जब कोई पढ़ा लिखा लेखक डायरी लिखता है तो पढ़ने में बहुत अच्छा लगता है। जैसे वरिष्ठ लेखक जयशंकर की डायरी के ये अंश-
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इबारतें
(जनवरी – सितम्बर 2015)
-१-
इन सर्दियों में ‘रूपा’ से आये ‘महाभारत’ के रमेश मेनन के अनुवाद के दोनों खंडों को पढ़कर समाप्त किया है। बहुत पहले शायद रमेश मेनन के अनुवाद में ही “रामायण” भी पढ़ा था। अब वह किताब मेरे पास नहीं है। जिनको पढ़ने के लिए दिया था, अब वे इस संसार में जीवित नहीं हैं ।
महाभारत के आखरी – आखरी पन्नों तक आते-आते लग रहा है कि क्यों हमारे इन दोनों ही महाकाव्यों में भीषण मानवीय त्रासदियों को व्यक्त किया गया है? महाभारत के ज्यादातर पात्रों के जीवन, किसी न किसी किस्म की त्रासदियों से जूझते रहते हैं, हारते रहते हैं। हर पात्र अपनी निर्धारित नियति की तरफ बढ़ता रहता है। हर पात्र को अपने नर्क से
गुजरना पड़ता है ।
कहीं महाभारतकार हमसे यह कहना तो नहीं चाह रहा है कि अगर मानवीय जीवन अपने आपमें ही एक त्रासद घटना, एक ट्रैजिक उपक्रम और व्यापार बना हुआ है तब उसका चित्रण करने वाली कृतियाँ कैसे त्रासद नहीं कही जाएंगीं ? इन्हीं दिनों महाभारत पढ़ने के साथ-साथ उस पर आधारित पीटर ब्रुक के नाटक और फिल्म को देखकर भी
महाभारत को कुछ-कुछ, लेकिन ज़रूरी- सा समझता रहा हूँ।
-२-
मुक्तिबोध की लंबी कविताओं को एक और बार पढ़ना हुआ। उनकी कविता “अंधेरे में” असामान्य रूप से समृद्ध महसूस होती रही है। इस बार भी उसकी चिंताएं, उसकी संरचना, उसका कलात्मक जोखिम, मेरे भीतर गहराते गए। वे इतने बरसों पहले अपनी कविता के लिए इतने कठिन रास्ते पर चल पड़े थे। बिना किसी शार्टकट को अपनाए। हठपूर्वक किसी भी किस्म के समझौते से असहमत। अपनी निजता, वैयक्तिकता का प्रबल आग्रह लिए हुए । मुझे वे अपनी तरह के एकदम निराले कवि जान पड़ते है। अपनी रचनाओं में भटकते हुए, अपनी रचनाओं के लिए भटकते हुए, एकाकी घुमक्कड़ | अत्यंत नाजुक संवेदनाएं, ठोस विचार लिए हुए सच्चे कवि। पचपन का हो रहा हूँ। अब मुक्तिबोध को गंभीरता से पढ़ना चाहिए ।
मुक्तिबोध की कविताओं को पढ़कर लगता रहा है कि कविता सिर्फ भावनाओं का लेखा-जोखा भर नहीं है। वह सिर्फ चिंतन – मनन भी नहीं है बल्कि कविता लिखा जाना, कविता नष्ट करते रहने की कलात्मक आकांक्षा भी है, कविता को नष्ट करते हुए अपनी कविता को अपने लिए खोजे जाने अपने लिए पाने का सिलसिला भी । अब, अपनी उम्र के पचपन बरस में यह महसूस होता रहता है कि मैं मुक्तिबोध की कविता के थोड़ा –सा नजदीक पहुंचा हूँ ।
