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लथपथ सहानुभूति का प्रतिपक्ष:  रवीन्द्र कालिया की कहानियाँ

अभी हाल में ही अपने यादगार विशेषांकों के लिए जानी जाने वाली पत्रिका ‘बनास जन’ का नया अंक आया है प्रसिद्ध लेखक-सम्पादक रवीन्द्र कालिया पर। इस अंक में कालिया जी की कहानियों पर दुर्लभ लेखक हिमांशु पण्ड्या एक पठनीय लेख आया है। आपकी नज़र है- मॉडरेटर

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‘चाल’ कहानी में किरण, प्रकाश से कहती है, “तुम भी दूसरे गुणवंतराय हो. तुममें और पाल में कोई विशेष अंतर नहीं है. हमेशा स्त्री पर हावी रहना चाहते हो. तुम चाहते हो, वह रोती रहे और तुम आंसू पोंछकर बड़प्पन दिखाते रहो. तुम अपने को मन में कितना भी उदार समझो, स्त्री के बारे में तुम्हारे विचार सदियों पुराने हैं. तुम चाहते हो, वह बिना किसी प्रतिरोध के तुम्हारे इस्तेमाल में आती रहे. यही समझते हो न ?”

यह संवाद रवीन्द्र कालिया की दो अन्य महत्त्वपूर्ण कहानियों को समझने की चाबी प्रदान करता है. ये वे दो महत्त्वपूर्ण कहानियां हैं जो आलोचकीय दुर्घटना का सबसे ज्यादा शिकार हुई हैं. ये हैं – ‘नौ साल छोटी पत्नी’ और ‘डरी हुई औरत’. दोनों ही कहानियों का गलत और भ्रामक पठन चूंकि बरसों में ऐतिहासिक अकाट्य सत्य बन गया है इसलिए उसके सुधार के लिए लम्बे प्रत्याख्यान की आवश्यकता होगी.

प्रसिद्द आलोचक विजयमोहन सिंह ने यह स्थापना दी कि ‘नौ साल छोटी पत्नी’ सन साठ के बाद की कहानी का पहला प्रस्थान बिंदु है. ( इस स्थापना से कोई ऐतराज़ नहीं है, ऐतराज़ उसके कारण से है.) इसका नायक पत्नी के प्रेम पत्रों को पुरलुत्फ़ अंदाज़ में ग्रहण करता है, ईर्ष्यादग्ध होकर हाहाकार नहीं करता. ( ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ की भूमिका में रवीन्द्र कालिया द्वारा उद्धृत ) रक़ीब के ख़तों को मज़े लेकर पढ़ते नायक की यह छवि अब सामान्य पाठकीय भावबोध का हिस्सा बन गयी है. रवीन्द्र कालिया यानी ‘नौ साल छोटी पत्नी’, ‘नौ साल छोटी पत्नी’ यानी रक़ीब का मतलब बुआ का लड़का – यह इतनी बार दोहराया गया है कि कि इस कहानी का मतलब नए भावबोध वाले नायक का हिन्दी कहानी के पटल पर आगमन ही बन गया.

नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए रवीन्द्र कालिया की संकलित कहानियों की भूमिका में विजयमोहन सिंह लिखते हैं, ” ‘नौ साल छोटी पत्नी’ और ‘एक डरी हुई औरत’ लगभग एक ही जमीन पर लिखी गयी कहानियां हैं. जिनमें पति-पत्नी और प्रेमी के पुराने त्रिकोण से बाहर निकलकर उसे एक नए कोण से देखा गया है : पुराने ‘त्रिकोण’ में जो ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिशोध की मानसिकता थी उसे ध्वस्त करती इस कहानी में ‘नए मनुष्य’ की नई संवेदना से निर्मित मानसिकता को व्यक्त किया गया है. कहानी में जब पति को पता चलता है कि उसकी नवविवाहिता पत्नी का कोई पूर्व प्रेमी ( जो कि स्वाभाविक है) भी था तो वह कोई हायतौबा नहीं मचाता बल्कि उसे सी स्वाभाविकता के साथ ग्रहण करता है जिसके अंतर्गत संबंधों में विकास और परिवर्तन होता है.”

इस सम्पूर्ण व्याख्या से विनम्र किन्तु ठोस असहमति है. विजयमोहन सिंह नायकीय आभामंडल की घटाटोप में हैं और उसके उदार-परिपक्व दृष्टिकोण पर लहालोट हैं. वे इसे ‘नए मनुष्य की नई संवेदना’ करार दे रहे हैं. जाहिर है, यहाँ मनुष्य से उनका अर्थ पुरुष से ही है. फ्रांस की राज्यक्रान्ति को सवा दो सौ साल बीतने के बाद भी मनुष्य का अर्थ पुरुष ही होता है, क्या कीजिये.

तो पहली असहमति तो यह है कि ये दोनों ही कहानियाँ पुरुष नहीं स्त्री के बारे में हैं. पहली गवाही लेखक की की ही है, इन कहानियों के शीर्षक के रूप में – ‘नौ साल छोटी पत्नी‘ और ‘डरी हुई औरत‘.

पहली कहानी पर चलते हैं. लेखक ने पूरे घटनाक्रम को इस तरह रचा है कि पाठक समझे कि कुशल ‘कल से ही सोम की चर्चा में आनंद ले रहा’ है. सोम यानी तृप्ता का पूर्व प्रेमी जो पिछले दिन उनके यहाँ आकर गया है. कहानी इसके अगली दोपहर की है जब कुशल नौकरी से अचानक घर लौटा है, दबे पाँव घुसा है और तृप्ता ने उसे देखते ही कागजों का पुलिंदा ट्रंक में छुपा दिया है. कुशल जानता है कि छुपाये गए कागज़ तृप्ता और सोम के एक दूसरे को लिखे ख़त हैं. कुशल पहले ही ट्रंक की खोजबीन के दौरान उन्हें पढ़ चुका है.

अब कुशल इस पूरी परिस्थिति का एक कुशल खिलाड़ी की तरह आनंद लेता है. एक कुशल पतंगबाज़ की तरह वह पेंच लड़ाते हुए ढील देता रहता है. वह तृप्ता को टोककर – “पैर क्यों हिला रही हो ?” उसकी असहजता पर ध्यानाकर्षण भी करता है और तृप्ता के विषय बदलने पर ‘बेवकूफ़ बनने’ का मज़ा भी लेता है. जब तृप्ता पड़ौस की हमउम्र लड़की सुब्बी की बुराई करती है कि ‘वह देखने में कितनी भोली लगती है पर मुई के पास लड़कों के ख़त आते हैं.’ तो वह मुस्कुराते हुए टिप्पणी करता है, “देखने में तो तुम भी बहुत भोली लगती हो.” हालांकि जब तृप्ता के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगती हैं तो वह फिर बात संभाल भी लेता है. सुब्बी प्रसंग कुछ यों आता है :

‘अगर सुब्बी ऐसी लडकी है, तो तुम उसके साथ सम्बन्ध क्यों रखे हो?’

‘मैं तो उसे समझाती रहती हूँ.’

‘क्या समझाती रहती हो?’ कुशल के गाल पर एक कट आ गया. ( बल मेरा)

‘यही कि दर्शन ख़त लिखता है तो वह जवाब क्यों देती है?’

कुशल ने तौलिये से गाल साफ़ किया. दूसरे ही क्षण खून का एक और कतरा चमकने लगा. तृप्ता भागकर डेटाल ले आयी. रुई से उसके गाल पर लगाते हुए बोली, ‘मैंने उसे यह समझाया भी है कि वह दर्शन से कहे कि जब तक वह उसके पिछले ख़त नहीं लौटाएगा, वह उससे बात नहीं करेगी.’

कुशल ने कहकहा लगाया और बोला, ‘तुम जरूर उसे फंसाओगी.’

‘फंसाऊंगी कैसे?’

‘उस से न तो ख़तों को नष्ट करते ही बनेगा और संभाल कर रखेगी तो किसी वक्त भी राज़ खुल सकता है.’ कुशल ने कहा.

