मृणाल पाण्डे की कथा:भगवान का हाथ और सुबिया भिखारी की कथा

प्रसिद्ध लेखिका मृणाल पाण्डे इन दिनों बच्चों को न सुनाने लायक बालकथाएँ लिख रही हैं। यह 14वीं किस्त है। यह कथा उत्तराखंड की एक लोक कथा पर आधारित है। लोक कथाओं की यह विशेषता होती है कि वे हर युग में प्रासंगिक लगती हैं। हर दौर में उनके युगानुकूल अर्थ निकल ही आते हैं। अब देखिए न हाल में भगवान के हाथ की बात आई तो यह कथा वैसी ही बात करती है-

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एक बार की बात है, किसी शहर में एक गरीब भिखारी और उसकी बीबी रहते थे। भिखारी बेचारा मति का हीन, पेट का भूखा, करम का नाटा और अकल का फाटा था। सुबह घर घर जाकर फिर दिन भर सडक पर भीख माँगता, तब भी शाम तक उसको सिर्फ डेढ पाव आटा और डेढ चम्मच तेल मिल पाता। उसकी कर्मठ बीबी दिन के बखत आस पास से कुछ लकड़ियाँ और हरा साग तोड़ लाती। और शाम को उनको काट कर भीख के आटे में गूंध उसकी डेढ मोटी रोटियाँ बनाती: एक पति के लिये, आधी अपने लिये।

ऐसे किसी तरह उनकी कट रही थी।

भिखारी का वैसे नाम तो था सूबेदार, लेकिन गरीब को उसके सही नाम से कौन पुकारता है भला? न पग नीचे की धरती उसकी, न ही सर के ऊपर का आसमान।

आसपास कुछ ठहरा तो बस हवा पानी और आग। और वो भगवान ने अमीर-गरीब सबके आसपास छोड़ रखे हैं कि हवा बहाये, आग अंत में हर देह को दाग दे कर भसम बनाये और फिर पानी उसे भी बहा ले जाये। बस। चलो भगवान का हाथ है सबके ऊपर। और सुबिया धीर धर लेता।

उसे कोई कहता, अरे ओ भिखमंगे, कोई दरवाज़े पर से दुरदुरा कर कहता, ‘ये भिखारी साले हर जगह आ जाते हैं।’ सुबिया को इसकी भी आदत थी। गरीब आदमी को उसके जीते भी उसके सही नाम से कौन पुकारता है? गरीबी बचपन से ही सिखा देती है भिखारी को, कि गारि न खीझ, मारे नहीं लाजा।

एक रात सुबिया भिखारी और उसकी पत्नी खाने को बैठ ही रहे थे तभी कुंडी खड़की। खोल कर देखा तो बाहर एक भगवाधारी साधु खड़े थे । सुबिया ने उनके पैर छुए, ‘इतनी रात गये कैसे महाराज?’

साधु बोले, ‘हरे सुबिया, बाबे को बड़ी भूख लगी है, कुछ खाने को है तो दे।’

सुबिया ने बगल में खड़ी बीबी को देखा, बीबी ने उसे। घर में थीं कुल्लमकुल्ल डेढ रोटियाँ। नंगा क्या तो धोये, क्या निचोड़े?

फिर भी अतिथि तो देवता सरूप हुआ। विनम्रता से हाथ जोड़ कर सुबिया बाबा से बोला, ‘आइये महाराज, हम गरीबों की कुटिया पवित्तर कर दी आपने। यहाँ जैसी जो भी रूखी सूखी है, भोग लगाइये।’

बाबा को भीतर ला कर उसने आसन धर दिया। साधु तुरत पालथी मार कर बैठ गये और चारों तरफ की निचाट गरीबी पर नज़र फिराई। देखा बालबच्चे नहीं, घर भी ऐसा न तन पर पूरे कपड़े न बरतन बासन।

‘लगता है कि पुश्तैनी भिखारी हो’। बाबा बोले।

‘बाबा जी, गरीबी, अमीरी, भिखमंगी सब भगवान के हाथ है महाराज । हम मनुख जात भगवान से भला क्या कह सकते हैं?’ लंबी उसांस लेकर सुबिया बोला।

इस बीच सुबिया की बीबी ने साधु के सामने एक पत्तल पर घर का टोटल डिनर, यानी डेढ रोटियाँ और  पीने को लोटे में साफ पानी भी ला कर सामने धर दिया। साधु ने बिना बोले सब रोटियाँ खाईं, फिर लंबा डकार ले कर बोले ‘बच्चा हम तृप्त भये । अब बाबा जाता है।’

