‘देस’ की तलाश में मैथिली सिनेमा

मैथिली सिनेमा पर एक अच्छा लेख ‘प्रभात खबर’ के दीवाली विशेषांक में आया है। लिखा है लेखक-पत्रकार अरविंद दास ने। जिन्होंने न पढ़ा हो उनके लिए साभार प्रस्तुत कर रहे  हैं-

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वर्ष 1937 में ‘न्यू थिएटर्स’ स्टूडियो की ‘विद्यापति’ फिल्म खूब सफल रही थी. देवकी बोस के निर्देशन में बनी यह फिल्म खास तौर से गीत-संगीत के लिए आज भी याद की जाती है. मैथिली के आदि कवि विद्यापति (1350-1450) के गीतों की संगीतात्मकता प्रसिद्ध है. आश्चर्य की बात यह है कि इस फिल्म में गीत विद्यापति के नहीं थे, न ही फिल्म की भाषा ही मैथिली थी. यह फिल्म हिंदी-बांग्ला में बनी थी. मिथिला अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है, पर आधुनिक समय में फिल्मों में इस समाज की लगभग अनुपस्थिति एक प्रश्नचिह्न बनकर खड़ी है.

जहाँ बोलती हिंदी फिल्मों के साथ-साथ ही बांग्ला और असमिया सिनेमा विकसित होनी शुरू हुई, वहीं मैथिली में सिनेमा का इतिहास आजादी के बाद 60 के दशक में शुरु होता है. ‘नैहर भेल मोर सासुर’ नाम से पहली मैथिली फिल्म वर्ष 1963-64 में बननी शुरु हुई, जिसके निर्देशक सी परमानंद थे. बाद में यह फिल्म काफी कठिनाइयों को झेलती हुई ‘ममता गाबय गीत’ नाम से 80 के दशक के मध्य में रिलीज हुई थी, जिसे लोग गीत-संगीत और मैथिली संवाद के लिए आज भी याद करते हैं. इस फ़िल्म में महेंद्र कपूर, गीता दत्त और सुमन कल्याणपुर जैसे हिंदी फ़िल्म के शीर्ष गायकों ने आवाज़ दी थी और मैथिली के रचनाकार रविंद्र ने गीत लिखे थे. ‘अर्र बकरी घास खो, छोड़ गठुल्ला बाहर जो’, ‘भरि नगरी मे शोर, बौआ मामी तोहर गोर’ के अलावे विद्यापति का लिखा-‘माधव तोहे जनु जाह विदेस’ भी इस फिल्म भी शामिल था.

मैथिली में पहली फिल्म होने का श्रेय ‘कन्यादान’ फिल्म को है. वर्ष 1965 में फणी मजूमदार ने इस फिल्म का निर्देशन किया था. हरिमोहन झा के चर्चित उपन्यास ‘कन्यादान’, जिस पर यह फिल्म आधारित है, का रचनाकाल वर्ष 1933 का है. इस फिल्म में बेमेल विवाह की समस्या को भाषा समस्या के माध्यम से चित्रित किया गया है. चर्चित लेखक फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ इस फिल्म से संवाद लेखक के रूप में जुड़े थे. फिल्म में मैथिली के साथ हिंदी का भी प्रयोग था. इस फिल्म के गीत-संगीत में प्रसिद्ध लोक गायिका विंध्यवासिनी देवी का भी योगदान था. इसके बाद ‘जय बाबा वैद्यनाथ (मधुश्रावणी)’ फिल्म 70 के दशक के आखिर में प्रदर्शित हुई लेकिन इस फिल्म में भी मैथिली के साथ हिंदी का प्रयोग मिलता है.

इन दो फिल्मों के अलावे ‘सस्ता जिनगी महग सेनूर’, ‘कहन हरब दुख मोर’ ‘घोघ में चाँद’ आदि इक्का-दुक्का फिल्में प्रदर्शित हुई, जिसकी छिटपुट चर्चा की जाती रही है. हालांकि इनमें कोई आलाोचनात्मक दृष्टि या सिनेमाई भाषा नहीं मिलती है, जो मिथिला के समाज, संस्कृति को संपूर्णता में कलात्मक रूप से रच सके. इनमें से ज्यादातर फिल्में सामाजिक विषयों के इर्द-गिर्द ही रही, एक-दो फिल्में धार्मिक-पौराणिक महत्व के रहे.