इस तरह कुशल, तृप्ता को अहसास करा देता है कि उसका नन्हा सा रहस्य दरअसल उसकी मुट्ठी में आ चुका है और यह कुशल है जो नादान तृप्ता के ‘कीप द सीक्रेट’ गेम को ‘तू डाल डाल, मैं पात पात’ शैली में मजे लेकर खेल रहा है. अच्छा, कहानी का सबसे चर्चित रक़ीब प्रसंग देखें :

‘सोम तुम्हारा क्या लगता है?’

‘बुआ का लड़का है. आपको कई बार तो बताया है.’ उसने चिढ़कर कहा.

‘मैं हर बार भूल जाता हूँ.’ कुशल ने हँसते हुए कहा, ‘तुम्हारे ब्याह में सबसे अलग-थलग खड़ा जिस ढंग से रो रहा था, उससे तो मैंने अनुमान लगाया था कि जरूर मेरा रक़ीब होगा.’

‘रक़ीब के मानी क्या होता है?’ तृप्ता ने तुरंत पूछा.

‘अरबी में बुआ के लड़के को रक़ीब कहते हैं.’ कुशल ने कहा और कंधे पर तौलिया रख कर बाथरूम चला गया.

दरअसल कुशल अपने अंतरतम की गहराइयों में अत्यंत ईर्ष्यालु है. इस अंतरतम में झाँकने का कहानी में एक मौका हमें रवींद्र कालिया ने दिया है. यहाँ : जब सोम आया था तो कुशल एक पत्र टाइप कर रहा था, जब वह चला गया, वह फिर टाइपराइटर पर झुक गया और टाइप करने लगा : सोम डरपोक था कि तृप्ता डरपोक थी, नहीं सयानी. सोम डरपोक था, सोम डरपोक है, सोम डरपोक रहेगा. तृप्ता डरपोक थी, तृप्ता डरपोक…

यह प्रसंग, बीच दोपहर में अचानक लौटना, दबे पाँव घुसना ये सब क्या है ? कुशल इस कहानी का नायक नहीं प्रतिनायक है. चूंकि उसने आधुनिकता का लबादा ओढ़ रखा है इसलिए उसे अपनी क्रूरता के प्रस्फुटन के वैकल्पिक अभिजात मार्ग ज्ञात हैं. सन साठ में गूगल भले न था पर शब्दकोष था और एक ख़ास शब्द का अर्थ जानने के लये आतुर पढी लिखी लडकी के लिए उस तक पहुँचना कुछ घंटों की नहीं तो कुछ दिन की ही बात थी. कल या परसों तक तृप्ता ‘रक़ीब’ के मानी जान ही लेगी.

या शायद जान ही लिया है.

यह कहानी इसी तृप्ता के बारे में है जो ‘रक़ीब’ के मानी भले न जानती हो लेकिन यह जानती है कि उसका अर्थ वह नहीं है जो कुशल ने बताया है. बेहतर हो, हम तृप्ता के बारे में बात करने के पहले दूसरी कहानी ‘डरी हुई औरत’ की मुख्य पात्र तुलना को भी यहाँ ले आयें. बेशक, ‘डरी हुई औरत’ का नायक गौतम, कुशल की तरह ईर्ष्यालु नहीं है. बहुत संक्षेप में, कहानी तुलना के एक इतवार के दिन, गौतम के दोस्त खुशवंत के साथ अकेले घूमने जाने के बारे में है. हालांकि, गौतम के मन में इसे लेकर कोई अंतर्द्वंद्व नहीं है बल्कि उसी ने तुलना को जाने के लिए लगभग धकेला है. इसके बावजूद, यह लेखक की सूक्ष्म अवलोकन क्षमता है कि हम देखते हैं कि दैनंदिन की एक  सामान्य घटना भारतीय मध्यवर्गीय दाम्पत्य में एक पत्नी के लिए बहुत ही असहज कर देने वाला लगभग आपराधिक कृत्य बन जाती है.

इन रेखांकित किये जाने योग्य हिस्सों पर बात करते समय मेरा अनुरोध रहेगा कि आप कल्पना करें कि इस जोड़े की जगह घूमने जाने वाला जोड़ा गौतम और उसके किसी पुरुष मित्र या गौतम और उसकी किसी महिला मित्र या तुलना और उसकी किसी महिला मित्र का होता तो दृश्य कैसा होता. जब तुलना पूछती है कि क्या गौतम को उसका गुणवंत के साथ अकेले जाना अच्छा लगेगा तो गौतम कहता है, “तुम कमला-बिमला जैसी बातें क्यों कर रही हो. जरा सोचो, तुम्हें अकेला देखकर खुशवंत कितना खुश होगा.” तुलना चिढती भी है और उसे अच्छा भी लगता है.यहाँ तक एक स्वाभाविक सी चुहल है. फिर साड़ी के चुनाव के समय यह असहजता बढनी शुरू होती है जो लौट के आने के बाद चरम पर होती है. तुलना एक कोने में दुबकी खड़ी है, वह अपने ही घर में अजनबी महसूस कर रही है, ( खुशवंत की शिकायत करते हुए ) उसे अपने ही घर में बैठकर दूसरे की शिकायत करना विचित्र लग रहा है, गौतम उसके लिए निर्मल ( नौकर ) को चाय लाने को ऐसे कह रहा है जैसे वह मेहमान हो. और फिर, खुशवंत बताता है कि बाहर भी उसका मन रोने को होता रहा.

‘नौ साल छोटी पत्नी’ की तृप्ता का विकास ही ‘डरी हुई औरत’ की तुलना है. वे दोनों दो ऐसे कृत्यों के लिए शर्मसार हैं जो जो एक मामले में दिनचर्या और दूसरे मामले में स्वाभाविक सा तथ्य है. यही दोनों कृत्य यदि उनके पतियों के होते तो यह हल्के परिहास और किंचित अभिमान का विषय होते. इसका एक सरल सा पाठ्यपुस्तकीय जवाब तो यह है कि यह व्यवस्था है जिसने स्त्रियों को अपनी आकांक्षाओं के लिए भी ग्लानिभाव में जीना सिखाकर उन्हें मनुष्यत्त्व से एक दर्जा नीचे स्थिर किया है. लेकिन पाठ्यपुस्तकीय जवाब एक समीकरण की ओर ले जाते हैं मानो यह निष्पादित करने के लिए लेखक ने कहानी लिखी थी जिसे ढूंढ निकलना आलोचक नामक जीव का काम है. यह व्यवस्था जिसे हम पितृसत्ता के नाम से जानते हैं, हवा में निर्मित नहीं होती है. कुशल कथा के उत्तरार्ध में कल्पित प्रेमिका का पुराना किस्सा सुनाता है. ‘कल्पित’ यह विशेषण लेखक ने स्वयं दिया है. यदि हम कुशल को संदेह का लाभ देना चाहें तो कह सकते हैं कि वह एक प्रेमिका की छबि गढ़कर तृप्ता को यह अहसास करा रहा है कि विवाह पूर्व कोई प्रेम प्रसंग होना एक सामान्य सी बात है, हव्वा नहीं. किन्तु पूरी रचना का क्रम संयोजन, जो मैंने पहले विश्लेषित किया, उसे देखते हुए यह संभावना ज्यादा लगती है कि लेखक यह रेखांकित करना चाहते हैं कि कुशल की एक अनकही पीढ़ा या अदृश्य कुंठा यह है कि उसके पास कोई कहानी नहीं है. तृप्ता का मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट अचानक हाथ में आ जाने पर कुशल को ऐसा लगा था जैसे उससे अनजाने में चूहा जिबह हो गया हो. ( यहीं से कहानी का शीर्षक निकला है ) मैं कहना चाहता हूँ कि कुशल वह पुरुष है जिसके लिए आलोक धन्वा ने लिखा था :

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी?

क्या तुम्हारी रातों में
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं?

