लॉकडाउन की इंग्लैंड डायरी

प्रज्ञा मिश्रा इंग्लैंड में रहती हैं और वहाँ के लॉकडाउन अनुभवों को उन्होंने दर्ज करके भेजा है। आप भी पढ़ सकते हैं- जानकी पुल।

=========================

पूरे तीन महीने बाद शहर के बाजार जाने का मौका मिला, यू के में इन्हें  टाउन या सिटी सेंटर कहते हैं।   दुकानें तो सभी बंद हैं, बस दवा  की दुकान और बैंक की ब्रांच खुली हुई थी, दुकान में और बैंक में एक समय में गिनती  ही लोग अंदर जा सकते हैं इसलिए लाइन बाहर थीं और लम्बी भी। आम तौर पर यू के में ऐसी कतारों में आगे पीछे वाले से बात करना तमीज और तहजीब की तरह माना जाता है, क्योंकि यह तो बदतमीजी है कि आपने देख लिया है कि आपके पास कोई खड़ा है और आपने उसे कोई तवज्जो  ही नहीं दी। लेकिन आज ऐसा कुछ नहीं हुआ क्योंकि सभी दो दो मीटर की दूरी पर खड़े थे और  यह दूरी इतनी कम भी नहीं थी कि साथ साथ इंतज़ार करने का एहसास हो।

क्या मुझे लॉक डाउन से कोई परेशानी है? बिलकुल भी नहीं। खाने पीने की सारी जरूरतें पूरी हो रही हैं। और घर में रहने की जरूरत भी नहीं है, क्योंकि जॉब भी essential वर्क की केटेगरी में आता है तो कहने का मतलब है रोज़ाना की ज़िन्दगी में कोई ख़ास फर्क नहीं है। हाँ छुट्टी के दिन घर से निकलने में थोड़ा सोचना पड़ता है। यू के में  दिन लम्बे और उजाले से भरपूर होने लगे हैं, और ऐसे में गाड़ी लेकर चल कहीं दूर निकल जाएँ गाना हर वक़्त दिमाग में बैक ग्राउंड म्यूजिक की तरह बजता रहता है। बस यही एक तकलीफ है कि छुट्टी भी आती है तो कहीं जा नहीं सकते, पर फिर उसकी भी कोई शिकायत नहीं है क्योंकि कम से कम मुझे घर से निकलने की तो इज़ाज़त है।

लेकिन फिर भी मुझे एक बात से  बहुत परेशानी है और वो है लोगों का सोशल डिस्टेंसिंग को नया नियम मान लेने की बात।  न जाने कितनी बार सुन चुके हैं कि मुमकिन है यही सोशल डिस्टेंसिंग नए तरीके से सामान्य ज़िन्दगी कहलाने लगे। कहने वाले का तो पता नहीं लेकिन हर बार इस “New Norm ” का नाम आता है और मुझे दबका सा लगता है। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि हम एक दूसरे से यूँ छिटक कर ही ज़िन्दगी बिता देंगे। कोई नजदीक ही नहीं आएगा तो पता कैसे चलेगा कि “best Hug ” कौन देता है , किसके हाथ मुलायम हैं और कौन बेख़याल होकर जब यूँ ही छू देता है तो हम ख्वाब देखने लगते हैं।

ज़रा सोचिये उन लोगों के बारे में जिनसे आप बस यूँ ही राह चलते टकरा गए थे और उस मुलाकात ने ज़िन्दगी के रिश्ते बना दिए ( अब यहाँ मेरे मेहबूब तुझे मेरी  मोहब्बत की कसम गाना भी सोच सकते हैं ). जब अपना देश छोड़कर यू के को अपना घर बनाने की कोशिश करी तब इन्हीं रास्ते में मिले लोगों ने नजदीकी बढ़ायी और कुछ नाम और चेहरे जाने पहचाने हो गए… कोई यूँ ही सड़क पर चलते हुए हिंदी में बात करते मिला और परदेस में हिंदी में कौन बोल रहा है इसी बात से बातों का सिलसिला जो चला तो इस कदर आने वाले तीज त्यौहार मनाने को घर वालों की कमी पूरी हो गयी। अब भला इस सोशल डिस्टेंसिंग वाली ज़िन्दगी में कोई कैसे अपना अकेलापन मिटाएगा!!

