14 अगस्त को बाघा बॉर्डर पर उनका जाना, हिन्द-पाक की दोस्ती के नारे लगाना, इस बात का द्योतक है कि वो कितने आशावान हैं और उन्हें दोनों धरती से कितना प्यार है। गुलज़ार को खंगालते हुए यतीन्द्र उनके इर्द -गिर्द  की दुनिया में टहलने लगते हैं और इस कोशिश में वे कला क्षेत्र की दुनिया में जो भी व्यक्ति उनसे संबंधित है और महत्व रखता है, उनके बारे में भी बहुत गहरी छानबीन करते हैं जैसे आर डी बर्मन कैसे अपने पिता से अलग हैं और कैसे गुलज़ार की उनसे इतनी छनती रही। साथ ही इस किताब में जगजीत सिंह, भूपेन्द्र और विशाल भारद्वाज के साथ के क़िस्से भी उतने ही रोचक हैं। हेमन्त कुमार और बिमल दा का अभिभावक वाला रूप, एन सी सिप्पी, तपन सिन्हा, बिमल रॉय और ऋषिकेश मुखर्जी जैसी शख़्सियत का शुरुआती साथ `अपने पराये’ जैसी फ़िल्म बनाने में उनका संबल बनना, यह सब यहाँ क्रमशः मिलेगा। 

    यतीन्द्र गुलज़ार के एक-एक फ़िल्म की तहें खोलते हैं, चाहे गुड्डी हो, परिचय हो, किताब हो, आँधी हो या मौसम। हर क़िस्से की तह तक जाते हैं और उसके रोचक तथ्य को अपनी चुटीली भाषा से और भी रोचक बनाते हैं। इन किस्सों में सीखने वाली कई घटनाएँ हैं, मसलन – पान छोड़ने की घटना, संजीव कुमार यानी हरी भाई के कहने पर। गैलीलियो के साथ हुआ अन्याय और चर्च के ग़लत रवैये का ज़िक्र लेखक यहाँ गुलज़ार की संजीदगी के साथ संवेदनशीलता में विविधता को दर्शाने के लिए एक बहुत सुंदर सार्थक उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत करते हैं। पोप को ख़त लिखना और तत्कालीन माफ़ी को हासिल करना कितनी ख़ुशी की बात रही होगी।

    `आनंद’ और `मिली’ दोनों संजीदा फ़िल्मों में ऋषिकेश मुखर्जी के साथ गुलज़ार का होना, इन फ़िल्मों को अलग ट्रीटमेंट देने में सहायक साबित हुआ।

    उनकी कविता का सबसे भरोसेमंद प्रतीक, चाँद पर भी यतीन्द्र की नज़र बराबर गई और उनके नज़्मों में चाँद की मौजूदगी के विभिन्न आयाम पर बहुत ठहर कर बात रखी गई इस किताब में। इसी तरह आँखों पर नयन ठहरा कर बात रखी गई है। आर डी बर्मन और संजीव कुमार की अहमियत गुलज़ार की ज़िंदगी में कितनी ज़्यादा है, यह किताब पढ़कर पता चलता है। उसी तरह आशा भोंसले का पार्श्व गायन की अलग रोशनी कैसे मिलती है गुलज़ार की फ़िल्मों में, जो गुलज़ार की फ़िल्मों में नये आयाम तलाशती नज़र आती है। फ़िल्म `आँधी’ से जुड़ी कई बातें, इमरजेंसी और फ़िल्म बैन करने की बातें, राजनीति और रिश्तों के साथ सिद्धांतों की लड़ाई की बातें सब इस किताब ने समेटा है और यूँ समेटा है जैसे समय के उस टुकड़े को बिलकुल उसी तरह रख दिया गया हो।