क्या तुम्हें दाम्पत्य दे दिया गया?
क्या तुम उसे उठा लाए
अपनी हैसियत अपनी ताकत से?
तुम उठा लाए एक ही बार में
एक स्त्री की तमाम रातें
उसके निधन के बाद की भी रातें !

हालांकि दूसरी कहानी में ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता कि गौतम-तुलना का दाम्पत्य चयनित है या प्रदत्त और उनका दाम्पत्य काफी हद तक समकक्षता पर टिका लगता है किन्तु यही विडम्बना है कि उसके बावजूद तुलना और तृप्ता की नियति एक जैसी ही है. मूल दिक्कत दाम्पत्य की उस ठस संरचना से है जिसमें आते ही पति-पत्नी अपनी प्रदत्त सामाजिक भूमिका में बंध जाते हैं, उसे लांघकर सहचर नहीं बन पाते. यही रवीन्द्र कालिया की सफलता है कि वे उस प्रक्रिया को हमारे सामने रख देते हैं जिसमें स्वाभाविक ही यह ग्लानिभाव तृप्ता-तुलना का संस्कार बन जाता है. जैसा कि मैंने पहले लिखा – कहानी की सफलता इसमें नहीं है कि वह क्या दिखाती है, इसमें है कि वह कैसे दिखाती है.

मैंने इस भाग के प्रारंभ में दो कहानियों के साथ हुई आलोचकीय दुर्घटना के प्रत्याख्यान का प्रस्ताव रखा था, वह बात अभी आधी ही सिद्ध हुई है. शेष आधी हेतु पुनः साठोत्तरी कहानी के सबसे बड़े आलोचक श्री विजयमोहन सिंह की ये विवेचना पढ़ें, “क्या यह केवल एक ‘डरी हुई औरत’ की कहानी है? पत्नी डरी हुई है क्योंकि उसके मन में एक अपराधबोध है कि वह पराये मर्द के साथ दिन भर अकेली रही! वह डरी हुई इसलिए भी है कि वह पति के लिए ‘सिगार’ लाना भूल गयी! यहाँ ध्यान देने की बात ये है कि ‘नौ साल छोटी पत्नी’ की पत्नी भी डरी हुई है- उसके मन में भी अपराधबोध है. किन्तु दोनों कहानियों में ‘पतियों’ की मानसिकता पत्नियों से बिलकुल अलग है. वे खुले दिल और वयस्क भावबोध वाले हैं. उनके मन में परपुरुष को लेकर कोई ईर्ष्या-द्वेष या डर-भय नहीं है.”

विजयमोहन सिंह स्त्री के डर और पुरुष के अकुंठ स्वभाव को ( जो कि नहीं है! ) इस तरह पेश कर रहे हैं जैसे यह स्त्री की अक्षमता और पुरुष की उपलब्धि हो. यह कुछ ऐसे है जैसे उपनिवेशवाद के बारे में स्थापना दी जाए कि अँगरेज़ तो भरसक दयालु और सभ्य थे किन्तु भारतीय थे जो इस गुलामी के जुए को उतार नहीं पा रहे थे.

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चाल’ कहानी से रवीन्द्र कालिया की रचना प्रक्रिया को समझने के दिलचस्प सूत्र मिलते हैं. कहानी शनिवार की शाम को एक मैदान के चित्रण से शुरू होती है. भिखारियों, जुआरियों, लूलों-लंगड़ों का मैदान, यहाँ तक कि लेखक उस मैदान के पात्रों से भी परिचय करवाता है. मैदान का दादा द्रैगो और उसकी प्रेमिका मारिया. आपको लगता है कि यह कहानी तलछट की कोरस सरीखे हाशिये के पात्रों से आपका परिचय करवायेगी, तभी कहानी मैदान के समानांतर बसी चाल के एक डेढ़ कमरे के मकान तक जाती है और सूखी हुई मछली की गंध से हडबडाया हमारा नायक प्रकाश मैदान की ओर खुलती हुई खिड़की बंद कर देता है. यदि सिनेमाई फ्रेम की भाषा में बात करें तो मैदान की ज़िंदगी को फुर्सत से दिखा रहा कैमरा धीरे धीरे ज़ूम आउट करता हुआ खिड़की तक आता है और खिड़की बंद होती है, कैमरे का फोकस बदल जाता है.

इस तरह रवीन्द्र कालिया मूल कथा के चारों ओर के परिवेश को बहुत फुर्सत और विस्तार से दिखाते हैं. कथा रचना की सामान्य चेखव मार्का सलाह के विपरीत यह पृष्ठभूमि कई बार अप्रासंगिक सी ( प्रतीत ) होती है ( पर होती नहीं है ). रवीन्द्र कालिया जानते हैं कि पृष्ठभूमि के धूसर रंगों के चित्रांकन से मूल दृश्य के स्याह रंग का विपर्यय और उभरता है. कभी कभी यह विपर्यय दिखाने के लिए वे किसी अभिजात परिवेश की भी प्रस्तुति करते हैं, जैसे ‘कोजी कार्नर’ और कभी कभी तो इस पृष्ठभूमि को पढ़ रहा पाठक मूल कथा का इंतज़ार ही करता रह जाता है और तब उसे समझ आता है कि यही कोलाज़ दिखाना ही लेखक का अभीष्ट था, जैसे ‘ ब…बेशर्मी’.

‘चाल’ कहानी में इस विपर्यय को और गाढ़ा करने के लिए कथा के उत्तर भाग में एक उच्चमध्य वर्गीय मित्र – जो अपनी वर्गीय आकांक्षा में तीव्र ऊर्ध्वगामी है और इसलिए अभिजात नफासत से लकदक है – का भी आगमन होता है और सूखी मछली की गंध से शुरू हुई कथा कबाब, रशियन सैलाड, किंग्स ब्लैंड व्हिस्की और सैटरडे मिडनाईट पिकनिक के प्रस्ताव तक आ जाती है.

उच्च वर्गीय आकांक्षाओं और निम्नवर्गीय अभिशप्तताओं के बीच झूलते हुए इस निम्नमध्यवर्गीय नायक के बारे में पहला और अंतिम प्रामाणिक तथ्य यह है कि वह पढ़ा लिखा बेकार है. इस पढ़े लिखे बेकार युवक पर रवीन्द्र कालिया ने अनेक कहानियां लिखी हैं और इस तथ्य को पहला के साथ साथ अंतिम लिखने का कारण यह है कि इस युवक के सम्पूर्ण आचरण, प्रतिक्रियाओं, सिनिकल हास्यबोध और आक्रोश-नैराश्य के ज्वार-भाटा के पीछे एकमात्र नियामक तथ्य उसका पढ़ा लिखा बेकार होना ही है.

इसी बेकार युवक के बारे में लिखी गई एक और कहानी का ज़िक्र करूंगा – ‘एक और दिन’।

‘सिर्फ एक दिन’ में बेरोजगारी की चोट अवमानना के सूक्ष्मतम और क्रूरतम रूप में सामने आती है, जिसे रवीन्द्र कालिया की पारखी नज़र ही देख सकती थी। अवमानना का सूक्ष्मतम और क्रूरतम रूप ये है कि आप अपने प्रेम के आलंबन के सामने क्षुद्र साबित हो जाएँ। नायक के साथ यही होता है जब उस लड़की के सामने निरस्त्र और परास्त होना सार्वजनिक हो जाता है जो किसी जमाने में उसकी चाहत का केंद्र बिन्दु थी। ( यह स्पष्ट नहीं है कि यह प्रेम दोतरफा था या नहीं किन्तु नायक के लिए वह एक अलभ्य आकांक्षा जरूर थी। ) यह आपके व्यक्तित्त्व के किसी कोमल हिस्से का चकनाचूर हो जाना होता है, जिसकी आवाज़ भी नहीं होती।

रवीन्द्र कालिया की खासियत ये है कि वे यह पूरा प्रकरण भावुकता को स्पर्श भी किए बिना प्रस्तुत कर देते हैं। सरोज से अनायास रेस्तरां में मुलाक़ात होने पर नायक ( महेंद्र ) उससे बचने की असफल कोशिश करता है। सामान्य अभिवादन के बाद लौटने के तमाम बहाने काम नहीं आते और उसे और गुलाटी को सरोज और उसके भाई के साथ टेबल पर बैठना पड़ता है। सरोज अंबाला में लेक्चरर हो चुकी है और इसकी वजह थी उसके पापा का मैनेजिंग कमेटी पर होल्ड, यह बात भी वह सरलता से बता देती है। जब वह अपनी पहुँच की यह बात बता रही है, तब नायक की जेब से एप्लिकेशन फॉर्म झांक रहे हैं जिन्हें वह बड़ी सफाई से छुपा देता है और शुक्र मनाता है कि वह पोस्टल ऑर्डर खरीदकर नहीं लाया था। जाहिर है , तब उसकी तमाम विवशताएँ टेबल पर खुली रखी होतीं। एक संवाद बहुत दिलचस्प है :

‘आप किधर हैं आजकल, यहीं ?’

