तारिक़ छतारी की कहानी ‘बंदूक़’

आज पढ़िए उर्दू के कथाकार तारिक़ छतारी की कहानी ‘बंदूक़’, जिसका हिंदी रूपांतरण किया है हिंदी लेखक पंकज पराशर ने-

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शेख़ सलीमुद्दीन रात में पढ़ी जाने वाली इशा की नमाज़ के बाद हवेली में बैठे हुए हुक़्क़ा पी रहे थे। उनका बेटा ग़ुलाम हैदर मोढ़ा खींचकर उनके पास आकर बैठ गया।

‘अब्बा हुज़ूर, इन दिनों माहौल ठीक नहीं है। पता चला है कि बाज़ार में कुछ अज़नबी लोग आपके बारे में लोगों से पूछताछ करते हैं और आपका पीछा करते हैं! वे अजनबी लोग इस क़स्बे के नहीं हैं। तेजपाल हलवाई से मालूम हुआ कि वे आपके बारे में पूछताछ कर रहे थे।’ शेख़ सलीम उसी तरह हुक़्क़ा पीते रहे, जैसे यह सब सुनकर भी कुछ न सुना हो!

‘रात की नमाज आप घर पर ही पढ़ लिया करें।’ आम दिनों में ऐसी सलाह पर वे शायद वे बिफर उठते, लेकिन आज बिल्कुल चुप रहे। थोड़ी देर के बाद सिर्फ़ इतना कहा, ‘सदर दरवाज़ा बंद कर लो।’ यह कहकर शेख़ साहब उठे और हुक़्क़े की चिलम उलट दी। फिर अपने बिस्तर पर जाकर लेट गए।

शेख़ सलीमउद्दीन के स्वभाव और शिष्ट व्यवहार से उनके क़स्बे ही नहीं, आसपास के गाँवों के लोग भी बहुत प्रभावित थे। उनके परिवार की बहुत प्रतिष्ठा थी। तमाम लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। वे लोगों के दुःख-सुख में शामिल होते थे। किसी को ख़बर भी नहीं होती और ज़रूरतमंद की ज़रूरत पूरी हो जातीं। वह अनेक तरह से लोगों की मदद करते। ग़रीब लोगों की बेटियों की शादी में मदद करते, तो कभी किसी को कोई कारोबार शुरू करने के लिए आर्थिक मदद करते, किसी को बच्चे की पढ़ाई के लिए वज़ीफे देते। मतलब यह कि लोगों की मदद करके उन्हें आंतरिक खुशी मिलती। वैसे क़स्बे में कुछ और घराने भी थे, जिनका समाज में एक असर था…कुँअर माजिद अली खाँ। क्या दबदबा था उनका! मिर्ज़ा अकबर अली खाँ…बात-बात पर बंदूक निकाल लेते। डाक्टर इब्राहीम…पढ़े-लिखे थे, प्रैक्टिस तो अच्छी नहीं चलती थी, लेकिन क़स्बे की राजनीति पर पकड़ अच्छी थी।

ये सब नेमतें तो शेख़ साहब को हासिल नहीं थीं, लेकिन जिस चीज़ से दूसरे लोग वंचित थे, वह उनके पास भरपूर थी और वह थी क़स्बे के लोगों से हासिल मुहब्बत! यही वज़ह थी कि उनकी बैठक में लोग हरदम जमा रहते थे। रमज़ान में लगभग हर रोज़ दस-बीस लोग उनके साथ इफ़्तार करते। कुछ लोग उन्हें जगाने के बहाने आकर सहरी भी उनके साथ ही करते थे। मंदिर में कथा हो या हनुमान अखाड़े में दंगल, चंदा वसूल करने के लिए पंडित हरप्रसाद सबसे पहले उन्हीं के यहाँ पहुँचते थे। उनका मानना था कि शुरुआत शेख़ साहब के घर से हो तो चंदा ज़्यादा मिलता है। रामलीला के लिए घर के सारे तख़त, जाज़िम और सफेद चादरें पूरे दस दिनों के लिए बड़े मंदिर पर पहुँचा दिये जाते। क्या हिंदू, क्या मुसलमान सभी लोग उन पर जान छिड़कते थे। आज उन्हीं का ख़ून उनसे कह रहा है कि लोग उनकी जान लेना चाहते हैं!

