जासूसीपन, थ्रिलरपन और रहस्यपन का रोचक कथानक ‘नैना’

संजीव पालीवाल के उपन्यास ‘नैना’ पर टिप्प्पणी जानी-मानी लेखिका नीलिमा चौहान ने लिखी है। एक रोचक और बेहद पठनीय उपन्यास की बहुत रोचक, पठनीय और विचारोत्तेजक समीक्षा। आप भी पढ़ सकते हैं-

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हाल के वर्षों में उपन्यास विधा के साथ दो सुंदर हादसे हुए हैं। एक तो यह कि उपन्यास का बड़ी तेज़ी से पारंपरिकता की गिरफ्त से निकलना हुआ है। दूसरा जिस तरह के उपन्यासों को पल्प और उपन्यासकारों को पल्पकार कहकर गैर साहित्यिक और गैर साहित्यिक कहकर उपेक्षित किया गया उस तरह के उपन्यासों और उपन्यासकारों ने अपने पाठक, अपने रसिक, अपने दयार और अपने पैमाने गढ़ लिए। साहित्य के विकेंद्रीकृत और परिधि मुक्त होने के इस दौर में हिंदी में नये अफसानानिगारों के साथ नये नवेले पाठक वर्ग का पनपना भी मुमकिन हुआ।

संजीव पालीवाल का लिखा उपन्यास ‘नैना’ पढ़ने के बाद हिंदी उपन्यास विधा की इस उपलब्धि पर ध्यान जाता है। यह उपन्यास एक मर्डर मिस्ट्री है। जासूसीपन, थ्रिलरपन और रहस्यपन को समेटे हुए इसके कथानक में रोचकता शुरू से अंत तक बरकरार रहती है। एक मशहूर एंकर की हत्या के रहस्य के इर्द गिर्द रची गई इसकी कथा की खासियत है के यह अपने साथ विधागत औऱ सम्वेदनागत और भी परतों को लिए हुए है। एक कथा को रचते हुए एक जॉनर को संभालते हुए सबजॉनर को भी रचते चलना। एक मर्डर मिस्ट्री होते हुए भी मीडिया की दुनिया की तमाम खोह खाइयों से गुजरते चलना। एक स्त्री के सफल, निर्भीक ,महत्वाकांक्षी ,स्थापित कामकाजी स्त्री होने की सामाजिक दुश्वारियों को उघाड़ते चलना। पॉप्युलर और आभिजात्य साहित्य के बीच एक नया रास्ता रचते हुए चलना। यह एक खास हुनरमंदी का काम है। पाठक की सम्वेदना को दोनों किनारों तक लेकर जाना और आस्वाद्यता को सुनिश्चित रखते चलना एक अभ्यास का साधना का काम है। यह जानकर हैरानी होती है कि यह लेखक का पहला उपन्यास है।