‘हाँ, यहीं।‘ मुझे वे प्रश्न बेहद प्रिय हैं जिनके अस्पष्ट उत्तर आसानी से दिये जा सकते हैं।

यह ‘किधर’ जगह के बारे में नहीं था, यह नायक की सामाजिक हैसियत के बारे में सवाल था और चूंकि इस सवाल का नायक के पास कोई जवाब है नहीं इसलिए इस प्रश्न की अस्पष्टता का लाभ उठाते हुए उसने मूल सवाल को उड़ा दिया। इस पूरे वार्तालाप में ध्यान देने वाली बात ये है कि सरोज बारबार नौकरी, कौंपीटीशन आदि की बात कर रही है और बलराज बार बार बातचीत को कॉफी पर लौटा लाता है। ऐसा नहीं कि ये बातें करके सरोज, बलराज को कमतर साबित करना चाह रही है। लेखक के शब्दों में वह ‘सहानुभूति से लथपथ’ है और शायद यही बात नायक के लिए सबसे तकलीफदेह है। मानो यह काफी नहीं था, इस विडम्बना को द्विगुणित कराते हुए, रेस्तरां का वेटर आकर नायक से चिरौरी करने लगता है कि वह उसके भाई को छोटा मोटा काम दिलवा दे। अंत में, बिल आता है, नायक अपने गुरूर और यथार्थ के बीच झूलता रह जाता है। नायिका बिल चुका देती है और नायक जेब में एप्लिकेशन फॉर्म टटोलता रहता है।

लेकिन यह क्लाइमेक्स नहीं है। कहानी नायक के इस संवाद पर खत्म होती है, “शट अप नाऊ। हम कॉफी फिर से पीएंगे।“

रवीन्द्र कालिया जानते हैं कि कहानी को सहानुभूति उत्पादक मोड़ पर खत्म करना उसके मूल उद्देश्य की भ्रूण हत्या होगा। महेंद्र सहानुभूति में लथपथ मीठी कॉफी के बाद अब यथार्थवादी कड़वी कॉफी पीना चाहता है। ( यह तुलना भी मेरी नहीं है, सावधान पाठक इसे कहानी में ढूंढ सकते हैं। ) कोई आश्चर्य नहीं है कि बेरोजगारी पर लिखी गई चर्चित कहानी ‘दोपहर का भोजन’ में सभी पात्र घर से बाहर रहने के बहाने ढूंढते थे लेकिन ‘सिर्फ एक दिन’ का नायक अपने घर-अपने कमरे-अपनी खटिया यानि अपने दड़बे में ही सिमटा रहना छटा है । ( और मानो रवीन्द्र कालिया ये बात जानते थे कि 2018 में हर बेरोजगार प्रश्नाकुल नौजवान को ‘सीमा पर मर रहे जवान’ का ताना दिया जाएगा, वे कहानी में विडम्बना को कई गुना बढ़ा देते हैं ये तथ्य जोड़कर कि नायक का बड़ा भाई सेना में है और सीमा पर है। )

रवीन्द्र कालिया के तमाम बेरोजगार नौजवान नायक ‘सहानुभूति से लथपथ’ दुनिया से दूर भागते हैं और अपने जैसे बेरोजगार युवकों की संगति में आश्रय पाते हैं। असफलता ही वह सूत्र है जो उन्हें जोड़े हुए है. ‘हथकडी’ कहानी में इन असफल युवकों की दुनिया सबसे विश्वसनीय तरीके से चित्रित की गई है। इस दुनिया के कायदे इतने कठोर हैं कि सफलता का स्वाद चखने वाला युवक सबसे पहले अपनी सफलता पर लज्जित होता है और फिर परिणामस्वरूप चाहे न चाहे बिरादरी से बहिष्कृत हो जाता है। इन समूहों में सामूहिकता के मापदंड भी इतने कठोर और मध्यवर्गीय शुचिताबोध के लिए अपाच्य हैं कि वैयक्तिक शुचितावादी दृष्टि इन युवकों को आसानी से उच्छृंखल करार दे देगी। उदाहरण के लिए कहानी ‘पचास सौ पचपन’ में दो दोस्तों के ये दो तुर्की ब तुर्की संवाद किसी भले गृहस्थ के होश उड़ा सकते हैं :

‘पहले तुम्हें अपना टूथब्रश खरीदना चाहिए,’ प्रोफेसर बोला, ‘वह इतना गंदा हो चुका है कि मैं उससे अपने जूते भी साफ नहीं कर सकता।‘

‘शट अप!’ फ्रीलान्सर बोला, ‘ मुझे उस व्यक्ति से नफरत है जो अपनी प्रेमिका के खत एकांत में पढ़ता है।‘

ममता कालिया ने तद्भव में प्रकाशित संस्मरण ‘रवि कथा’ में इन पंक्तियों को रवीन्द्र कालिया की प्रिय पंक्तियाँ बताया है : बरबादियों का सोग मनाना फिजूल था/ बरबादियों का जश्न मनाता चला गया/ हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया। ‘बरबादियों का जश्न’ इसे हम इन कहानियों का केंद्रीय भाव कह सकते हैं।

“उदासी, अवसाद या विषाद दो मार्गों से निसृत होता है – आंसुओं की शक्ल में या छतफोड़ ठहाकों के रूप में। पहले रूप को हिन्दी में कई शब्दों से  पुकारा जाता है, जैसे गलदश्रु भावुकता या अश्रुविगलित भावुकता। अक्सर इसे बांग्ला भावबोध से जोड़कर देखा जाता है। हिन्दी गीति परंपरा में इसका जमकर दुरुपयोग हुआ है। बांग्ला उपन्यास या उस भावबोध की रचनाएँ पढ़कर आँसू पोंछते पोंछते श्रोताओं या पाठकों के आस्तीन गीले हो जाते थे। कहानी में इस प्रकार की भावुकता को थोड़ा परिष्कृत रूप में इस्तेमाल किया गया। सन तिरसठ में जब मैं परिमल के कथा सम्मेलन में भाग लेने के लिए मोहन राकेश और कमलेश्वर के साथ इलाहाबाद आया तो विजयदेव नारायण साही की इस अवधारणा से गहरा झटका लगा कि नीरज के गीतों और नए कथाकारों की  मूल संवेदना में अद्भुत साम्य है। नए कथाकारों ने इसका जमकर विरोध किया था और अपनी कहानियों में एक गहरा सामाजिक सरोकार प्रतिपादित किया था। मोहन राकेश ने नई कहानियों की सूक्ष्म सांकेतिकता और मानवीय सम्बन्धों की पहचान को रेखांकित किया था। समय समय पर नई कहानी के कथाकारों ने दावे तो बहुत किए लेकिन उनकी कहानियाँ निरंतर आत्मगत अनुभवों का सूक्ष्म बोरा बनकर रह गईं। एक विशेष प्रकार की रूमानियत से वे अंत तक मुक्त नहीं हो सके।“ ( ‘मैं मूरख खल कामी’, भूमिका, ‘रवीन्द्र कालिया की इक्कीस सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ’)