-३-
कल शाम मार्च की गोधूलि के वक्त में, अपने शहर और बस्ती के बरसों पुराने गिरजाघर के पड़ोस से डाक्टर के घर, वहीं खड़े हुए उनके क्लीनिक में जाना हुआ।
गिरजे में प्रार्थना हो रही थी। अपने घर से निकलते वक्त गिरजे से आती घंटियों की आवाजें सुन चुका था। यह मेरी जिंदगी का पचपनवां बरस शुरू है| बचपन से इस गिरजे का संग-साथ मिलता आया है। इसके लम्बे चौड़े परिसर में, इसके पीछे खड़े स्कूल के मैदान में न जाने अपना कितना सारा समय बिताया है। शायद इसलिए भी इसके आसपास होने से, अपनी इतनी उम्र के बीत जाने का अहसास गहराता है ।
देह में बुखार का डेरा है और मन में गहरा विषाद कि जीवन के इतने सारे साल बीत गये | बचपन में गिरजे के बाजू की इसी संकरी, छोटी- सी सड़क से ही अम्मा के साथ सदर की सरकारी डिसपेन्सरी में जाता था।
बड़ी बहन के साथ अपनी और उसकी स्कूली किताबों के लिए वेस्टर्न बुक शॉप जाया करता था। कभी यहीं के लेटर बॉक्स के करीब मदर टेरेसा को दूर से देखा था। वे स्कूल और गिरजे से जुड़े कार्यक्रमों के लिए नागपुर आई थीं।
आज लगता है कि क्यों मार्च की ये शामें मेरे लिए इतनी आकर्षक, रहस्यमय और नॉस्टैल्जिक रहती आई हैं? क्यों इन शामों में एक तरह का अकेलापन, एक किस्म का एकाकीपन घेर लेता है? याद आता है कि बरसों पहले कभी मार्च की ऐसी ही शामों में दो – तीन बार निर्मल वर्मा के साथ दिल्ली के कनॉट प्लेस से मंडी हाउस तक पैदल-पैदल ही जाना होता रहा था । अब उनके साथ बीती मार्च की उन आत्मीय शामों की भी याद आती है ।
कल शाम डाक्टर के बंगले के गेट से ही बरामदे की आराम-कुर्सी पर बैठी हुई डाक्टर की माँ को देख लिया था। जब क्लीनिक के दरवाजे तक पहुंचा तब उनकी बूढ़ी उंगलियों में रोजरी (माला) को देखा। डाक्टर सत्तर के आस-पास होंगे । बैचलर हैं । इतने बड़े बंगले में अपनी मां के साथ रहते हैं । दो-तीन नौकर-चाकर इन दोनों की मदद करते होंगे । ट्यूबलाइट की रोशनी में डाक्टर की मां के चेहरे पर थमी झुर्रियों से, उनके हाथ में पड़ी माला से, न जाने मुझे क्यों हाल ही में पढ़ी गई रूसी कवि “मेंडलश्टाम” की इन पंक्तियों का
ख्याल आया-
“What does a woman one who is alone
Know of her hour of death ?”
