दिल्ली की सूफी दरगाहें और दिलों के राहत का सामान

आजकल दिल्ली में सड़कों पर दरबदर भटकते इंसान दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में दिल्ली की सूफ़ी दरगाहों की याद आई, जहां ग़रीबों को खाना खिलाना इबादत के हिस्से की तरह रहा है। यह सूफ़ी परम्परा का हिस्सा रहा है। जब इस परम्परा की याद आई तो प्रसिद्ध इतिहासकार रज़ीउद्दीन अक़ील के इस लेख की याद आई। पढ़िएगा और इस परम्परा की खूबियों समझने और अपनाने की दिशा में सोचिएगा- जानकी पुल।

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दिल्ली के सूफी संतों की दरगाहों और शहर की बहुलतावादी संस्कृति के अभ्युदय में गहरा संबंध है। दरगाहों ने समाज को जोड़ने का काम किया है। वहाँ हर मजहब के गरीब-लाचार और जरूरत-मंदों के लिए मदद की दुआएँ की जाती हैं। वहाँ प्रचलित क़व्वाली की प्रथा भी कई तरह के दर्दो-गम से दिलों को राहत पहुंचाती है। इस संदर्भ में, निजामुद्दीन औलिया और उनके प्रतिभा-संपन शिष्य अमीर खुसरौ का नाम बार-बार सुनने को मिलता है। पिछले 800 सालों से, महरौली का इलाका भी कुतुब साहेब के ताल्लुक से रुहानियत का गहवारा रहा है। दक्षिण दिल्ली का एक बड़ा इलाका आज भी चिराग दिल्ली के नाम से रौशन है। वहां सूफियों के चिश्ती सिलसिले में निजामुद्दीन औलिया के अनुयायी नसीरुद्दीन चिराग ने उनके वक्त के निरंकुश शासक मोहम्मद बिन तुगलक के बेतुके फरमान को न मान कर दिल्ली को तबाही से बचाया था। सुलतान शहर के उलमा, सूफी और अशराफ तबकों के जिम्मेदार लोगों को दौलताबाद भेजकर उनके सहारे दक्कन में अपनी पैठ मजबूत करने का प्रयास कर रहा था, यह समझे बगैर कि उसका यह कदम दिल्ली की बर्बादी का सबब बन सकता था जो खुद उसकी सत्ता के लिए हानिकारक था। यह और इस तरह के कई और उदहारण दिल्ली की राजनीतिक स्थिरता और सांस्कृतिक रंगरंगी में सूफियों के अहम ऐतिहासिक रोल की अक्कासी करते हैं।

सूफी और उन जैसे दूसरे मुस्लिम बुजुर्ग खुदा के आशिक, दोस्त या वली कहलाते हैं। उनका मामला दिल का मामला है, जो उन्हें ईश्वर से जोड़ता है और इंसान और इंसान के बीच के सम्बन्ध को ठीक करता है। सूफी यह काम खूबसूरती से करते हैं और यह समझते हैं कि चूँकि हर चीज खुदा की बनाई हुई है, हर चीज में खुदा का नूर पाया जा सकता है। सूफियों के आदाबो-अखलाक उनके जीवन और सिद्धांतों में हुस्नो-जमाल की रूह फूंकते हैं, हालांकि कभी-कभी उनका गुस्सेवर तेवर जलाली रूप धारण करके उनके विरोधियों और प्रतिद्वंदियों को ध्वस्त भी कर सकता था। अमूमन सूफी लोग अपनी करिश्माई शक्ति या करामत का इस्तेमल अपने अनुयायियों और श्रद्धालुओं की भलाई के लिए करते थे, और इसीलिए श्रद्धालु उन्हें गरीबनवाज और गंजबख्श जैसे अलकाब से पुकारते रहे हैं।