रवीन्द्र कालिया के इस लंबे उद्धरण से मैं दो सूत्र पकड़कर अपनी बात आगे बढ़ाऊंगा। पहली बात, रवीन्द्र कालिया और उनके साथी रचनाकारों की यानी साठोत्तरी कहानी  की भाषा और संरचना किस तरह नई कहानी से आगे की और परिपक्व शैली है और दूसरा, कैसे ये भावुकता निषेध एक सुचिन्तित राजनीतिक समझदारी है।

‘कहानी नई कहानी’ में डॉ. नामवर सिंह ने नई कहानी की सांगीतिकता को उसके गुण के रूप में रेखांकित किया था. कविता या संगीत की तरह कहानी को बार बार पढ़ा नहीं जा सकता – नदी की तरह उसे पार किया जा सकता है, झील की तरह उसे बार बार निहारा नहीं जा सकता. नामवर जी ने इसे ठीक ही रेखांकित किया कि नई कहानी इस अर्थ में कविता के निकट आयी कि उसमें प्रतीकों और बिम्बों के सहारे दृश्यात्मकता, सांकेतिकता और सांगीतिकता के ठहराव वाले तत्त्व शामिल हुए. कोई आश्चर्य नहीं कि ‘परिंदे’ संग्रह को उन्होंने हिन्दी की नई कहानी का प्रस्थान बिंदु माना।  लेकिन ऐसा करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से काव्यभाषा के रूप में कुछ बद्धमूल आग्रह और प्रकारांतर से कहानी को भी वायवीय बनाने वाले और उसकी भाषा से एक अपेक्षित तरलता के आग्रह साथ में चले आये।

पहली बात तो कविता के बारे में भी ये आग्रह गलत थे और इसका प्रत्याख्यान खुद डॉ. नामवर सिंह ने ही ‘कविता के नए’ प्रतिमान में ‘शुष्को वृक्षस्तिष्ठत्यग्रे’ बनाम ‘नीरस तरुरिह विलसति पुरतः’ की बहस के जरिये कर दिया था।  और दूसरी बात, इसने नई कहानी की भाषा को कुछ छायावादी कुहरिल शब्दावली की ओर धकेलने या उसे वरेण्य मानने की प्रवृत्ति को बढ़ाया।

साठोत्तरी कहानी ने इस भाषा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।  

रवीन्द्र कालिया के यहाँ प्रतीक हैं ही नहीं। वे भी परिवेश के चित्रण पर अतिरिक्त आग्रह रखते हैं लेकिन वह चित्रण न तो ‘परिंदे’ और ‘छोटे छोटे ताजमहल’ की तरह पानी पर झिलमिलाते चाँद की तरह का कोई नाज़ुक परिवेश गढ़ता है और न ‘आर्द्रा’ और ‘एक और ज़िंदगी’ की तरह उस परिवेश की प्रतीकात्मक व्याख्या की संभावनाएं पैदा करता है। रवीन्द्र कालिया की कहानियों का परिवेश अपनी पूरी अभिधात्मकता के साथ है और वह यथार्थ की प्रस्तुति के लिए किसी प्रतीक पर आश्रित भी नहीं है। प्रतीक ढूंढकर लेखक के लक्ष्य को अरहस्यीकृत करने का आदी आलोचक बहुत कोशिश करेगा तो ‘बोगनवेलिया’ कहानी में पौधे के मुरझाने को ग्रामीण युवक के विस्थापन के चलते अपनी जड़ों से कट जाने को ढूंढ लेगा जो कि उस कहानी में है ही नहीं। रघुवीर सहाय के शब्दों में कहा जाए तो, “प्रिय पाठक ये मेरे बच्चे हैं/ कोई प्रतीक नहीं/ और यह मैं हूँ/ कोई रूपक नहीं” ‘तफरीह’ कहानी जब मध्यवर्गीय दंपती द्वारा गृहस्थी के जंजाल से छीनी गई एक शाम की पूरी तस्वीर रखती है जिसमें ऊँघती, हाँफती, बार बार पेशाब जाती पत्नी और झींकता, झल्लाता, मुटाता पति उस खास बिलकुल निजी समय में भी गृहस्थी के जंजाल और चिंताओं में घिरे रहते हैं तो अभी तक ‘छोटे छोटे ताजमहल’ या ‘यही सच है’ के निश्छल द्वंद्व पर फिदा रहा पाठक हक्का बक्का रह जाता है। यदि रूपक का सहारा लें तो कह सकते हैं कि नई कहानी के बाद रवीन्द्र कालिया-ज्ञानरंजन को पढ़ना पाठक के लिए ऐसा ही अनुभव है जैसे ऋषिकेश मुखर्जी की ‘अभिमान’/’रंग बिरंगी’ या बासु चटर्जी की ‘छोटी सी बात’/’रजनीगंधा’ देखकर अपने भावबोध को परिष्कृत हो चुका मानने वाले दर्शक को अचानक बासु भट्टाचार्य की दाम्पत्य त्रयी ( अनुभव- आविष्कार- गृह प्रवेश ) देखने को मिल जाए और उसे समझ आए कि उसकी समझ  कैशोर से परिपक्व हो चली है।

नई कहानी के पक्ष में लिखते समय नामवर सिंह ने उसे नए भावबोध की कहानी बताया था। नया भावबोध जो भावुकता से लथपथ करके पाठक की आँखें  धुंधली नहीं करता बल्कि प्रतीकों और बिंबों के जरिये अपनी बात संकेतिकता में पहुंचाता है। पुराने भावबोध की दो कहानियाँ चुनकर उन्होने भावुकता के अतिवाद को स्पष्ट किया था – एक, द्विजेन्द्र्नाथ मिश्र निर्गुण की कहानी ‘एक शिल्पहीन कहानी’ और दूसरी विष्णु प्रभाकर की ‘धरती अब भी घूम रही है’। अपने आदर्श ग्राम्शी का सूत्रवाक्य/सिद्धान्त  उन्होने यहाँ त्याग दिया- “युद्ध क्षेत्र में दुश्मन के सबसे कमजोर मोर्चे पर हमला करके जीत हासिल कर लेना भले ही सफल रणनीति हो, पर बौद्धिक क्षेत्र में सबसे मजबूत और मुश्किल मोर्चे की विजय ही असली विजय है।“ उन्होने दोनों ही कमजोर कहानियाँ चुनीं। ( वरना तो जैनेन्द्र-अज्ञेय लिख ही रहे थे ) बहरहाल, नामवर जी द्वारा प्रशंसित चयनित मुख्य कहानियाँ क्या वाकई उस भावुकता का निषेध करती थीं जिसका दावा किया गया था ? उषा प्रियम्वदा की कहानी ‘वापसी’ ( जिसे ‘एक शिल्पहीन कहानी’ की तुलना में रखा गया ) बेशक चारपाई के प्रतीक का सुंदर इस्तेमाल करती थी और मेलोड्रामाई दृश्यों से सायास बचा गया था लेकिन गजाधर बाबू के दुख को व्यक्त करने के लिए कई पंक्तियाँ खर्च करने में उषा प्रियम्वदा ने कोई कसर नहीं उठा रखी थी। सूनापन, अकेलापन, उदासी, अस्थायित्त्व, आहत, विस्मित, निस्संग, अपरिचित, मौन, हताश, ‘जीवन खोई विधि सा’, ‘ज़िंदगी द्वारा ठगे गए’, ‘जो चाहा उसमें से एक बूंद न मिली’ –  कौनसा विशेषण या उपमान नहीं है जो उषा जी ने गजाधर बाबू की मनःस्थिति समझाने के लिए काम में नहीं लिया। हद तो यह है कि कहीं पाठक प्रतीक समझने में चूक न जाये इसलिए लिख ही दिया गया है – “उनकी उपस्थिति उस घर में ऐसी असंगत लगने लगी थी¸ जैसे सजी हुई बैठक में उनकी चारपाई थी।“