सुबिया और उसकी बीबी ने उस रात खाने के नाम पर बस लोटा भर पानी पिया, और चुपचाप खाली पेट सो गये।

सुबिया की झोपड़ी से लंबे डग भरते साधु बाबा जब निकले तो सीधे स्वर्ग को चल दिये। सिद्ध पुरुष थे सो सशरीर उड़ कर स्वर्ग जा पहुंचे जिस तरह उनके जैसे पहुंचे हुए संत पीर फकीर ही जा सकते हैं। भगवान के यार हुए ये असली साधु-पीर-फकीर। कभी जी किया, तो धरती से ही आसमान की तरफ सर करके भगवान से बात कर लेते हैं। कभी दनदनाते हुए सीधे उनके दरबार जा धमकते हैं।

सो साधु बाबा दरवाज़ा पार कर सीधे जा पहुंचे स्वर्ग। वहाँ क्या देखते हैं? देखते हैं कि भगवान अपने कमरे में धरती के उसी गणतंत्र का पाप पुन्न का का जब्बर भारी बही खाता खोले हैं जहाँ सुबिया रहता है।

‘अरे यार तू? बडे दिन में आया?’ भगवान् ने खुशी खुशी बाबा से कहा। ‘बता मर्त्यलोक से क्या खबर लाया है?’

बाबा बोले ‘हे भगवान, अभी मर्त्यलोक के एक गणतंत्र से आता हूं। नाम को गन का तंत्र, पर गण और तंत्र के बीच जहाँ देखी भारी गैर बराबरी देखी। बाढ सुखाड़  का प्रकोप है ही। और हर जगह गरीब और बूढे तिलचट्टों की तरह मर रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ तंत्र को हाँकनेवाले तेरह स्याणे सेठ ही लगातार अमीर बन रहे हैं। गरीब भूखे पेट सो रहे हैं तो वे पंचमेवा, सोलह तरह के फल बत्तीस तरह की मिठाई और छप्पन तरह के भोग खा रहे हैं। नया गणनेता चुनने का बखत हुआ तौ यही तेरह स्याणे मिलीभगत कर पर्ची से अपने ही बीच से किसी को राष्ट्रप्रमुख चुनवा लेते हैं। और आप को तो पता ही है कि अंधा बाटे रेवडियां, तो फिर फिर अपनों को दे।

‘मनुख की जात तो जनम से मरण तक गुण दुर्गुण का पिटारा है भाई। उसे तो तूने इसी वजह से त्याग दिया। चल धरम करम समाज की सुना।’ भगवान बोले।

‘अरे जैसे राष्ट्रप्रमुख, तैसा दरम और धरम के ठेकेदार। सरकारी साधुओं के ज्यादेतर अखाड़े स्याणों के चंदे से भ्रष्टाचार के अड्डे बने हुए देखे। इधर एक धूर्त की दुकान खूब चल रही है जिसने तरह तरह के द्रविड प्राणायाम दिखा कर तेरहों स्याणों को अपना मुरीद बना रखा है। अभी हाल उसके लामबंद शिष्यों ने गरीबों को उनकी अपनी ज़मीन से बेदखल कराया। फिर राजकोष से पैसा लेकर उसने उस जगह मंदिर बनवाया। वहाँ सेठ स्याणों के पैसे से  भंडारा किया। जिन्ने उसे चंदा दिया उसे राज कर से माफी दिला दी। ये है धरम का हाल!’

‘देख यार दुनिया तो यूं ही चाल्लेगी पण तू किसी खास के लिये कुछ कहने आया है सो कह डाल!’ भगवान बोले।

‘उस गणतंत्र में एक सुबिया भिखारी नाम का खानदानी गरीब है। दिन भर माँग करके भी उनको डेढ पाव आटा मुश्किल से जुटता है। उनका कुल्ल खाना यानी रूखी सूखी डेढ रोटी खा कर मैं आ रहा हूं। फिर भी चेहरे पर शिकन नहीं। पूछा तो बोला, ‘गरीबी अमीरी सबके पीछे भगवान का हाथ है। हम मनुख क्या शिकायत करें?’