………
-४-
रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उपन्यास “घरे-बाइरे” को एक और बार पढ़ा है। दो–तीन बार इसी उपन्यास पर आधारित सत्यजित राय की फिल्म को भी देख चुका हूँ। मुझे लगता रहा है कि इस उपन्यास के एक नायक निखिल के भीतर से रवीन्द्रनाथ खुद बोल रहे हैं। उपन्यास में बीसवीं सदी की शुरुआत के हमारे स्वाधीनता संघर्ष के जुड़ा हुआ वातावरण है।
वाद, विवाद और संवाद हैं । स्वदेशी आंदोलन के आसपास की राजनैतिक बहसें हैं । इन सबसे घिरे हुए दाम्पत्य, पारिवारिक जीवन की गाथा है । उपन्यास के अंत तक आते-आते निखिल हमें उस दुनिया में सांस लेते हुए एक मासूम, निष्पाप और असली इंसान नजर आते हैं। एक पूरी तरह से खुले हुए दिमाग के, अपनी स्वतंत्र बुद्धि लिए हुए, निर्भीक और साहसी इन्सान, जिनके लिए स्वतंत्र दिखना नहीं, स्वतंत्र होना, एक बड़ा मानवीय मूल्य है।
बोरिस पास्तरनाक के उपन्यास “डॉ. जिवागो” की भी याद आती है । उसका नायक यूरी भी निखिल की ही तरह एक सच्चा, स्वतंत्र और साहसी व्यक्ति है।
संभवत: बीसवी सदी के पूवार्ध के साहित्य में मानवीय स्वतंत्रता का सवाल, एक बड़ा सवाल बनकर उभरा होगा। सिर्फ स्वतंत्रता का प्रश्न ही नहीं, इसको पाने के लिए ज़रूरी समर्पण, कुर्बानी का सवाल भी। मानवीय स्वतंत्रता और त्याग से जुड़ी हुई इन और ऐसी बातों को हम बीसवीं सदी के उत्तरार्ध के रूसी फिल्म- निर्देशक तारकोव्स्की की फिल्मों में भी देख सकते हैं। तारकोव्स्की ने अपनी एक फिल्म का नाम ही “Sacrifice” रखा है ।
-४-
वर्जिनिया वुल्फ कहीं पर कहती हैं कि बड़े होने का अर्थ ही अपने भ्रमों, भुलावों से मुक्त होना है। भ्रमों को खो देना है ताकि दूसरे भ्रमों और भुलावों को अपने लिए पाया जा सके।
एक लम्बी उम्र तक शायद हम सबके साथ यह भ्रम चला आता है कि हम अनुभवों का सृजन कर सकते हैं । बहुत बाद के बरसों में समझ में आता है कि मानवीय अनुभव ही एक ऐसी बात है, जिसे क्रिएट नहीं किया जा सकता है। जिससे सिर्फ गुजरना होता है। और शायद यहीं से जिंदगी को वैसे ही अपना लेने का विचार आया होगा, जैसी वह हमें मिलती है। अपना खुद का अस्तित्व लिए हुए, अपनी अस्मिता के साथ खड़ी ज़िंदगी।
-५-
कल शाम जबलपुर में नर्मदा के किनारे की एक निर्जन, शांत जगह पर अकेला ही था । मेरे सामने गर्मियों की शाम के आसमान की गहराइयां । धीरे- धीरे शाम, रात की तरफ बढ़ रही थी । कितना मार्मिक-सा सौंदर्य |
कभी -कभार ऐसी ही अकेली और उदास शामों में एक तरह की उदासी को अपने भीतर लिए हुए, अपने बचपन को याद करता हूँ। अपने ग्यारह – बारह के होने के वक्त को। पिता का निधन उन दिनों ही हुआ था। वे गांव में अध्यापक की नौकरी करते हुए, शहर के मेडिकल अस्पताल में मरे थे। तीस जनवरी की शाम को ।
