पति, पत्नी और वो का मुकदमा और ‘रुस्तम’

नानावती के प्रसिद्ध मुकदमे को लेकर फिल्म आई है ‘रुस्तम’. पति, पत्नी और वो की इस कहानी को देखने का नजरिया भी समय के साथ बदलता जा रहा है और इसकी व्याख्या भी. ‘रुस्तम’ की एक आलोचनात्मक समीक्षा लेखिका दिव्या विजय ने लिखी है- मॉडरेटर.
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सीपिया शेड की यह फ़िल्म बाहर से आकर्षक लगती है।  पर मनोरंजक होने का प्रयत्न करते हुए यह सतही हो उठती है। रुस्तम देखने के बाद सोच में पड़ जाया जाए यह ऐसा सिनमा क़तई नहीं है। यह एक सनसनीख़ेज़ घटना को भौंडेपन की चाशनी में लपेटने की कोशिश भर है.
सन १९५९ के चर्चित नानावटी केस पर बनी यह फ़िल्म उस केस का पोस्टमार्टम करती प्रतीत होती है। उस दौरान अपनी पत्नी सिल्विया का सम्बंध अपने ही मित्र प्रेम आहूजा से होने के कारण नौसेना के अफ़सर कमांडर के.एम. नानावटी ने, अपने मित्र की हत्या उसके सीने में तीन गोलियाँ उतार, कर दी थी. तत्पश्चात उन्होंने अपने जुर्म का इकबाल किया था जिसके एवज़ में उन पर मुक़दमा चलाया गया. इस ट्रायल कोर्ट के ज्यूरी मेंबर्स ने उन्हें सहानुभूतिवश निर्दोष क़रार दिया. मुक़दमा हाई कोर्ट में स्थानांतरित हुआ जहाँ उन्हें उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई गयी. इसके खिलाफ नानावटी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की मग़र सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फ़ैसला बरक़रार रखा. अंत में नानावटी की क्षमादान याचिका तत्कालीन गवर्नर तथा पंडित जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित के पास पहुँची जिसे पब्लिक ओपिनियन को मद्देनज़र रखते हुए स्वीकार कर लिया गया.  पब्लिक ओपिनियन बनाने में बड़ा हाथ तब के समाचार पत्र  ब्लिट्ज का भी था. अभूतपूर्व मीडिया कवरेज के परिणामस्वरूप इस केस का निर्णय बदल गया.
यह सारा प्रकरण न सिर्फ अपनी विषयवस्तु के कारण बल्कि विस्तृत मीडिया कवरेज, सिंधीपारसी समुदाय की भागीदारी के कारण आम लोगों की दिलचस्पी बटोरने में सक्षम रहा था.
फ़िक्शन होने का दावा करने वाले चलचित्र इतिहास की घटनाओं को उठाते हैं और उनमें मनमाने घटक जोड़ते घटाते  हैं। सिनमा एक उदार माध्यम है और इस तरह के प्रयोगों के लिए कोई रोक नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर यही घटक सारहीन न होकर सार सहित हों तो अधिक अपील करेंगे।
मसलन, कोर्ट में गवाही देने आयी घरेलू हेल्पर जब चीख़ कर दलील देती है कि बाहर काम पर गए आदमी की बीवी के साथ अगर कोई चक्कर चलायेगा तो  उसका हश्र यही होना चाहिए तो कोर्टरूम तालियों से गूँज उठता है। उसके बाद उसका जज से प्रश्न कि अगर आपकी बीवी के साथ इस वक़ील का चक्कर होगा तो आप क्या करेंगे। जैसे महज़ अपनी स्त्री के किसी के साथ विवाहेत्तर सम्बन्ध होने मात्र से आप उस पुरुष का क़त्ल करने के अधिकारी हो जाते है और उसका क़त्ल कर देना हर तरह से जायज़ हो जाता है. यह दीगर बात है कि उसे अदालत की अवमानना के लिए सज़ा सुना दी जाती है। पर यह सब मज़ाक़ अधिक प्रतीत होता है।
अख़बार बेचने वाले लड़के द्वारा बोला गया यह संवाद, “घर जाओ आपकी बीवी अकेली है” औरत को पूरी तरह ऑब्जेक्ट के रूप में स्थापित करता है जिस पर निरंतर नज़र रखना आवश्यक है। ज्यों ही बीवी को अकेला छोड़ा त्यों आपके हाथ से गयी।