13वीं शताब्दी के आरम्भ में दिल्ली सल्तनत की स्थापना से पहले ही, सूफी आध्यात्मिकता इस्लाम की एक मुख्य धारा बन चुकी थी। दर हकीकत, सूफी साहित्य का फारसी में लिखा हुआ पहला बड़ा सैद्धांतिक ग्रन्थ, कशफुल महजूब, गजनवी पंजाब की राजधानी लाहौर में शेख अली हुजविरी दाता गंजबख्श ने 11वीं शताब्दी में ही लिख डाला था। चिश्ती सूफियों में शुरू के पाँच ख्वाजा, मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी, कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी (मेहरौली, देहली), फरीदुद्दीन गंज-शकर (अजोधन, पाक-पटन, पंजाब), महबूबे इलाही निजामुद्दीन औलिया (देहली) और नसीरुद्दीन चिराग-दिल्ली, सूफीमत के इतिहास में और आज भी विशेष दर्जा रखते हैं। इनके अतिरिक्त, हर दौर में और हर जगह बड़े सूफी बुजुर्ग हुए हैं जिनकी यादों की मंजूषा श्रद्धालुओं के दिलों को राहत प्रदान करती है, जिनके सहारे वह राजी खुशी जी लेते हैं। यह मान्यता भी आम है कि सूफी दरगाहों या दरवेशों और फकीरों से प्राप्त तावीज-गंडों की भी यही तासीर है। यह सब कुरानी आयात की पॉपुलर ताबीर पेश करते हैं।

सूफियों के खिलाफ उलमा का एक बड़ा इलजाम यह था कि वह न केवल पाबंदी के साथ इस्लामी प्रार्थनाओं (जैसे मसजिद की पंजवक्ता नमाज) में शामिल नहीं होते थे, बल्कि उनकी आध्यात्मिक प्रथाओं में गैर-इस्लामी योग, प्राणायाम और चिल्लए-माकूस वगैरह को खासी अहमियत दी जाती थी। यह सही है कि सूफी योग पर एक मध्यकालीन ग्रन्थ, अमृतकुण्ड, को पूरी तरह चाट गए थे। उलमा ने सबसे ज्यादा सूफियों की गीत-संगीत, महफिले समा या कव्वाली, के खिलाफ फतवे मंगवाकर हमला किया। लेकिन वह कव्वाली पर हमेशा के लिए प्रतिबन्ध नहीं लगवा सके। आज की हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत मध्यकाल के सूफियों की देन है। सूफियों ने खुदा के रसूल की दुहाई देते हुए यह सफाई पेश किया कि अच्छे स्वर में गाए जाने वाले गीत इंसान के साथ-साथ जानवरों के रुह को भी तसकीन पहुंचाते हैं। इसलिए यह लताफत और जौक का मामला है। आध्यात्मिकता से सराबोर दिलों के लिए अच्छी आवाज में पढ़ी गयी गजल काफी है। वहीं दूसरे लोग और जानवर जैसे ऊंट, हिरण और यहाँ तक कि गधे भी संगीत के यंत्रों से निकलने वाली ध्वनि और मधुर गान सुनकर महजूज होते हैं। यही हाल परिंदों का भी है। सूफियों के गम और दर्द से भरे नगमे उनमें भी हाल की कैफियत पैदा कर मद-मस्त करते हैं। तो फिर कोई अच्छा इंसान गीत-संगीत की तरफ मायल क्यों न हो?