    नसीरुद्दीन शाह और ग़ालिब फ़िल्म, जो बाद में धारावाहिक बनी, से जुड़ी बातें गुलज़ार से ज़्यादा नसीर की तबियत का पता देती हैं। युवा नसीर कैसे गुलज़ार को ख़त लिखता है और किस बेहतरीन अन्दाज़ में, जिसमें झूठ का फ़िकरा भी पेबंद है, इस किताब का हासिल है। प्रकाश झा की चर्चित फ़िल्म ‘हिप हिप हुर्रे’ के साथ जुड़ी बातें भी बहुत सलीक़े से रखी गई हैं। कैसे गुलज़ार जुड़े इस फ़िल्म से और इस फ़िल्म को इस मुक़ाम तक पहुँचाने में कैसे मदद की। कनु रॉय एक वेल्डर से संगीतकार कैसे बनें और फिर कैसे टैलेंटेड होने के बावजूद सफल नहीं हो सके, फ़िल्म इंडस्ट्री की अलग हक़ीक़त को बयाँ करती है, जिसे गुलज़ार साक्षात्कार के दौरान ठीक से समझाते हैं।

    लेखक ने गुलज़ार के निर्देशकीय पहलू को गीतकार या पटकथा के आगे रखा है, जबकि साधारण जन मानस के दिल में गुलज़ार एक गीतकार की तरह ज़्यादा मात्रा में मौजूद हैं। उस किताब को पढ़ने के बाद पाठक उनके और भी पहलुओं से बराबर वाक़िफ़ हो जाएँगे। बालगीतों पर यहाँ समुचित प्रकाश डाला गया है और इसी के बहाने मकड़ी, मासूम और मोगली जैसी फ़िल्मों और उनके गीतों को याद किया गया है। गीत के बोलों पर गुलतराशी करने वाले गीतकार से बीच में जब लेखक रुक-रुक कर संजीदगी भरे प्रश्न करता है, तो यह सिने जीवन चर्चा बन और  गंभीर हो उठता है। मसलन एक जगह गीतों में गुम भारत की बात पर गुलज़ार का यह कहना “मियाँ, आपको गीतों में भारत कैसे दिखेगा? जब फ़िल्मों में ही हिंदुस्तान नज़र नहीं आता, तो हिन्दुस्तानियत कैसे दिखेगी गानों में” यह बात बड़ी साफ़गोई से समझ आएगी। इन सब बातों से इतर फ़िल्म `मीरा’ से जुड़ी सारी बातें, बेहद रोचक और शायद कई लोगों के कई राज़ से मरहूम भी हों, जो इस फ़िल्म से जुड़ी हैं। लता मंगेशकर का गाना गाने से इनकार, संगीतकार लक्ष्मीप्यारे का फ़िल्म से हटना और रविशंकर का संगीतकार के रूप में पदार्पण, वाणी जयराम की आवाज़ के साथ जुड़ना और इस तरह की कई रोचक घटनाएँ इस किताब की विशेष उपलब्धि है। ऐसा ही `लेकिन’ फ़िल्म के बनने की कहानी पढ़ते हुए लगा और मन से निकला शुक्रिया यतीन्द्र ! इस किताब को लिखने के लिये। 

    यह भी एक रोचक तथ्य है कि गुलज़ार के कई स्क्रिप्ट के पीछे बंगाल के कहानीकार की कहानियाँ रहीं । नमकीन,सुबोध घोष की कहानी पर, इज़ाजत, ख़ुशबू इत्यादि सब बंगाल की छाया से निकली कहानियाँ हैं ।

    गुलज़ार के हास्य रंग पर भी पैनी नज़र रखी यतीन्द्र ने जब अंगूर, बावर्ची, चुपके-चुपके और खूबसूरत की बात करते हैं, तब इस रस में उनकी महारत का नज़ारा आपको देखने को मिलता है। 