पहली बार जब ग़ुलाम हैदर ने उनसे यह बात कही थी, तो वे चौंक गए थे, लेकिन उसके बाद उन्होंने ख़ुद को संभाल लिया…और अब तो जैसे वे ये सब सुनते ही नहीं! कई दिनों से उन्हें ग़ुलाम हैदर समझाने की कोशिश कर रहा है।

‘अब्बा हुज़ूर, बंदूक ख़रीद लीजिए।’

‘क्यों?’

‘बस्ती में सभी लोगों के पास है। कुँअर माजिद अली खाँ तो आजकल बिना मतलब के बाज़ार में बंदूक लिये हुए घूमते हैं कि लोग देखें कि उनके पास….और मिर्ज़ा साहब? वह अब रोज़ाना शिकार पर जाने लगे हैं। डॉक्टर इब्राहीम ने सैयद अनवार हुसैन को भी लाइसेंस दिलवा दिया है।’

‘हूँ…’ शेख़ सलीमुद्दीन ने लंबी साँस लेते हुए कहा। वह ग़ुलाम हैदर की बातचीत का विषय बदलना चाहते थे, लेकिन वह था कि उसी तरह लगातार बोलता रहा, ‘मुकर्रम यार खाँ अपने खलिहान पर ख़ुद जाकर सोते हैं और साथ में बंदूक वाले दो पहरेदार भी होते हैं। हर शख़्स वक्त के मिज़ाज को समझ रहा है, बस एक आप हैं कि…’

‘ग़ुलाम हैदर, मेरे पास भी बंदूक है।’ उन्होंने तल्ख़ लहजे में कहा।

 ‘आपके पास?’

‘तुमने अभी तक नहीं देखी?’

‘हैरत है!’

‘हैरत तो मुझे तुम पर हो रही है।’

‘लेकिन आपने आज तक कभी चलाई नहीं! आपको तो बंदूक पकड़ना भी…’

‘ख़ैर, छोड़ो इस बहस को…’ और फिर दोनों ख़ामोश हो गए।

कई दिनों तक इस मुद्दे पर दोनों बाप-बेटों के दरम्यान कोई बात नहीं हुई, लेकिन जब पूरे इलाक़े में दंगा फैल गया, तो शेख़ सलीमुद्दीन का क़स्बा निज़ामपुर भी अछूता न रहा। मुख्य द्वार के मोटे-मोटे किवाड़ों पर ताला लगा दिया गया। शेख़ सलीमुद्दीन की जिंदगी में पहली बार हवेली का दरवाज़ा दिन में बंद हुआ था। ग़ुलाम हैदर ने ख़बर दी कि ‘हमारे सब लोग बस्ती छोड़कर जा रहे हैं। कुँवर माजिद अली खाँ की कोठी जला दी गई है। मिर्ज़ा अकबर अली खाँ की उन्हीं की बंदूक से हत्या कर दी गई है…और सारा क़स्बा ख़ाली हो गया है।’

     शेख सलीमुद्दीन ने बहुत कोशिश करके अपना झुका हुआ सिर ऊपर उठाया और सूनी-सूनी आँखों से ग़ुलाम हैदर का चेहरा देखन लगे।

     ‘अब क्या होगा अब्बा हुज़ूर? हमारा तो कोई सहारा नहीं, न कोई अज़ीज़ बचा है, न कोई रिश्तेदार-पूरे मुहल्ले में अकेला घर हमारा है। आप हैं कि…कहते हैं, तुमने देखी नहीं है। है कहाँ, जो देखें?’ ग़ुलाम हैदर लगातार बोले जा रहा था और शेख़ सलीम बिल्कुल ख़ामोश थे। यह ख़ामोशी किसी गहरे इत्मीनान का नतीज़ा नहीं थी, बल्कि आज उनके चेहरे पर परेशानी की आशंका साफ झलक रही थी। पहली बार उनके दाहिने हाथ की तर्जनी में हरकत हुई थी, जैसे सपने में बंदूक चलाने का अभ्यास कर रहे हों।