प्रतीकों और बिंबों का घटाटोप हमेशा कहानी को अच्छा नहीं बनाता। कई बार वह परिवेश के सीधे अंकन से बचने की एक कथायुक्ति बन जाता है और इसके पीछे वैचारिक प्रतिबद्धता का सायास निषेध या साहस का अभाव कारण हो सकता है। निर्मल वर्मा की बहुप्रशंसित और नामवर जी के शब्दों में नई कहानी की पहली कृति ‘परिंदे’ के संदर्भ में पहली बात लागू होती है। नामवर जी ने स्थापना दी कि स्वतन्त्रता या मुक्ति का प्रश्न इस संग्रह की कहानियों में अलग अलग कोण से उठाया गया।  लतिका के सवाल ‘हम कहाँ जाएँगे’ के बाद उन्होने ( बेशक बिना नाम लिए ) लेनिन के ‘क्या करें’ को रख दिया। उन्हें यह ‘मानव नियति का विराट प्रश्न’ नज़र आया। ‘सितंबर की एक शाम’ कहानी को उन्होने बेकारी पर लिखी गई दर्जनों कहानियों पर भारी बताया। “उसने आँखें उठाईं- सारी दुनिया उसके सामने पड़ी थी और उसकी उम्र सताईस वर्ष की थी।“ इस एक वाक्य में नामवर जी को ‘आज का सारा अंतर्विरोध’ दिख गया। यह वाक्य उन्होने लेख में तीन बार उद्धृत किया है। पर वे फिर भी एक कम रहे। खुद निर्मल वर्मा ने थोड़े हेर फेर के साथ यह वाक्य कहानी में चार बार प्रयोग किया है। बेशक निर्मल वर्मा में उषा प्रियम्वदा जितनी हड़बड़ी नहीं है, एक नफीस नज़ाकत है लेकिन अंततः यहाँ भी इस दोहराव में चिंता वही है – कहीं पाठक प्रतीक चूक न जाये।

बेकार युवक पर लिखी गई कहानी यदि थमी हवा, खामोश पत्ते, पीली गर्म धूल, फीके आकाश, जामुनी बदली, घास पर उड़ती हुई तितली और नीरव शांति का ही परिवेश रचती है और बेकारी की कारक परिस्थितियों और बेकारी के दंश का अहसास करने वाले सामाजिक परिवेश का अंकन सायास छोड़ देती है तो वह बेकारी को चयनित अवसाद के उत्सव में बदल देती हैं। ‘परिंदे’ की लतिका या ‘सितंबर की एक शाम’ का नायक दोनों ही स्मृतियों से मुक्ति के आकांक्षी हैं लेकिन दोनों ही स्मृतियों के आश्रय में मुक्ति पाते हैं। यदि परिवेश का दमघोंटू दबाव न दिखाकर प्रकृति की नीरवता का पार्श्व रचा जाएगा तो निश्चय ही यह नहीं कहा जा सकेगा कि दुख और अकेलापन मिला है बल्कि यही मानना तार्किक होगा कि यह दुख और अकेलापन ओढा गया है और इसमें अपने घाव को कुरेदने जैसा सुख है ( यह उपमा निर्मल वर्मा की ही है )।  ‘परिंदे’ हिन्दी का सर्वाधिक ओवर हाइप्ड संग्रह था और इसमें जो ढूंढा गया , यह उससे ठीक उल्टा अर्थ प्रक्षेपित कर रहा था।

नई कहानी के अन्य कहानीकार परिवेश के प्रति इतने उदासीन नहीं थे लेकिन एक बात तय है। ‘आर्द्रा’, ‘मिस पाल’, ‘राजा निरबंसिया’, ‘टूटना’,’कोसी का घटवार’, ‘ज़िंदगी और जोंक’, ‘रसपिरिया’ – ये सभी कहानियाँ मेलोड्रामा से बचते हुए भी अंततः पाठक को भावुक बनाने का ही लक्ष्य साध रही थीं। यह थोड़ी अभिजन भावुकता थी जिसमें रोया धोया नहीं जाता लेकिन लक्ष्य पाठक के कोर गीले करना ही होता है।

इसी बिन्दु पर रवीन्द्र कालिया-ज्ञानरंजन-काशीनाथ सिंह आते हैं जो इस भावुकता को किनारे करते हुए हिन्दी कहानी को परिपक्व बनाते हैं।

फिर से बेकारी पर लिखी गई रवीन्द्र कालिया की कहानियों पर आते हैं। पहली बात, उनकी किसी भी कहानी में कोई अकेला बेकार युवक नहीं है। उनके यहाँ  बेकारी एक सामूहिक नियति और परिघटना है और यह एक गहरी राजनीतिक दृष्टि है। दूसरी बात, इन युवकों की मुफ़लिसी तमाम उदात्तताओं को उनकी औकात बताती है और यह भी एक राजनीतिक दृष्टि है। एक उदाहरण देना यहाँ ठीक रहेगा। मोहन राकेश के सुप्रसिद्ध नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ का एक संवाद है – “ये पृष्ठ अब कोरे कहाँ हैं मल्लिका ? इन पर एक महाकाव्य की रचना हो चुकी है… अनंत सर्गों के एक महाकाव्य की।“ कथा में – मल्लिका को छोडकर उज्जयिनी और फिर कश्मीर जा चुका कालिदास, राजतंत्र के गठजोड़ों से वितृष्णा होने के बाद लौटकर अपने ग्राम आया है और अब इतने वर्षों के मल्लिका के त्याग को देख रहा है। यह कोरे पृष्ठ मल्लिका ने कालिदास के लिए रख छोड़े थे ताकि कालिदास इन पर महाकाव्य की रचना कर सके। किन्तु कालिदास को इन कोरे पृष्ठों में मल्लिका का त्याग और संघर्ष नज़र आता है। जाहिर है, ये संवाद नाटक के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और गरिमामयी संवादों में स्थान रखते हैं और इसी तरह यह नाटक भी हिन्दी नाटक के इतिहास में एक गरिमामयी स्थान रखता है। रवीन्द्र कालिया की कहानी ‘पचास सौ पचपन’ का फ्रीलान्सर इन संवादों की ऐसी तैसी कर देता है जब वह एक से ज्यादा बार इन संवादों को कहानी में उन विभिन्न जगहों पर दोहराता है जहां ये तत्कालीन परिस्थितियों पर टिप्पणी के लिए काम आते हैं। एक बार वह अपने रूम पार्टनर प्रोफेसर की नई शीट पर कै कर देता है और उसे ‘महाकाव्य की रचना’ सिद्ध करता है और दूसरी बार अपनी प्रेमिका के घर में उसकी माँ के ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठकर आईने में घूरता हुआ कह रहा है,”मैंने नौटंकी में हिस्सा लेने के लिए एम ए किया था या तवे बाल्टियों का व्यापार करने के लिए ? मैंने क्यों किया था एम ए मल्लिका ? ये पृष्ठ अब…”