‘आपको अपने हाथ की आन। कोई मदद तो उसको मिलनी ही चाहिये।’

‘हूं,‘ भगवान बोले। ‘देख यार, अकारण कुछ नहीं होता। ये खाता देखते हो? इसमें दर्ज है कि पिछले जनम में यही सुबिया बडा ही कंजूस नगरसेठ और स्याणा होता था। सारे जनम भर उसने खूब माल कमाया, अपनी पसंद के राष्ट्रप्रमुख चुनवाये, पर दान में खरच किया कुल डेढ रुपया। यही वजह है कि मंहगाई अडजस्ट करके भी मेरे भले-बुरे के खाते में इस जनम में रोजीना उसके हिस्से केवल डेढ पाव आटा ही आउटस्टैंडिंग बनता है।

‘खैर तू पुराना यार है सो तेरी बात नहीं टालूंगा। यह ले डेढ रुपया और उसे कह, कि इस जनम में इससे जितना उसे मिले, उसका बडा हिस्सा वह गरीबों को बाँट दे। धरती पर वो जितना दान देगा उसका ठीक दुगुना मैं यहाँ से नीचे किसी न किसी निमित्त से मृत्युलोक के उसके अकौंट में भेज दूंगा।’

सुबिया के हिस्से का वह डेढ रुपया लेकर बाबा जी स्वर्ग से लौट कर फिर सुबिया के घर गये। और उसे वह रुपया देकर दान पुन्न की बाबत भगवान का संदेसा कह सुनाया। सुबिया गद्गद् हो गया।

अगले दिन सुबिया भीख मांगने नहीं गया। उसने भगवान के भेजे डेढ रुपये के फूल खरीदे और राजपथ पर जा बैठा। भगवान का हाथ देखिये उसी समय नगर कोतवाल का पद पा गये महामहिम की सवारी-शोभायात्रा निकल रही थी। सेठों को तो निरंतर नगर कोतवाल से कुछ काम निकलवाना होता है। सो कोतवाल पर फेंकने के लिये सुबिया के सारे फूल मुंहमांगा दाम दे कर खरीद लिये गये। छतों से फूल बरसाये गये, कोतवाल साहिब स्याणों में शुमार भये। और सुबिया के हाथ आ गये दस रुपये!

बाबा हो! इतना पैसा तो उसने कभी एकमुश्त देखा भी न था।

लेकिन सुबिया को बाबा की दान पुन्नवाली बात याद थी। उसने दस में से छ: रुपये तो साथी भिखारियों को बाँट दिये और चार रुपये का आटा और नमक मिर्च तेल खरीद कर घर गया।

कई दिनों बाद उसने और उसकी बीबी ने दो दो रोटियाँ खूब सवाद ले ले कर खाईं।

इसके बाद सुबिया की आमदनी और उसके दान की राशि लगातार बढती चली गई। पुश्तैनी भिखारी था सो उसका उठना बैठना तो सदा से भिखारियों और सडक छाप गरीबों के बीच ही का रहा था। रोज़ाना दान की राशि भी वह उनको ही देता। भिखारियों के बीच उसे झोला भर लाइक्स मिलने लगीं।

पर माल ए मुफत, दिल ए बेरहम! होते होते शहर के सारे भिखारी और सडकछाप लोग मुफत का खूब सारा माल खा खा कर मुश्टंडे आलसी बन गये। दिन भर सोते या मटरगश्ती करते। उनकी बीबियाँ बी दिन भर खाट तोड़तीं। उधर वादे के मुताबिक सुबिया को उसके बनिज व्यापार की मार्फत भगवान की तरफ से उसके मूल दान से दूनी ग्रांट आती रही।

गरीब ठलुए बन गये तौ धीमे धीमे सेठ लोगों के कारोबार चौपट होने लगे। दू बखत के खाने और चार पैसे में दिन भर घर से कारखाने तक काम को राज़ी होनेवाले मजूर, राजमिस्तरी, रसोइये, झाडूदार सुबिया के दान से तृप्त हो कर फिरते थे।

‘देंदा है रब सडने दे सब। पता नहीं क्यूं?’ स्याणों सेठों को और भी चिढाने को उनने शहर में जगह जगह लिख दिया।