जब भी बिहार के फिल्मों की बात होती है, भोजपुरी सिनेमा का ही जिक्र किया जाता है. मैथिली फिल्मों की चलते-चलते चर्चा कर दी जाती है. जबकि पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पिअरी चढैबो’ और ‘ममता गाबए गीत’ का रजिस्ट्रेशन ‘बाम्बे लैब’ में वर्ष 1963 में ही हुआ और फिल्म का निर्माण कार्य भी आस-पास ही शुरू किया गया था. इस फिल्म में निर्माताओं में शामिल रहे केदारनाथ चौधरी बातचीत के दौरान हताश स्वर में कहते हैं-‘भोजपुरी फिल्में कहां से कहां पहुँच गई और मैथिली फिल्में कहां रह गई!’ लेकिन, यहां इस बात का उल्लेख जरूरी है कि भोजपुरी और मैथिली फिल्मों के अतिरिक्त साठ के दशक में फणी मजूमदार के निर्देशन में ही ‘भईया’ नाम से एक मगही फिल्म का भी निर्माण किया गया था. पचास-साठ साल के बाद भी मैथिली और मगही फिल्में विशिष्ट सिनेमाई भाषा और देस की तलाश में भटक रही है.

केदार नाथ चौधरी ‘ममता गाबय गीत’ फ़िल्म के मुहूर्त से जुड़े एक प्रंसग का उल्लेख करते हुए अपनी किताब ‘आबारा नहितन’ में लिखते हैं कि जब वे फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ से मिले (1964) तो उन्होंने मैथिली फ़िल्म के निर्माण की बात सुन कर भाव विह्वल होकर कहा था-‘अइ फिल्म केँ बन दिऔ. जे अहाँ मैथिली भाषाक दोसर फिल्म बनेबाक योजना बनायब त’ हमरा लग अबस्से आयब. राजकपूरक फिल्मक गीतकार शैलेंद्र हमर मित्र छथि (इस फ़िल्म को बनने दीजिए. यदि आप मैथिली भाषा में दूसरी फ़िल्म बनाने की योजना बनाए तो मेरे पास जरूर आइएगा. राजकपूर की फ़िल्मों के गीतकार शैलेंद्र मेरे मित्र हैं)’.

इस फ़िल्म के निर्माण के आस-पास ही रेणु की चर्चित कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर ‘तीसरी कसम’ नाम से फ़िल्म बनी. इस फ़िल्म में मिथिला का लोक प्रमुखता से चित्रित है और फ़िल्म में एक जगह तो संवाद भी मैथिली में सुनाई पड़ता है. क्या ‘तीसरी कसम’ मैथिली में बन सकती थी? केदारनाथ चौधरी कहते हैं कि ‘निश्चित रूप से. यदि ‘तीसरी कसम’ फिल्म मैथिली में बनी होती तो मैथिली फिल्म का स्वरूप  बहुत अलग होता.’ यह सवाल भी सहज रूप से मन में उठता है कि यदि ‘विद्यापति’ फिल्म मैथिली में बनी होती तो मैथिली फिल्मों का इतिहास कैसा होता?

फिल्म नगरी बंबई में शुरुआती दौर से बिहार के कलाकार मौजूद रहे हैं और विभिन्न रूपों में अपना योगदान देते रहे हैं. प्रसंगवश, ‘ममता गाबय गीत’ के निर्देशक सी परमानंद की एक छोटी सी भूमिका ‘तीसरी कसम’ फिल्म में थी. साथ ही बिहार में भी सिनेमा देखने की संस्कृति शुरुआती दौर से रही है. भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों के इतिहास में जब भी पुरोधाओं का जिक्र किया जाता है, तब दादा साहब फाल्के के साथ हीरा लाल सेन, एसएन पाटनकर और मदन थिएटर्स की चर्चा होती है. मदन थिएटर्स के मालिक थे जेएफ मदन. एल्फिंस्टन बायस्कोप कंपनी इन्हीं की थी. पटना स्थित एल्फिंस्टन थिएटर (1919), जो बाद में एल्फिंस्टन सिनेमा हॉल के नाम से मशहूर हुआ, में पिछली सदी के दूसरे-तीसरे दशक में मूक फिल्में दिखायी जाती थीं. आज भी यह सिनेमा हॉल नये रूप में मौजूद है.

पर जहां तक सिनेमा के सरंक्षण और पोषण का सवाल है, बिहार का वृहद समाज और सरकार उदासीन ही रहा है. एक उदाहरण यहाँ पर देना प्रासंगिक होगा. पहली फिल्म ‘कन्यादान’ के प्रिंट आज अनुपलब्ध हैं. इस सिलसिले में जब मैंने पुणे स्थित ‘नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया’ से संपर्क साधा तो उनका कहना था कि उनके डेटा बैंक में ऐसी कोई फिल्म नहीं है. मनोरंजन के साथ-साथ फिल्म का सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व होता है. सिनेमा समाज की स्मृतियों को सुरक्षित रखने का भी एक माध्यम है. फिल्मों के खोने से आने वाली पीढ़ियाँ उन संचित स्मृतियों से वंचित हो जाती है.