यही समझने की बात है। नई कहानी के एक प्रमुख हस्ताक्षर का भावबोध जो त्याग के अश्रुविगलित महिमामंडन से छलका पड़ रहा है – मुझे लगता है यह रवीन्द्र कालिया का एक सोचा समझा चुनाव है। दरअसल कई कहानियों में रवीन्द्र कालिया, मोहन राकेश के एंटीडोट हैं। ( कोई चाहे तो साठोत्तरी कहानी के दूसरे रचनाकारों मसलन  ज्ञानरंजन की कहानी ‘यात्रा’ या काशीनाथ सिंह की ‘सुख’ को भी इसी तरह भावुकता के एंटीडोट के रूप में पढ़ सकता है। ) हालांकि उन्होने एक जगह संस्मरण में लिखा है कि ये सिर्फ संयोग था कि वे उस समय ‘आषाढ़ का एक दिन’ पढ़ रहे थे पर मेरा मानना है कि त्याग, धैर्य, संतोष, लगन, आत्मविश्वास ये सब शब्द जब आदर्श के रूप में बेकार युवक के सामने परोसे जाते हैं तो वे एक क्रूर व्यंग्य से ज्यादा कुछ नहीं होते और ये बात रवीन्द्र कालिया सबसे बेहतर तरीके से ( इस कहानी में भी और ) अपनी अनेक कहानियों में दिखा पाए हैं। ‘सिर्फ एक दिन’ के दोनों युवक नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ की आदर्शवादी पंक्तियों की पैरोडी करते हैं। रवीन्द्र कालिया की सभी कहानियों के बेकार पात्र तमाम आदर्शों की धज्जियां उड़ाकर पाठकों की सहानुभूति पाने का स्वर्णिम अवसर ठुकरा देते हैं। सहानुभूति से लथपथ दृष्टि से रवीन्द्र कालिया को सख्त चिढ़ है। वे न तो अपने बेरोजगार नौजवानों को इस तरह से चित्रित करते हैं और न पाठक से अपेक्षा रखते हैं कि वह उनके नायकों को सहानुभूति से देखे। सहानूभूति नाकामी का अहसास कराती है और नाकामी अक्षमता का। ये बेरोजगार नौजवान अक्षमता के कारण नहीं, षड्यंत्र के कारण बेकार हैं और उन्हें ये बात मालूम है।

परंपरागत मार्क्सवादी शब्दावली इन्हें लुंपेन प्रोलीतेरिएत कह देगी। इसमें एक चिंता निहित होगी कि यदि यह ऊर्जा सार्थक इस्तेमाल में नहीं लगी तो विध्वंसक रूप ले लेगी। उदाहरण के लिए अमरकान्त की विख्यात कहानी ‘हत्यारे’  ( और उस ) का विश्लेषण। यहाँ तीसरी बात आती है, रवीन्द्र कालिया दोनों अतियों से बचते हैं। न तो वे इन्हें कहीं भी खल पात्र के रूप में दिखाते हैं, न अपोलोजेटिक होते हैं और न इनके लिए कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। इस महत्त्व को और रेखांकित करने के लिए उत्तर रवीन्द्र कालिया काल की बेरोजगारी पर लिखी गई सबसे चर्चित कहानी चिट्ठी ( अखिलेश ) को लें। अखिलेश की कहानी के किरदार रवीन्द्र कालिया के बेरोजगारों के ही विस्तार हैं, वैसे ही बोहेमियन, लेकिन एक फर्क है। कहानी के अंत में अपने ठीये ‘कुटिया’ पर पी रहे नौजावान अपने रहस्य खोलते हैं और एक एक का स्पष्टीकरण सामने आता जाता है। उदाहरण के लिए एक संवाद देखें : “लो मैं भी बता देता हूँ।“ रघुराज ने सिर उठाया, उसकी आँखें सुर्ख लाल थीं।“ मैं अपना रहस्य खोलता हूँ। अब हम जा रहे हैं तो क्या छिपाना।  मैं लड़कियों के पीछे कभी नहीं भागा। मैं एक कपड़े की और एक दवाई की दुकान पर पार्ट टाइम काम करता रहा। मालिक मुझे ढाई सौ रुपये का चाकर समझते रहे। मैं… मैं…।“ वह चुप हो गया, उसकी आवाज़ फँसने लगी।

इस तरह अखिलेश अपने पाठकों को बता देते हैं कि उनके नौजवान बातें चाहे अश्लील करते हों पर चरित्रहीन नहीं हैं। चरित्र की रक्षा का ऐसा कोई आग्रह रवीन्द्र कालिया के यहाँ नहीं है। दरअसल अपने नायक को परंपरागत मानदंडों पर नैतिक साबित करने की हड़बड़ी न होने के पीछे नैतिकता-अनैतिकता की एक वैकल्पिक समझ है। लोहिया को याद करना यहाँ स्वाभाविक होगा जिन्होने कहा था कि जबर्दस्ती और झूठ के अलावा स्त्री पुरुष के सभी संबंध जायज़ हैं।  मिहिर पण्ड्या ने ‘देल्ही बेली’ की समीक्षा करते हुए इसे रेखांकित किया था कि जो फिल्म बहुत से दोस्तों को नैतिकता के धरातल पर खरी नहीं लग रही है, वह अनेक प्रसंगों में गहरे अर्थों में नैतिकता के सवाल ही उठाती है। लिव इन, प्री मैरिटल सेक्स, ओरल सेक्स वगैरह में मुब्तिला नायक एक लड़की के साथ जुड़े होते हुए दूसरी लड़की के साथ चुंबन को नैतिक रूप से गलत मानता है। मिहिर के शब्दों में, “एक क्षण उसके चेहरे पर ‘मैंने दोनों के साथ बेईमानी की’ वाला गिल्ट भी दिखत है और दूसरे क्षण वो किसी प्रायश्चित्त के तहत दोनों के सामने ‘सच का सामना’ करता है, यह जानते हुए भी कि इसका तुरंत प्रभाव दोनों को ही खो देने में छिपा है।“ ‘देल्ही बेली’ तो 2011 में आई थी। रवीन्द्र कालिया पचास साल पहले ये वैकल्पिक नैतिकता अपनी कहानियों में रख रहे थे। उनकी कहानी ‘हथकड़ी’ का अदीब एक असफल पूर्व बोहेमियन और वर्तमान नाकारा है और उसके मुक़ाबले नायक सफल है। दोनों दोस्तों के एक ऐसे समूह से निकले हैं जो बर्बादी, आवारागर्दी और लुच्चई के लिए कुख्यात था। कहानी में जब नायक एक परिचित स्त्री के साथ चोरी छुपे अदीब के घर पहुंचा है तब उस परिस्थिति को रवीन्द्र कालिया अदीब की प्रतिक्रिया के कारण अविस्मरणीय बना देते हैं। वह उस स्त्री के प्रति हिकारत रखते हुए भी उसके सामने यह प्रकट नहीं करता, उन दोनों के सामने उस समय कोई नैतिक कठघरा नहीं खड़ा करता, उन दोनों को अपेक्षित एकांत उपलब्ध कराता है, बस जाते जाते नायक की जेब में चुपके से वह घड़ी सरका देता है जो उसकी बीवी ने कभी अदीब को दी थी। और इस तरह वह नायक के मूल्यबोध को अपनी कसौटी पर खारिज कर देता है।

यहाँ मैं इसी नैतिकता के सवाल को एक भिन्न स्तर पर उठाते हुए वह पंक्ति लिखना चाहूँगा जो तब मेरा चयन होगी जब मुझे रवीन्द्र कालिया के सम्पूर्ण लेखन से एक पंक्ति चुनने को कहा जाये। यह पंक्ति ‘बड़े शहर का आदमी’ कहानी में आती है। कहानी पहले नायक की उधेड़बुन को दिखाती है जो अपने साथ रह रहे अपने बेकार दोस्त पीके से कुछ बात करना चाहता है। वह ‘करूँ, न करूँ’ की उलझन में है और आखिरकार खुलकर बात करने का निश्चय कर लेता है। पर आखिरकार उसे बात शुरू करने की जरूरत नहीं पड़ती, उसके हाथ में स्लिप देखकर पीके वैसे ही समझ जाता है। उस स्लिप पर लिखा था, ‘नन एल्स बी हेल्ड रिस्पांसिबिल फॉर माई डेथ’, पीके की क्रमिक प्रतिक्रियाएँ ध्यान देने योग्य हैं – वह तैश में आता है, काँपती आवाज़ में बार बार कहता है – ‘तुम मेरी तलाशी लेते हो’,रूआँसा होता है, बड़बड़ाता है, कुछ देर चुप रहता है फिर संयत स्वर में बोलता है, “मुझे यकीन है तुमने तलाशी नहीं ली होगी। तुमने सिगरेट ढूँढने के लिए जेबें टटोली होंगी।“