     अँधेरा होता जा रहा था। सन्नाटे ने ख़ामोशी के गोले दाग़ने शुरू कर दिये थे और पूरी हवेली किसी अज्ञात भय की आशंका से सहमी-सिमटी आसमान की ओर नज़रें गड़ाए शेख़ सलीमुद्दीन को कोस रही थी कि अचानक फाटक पर ज़ोरदार धमाका हुआ। शेख़ साहब उछल पड़े। ग़ुलाम हैदर ने घर की औरतों और बच्चों को एक सुरक्षित कमरे में बंद कर दिया और ख़ुद सीढ़ियाँ चढ़ कर पीछे के रास्ते से घर वालों को बाहर निकाल ले जाने के रास्ते तलाश करने लगा।

     ‘मग़र जाएँगे कहाँ? जिनके यहाँ जा सकते थे, वह सब तो मारे गए या कूच कर गए।’

     ‘ग़ुलाम हैदर…ग़ुलाम हैदर…’ शेख़ साहब ने अपने बेटे को इतनी धीमी आवाज़ में पुकारा कि ग़ुलाम हैदर तो क्या, ख़ुद शेख़ साहब भी अपनी आवाज़ न सुन सके, लेकिन तआज्जुब की बात यह है कि अच्छी-ख़ासी दूरी पर होने के बावज़ूद ग़ुलाम हैदर ने अपने बुजुर्ग पिता की आवाज़ न केवल सुन ली, बल्कि उनके पास आकर बोला, ‘धीमे बोलिये अब्बा हुज़ूर…हवेली के पिछवाड़े में कुछ लोग जमा हैं।’ ये कहकर ग़ुलाम हैदर ने लंबी साँस ली और फिर बड़बड़ाने लगा, ‘लगता है सुबह होते-होते हम सब इसी हवेली में दफ़्न कर दिये जाएँगे। बचने की कोई उम्मीद नहीं है।’

‘कोई उम्मीद नहीं तो फिर सदर दरवाज़ा खोल दो।’

‘ज़रूर खोल देता अगर इस वक़्त हमारे घर में बंदूक होती। कोई आपकी तरह भी ज़िंदगी गुज़ारता है? इतनी बड़ी जायदाद और…’

‘चलो छोड़ो, घुटन बहुत है। औरतों और बच्चों को जिस कमरे में बंद किया है, कम-से-कम वह तो खोल दो।’ इतने में एक और धमाका हुआ, जैसे पुराने ककय्या ईंटों से बनी हवेली की बरसों पुरानी दीवार गिरा दी गई हो। सबका दिल धक से रह गया। औरतें मुँह पर दुपट्टे रखकर काँपने लगीं और भयाक्रांत होकर घुटी-घुटी वहशतनाक आवाजें निकालने लगीं। शेख़ सलीमुद्दीन ने महसूस किया कि औरतों वाले कमरे और हवेली के बाहर से आने वाली आवाज़ों में काफ़ी हद तक समानता है। बहुत देर तक ऐसी रहस्यमयी आवाज़ें आती रहीं। उन्होंने अंदाज़ा लगाया कि जिस तेजी से दीवार गिरने, दरवाज़ा टूटने और ज़मीन खोदने की आवाज़ें आ रही हैं उस हिसाब से तो हम अब तक क़त्ल करके दफ़्न भी कर दिये जाते, मगर…

उन्होंने ख़ुद को टटोला और ग़ुलाम हैदर की ओर देखा। औरतों की आवाज़ें सुनीं और गहरी साँस लेकर बोले, ‘अल्लाह हिफ़ाज़त करने वाला है। अब तो सुबह होने ही वाली है। ग़ुलाम हैदर, अज़ान देने वाले मुअज्ज़िन की कोई ख़बर मिली?’

‘नहीं, कुछ पता नहीं चला।’

‘ओह, ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ!’