पिछले दो दशकों में भारतीय सिनेमा में क्षेत्रीय फ़िल्मों की धमक बढ़ी है. भूमंडलीकरण के साथ आई नई तकनीकी, मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर और कला से जुड़े नवतुरिया लेखक-निर्देशकों ने सिनेमा निर्माण-वितरण को पुनर्परिभाषित किया है. जहाँ कम लागत, अपने कथ्य और सिनेमाई भाषा की विशिष्टता की वजह से मराठी, पंजाबी, मलयालम फ़िल्में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल रही है, वहीं भारतीय सिनेमा के इतिहास में फुटनोट में भी मैथिली फ़िल्मों की चर्चा नहीं मिलती.  यहाँ तक कि पापुलर फ़िल्मों में भी भोजपुरी फ़िल्मों की ही चर्चा होती है.

हाल के वर्षों में नितिन चंद्रा निर्देशित ‘मिथिला मखान’ (2015), रूपक शरर निर्देशित ‘प्रेमक बसात’ (2018), और अचल मिश्र निर्देशित ‘गामक घर’ (2019) की मीडिया में चर्चा हुई है. ‘मिथिला मखान’ मैथिली में बनी एक मात्र ऐसी फ़िल्म है जिसे मैथिली भाषा में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है. साथ ही ‘गामक घर’ फिल्म को भी फिल्म समारोहों में सराहा गया और यह भी पुरस्कृत हुई. ‘गामक घर’ एक आत्म-कथात्मक फिल्म है, जिसके केंद्र में दरभंगा जिले में स्थित निर्देशक का पैतृक घर है. यह फिल्म एक लंबी उदास कविता की तरह है. मैथिली सिनेमा में ‘गामक घर’ जैसी फिल्मों की परंपरा नहीं मिलती. निर्देशक ने घर के कोनों को इतने अलग-अलग ढंग से अंकित किया है कि वह महज ईंट और खपरैल से बना मकान नहीं रह जाता. वह हमारे सामने सजीव हो उठता है. डॉक्यूमेंट्री और फीचर फिल्म की शैली एक साथ यहां मिलती है. इस तरह की फिल्में मैथिली सिनेमा को कला प्रेमियों और देश-विदेश के समीक्षकों की नजर में लाने में कामयाब है.

हालांकि इन फिल्मों को लेकर वितरकों में कोई  उत्साह नहीं है. नितिन चंद्रा कहते हैं कि ‘वितरक यह भी नहीं जानते कि मैथिली नाम से कोई भाषा है जिसमें फिल्में बनती हैं. हमने इस भाषा में अब तक कुछ खास बनाया ही नहीं!’ वे कहते हैं कि यहाँ तक कि ऑनलाइन प्लेटफार्म (हॉटस्टार, नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, जी 5 आदि) पर भी मिथिला मखान को कोई प्रदर्शित करने को राजी नहीं हुआ तब उन्होंने खुद इसे एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर रिलीज करने का फैसला किया. नितिन चंद्रा इस फिल्म के प्रचार-प्रसार के लिए लोगों से चंदा (क्राउड फंडिंग) भी मांग रहे हैं, पर परिणाम उत्साहजनक नहीं रहा है. ‘ममता गाबय गीत’ को भी अपने जमाने में वितरक नहीं मिल पाया था. ऐसा लगता  है मैथिली सिनेमा इन दशकों में एक बाजार विकसित करने में नाकाम रहा है. मिथिला में कोई माहौल नहीं दिखता.

दरभंगा-मधुबनी जैसी जगहों पर दो दशक पहले तक सिनेमा प्रदर्शन के लिए जो सिनेमाघर थे वे भी लगातार कम होते गए. जो भी सिनेमाघर बचे हैं वहाँ भोजपुरी फिल्मों का प्रदर्शन ही होता है. मिथिला से बाहर देश-विदेश में जो मैथिली भाषा-भाषी हैं वे अपनी भाषा और संस्कृति को लेकर उत्साही नहीं हैं, भले ही वर्ष 2004 में संविधान की आठवीं अनुसूची में इसे शामिल कर लिया गया हो. हिंदी के वर्चस्व को लोगों ने बिना किसी दुविधा के स्वीकार कर लिया है. मनोरंजन के लिए ये बॉलीवुड की ओर ही देखते रहते हैं और इनमें मैथिली सिनेमा को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं दिखती हैं. साथ ही मैथिली भाषा पर एक जाति विशेष की भाषा होने का आरोप लगता रहा है. क्या मैथिली सिनेमा का विकास नहीं होने की एक वजह यह भी तो नहीं?

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