उनकी मृत्यु के बाद के वर्षो में मैं टयूटर की हैसियत से, अपने से छोटी क्लास के बच्चों को पढ़ाने लगा था। डिसूजा परिवार के एक बच्चे को पढ़ाने के लिए सुबह -सुबह जाना पड़ता था। शाम को वह लड़का खेल के मैदान पर रहता। गिरजे की भजन मंडली में गाने की प्रैक्टिस करता था ।
उसके घर का दरवाजा एक बूढ़ी औरत खोलती थी। हरे रंग का दरवाजा । उस दरवाजे के सामने बड़ा सा बगीचा खड़ा रहता । तरह-तरह के पेड़, किस्म-किस्म के पौधे । माली के न आने पर पेड़ पौधों को पानी देने का काम वह बुढ़िया ही करती ।वे छोटे कद की थी । गोरे रंग के चेहरे पर झुर्रियां उतर आयी थी ।
एक सुबह उस घर में गया और जाना कि रात में वह बुढ़िया इस दुनिया से चली गयी। जहां हमारे पढ़ने के डेस्क रहा करती, वहीं एक लकड़ी की दीवान पर उसकी मृत देह सो रही थी । उसके जुड़े हुए हाथों के बीच उनकी रोजरि थी । पड़ोस के स्टूल पर मोमबत्तियां । आसपास उनके परिवार के लोग ।
मैं लगभग साल भर से रोज सुबह उनसे मिलता आया था। उनको अखबार पढ़ते हुए, कुछ बीनते हुए, पौधों को सींचते हुए, अपनी नाती से बतियाते हुए, अपने कुत्ते से खेलते हुए देखता आया था। मुझे लगता रहा था कि वह हर किसी को, हर चीज को प्यार करती रही होगी । प्यार करते रहने से उतरता आलोक उनके चेहरे पर था । उनसे ही मुझे कभी “बाइबल” उपहार में मिली थी । बरसों बाद मैंने उसके कुछ शुरुआती हिस्सों को पढ़ा भी था । क्या बढ़ती उम्र में बचपन के इतने डिटेल्स, इतने साफ-साफ, इतने नजदीक, इतने आत्मीय हो जाते हैं ? कल की शाम थोड़ी-सी उदासी लिए हुए लेकिन बहुत चमकीली लगती रही थी ।
– ६-
तब से मेरा जीवन कितना ज्यादा बीत गया है । कितना ज्यादा बदल गया है । अब तो अपने उस जीवन की अनुपस्थिति ही ज्यादा महसूस होती है । इतना ज़रूर है कि सर्दियों की किसी-किसी शाम का अलौकिक सौंदर्य, कभी –कभार, बीच –बीच में उनकी बड़ी-बड़ी, सुन्दर और राजसी आँखों की याद दिला जाता है ।
वे मेरे किशोर दिनों में मेरी अम्मा का इलाज करने वाले डॉक्टर रहे थे । गेहुंआ रंग लिए हुए , लम्बे कद के ईसाई डॉक्टर । एक लम्बी-चौड़ी जगह पर फैले हुए मिशनरी अस्पताल के कम्पाउंड के एक बंगले में उनका आवास था और सामने के हिस्से में उनका क्लीनिक । क्लीनिक के पहले हिस्से के बरामदे में लम्बी-चौड़ी कुर्सीनुमा बेंच रखी रहती थी । वहीं दीवार पर टंगा हुआ बैरोमीटर, बीमारियों से जुड़े हुए विज्ञापन, इधर-उधर छोटे-छोटे सीमेंट के चबूतरों पर गमलों में पलते हुए पौधे। कभी-कभार अम्मा मिशनरी के उसी अस्पताल में एडमिट होती और मुझे रात में अस्पताल की बेंच पर ही सोना पड़ता था । उन रातों में ही डॉक्टर के घर से रात दस बजे के आसपास पियानो के स्वर उभरते- उतरते थे।
डॉक्टर ही अपने पियानो पर प्रैक्टिस किया करते थे।
अब डॉक्टर नहीं है । मेरी मां भी नहीं रही हैं । जब डॉक्टर गुजरे तब मैं अपने शहर से दूर एक कस्बे में नौकरी कर रहा था । यहां रहता तब आखरी बार डॉक्टर की उन राजसी आंखों को जरुर देखता , जो मुझे अपने किशोर दिनों से ही मंत्रमुग्ध करती आयी थी ।