एक दिन आया जब सुबिया शहर का सबसे अमीर आदमी बन गया। नगर के बडे लोगों की बैठक हुई। सबके हाथ तंग। कारखाने बंद हो रहे थे। गणतंत्र को मालदार राष्ट्रप्रमुख की जरूरत थी। तय हुआ कि इस बार सुबिया को ही राष्ट्रप्रमुख बनाया जाये। गरीब अनपढ ही सही। हुनरमंद तो हैगा। देखो न राजपथ पर फूल बेचने से शुरुआत कर कित्ता बडा मनुख बन गया! अब उसे सुबिया कोई न कहेगा, सब उसको सूबेदार सिंह जी कहेंगे, यह भी तय हुआ।

सो सुबिया अब सर्वसम्मति से गणतंत्र का राष्ट्रप्रमुख चुन लिया गया। दरबार जाता तो मंत्री से संत्री तक सब सलाम मार कर पूछते ‘ठाकुर सा’ब अच्छे तो हैं न?’ सुबिया खुश!

अब साधु एक बार फिर भगवान से मिल कर उनको थैंक्स कहने सुरग पहुंचे। यह क्या ? देखते हैं कि बही खातों पर झुके उनके मितर पियारे भगवान के बाल कास के फूलों जैसे सफेद हो चुके हैं और पीठ झुक कर कमान।

भगवान बोले ‘यार, तूने तो बडी मुसकिलात में डाल दिया मुझे। उस सुबिया के दान पुन्न से उसकी मेंटेनेंस पर मेरा खरच इतना बढ गया है कि सुरग का खज़ाना भी बिलकुल ही खाली हो चला है। चंचला लछमी लगता है धरती पर सेठ सूबेदार सिंग यानी सुबिया के ही घर जा बैठी है। और अब उसका पैसा सुरग के पैसे को भी खींच रहा है। अब जैसे हो तुझे ही कुछ करना होगा वरना सुरग के खजाने का तो दिवाला पिट जायेगा।’

साधु बोले, ‘चिंता मत करियो, कल का भिखारी सुबिया अब सेठों स्याणों के संग बैठने लगा है। संगत के असर से समस्या खुद्दै सुलझ जावेगी।’

अब स्याणे समय समय पर राजकाज की बाबत सुबिया से मिलते बैठकें करते रहते। एक बड़ी बैठक में सबसे पुराने स्याणा बोला: ‘सूबेदार सिंग महाराज आप बहुत अच्छा कमा रहे हैं जिससे हम सबको भारी खुशी है। पर सुनते हैं आप रोजीना का खर्च छोड कर बाकी सब गरीबों पर लुटा रहे हो।

‘हमको आपकी और आपकी पत्नी की चिंता है कि बाल बच्चे हैं नहीं, आगे के लिये कुछ भी धन बचा काहे नहीं रहे हैं? अरे जब बुढापा घेर लेगा तो सेवा टहल की जरूरत पडेगी। खाने पीने के दवा दारू के दसियों तरह के खर्चे होंगे। उनके लिये हमारी नेक सलाह के है, आप पूछें तो हम बतावें।’

सुबिया बोला, ‘जरूर जी। बोलिये।’

अब सबसे खुर्राट नगर सेठ ने कमर बंद में खुंसा एक प्रस्ताव निकाला और पढना शुरू किया:

‘परम आदरणीय राष्ट्रप्रमुख जी को स्याणों सेठों की मंडली की सलाह है कि वे गरीबों को खुदरा मदद देना बंद करें और धन अन्नादि बाँटने को एक बडा सा केंद्रीय कोष बनायें। उसका नाम हो, ‘सूबेदार सिंग सर्वजनहिताय कोष’। आप उसी में अपनी सारी बचत डालना शुरू कर दें, हम सब भी आपके आदेशानुसार अपने मुनाफे का आधा हिस्सा उसमें देंगे।’ सब सहमत हुए। इन दिनों किसी को कोई मुनाफा हो नहीं रहा था, सो हरज ही क्या था?

‘पर हम वह धन कैसे, किस आधार पर वितरित करेंगे?’