दोनों थोड़ी देर ख़ामोश बैठे रहे, फिर एक मनहूस-सी आवाज़ दोनों ने सुनी। इससे पहले ऐसी आवाज़ उन्होंने ज़िंदगी में कभी नहीं सुनी थी। तीर की तरह चुभने वाली आवाज़, ‘यह किसी परिंदे की आवाज़ है।’ ग़ुलाम हैदर ने कहा।

‘हाँ, तुम ठीक कह रहे हो।’

‘वह देखिये दीवार की मुंडेर पर…’

‘हाँ, वह बैठा है, मार दो।’ शेख़ सलीमुद्दीन ने बेसाख़्ता कहा।

‘मगर कैसे? हमारे पास….’

…और शेख़ सलीमुद्दीन ने एक गहरी साँस लेते हुए कहा, ‘कभी सोचा भी नहीं कि इस हवेली की दीवार पर एक दिन कोई मनहूस परिंदा आ बैठेगा।’

     पौ फटने लगी थी। उजास फैलने लगा था। परिंदा दीवार पर उसी जगह बैठा था और जब वह साफ दिखाई देने लगा, तो शेख़ सलीमुद्दीन और ग़ुलाम हैदर ने एक-दूसरे की ओर देखकर आँखें झुका लीं। दरअसल यह उनका पालतू कबूतर था जिसे रात ग़ुलाम हैदर बदहवासी में दरबे में बंद करना भूल गया था। अब धूप की किरणें आँगन में उतर आयी थीं, लेकिन मुख्य द्वार का ताला अभी तक नहीं खुला था। जब दोपहर होने को आई तो ग़ुलाम हैदर ने कहा, ‘आप कहें तो कोई इंतज़ाम करूँ? ज़रूरी सामान के साथ दोपहर में निकल चलते हैं। इस तरह और रातें गुज़ारने की अब हिम्मत नहीं।’

     शेख़ सलीमुद्दीन ख़ामोश रहे, मग़र ग़ुलाम हैदर ने सुना कि वह कह रहे हैं, ‘हाँ, जल्दी से कोई इंतज़ाम कर लो।’

सूरज डूब रहा था-सामने हज़ारों नुकीले पंजों वाला ऊबड़-खाबड़ और आड़ा-तिरछा भयावह रास्ता जमीन की छाती से चिपटा हुआ था। ग़ुलाम हैदर ने ख़ुद को तसल्ली दी।

     ‘ख़ुदा का लाख-लाख शुक्र है कि ख़तरे से बाहर निकल आए। कोई और सवारी तो मिली नहीं, वो तो भला हो राम रतन ऊँट वाले का कि अपनी अपनी शिकरम हमें दे दी। रात होने से पहले-पहले हम नजीबगंज पहुँच जाएँगे। नवाब साहब की गढ़ी बहुत महफूज है। सुबह तक वहीं रहेंगे, उसके बाद…’

     ‘उसके बाद?’ …दोनों ख़ामोश हो गए। शेख़ सलीमुद्दीन ने गाड़ी पर रखे सामान से टेक लगायी ही थी कि ग़ुलाम हैदर की नज़र दाहिनी तरफ़ आती भीड़ पर पड़ी। वे एकदम से सहम गए।

     ‘अब्बा हुज़ूर…’

     ‘हाँ…’

     ‘वह देखिये…’

     ‘हाँ, कुछ धुआँ-सा उठ रहा है। शायद किसी के खलिहान में आग लगी है।’

     ‘नहीं अब्बा हुज़ूर, भीड़ हमारी तरफ़ बढ़ रही है। लगता है हमारी बस्ती के ही लोग हैं। नाला पार करके आए हैं, इसीलिए इतनी जल्दी…’

     ‘धीमे बोलो, औरतें घबरा जाएँगी।’

           ‘लेकिन वे लोग बहुत क़रीब आ चुके हैं।’ यह कह कर ग़ुलाम हैदर ने लोहे की एक लंबी छड़ सामान से खींच कर हाथ में थाम ली। बेगम साहिबा ने जब यह देखा तो वह न चीख़ीं, न घबराईं बल्कि इत्मीनान से खिसक कर शेख़ साहब के करीब आ गईं। बस इतना कहा, ‘मैं कभी कुछ नहीं बोली, मगर आज…’

शेख़ सलीमुद्दीन ने बेगम साहिबा की तरफ देखा और उनकी हैरानी लंबी ख़ामोशी में बदल गई।