इसके अतिरिक्त सूफियों ने भारतीय देशज भाषाओं और साहित्य (पंजाबी, उर्दू, हिंदी, इत्यादि) के अभ्युदय और विकास में भी महत्वपूर्ण रोल अदा किया है। इस तरह, सूफियों ने भाषा, साहित्य, संगीत, योग, एकेश्वरवाद और अद्वैतवाद आदि के माध्यम से लोगों को जोड़ने का काम किया। मध्यकालीन भारत की राजनीति और समाज में सूफियों की अहम मौजूदगी को समझने के लिए खुद उनके साहित्य का बहुत बड़ा जखीरा काफी है। सूफियों ने फारसी और देशी या क्षेत्रीय भाषाओं में जो साहित्य लिखा है उनमें खास तौर से महत्वपूर्ण हैं: सूफियों के मलफूजात (रुहानी वार्तालाप), उनके मकतूबात (विशेषकर अनुयायियों की तरबियत के लिए लिखे गए पत्र), रहस्यवादी ग्रंथ जो आध्यात्मिक परम्पराओं पर बौद्धिक चिंतन करते हैं, सूफियों की अकीदतमंदाना जीवनी (तजकिरा) और खुद  सूफियों द्वारा रचित रुहानी नगमें। प्रेम-प्रसंगों की पुरानी दस्तानों और लोक कहानियों को समेटते हुए सूफियों ने वृहत्त आख्यानों को लिखने की एक नई परंपरा शुरु की, जिनके कुछ रुपों ने श्रद्धा और भक्ति से ओत-प्रोत जन-मानस की भावनाओं को किसी कदर प्रभावित किया।

सूफियों के नजदीक, एक अच्छे मुसलमान को एक अच्छा इंसान होना चाहिए, और उसे लगातार अपनी आत्मा को खंगालता रहना चाहिए। हजरत निजामुद्दीन के मलफूजात, फवायद-उल-फुआद, में बयान किए गए हिकायात या उपाख्यानों से पता चलता है कि वास्तव में, सभी प्रकार के बाधाओं और वैमनस्य के बीच भी प्यार से भरे जीवन को जी लेना संभव था। क्षमा करने की प्रवृति पर जोर देते हुए चिश्ती सूफी पीर ने यह समझाया कि यदि कोई किसी के रास्ते में कांटे डालता है और दूसरा भी प्रतिशोध में ऐसा ही करता है, तो हर जगह कांटे ही कांटे फैल जाएंगे। बेहतर यही है कि नजरअंदाज करें, माफ करें और भूल जाएं। विरोधी भी अंततः अपनी हरकतों से बाज आएगा, उसके दिल में करुणा का जज्बा पैदा होगा, और कड़वाहट सहिष्णुता या सम्मानजनक उदासीनता में तब्दील हो जाएगी। यह मशवरा उन तरीकों में से एक था जिससे सूफी अपने प्रतिद्वंदियों या मुखालेफीन का दिल जीत सके थे।

त्याग या दुनिया से किनारा-कशी की जरुरत पर, दिल्ली के संरक्षक संत, महबूबे-इलाही निजामुद्दीन औलिया ने क्या खूब कहा है कि दुनिया एक छाया की तरह है; यह आपका पीछा करती है, लेकिन यदि आप इसका पीछा करना शुरू करते हैं, तो यह आपसे दूर भागती रहती है। इसलिए, सूफियों ने दुनिया से दूरी या तर्क-ए दुनिया (त्याग) का रास्ता अपनाया। हजरत निजामुद्दीन के लिए, तर्क-ए दुनिया का मतलब यह नहीं था कि लंगोटा पहनकर पूजा-पाठ में अपने आप को लिप्त करने के लिए जंगल में चला जाना चाहिए। शक्ति और प्रतिष्ठा के जाल से बचना और मानव जाति की सेवा में समर्पित हो जाना ही अपने आप में एक बड़ी और सच्ची इबादत है। वास्तव में, मानव सेवा ही सूफी परंपरा (तरीकत) में पूजा का सर्वोत्तम रूप रहा है।

इस नजरिए को आगे बढ़ाते हुए, हजरत निजामुद्दीन ने बयान किया है कि उनके आध्यात्मिक गुरु (पीर) और अग्रणी पंजाबी सूफी, शेख फरीदुद्दीन गंज-ए शकर (बाबा फरीद) को एक बार एक शिष्य ने चाकू भेंट किया था। फरीद ने उससे कहा कि छूरी काटने का काम करती है, इसलिए सुई एक बेहतर उपहार हो सकती है, क्यूंकि सुई सीने के काम आती है। लोगों के दिलों और दिमागों को जोड़ना और उन्हें ईश्वर के प्रेम में एकजुट करना सूफी रहस्यमय प्रथाओं का मुख्य उद्देश्य है; इसके विपरीत, चाकू और तलवार का इस्तेमाल हिंसा के माध्यम से लोगों को नुकसान पहुंचाने, विभाजित करने और सत्ता हथियाने के लिए किया जाता है।