स्याणे हंसे। हंसे और बोले, ‘आपजी बहुत भोले हैं। यह रहा प्रस्ताव का दूसरा भाग। निम्नलिखित छोटी छोटी जनहितकारी मदों में कोष का थोडा थोडा पैसा आवंटित होगा जो गरीबों को आत्मनिर्भरता का पाठ पढायेगा:

-गली के आवारा कुत्तों–गायों को खाना देने को कुछ ‘श्वान रसोइयां’ और कांजी हौस।

-जन शौचालयों का निर्माण जिनमें पानी तथा सफाई की व्यवस्था लाभार्थी खुद करेंगे।

-कूडेदानों से बीने और साफ किये कच्चे माल से खिलौना निर्माण प्रोत्साहन।

-ठेलों पर पुओं या पकौडों या अन्य खाने पीने की चीज़ों के ठेले लगाने के स्थलों का निर्माण।

-इन सारे नव उपक्रमियों को प्रोत्साहन देने के लिये विभिन्न संसदीय समितियां बनवाई जायेंगी। हर हफ्ते उनकी भी बैठकें होंगी। सारी समितियों के खूब आकर्षक नाम होंगे तथा वे फैसला जब चाहे लें परंतु मीटिंग नियमित रूपेण करती रहेंगी। के.सू.स. कोष की तरफ से उनको चाय पानी मिष्ठान्न तथा आवाजाही का भाड़ा देय होगा।’

अंतिम बात: ऐसी सभी छोटी योजनाओं के नामपट्ट राष्ट्रप्रमुख अपनी छवि सहित नगर में हर जगह लगवा दिये जायेंगे, ताकि ऊपर से भगवान भी देखें कि यह गणतंत्र के.सू. स. कोष की मार्फत जनहित में कितना खर्च कर रहा है।’

सुबिया को बात जंची। अगले दिन से ही यह शुरू हो गया। कोष खूब हंगामी प्रचार सहित शुरू हुआ और अनगिनत योजनायें बनने लगीं!

सुबिया और उसकी पत्नी अब लगातार यही कोशिश करते कि उनका बुढापे का सुरक्षाचक्र यह कोष बना रहे। पर चूंकि सारा खर्चा मीटिंगों योजनाओं में खरच हो रहा था, तो इससे गरीबों तक पहले की तरह सीधे पैसा जाना मंद पड़ा फिर बंद हो गया। अब शहर में मुफत के माल को खा खा कर गैंडे बन गये कटखने कुत्तों और मरखनी आवारा बूढी गायों साँडों के पेट खाली हुए तो उनका आतंक बढ चला। अनेक स्याणों को या तो कुत्तों ने काट खाया या गायों ने सींग मार दिये।

उधर के. स.सू.सं. बनने के बाद खुद स्याणों का कम मजूरी पर कारखानों का कामकाज दोबारा बढने लगा था। अपना पुराना कारोबार बहाल करने में लगे जो सेठ-स्याणे पहले मुनाफा न होने पर रोते थे, अब मुनाफा कमाने लगे।

पर सड़कों की बदहाली, पशुओं का आतंक तथा सीमा असुरक्षा के बहाने नाराज़गी का नाटक रते हुए वे सब कें. सू.स. कोष को अपने मुनाफे का आधा हिस्सा देने से मुकर गये।

सुबिया ने गरीबों को जब खुद देना बंद किया तो भगवान ने भी सुबिया के नाम पैसा भेजने से हाथ  खींचना शुरू कर दिया। अब सुबिया सोना भी छूता तो मिट्टी बन जाता। लंका से, बंगाल की खाडी और नेपाल हर जगह से आते उसके कई मालवाही काफिले लुट गये और कुछ जहाज़ डूब गये। फूलों की फसल को पाला मार गया। धान की खड़ी फसल बाढ में बह गई। कल तक उसके नाम की माला जपनेवाले पड़ोसी भिखारी भी उसके घर के आगे कचरा फेंकने पर उतर आये।

यह सुन कर कि स्याणे सेठ नया राष्ट्रप्रमुख चुनने जा रहे हैं, सुबिया बैठक में पहुंचा तो उसे एक निचले ओहदेदार ने बाहर ही समितियों के खर्चे की लंबी फेहरिस्त थमा कर बताया कि कें.सू.सं.कोष एकदम खाली हो गया है। उससे शासन संभल नहीं रहा लिहाज़ा नया व्यक्ति चुना जायेगा। वह इज़्ज़त से वापसी चाहता है, तो चुपचाप घर चला जाये।

बेचारा सुबिया फिर मित्रहीन और कंगाल हो कर दोबारा भीख मांगने निकलने को मजबूर हो गया।

फलादेश : भगवान की ओट में अंटशंट काम किया, तो एक दिन वह भी तंग हो कर अपना हाथ तंग कर देगा।

फिर सुबिया भिखारी की ही तरह तुम भी जनता और स्याणों का गुस्सा तुम एकसाथ जानो और भुगतोगे! हां नहीं तौ!’

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