अम्मा उनके साफ-सुथरे, परिश्रमी, करुणामयी और सच्चे जीवन को लेकर बहुत कुछ बताती आई थी ।. . . . . . . . . . .मेरे जीवन में अब उन बरसों की उस जिंदगी का कोई भी गवाह नहीं रहा । धीरे-धीरे एक के बाद एक लोग या तो इस दुनिया में नहीं रहे या मेरे अपने जीवन में ।
एक उम्र के आते-आते ज्यादातर लोग और उनके चेहरे हमारे पीछे खड़े रहते हैं । तब भविष्य उतना अपने पास नहीं रह जाता है, जितना अतीत । अपने उस अतीत में कितनी सारी खाली जगहें खड़ी हो जाती है । जगहें खाली हो जाती है । लोग और जगह ही नहीं, हमारी कुछ भावनाएं, कुछ आशाएं और आस्थाएं भी हमें छोड़कर चली जाती है । एक तरह से हमारे जीवन के आखरी –आखरी बरस, जुदाइयों विदाइयों, यादों और उम्मीदों के ही बरस बन जाते हैं ।
-७-
हर बार, बार-बार अपनी किताबों के करीब लौटना ही ज्यादा तसल्ली देता नजर आता है । अपने घर से बाहर जाने पर उतनी सांत्वना नहीं मिलती है । कभी-कभार थकान, निराशा और पछतावे के साथ भी लौटना होता है । एक प्रकार की अर्थ-शून्यता लिए हुए, जो एक तरह की ऐसी मौत जान पड़ती है जिसके लिए देह को छोड़ना जरुरी नहीं रहता है ।
कभी-कभार ऐसे लौटने के दिनों में, बाहर से लौटने के समय में , कॉलेज के दिनों की बाहर की उन गर्मियों की गंध की याद आती है । सर्दियों के दिनों की गुमटियों की चाय-कॉफी की भी, जब ज्यादातर समय घर के बाहर ही बीता करता था ।
उन दिनों में ही मेरे भीतर कविता, संगीत और सिनेमा के लिए मेरे लगाव की, मेरे आवेग की शुरुआत हुई थी । अंग्रेजी साहित्य का छात्र होने से वर्ड्सवर्थ, कॉलरिज, कीट्स, शैली और बायरन की कविताओं के लिए मेरी तड़प, अनुराग और लालसा की शुरुआत ।
उसके कुछ बरसों बाद मेरा विदिशा प्रवास शुरु हुआ था । मेरा हर वीक-एंड में भोपाल में रहना । वहीं रूसी कवियों-लेखकों से शुरू हुई पहचान के बाद, इन अंग्रेजी कवियों के लिए मेरा उत्साह कम होने लगा था । फिर जिस दौर के अंग्रेजी साहित्य ने छूना शुरु किया था, वह वर्जिनिया वुल्फ और उनके समकालीनों का दौर रहा । इस दौर के लॉरेन्स, एलियट, ज्वायस और कैथेरीन मेंसफील्ड का लिखा गया भी, मेरा आत्मीय बनता गया ।
-८-
बरसों आमला में बिताकर अपने बचपन के शहर में लौट आया हूँ । शहर का चेहरा ही बदल गया है । तसल्ली इस बात की है कि हमारी अपनी बस्ती, उसके आसपास के इलाकों में उतने बदलाव नहीं आए हैं । ज्यादातर मकान वहीं और वैसे ही खड़े हैं । पेड़ अपनी जगहों पर हैं । छोटी छोटी सड़कें और पुरानी गलियाँ जैसी की वैसी खड़ी हुई हैं । वैसे तो आमला में रहते हुए भी, वीक-एंड में यहाँ आता ही रहा था । पर अब लगातार यहीं रहने लगा हूँ ।
यहाँ लौटने के शुरुआती दिनों में कुछ रातों तक मेरी नींद बार- बार टूटती-जुड़ती रही । कभी-कभार अपने भविष्य को लेकर चिंता और बेचैनी भी । इन दिनों में तनाव है लेकिन दूसरी तरह के । इन दिनों अपनी क्षमता पर, अपनी औसत प्रतिभा की सच्चाइयों पर मेरा संशय बढ़ा है । खुद की संभावनाओं से ज्यादा, खुद की सीमाओं के ख्याल साथ बने रहते हैं, सताते रहते हैं ।