    इस किताब और मेघना गुलज़ार के मार्फ़त एक ऐसी बात सामने आती है, जिस ओर सामान्यतः नज़र नहीं जाती, वह है गुलज़ार की फ़िल्मों में घर का टूटा-फूटा स्वरूप रिश्तों का टूटना इत्यादि। सीधे-सीधे अपनी ज़िंदगी को शायद वहाँ दर्ज करने की लेखकीय कोशिश भर है यह, जो राखी के बारे में गुलज़ार के शब्दों का ही प्रतिरूप-सा प्रतीत मालूम होता है। मसलन – मेरे अपने , ख़ुशबू , आँधी, किनारा या नमकीन सब में घर बिखरा पड़ा है।

    संजीदा फ़िल्म इजाज़त और लिबास को उसी संजीदगी से दर्ज किया गया है यहाँ। इन फ़िल्मों के गीत, जो आज भी विशेष हैं, हम सब के लिये उनकी असाधारण पंक्तियों को यहाँ बड़े जतन से रखा गया है, जिसे पढ़ते समय अजब सा नॉस्टलज़िया उभरता है। एक कुशल चितेरा कैसे- कैसे रंग भरता है, वो इस किताब के मार्फ़त थोड़ा बेहतर जान पाते हैं हम।

    गुलज़ार ने अपने बचपन के कनॉट प्लेस को जिस तरह याद किया है, वो हमारे लिए भी एक नयी खिड़की खोलती है। बचपन की ख़रांशों को भी याद किया है उसी शिद्दत से, पिता का दिल्ली आना, दीना स्टेशन, विभाजन की वीभत्सता सब का ज़िक्र, पढ़ने वाले को भावुक करता चला जाएगा। कुछ पंक्तियाँ हैं, जहाँ आपका मन रुकने को कहेगा थोड़ी देर, जिसे उदाहरण स्वरूप यहाँ लिख रहा हूँ :

    “ज़िंदगी में गुरु एक नहीं होता, कई उस्ताद होते हैं।”

    “ मुझे कई दफ़ा अन्तरिक्ष का काम शायर की तरह का लगता है।” 

    “ गाना कुछ ऐसे ही चलना चाहिए, कोहनियों के बल”

    “ मैं समय से बहुत पहले बुजुर्ग हो गया”

    नये गीतकार जैसे – प्रसून जोशी, इरशाद कामिल, अमिताभ भट्टाचार्य का ज़िक्र जिस तरह गुलज़ार ने किया, वह उनके खुले दिल और सूफ़ियाना मिज़ाज को भी दर्शाता है। 

    साक्षात्कार वाले अंश में यतीन्द्र की पकड़ संगीत व राग की जानकारियों पर कितनी कसी सधी हुई प्रतीत होती है, जो थोड़े आश्चर्य में आपको डाल सकती है। सवाल जवाब और फिर उसके उत्तर में किसी राग का संदर्भ बारंबार देना इस क्षेत्र में उनकी योग्यता सिद्ध करता है। गुलज़ार भी जवाब देते हुए कई बार यतीन्द्र की जानकारियों के मुरीद होते प्रतीत होते हैं। न सिर्फ़ संगीत बल्कि दर्शन की समझ, कबीर बुल्लेशाह, अमीर ख़ुसरो सब की बातें करते हुए वो पूरे अधिकार के साथ संवाद करते नज़र आते हैं, जिसका उत्तर गुलज़ार की जानकारियों का विस्तार लेकर आपके सामने आता है। ये हिस्सा कमाल का है, जब इन कवियों और सूफ़ियों के बारे में गुफ़्तगू हो रही होती है दोनों में तो एक अलौकिक सा माहौल छा जाता है । 

    अंततः यही कहूँगा कि यह किताब न सिर्फ़ गुलज़ार के सिनेमाई सफ़र के साथ गुलज़ार को समझने में मदद करती है अपितु यतीन्द्र के व्यक्तित्व में भी झाँकने के कई सुनहरे मौक़े देती है। एक अच्छी किताब के लिए यतीन्द्र मिश्र को बधाई।

    पुस्तक वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है।

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