अनजाने लोगों  ने ना जाने कितनी बार हाथ लगाकर वजन उठवाया है। अनगिनत सफर हैं जिनमें पडोसी से बात करते हुए कब जर्नी  ख़तम हो गयी पता ही नहीं चला। भारत की ट्रेन में एक ही बर्थ पर ३-४ लोगों के साथ बैठकर रास्ता नापा हो या हवाई जहाज में पड़ोस वाले  का खाना सूंघते और बतियाते एक देश से दूसरे देश पहुँच गए हों , इन सारी यादों में दूरी बनाये रखना है अगर यह ख्याल कहीं भी होता तो इतनी खूबसूरत यादें नहीं बनती।

इतना ही नहीं कई कई बार अनजाने लोगों के साथ घर भी बाँटा है और किचन में अलग अलग तरह का खाना भी साथ ही पकाया है। क्या यह कभी मुमकिन हो सकता था अगर हम दूरी नापने के फेर में पड़े रहते?? फिर तो किचन में  एक वक़्त में एक ही इंसान मौजूद होता , पेट को तो खाना मिल जाता लेकिन रूह यूँ ही खाली रह जाती।

लेकिन इन सबसे भी बड़ी  एक बात है जो बिना सोशल डिस्टेंसिंग के ही इंसान को इंसान से दूर किये है और अगर यही अगर नए तरीके का सामान्य हो गया तो बात कहाँ जाकर रुकेगी, इसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता। भारत में आज भी कितने ही घरों में काम करने वाली बाई के लिए अलग से बर्तन होते हैं ताकि अगर उन्हें कुछ खाने पीने को दिया जाए तो उन्हीं बर्तनों का इस्तेमाल हो, वही बाई जो आपके घर को साफ़ सुथरा रखती है, आपके बर्तन साफ़ करती है, उसी को अलग बर्तन में चाय खाना देना किस तरह का सामान्य बर्ताव है। लेकिन अगर यह सोशल डिस्टेंसिंग और किसी भी चीज़ को घर में लाने से पहले धोया जाना नया नियम है तो फिर सोचिये इन लोगों  का क्या होगा। कई बहुमंजिला बिल्डिंग ऐसी हैं जहाँ काम करने वाले अलग लिफ्ट  से आते हैं या उन्हें सीढ़ियों से ही आने की मंजूरी है। अब वहां के हालात क्या होंगे?

जब तक यह वायरस अपने चरम पर है तब ही तक यह सोशल डिस्टेंसिंग चले तो बेहतर है। वरना अगर यह आदत में आ गया तो कई कई एहसास हैं जिनसे हम महरूम रह जाएंगे, और सोचिये वो बच्चे जो इस दौर में बड़े हो रहे हैं, क्या उन्हें हम कभी बता भी पाएंगे कि हम यूँ ही राह चलते लोगों से क्यों छिटक कर खड़े हो जाते हैं? उन्हें तो राह चलते किसी  से मिलना, बात करना, गले लग जाना किसी दूसरे ग्रह की बातें लगेंगी। अहमद फ़राज़  ने लिखा है “आँख से दूर न हो दिल  से उतर जाएगा , वक़्त का क्या है गुजरता है गुजर जाएगा।” यहाँ तो आँखों  के सामने भी हैं लेकिन दूरी है। बस इसी बात की उम्मीद है कि दिलों में दूरी ना आये क्योंकि इंसानियत तो तब ही बरक़रार है जब हम उसे घर के बाहर भी देख सकें महसूस कर सकें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 mins
WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify WooSearch – Popup Product Search & Filters for WooCommerce WooCommerce Product Subtitle WooCommerce Product Grid Builder WooCommerce Variable Pricing Calculator – Measurement Based Price for Variations SUMO WooCommerce Dynamic Pricing Discounts ptcLAB – Pay Per Click Platform Coming Soon Counter Page / Maintenance Mode WordPress Plugin – Lacoming Soon COVID-19 Coronavirus – Viral Pandemic Prediction Tools + Live Maps, Stats & Widgets Uber Zoom – Smooth Zoom & Pan for WordPress 50 Small SEO Tools WordPress