लोगों को खाना खिलाने को एक आला दर्जे का पुण्य कार्य बताते हुए, हजरत निजामुद्दीन ने कहा है कि जब मेहमान या आगंतुक घर या खानकाह या जमाअत-खाने में आते हैं तब उन्हें भोजन परोसा जाना चाहिए, या अगर तुरंत सेवा करने के लिए कुछ नहीं है तब कम से कम एक गिलास पानी पेश किया जाना चाहिए। अन्यथा ऐसा प्रतीत होगा कि वह किसी मृत व्यक्ति से मिलने कब्रिस्तान गया था, जहाँ मृत व्यक्ति आगंतुक की कोई सेवा नहीं कर सकता! इसलिए, सूफियों की खानकाहों में आगंतुकों के आदाब का आदर्श तरीका था: सलाम, ताम, और कलाम। आगंतुक सलाम कहते हुए प्रवेश करेगा, उसके बैठते ही भोजन (ताम) पेश किया जाएगा, और फिर बातचीत (कलाम) का सिलसिला शुरु होगा। इस सब में, जाति और पंथ के भेद, अस्पृश्यता, या किसी तरह के प्रदूषण की भावना के लिए कोई जगह नहीं होगी। सब मनुष्यों, दोस्तों या मेहमानों से सम्मान और आदर एवं बराबरी के साथ सलूक किया जाएगा। दरवाजे और बैठक पर आए भूखे को खाना खिलाने पर विशेष रुप से जोर दिया गया है, चाहे वह बेचारा आवारा कुत्ता ही क्यों न हो। इस तरह हम समझ सकते हैं कि सूफी परम्पराओं से जुड़े आदर्शों ने उस रहस्यवादी आध्यात्मिक मत को एक लोकप्रिय सामाजिक आंदोलन का रूप दे दिया।

आज भी कि जमाना खराब है और मुसलमानों के ताल्लुक से तरह-तरह की गलत-फहमियां राजनीतिक दांव-पेच का हिस्सा हैं, दिल्ली शहर के अनगिनत दरगाहों और मजारों पर हजारों लोग जुमेरात की शाम और उर्स के मौकों पर श्रद्धा-पुर्वक मिन्नत-समाजत करते हुए देखे जा सकते हैं। उनमें सत्ताधारी लोग भी होते हैं, और बेकस-बेसहारा भी। औरत, मर्द और ट्रांस-जेंडर भी। कोई किसी की जाति नहीं पूछता, न धर्म। 14वीं शताब्दी के मध्य में ही हजरत निजामुद्दीन से जुड़े एक सूफी लेखक अमीर खुर्द ने अपनी किताब, सियर-उल-औलिया, में कह दिया था कि उनकी दरगाह की दहलीज का धूल वहां आने वाले हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और पारसी लोगों की आंखों में सुरमे का काम करती है। श्रद्धालुओं के लिए यही हाल और दूसरी दरगाहों का भी है, जो बदलते वक्त के साथ प्रासंगिक बनी हुई हैं, क्योंकि उनकी तमाम प्रथाएं यहाँ की सामाजिक और सांस्कृतिक परम्पराओं से पूरी तरह वाबस्ता हैं। बहुलतावादी संस्कृति की यह धारा सरकारी तंत्र से जुड़े लोगों के भी काम आती है। समाज और देश को खूबसूरती से चलाने में सुफिया-ए कराम के आदर्श महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश का काम करते हैं।

चिराग़ दिल्ली

 

 

 

(रजीउद्दीन अकील दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाते हैं।)

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