इतना जरुर है कि संडे के अलावा, रोज ही नियमित रुप से नियत समय के लिए किसी न किसी लाइब्रेरी में जाने लगा हूँ । इस तरह लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ना मेरी जिंदगी का बड़ा सहारा बन रहा है ।
ऐसा होता है कि लाइब्रेरी के रीडिंग रूम से किताब से मेरा मन ऊब जाता है । ऐसे समय मैं चिड़ियाघर को घेरे हुए पार्क में चला जाता हूँ । आम के विशालकाय पेड़ के नीचे की घास पर बैठे-बैठे फेंस के भीतर घूमते-खेलते हिरनों को देखता रहता हूँ । कभी-कभी उनको पत्तियां देता हूँ । उनको पत्तियों को खाते हुए देखता हूँ ।
अगर मन चिड़ियाघर से भी भर जाये तब अपने घर के करीब के म्यूजियम में लौट आता हूँ । यहां भी छोटा सा पार्क है । उसमें रखी गई लकड़ी की बेंच । यहीं कॉलेज के दिनों की अपनी पढ़ाई किया करता था । कितना सारा समय बिताया है मैंने इस म्यूजियम में । कितनी सारी यादें हैं इस म्यूजियम से जुड़ी हुई। तीस बरस पहले इसी म्यूजियम को केंद्र में रखकर अपनी एक कहानी “स्मारक” लिखी थी ।
-९-
हमारी ट्रेन बम्बई के दादर स्टेशन पर आधी रात में पहुंची। बाहर तेज बारिश हो रही थी। टैक्सी या ऑटो स्टैण्ड तक भी जाना मुश्किल था । सिर्फ एक लैंप-पोस्ट से रोशनी बाहर आ रही थी। स्टेशन की शुरुआत के हॉल में खड़े रहने के लिए जगह नहीं थी । जगह-जगह पर खड़े हुए यात्री, जगह-जगह पर बैठे हुए भिखारी लोग ।
मौसम का अभागापन, बदकिस्मती और भिखारियों की बीड़ी से उठती गंध । बाहर आता धुंआ । एक बूढ़ा भिखारी बीड़ी पीते-पीते मेरी तरफ देख रहा था । कितनी मर्म-स्पर्शी, विश्वासभरी थी उसकी निगाह।
स्टेशन की उस जगह पर कांपते-ठिठुरते बूढ़ों और बच्चों को देख कर मेरे भीतर का कुछ टूटने लगा था । कभी-कभार ऐसे ही दृश्यों को सामने देखकर, हमारी देश और समाज, जीवन और जनतंत्र को लेकर धारणाएं टूटती-बिखरती है, प्रश्नांकित होने लगती है। तभी कोने में बैठा हुआ एक युवक बांसुरी बजाने लगा । सामने रोते हुए बच्चा का रोना रुक गया । पड़ोस में उसकी युवा पत्नी बच्चे को गोद में लिए हुए थी । उस महसूस वातावरण में बांसुरी का बज उठना, एक बड़ी तसल्ली रही थी । कला कितने चुपके से अपना जादू जगाती है, हमारा जीवन बदलती है।
– १०-
इलाहाबाद के कुलीन इलाके की शरद ऋतु की आखरी दिनों की शाम। इस पुराने इलाके की उजाड़ सी गलियाँ। बंगलों के सामने के बड़े –बड़े गेट। पुराना इलाका । गोधूलि के वक्त की शांति और हल्की- सी गरमाहट ।
वहाँ घूमते हुए मैं सोच रहा था क्या मैं अपने भीतर खड़े हुए द्वंदों को समझ पा रहा हूँ ? क्या मैं अपने भीतर चल रहे संघर्ष को अच्छी तरह से व्यक्त कर सकता हूँ ? अभी भी मुझे अपनी पसंद-नापसंद आकारहीन नजर आती हैं । अब इस उम्र में क्या मेरी पसंद-नापसंद का कोई ठोस आकार नहीं होना चाहिए ?