यही पंक्ति। यह पंक्ति मुझे सर्वाधिक प्रिय इसलिए है क्योंकि यह जीवन के सवाल से बड़ा सवाल निजता के सवाल को बनाती है। निजता का सवाल मूलतः गरिमा का सवाल है, इस स्लिप के सामने आ जाने का मतलब है पीके का अपने दोस्त के सामने नग्न हो जाना। इस पंक्ति में पीके का विश्वास झलकता है कि उसके दोस्त ने ये कार्रवाई चलाकर नहीं की। पीके का ये विश्वास गलत नहीं है। नायक की प्रारम्भिक उलझन और बाद की बातचीत में ये समझ दिखती है। ख़ुदकुशी का फैसला भी एक नौजवान का निजी फैसला है, यह विवेक दोनों में है। एक बेकार नौजवान अपनी विवशताएँ किसी के साथ नहीं बांटना चाहता है। यहाँ तक कि ख़ुदकुशी का फैसला भी वह नितांत निजी अधिकार मानता है जिसमें किसी का हस्तक्षेप उसे स्वीकार्य नहीं है।  

रवीन्द्र कालिया जब अपने नौजवानों को सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से नहीं दिखाते हैं तो वे उनकी गरिमा की रक्षा करते हैं। यह एक गहरी संवेदनशीलता है जो अश्रुविगलित भावुकता के पीछे पीछे चली आई क्रूरता को पहचानने से उपजती है। बेशक नई कहानी के कहानीकारों ने भी भावुकता को छोडकर सांकेतिकता को अपनाया लेकिन वह सांकेतिकता उन्हें वायवीयता और आत्मलीनता की ओर ले गई। रवीन्द्र कालिया और साठोत्तरी कहानी के अन्य कहानीकारों ने नई कहानी का सबसे बड़ा गुण मितकथन अपना लिया और सबसे बड़ा दोष आत्मलीनता व वायवीयता छोड़ दिया। यहाँ चौथी बात आती है जो पहली और तीसरी बात का स्वाभाविक परिणाम है –  रवीन्द्र कालिया की कहानियाँ आत्मलीनता और वायवीयता की खाई में जाने से कैसे बचती हैं ? रवीन्द्र कालिया के बेरोजगार नौजवान अकेले नहीं हैं और एक दूसरे की सामूहिक नियति के साथ नाभिनालबद्ध है। चाहे वह पिछली कहानी के दोस्तों की बातें हो या अन्य कहानियाँ, रवीन्द्र कालिया बेहद अभिधात्मक ढंग से समूचे परिवेश को चित्रित करते हुए यथार्थ से सीधी मुठभेड़ करते हैं। चूंकि उनके यहाँ प्रायः कोई नौजवान अकेला नहीं है इसलिए बेकारी और अकेलापन घुलमिल नहीं जाते हैं। उनके बेहद लापरवाह और आत्महंता दिख रहे नौजवान एक दूसरे के प्रति गहरे सरोकार से भरे हैं और उन्हें एक दूसरे की नियति अपने बारे में एक चेतावनी सरीखी लगती है। जब ये एक दूसरे में अपनी छवि देखते हैं, एक दूसरे के संग साथ में सुख पाते हैं तो रवीन्द्र कालिया लघूत्तम रूप में ‘दुनिया के बेकारों के एक होने’ की सच्चाई और सार्थकता को दिखाते हैं।

बेकारी पर लिखी गयी कहानियों के साथ दो श्रेणी की कहानियों को और जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए। एक, जिनमें उनके नायक अपनी ऊर्जा, क्षमता और सर्जनात्मकता का एक अंश भी इस्तेमाल न कर पाने वाली नौकरियों में जुते हुए हैं ; और दूसरी, श्रमजीवी पात्रों पर लिखी गई कहानियाँ। एक अर्थ में ये कहानियाँ मुफ़लिसी में जी रहे नौजवानों वाली कहानियों का ही विस्तार हैं। 2018 के भारत में असली बेरोजगारी के आंकड़े कहीं भयावह हो जाएँगे यदि उन सभी ‘मानव संसाधनों’ को इसमें जोड़ लिया जाए जिनका ईंधन उनके वास्तविक दाय से कहीं कम पर भभक रहा है। जो सिर्फ इसीलिए बेकारी के आंकड़ों से बाहर हो गए हैं क्योंकि उन्होने किसी निजी ‘दुकान’ पर जरा सी रूपल्ली की नौकरी कर अपने को बचाए रखा है। दरअसल वे भी अपने को बचा नहीं पाये हैं, वे धीरे धीरे क्षरित हो रहे हैं।  यहाँ भी, ऐसे पात्रों की भी हम ‘चाल’ या ‘काला रजिस्टर’ आदि कहानियों में सामूहिक नियति देखते हैं। ‘चाल’ कहानी के कृष्णा या पाल या गर्ग या संतोष – इन पात्रों को लेखक ने बहुत फुर्सत से गढ़ा है। इनके तनाव, झगड़े और चिंताएँ, मुख्य पात्रों प्रकाश और किरण के दाम्पत्य के सवालों को विखंडित करती हैं। वे दरअसल प्रकाश और किरण की वर्गीय पहचान को गाढ़ा कर हमें हर सवाल को सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य में देखना सिखाती हैं। वास्तव में, इस कहानी का मुख्य पात्र चाल है और हम जानते हैं, मुंबई में चाल की वर्गीय पहचान सबसे साफ होती है।

‘काला रजिस्टर’ के सारे विनोद के पीछे खौफ़ का साया साफ देखा जा सकता है। ‘ए पी सी खाते रहो’ कहने वाले पात्र सामने वाले पर व्यंग्य नहीं कर रहे हैं, वे अपनी नियति की विडम्बना को हास्य में प्रकट कर रहे हैं। यही सामूहिकता बोध रवीन्द्र कालिया को विशिष्ट बनाता है।

श्रमजीवी पात्रों पर लिखी गई कहानियों में एक ही कहानी का उल्लेख करूंगा – ‘सुंदरी’। कहानी ज़हीर मियां के बारे में है जो तांगा चलाते हैं और अपनी घोड़ी सुंदरी की एक आँख दुर्घटना में चले जाने के बाद किसी तरह जीवन यापन कर रहे हैं। बारातों में जाना बंद हो गया है, सवारियाँ बैठती नहीं हैं और खर्चे सुरसा की तरह बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में जब एक सुबह एक शख्स ज़हीर मियां के तांगे में बैठ जाता है और सुंदरी ठिठक जाती है, बीच बाज़ार तांगा अड़ जाता है तब ज़हीर मियां हताशा और गुस्से से भर उठते हैं। ऐसे में एक पाठक क्या अपेक्षा करेगा ? ‘दो बीघा ज़मीन’ को याद कीजिये, यह एक यथार्थवादी कहानी के कारुणिक अंत के लिए पूरा तैयार मैदान है। यहीं रवीन्द्र कालिया की विशिष्टता पता चलती है। सहृदय सवारी पूरे पैसे देकर चली जाती है, घोड़ी के सामने उसे चलने के लिए उकसा रहे बच्चे खुशी से नाचने लगते हैं। जब एक पाठक अपने अभ्यस्त पाठकीय बोध के साथ एक कारुणिक अंत के लिए अपेक्षा कर रहा है तब वह कहानी प्रत्याशित नैराश्य की जगह एक तात्कालिक सुखांत रच देती है। थिगली लगे कपड़े पहने बच्चे नाच रहे हैं और हम उन्हें रोक नहीं सकते कि बच्चों यह मरीचिका है। करुणा वहाँ पैदा होती है जहां उसे पैदा होना चाहिए – पाठक का हृदय।

एक कुशल कहानीकार को अपनी कहानी को खत्म करना आना चाहिए। यह हिन्दी कहानी में दुर्लभ गुण है।

और इस लेख को कहाँ खत्म होना चाहिए ?

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  • हिमांशु पण्ड्या

रुदुआ कॉम्प्लेक्स

सांचोर बाइपास रोड

रानीवाड़ा ( जालोर )

राजस्थान 343040

मेल आई डी – himanshuko@gmail.com

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