     ‘अगर आपने ग़ुलाम हैदर की बात मानी होती तो आज…’

     ‘हाँ अब्बा हुज़ूर, आज हमारे पास अगर बंदूक होती तो ये लोग…’

     ‘इत्मीनान रखो।’

     ‘अब भी आप यही कह रहे हैं! जब हमारी जानें ही नहीं इज़्जत भी…’

     ‘नहीं ग़ुलाम हैदर…बस अल्लाह को याद करो।’ यह कह कर शेख सलीमुद्दीन कुछ पल के लिए चुप हो गए, फिर कुछ सोच कर बोले, ‘ग़ुलाम हैदर, शायद तुम ठीक कहते हो।’

देखते-ही-देखते भीड़ गाड़ी के चारों तरफ फैल गयी। शेख़ साहब ने देखा कि सामने वकील दयानंद कुछ लोगों के साथ खड़े हैं।

     ‘अब्बा हुज़ूर वकील साहेब भी…’

     ‘यह कैसे हो गया ग़ुलाम हैदर। वकील साहब भी उनके साथ हैं। ‘ज़रा ठीक से देखो, वकील साहब ही हैं न?’

ठीक से देखने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। वकील दयानंद, सेठ देवी सरन और पंडित हरप्रसाद ने शेख़ साहब की दोनों बाँहें पकड़ कर गाड़ी से उतार लिया। ग़ुलाम हैदर भी वालिद को बचाने के लिए उतरा, लेकिन कुछ लोगों ने उसे अपने घेरे में ले लिया। एक शख़्स ने ऊंट की नकेल अपने हाथ में थाम ली। ग़ुलाम हैदर ने देखा कि उसके वालिद क़स्बे के सम्मानित लोगों की गिरफ़्त में बेबस और पराजित व्यक्ति इस तरह खड़े हैं, जैसे ख़ुद को पूरे तौर पर वक्त के हवाले कर चुके हों। वकील दयानंद ने उनके बाजू छोड़ दिये और हाथ जोड़ कर खड़े हो गए।

     ‘शेख़ साहब, यह आप क्या कर रहे हैं?’

सेठ देवी सरन ने झुक कर उनके घुटने पर हाथ रख दिया-‘हमारी और बस्ती की इज़्जत आपके चरणों में है।’

     पंडित हरप्रसाद ने धीमे से कहा, ‘चलिये वापस, हम आपको इस तरह नहीं जाने देंगे।’

शेख़ सलीमुद्दीन ने आँखें बंद कर लीं।

     ‘अब्बा हुज़ूर… !’

चौंक कर आँखें खोलीं, ‘ग़ुलाम हैदर…’ वह कुछ कहना चाहते थे, लेकिन ज़ुबान से एक लफ़्ज नहीं निकला। ग़ुलाम हैदर भी ख़ामोश था, मगर उसकी आवाज़ जंगलों में, रेगिस्तानों में, पहाड़ों और वादियों में, मस्जिदों में, मंदिरों में और गिरजाघरों में, नाले के पार बस्ती के उजड़े मकानों और शेख़ सलीमुद्दीन के कानों में गूँज रही थी-वह ख़ामोश था, लेकिन शेख़ सलीमुद्दीन सुन रहे थे।

‘हाँ अब्बा हुजूर, देख लिया। जिसे बचपन से अब तक नहीं देखा था, उसे आज देख लिया! आपकी बंदूक को-जो ऐसे वक़्त काम आयी, जिसने ऐसे मौके पर जान बचाई, जब सारी बंदूकें अपने मालिकों का क़त्ल कर रही हैं।’

‘ग़ुलाम हैदर चलो…’ किसी ने धीमे से कहा। नकेल थामे शख़्स ने रस्सी खींची, ऊँट की गर्दन घूमी, ऊँटगाड़ी के अगले पहिये मुड़े और ग़ुलाम हैदर ने देखा कि सामने सीधा और जाना-पहचाना रास्ता ज़मीन से गले मिल रहा है। …और फिर सब लोग अपने क़स्बे निज़ामपुर की ओर लौट चले!

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पंकज पराशर

                               

 

 

 

 

 

 

 

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