कभी तो लगता है कि भले ही धीरे-धीरे लेकिन मैं अपने सपनों, अपनी आशाओं, अपनी क्षमताओं और आकांक्षाओं की दिशा में बढ़ रहा हूँ लेकिन फिर यह भी लगता है कि अपने भीतर की ये सब चीजें मुझसे छूटती जा रही है , अलग होती जा रही है ।
शायद अपनी आशाओं , आकांक्षाओं को समझने के लिए भी अपनी इलाहाबाद – बनारस यात्राओं के लिए निकला हूँ । ऐसी और इन सब बातों के बारे में इलाहाबाद के खुसरो बाग में सोचता रहा था ।
-११-
पिछली सर्दियों में मेरे बचपन के एक दोस्त नहीं रहे । सड़क दुर्घटना के शिकार । हम दोनों को मार्च में बनारस जाना था । वह फरवरी में चला गया । बसंत के दिनों में । कितना अखरता होगा बसंत के ऐसे आत्मीय दिनों में संसार से विदा लेना। उसकी मौत के बाद से खुद को अपने भीतर और बाहर अस्त-व्यस्त महसूस करता रहा हूँ । मैं उसके साथ के भूले गये बरसों को याद करता रहता हूँ । पढ़ने में मन नहीं लगता । कुछ भी पढ़ता तब उससे साझा ज़रूर किया करता था । वह सुनता । कुछ-कुछ बताया भी करता । मिलान कुन्देरा का बाद का लेखन उसे उतना नहीं छू रहा था जितना उनका शुरुआती काम ।
“उनको चेक भाषा में ही लिखना था” वह कहता
“फिर फ्रांस में उनकी किताबें कौन पढ़ता ?”
और फिर हमारी बहस शुरू हो जाती । हमारी बहस “इंडियन कॉफी हाउस” तक हमारे साथ जाती।
उसके जाने के बाद के बाद कॉफी हाउस जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। उसका लिखा गया एक पत्र, उसके जाने के बाद मेरे घर के पते पर आया था । उस पत्र में उसने हमारे बनारस प्रवास की आइटिनरी, हमारी यात्रा का यात्रा-क्रम लिख भेजा था।
-१२-
पिछले दिनों की अपनी कुछ विपदाओं से बाहर आया हू्ँ। अपने पर आये हुए संकट के साए कुछ धुंधले हुए हैं। अपने भीतर थोड़े से बदलाव को महसूस भी करता हूँ । सुबह-सुबह मेरा उत्साह बना रहता है, बढ़ता रहता है । शाम आती है, दिन ढलने लगता है और मेरे पास उदासियां लौटती हैं। इस वक्त याद नहीं आ रहा है कि ये पंक्तियाँ किस लेखक की हैं
“In the morning there is meaning , in the evening there is feeling”
इतना भर याद है कि ये फ्रांस में रह रहे किसी प्रवासी लेखक के शब्द हैं । अपनी याददाश्त पर जोर देता हूँ ।
पचपन की उम्र में ही याददाश्त के इतने बुरे हाल हैं !
कल शाम अमेरिकी लेखक कॉर्सन मैकुलर्स के उपन्यास “The member of the Wedding” पर बनी श्वेत-श्याम फिल्म देखी थी। इस वक्त जो कुछ बिखरे-बिखरे ढंग से याद आ रहा है वह कुछ इस प्रकार हैं ———– किशोरी फ्रैंकी का पहला मंजिल का मकान, अश्वेत नौकरानी का फ्रैंकी के लिए अनुराग । उसके पड़ोस के किशोर की मृत्यु । फ्रैंकी का रेलवे स्टेशन से लौटते हुए एक जगह पर, शायद किसी होटल में जैज़ को सुनना । संगीत की उपस्थिति की बात कॉसर्न मैक्कुलर्स के उपन्यास “Heart is a lonely Hunter” की उस लड़की की याद दिला गयी जो टिकट खरीदने की क्षमता न होने से ऑडोटोरियम की सीढ़ियों पर बैठे-बैठे ही कंसर्ट सुनने जाती रहती है। उपन्यास का एक पात्र सिंगर, उसी लड़की के लिए रिकार्ड खरीदता है । उस रिकार्ड को सिंगर के घर में दोनों सुनते हैं।
– १३-
कभी-कभार अपनी नोटबुक पर इस तरह कुछ न कुछ लिखते समय, दिन भर की थकान की घड़ियों के बाद के रात के वक्त में, मन में सवाल उतरता है कि मैं क्यों इतने बरसों से, भले ही कभी-कभी इस नोटबुक में अपने किसी अनुभव, किसी संवाद, किसी साक्षात्कार, किसी अहसास को उतारता आया हूँ ?