सन १९५९ में इस केस के प्रति आम जनता का रूख यही था कि नानावटी मध्यम वर्ग से संबद्ध,अपनी बीवी से बेहद प्रेम  करने वाला और उसके द्वारा छला गया व्यक्ति है। परंतु फिर भी, इस तरह के चालू संवाद भले ही आगे की पंक्ति के दर्शकों को सीटियाँ बजाने का या पुरुष दर्शकों को ताली पीट हँसने का मौक़ा दे मगर लगते यह कुत्सित ही हैं। इस तरह के संवादों से बचा जा सकता था।
आज़ादी के बारह वर्ष बाद के समाज का चित्रण देखते हुए एक बात तो समझ आती है, कि समाज चाहे तब का हो या अब का, स्त्रियों के प्रति लोगों की मानसिकता में अधिक परिवर्तन नहीं है।
नायिका के विवाहेत्तर सम्बन्ध को तर्कसंगत क़रार देने या नायिका की इनोसेन्स साबित करने के लिए निर्देशक द्वारा एक बचकानी दलील फ़िल्म में दी गयी है। पति के जाने से आहत हुई  पत्नी, पति को आहत करने के लिए किसी और आदमी से सम्बन्ध बनाती है। क्यों नहीं फ़िल्म बोल्ड्ली यह दिखा पाती कि औरत अकेला महसूस कर सकती है। और उसी अकेलेपन में या दूसरी ज़रूरतों के कारण वो किसी पुरुष की ओर आकर्षित हो सकती है।फ़िल्म यह भी नहीं दिखा पाती कि सिन्थिया का प्रेमी अपनी प्रेमिका को मात्र दैहिक संतुष्टि के लिए इस्तेमाल कर रहा है। फ़िल्म इसमें देशभक्ति, देश के प्रति ग़द्दारी, ब्लैकमेलिंग, प्रेमिका के पति से बदले आदि का घालमेल करते हुए एक नाजायज़ सम्बन्ध को अलग ही जामा पहनाने की कोशिश करती है। इक्कीसवीं सदी में भी इस तरह के स्पष्टीकरण की आवश्यकता क्यों पड़ती है? क्या अब भी दर्शक इतने परिपक्व नहीं हैं कि अडल्ट्री को सीधे स्वीकार सकें।
इसके अतिरिक्त नायिका कुछ गीतों को छोड़ सिर्फ आँसुओं का अंतहीन स्रोत प्रतीत होती है. उसका दुःख और पश्चाताप समझ आता है परन्तु दुःख सिर्फ आंसुओं से सम्प्रेषित नहीं होता.
बुरे किरदार को अच्छे किरदारों से अलग करने का सबसे आसान तरीक़ा है कि उनके हाथों में सिगरेट या सिगार पकड़ा दिया जाये। और इस पुरानी मान्यता का प्रयोग निर्देशक ने लगभग हर फ़्रेम में किया है। चाहे वो सिन्थिया का प्रेमी विक्रम हो या गहरी लाल लिप्स्टिक लगाए विक्रम की बहन हो। इसी तरह देशभक्ति को कैश करने का सबसे आसान उपाय मेडल और यूनीफ़ॉर्म दिखाना है जिसे नायक पूरी फ़िल्म के दौरान पहने रहता है। अभिनेताओं के चरित्रांकन में कुछ मौलिकता निश्चित रूप से लायी जानी चाहिए थी।
और  इन सबके बीच तमाचे जैसी वो तख़्तियाँ लगती हैं जो अदालत के बाहर लड़कियाँ लिए खड़ी होती हैं जिन पर लिखा होता है, “रुस्तम, आई वांट टू मैरी यू.”, “रुस्तम आई वांट योर बेबी।”
निर्देशक इन तख़्तियाँ से क्या साबित करना चाहता है! पुरुष अपने रक़ीब का क़त्ल कर इतना बड़ा हीरो हो जाता है कि लड़कियाँ यह जानते हुए भी कि वो शादीशुदा है उस से शादी रचाने को और उसके बच्चे की माँ बनने को आतुर हो जाती हैं।
किसी भी कला को सम्पूर्णता से खारिज नहीं किया जा सकता. लिहाज़ा कुछ अच्छी बातें यहाँ भी हैं जैसे रंग, कॉस्ट्यूम्स, मेकअप, सेट्स  आदि आपको एक बार तो बॉम्बे ले जाकर रेट्रो फील दे ही देंगे.

कुल मिलाकर  यह एक लचर कथानक वाली फ़िल्म है जिसमें देशभक्ति के एलिमेंट को बैसाखी के रूप में इस्तेमाल किया गया है।

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