यह भी सराहना का बिंदु है कि जासूसी उपन्यासों के तत्वों के आधार पर समीक्षा का इच्छुक कोई समीक्षक भी शायद यही पाएगा कि उपन्यास कहीं भी चूकता नहीं है। कब कहाँ कैसे किसने किसलिए के सवाल पाठकीय उत्सुकता और जिज्ञासा को जगाते भड़काते रहते हैं। अपराध के ब्यौरे तफसीलें सही जगह सही अनुपात में प्लांटिंड हैं। पाठक के जासूसी मन को संकेत भी देना और भटका भी देने की टाइमिंग। सस्पेक्ट की संख्या न कम न ज़्यादा होते हुए अभियुक्त के खुलासे को प्रामाणिक बनाए रखने में कामयाब होना। सीमलेसली, कोई सीवन दिखे बिना कथा को बुनना। यदि अपनी आलोचकीय दृष्टि को बेहद सक्रिय कर देखना चाहा तो लगा कि एक बात जो क्राइम मिस्ट्री को और सशक्त बना सकती थी वह गुम प्राय है। प्रोटोगोनिस्ट के चरित्र को भी मजबूती से उभारना। उपन्यास के मध्य में नैना की हत्या के बाद इंसपेक्टर समर को इंट्रोड्यूज करना और उपन्यास के एकदम अंत में उसके चरित्र के बारे में मजबूत खुलासा करना। मैं मर्डर मिस्ट्री नहीं पढ़ती रही हूँ और न ही कभी ऐसी कोई आलोचकीय टिप्पणी की चेष्टा ही की है पर सुरेंद्र मोहन पाठक के उपन्यासों में सुनील, सुधीर, विमल जैसे प्रोटोगोनिस्ट पाठक की याद में इसलिए ताज़ा रहे हैं कि उनको स्थापित करने और उनके कंट्रास्ट में बुरे और बुराई का खात्मा होते देखने की आकांक्षा से पाठक का साधारणीकरण बेहतरीन तरीके से हो पाता है। नैना में नैना की तो हत्या हो जाती है तो उसके पश्चात केवल इंस्पेक्टर समर ही वह पात्र हो सकता था जिसकी दृष्टि से, चेतना से, लक्ष्य से पाठक को मुतास्सिर होना है। इसलिए उसके चारित्रिक पक्ष को स्थापित करने में खास ध्यान दिया जा सकता था। इस बात की भी दाद देनी होगी कि लेखक ने उपन्यास की भाषा एकदम सरल रखी है। उपन्यास में एक दो जगह भाषिक प्रयोगशीलता के अलावा प्रचलित शब्दावली का इस्तेमाल करते हुए लगातार हिंदी के उस पाठक वर्ग का ध्यान रखा है जो दुष्कर हिंदी से घबराया हुआ हिंदी के ह से भी आंखें फेर लेता होता है। बहुत सी पंक्तियां ऐसी हैं जो कलम से रेखांकित करते हुए सहेज लेने लायक हैं। इंस्पेक्टर समर द्वारा प्राइम सस्पेक्ट नेता राघवेंद्र प्रताप से तफ्तीश करने वाले दृश्य में नैना से मुलाकात के सिलसिले के बारे में खुलासा करते हुए राघवेंद्र, नैना से हुए अपने संवाद को हूबहू सुनाते हैं वह भी शेरोशायरी सहित। संवाद शैली की जगह वर्णन शैली अधिक उपयुक्त हो सकती थी। इस प्रसंग के अलावा संवाद बेहद सशक्त और त्वरित हैं। पात्र व मनस्थिति को बयान करने वाले और कथानक को गति देने वाले। उपन्यास एक चुस्त सम्पादित फिल्म की तरह बीतता है और जिज्ञासा को सघन बनाए रखते हुए पाठक को बांधे रखने में कामयाब होता है। नैना वशिष्ठ में ‘मुझे चाँद चाहिए’ की वर्षा वशिष्ठ को देखा जा सकता है । ‘आधे अधूरे’ की सावित्री को देखा जा सकता है। मन्नू भंडारी की ‘आपका बंटी’ की शकुन को देखा जा सकता है। नैना के गर्भ में किसकी संतान थी यह रहस्य अंत तक नहीं खोला गया है और इस तरह उपन्यासकार एक बेहद सशक्त संदेश पैदा कर सका है। एक मर्डर मिस्ट्री के मिस यह एक स्त्रीवादी उपन्यास भी है। इस कथा में एक स्त्री के महात्वाकांक्षी स्त्री होने के बीच के रास्ते और बाद के नतीजे की शिकार नैना का जीवन एक त्रासदी की तरह ही नहीं एक बेहद तीखे असुविधाजनक सवाल की तरह भी दर्ज होता है।

कुल मिलाकर ‘नैना ‘पठनीयता के बेहद ज़रूरी पैमाने पर खरा साबित होने वाला उपन्यास है। कल दोपहर उठा लिया था फिर देर रात पढ़कर और आज दोपहर इस टिप्पणी को लिखकर ही रखा जा सका।

(उपन्यास वेस्टलैंड से प्रकाशित है।)

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