जब तक आमला में रहा, नौकरी करता रहा, तब तक इस तरह हर शाम या रात में डायरी लिखना मुझे गहरी सान्त्वना देता रहा। अब बहुत ही कम बार ऐसा होता है कि इसमें कुछ पक्तियाँ उतारने का उत्साह, आवेग मेरे अंदर उतरता है।
बाईस-तेईस की उम्र में यह भ्रम, यह भुलावा भी साथ बना रहा करता था कि अपने अनुभवों, अपने जीवन की घटनाओं को रिकार्ड नहीं किया गया हो, तब वे अनुभव जिंदगी में आए ही नहीं हैं, वे घटनाएं घटी ही नहीं है । जीते हुए भी , न जीने की बात डराती थी ।
लेखकों –कलाकारों और दूसरे इलाकों के अत्यंत प्रतिभाशाली लोगों को यह कहते-लिखते पाया था कि अगर एक समय तक आप डायरी लिखते रहेंगे, अपनी डायरी की देख-भाल करते रहेंगे तब एक समय के बाद आपकी लिखी डायरी, आपकी देखभाल करेगी । आपके लिए विश्वास और साहस जुटाएगी, आपकी आंतरिक शक्तियों की याद दिलाएगी ।
याद आता है कि अपनी उम्र के पैंतीसवें-छत्तीसवें वर्ष में मैंने वर्जिनिया वुल्फ की डायरी के कुछ खंडों को लगातार पढ़ा था । पेंग्युइन प्रकाशन में उनकी डायरियों के पेपरबैक संस्करण आते रहे थे । आने वाले दिनों में वर्जिनिया वुल्फ की डायरियों को एक और बार पढ़ने की लालसा साथ रहेगी ।
– १४-
बम्बई में म्यूजियम सर्कल के आसपास का यह इलाका मेरा जाना–पहचाना इलाका रहता आया है । यहीं पर डेविड सेसून लाइब्रेरी, जहांगीर आर्ट गैलरी, रिदम हाउस, मैक्समूलर भवन और म्यूजियम के आसपास अपना कितना ही समय बिताता आया हूँ । कल शाम म्यूजियम सर्कल के पास एक फेंस के करीब बैठा हुआ था । पुरानी किताबों की दुकान से खरीदी गई मार्टिन बूबर की एक प्रसिद्ध पुस्तक के पन्नों को उलट- पुलट रहा था ।
तभी मेरी निगाह पड़ोस के एक दृश्य पर ठहर गई। एक बूढ़ी औरत जमीन पर रखे चीनी मिट्टी के कटोरों में अपने थर्मस से दूध उड़ेल रही थी । तीन-चार बड़ी और छोटी उम्र की बिल्लियां सावधानी लेते हुए, इधर-उधर चौंकन्नेपन से निगाहें दौड़ाते हुए दूध पी रही थी । उस बूढ़ी औरत ने सूती कपड़े का छींटदार, धूसर रंग का फ्रॉक पहना हुआ था । कुछ देर बाद वह अपनी लकड़ी टेकते हुए वहां से चली गई । बिल्लियां भी एक इमारत की तरफ बढ़ गईं। मेरे जिज्ञासा जताने पर वहां फुटपाथ पर राजस्थानी चित्रों के प्रिंट्स बेचती औरत ने बताया कि यही बुढ़िया यहां कुत्तों को बिस्कुट देने, परिन्दों को दाना खिलाने के लिए बीच-बीच में एक बैग लटकाए हुए वहां आती रहती हैं।
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जयशंकर
!! शकुन्तला !!
33, प्रकाश नगर
नियर जिमखाना, गोधनी
रोड,
नागपुर, महाराष्ट्र – 440030
मो. 9425670177
Jayshankar58@gmail.com

