पंकज मित्र की कहानी \’सहजन का पेड़\’

अभी हाल में ‘लमही’ पत्रिका का कहानी विशेषांक आया है. उसमें कई कहानियां अच्छी हैं, लेकिन  \’लोकल\’ में \’ग्लोबल\’ की छौंक लगाने वाले पंकज मित्र की इस कहानी की बात ही कुछ अलग है. स्थानीय बोली-ठोली में बदलते समाज का वृत्तान्त रचने वाले इस कहानीकार का स्वर हिंदी में सबसे जुदा है. जैसे ‘सहजन का पेड़’- जानकी पुल.

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वो जो बिना पत्तोंवाला बड़ा पेड़ है जिसमें हरे-हरे सुगवा साँप लटक रहे हैं वह दरअसल साँप नहीं सहजन है और यही सहजन का पेड़ सिर्फ बचा है पांड़े परिवार की बाड़ी में जो है ठीक पांड़े परिवार के घर के पिछवाड़े। सहजन के पेड़ की तरह ही है एक बड़ा सा पांड़े परिवार भी जिसमें शामिल है तीन मर्द, दो औरतें, तीन बच्चे, एक लंगडू पिल्ला और एक अन्धा तोता और सभी मंडराते रहते हैं सहजन के पेड़ के आस -पास ही। सिर्फ बड़कू पांड़े अपनी लगभग अंधेरी कोठरी में चेचकरू चेहरे के साथ बैठे रहते हैं और साथ देता है उनका अन्धा तोता जो पूरे पांड़े परिवार का मानना है कि अंधेरी कोठरी में लगातार रहते-रहते देखने की शक्ति खो बैठा है, बिलकुल बड़कू पांड़े की तरह। सिर्फ मझले पांड़े नहीं मानते हैं ये बात-

सब ड्रामा हौ।  सूझै ने हौ तो एक तारीख के दस्खतवा कैसे?

मंझले पांड़े भचकते हुए आगे बढ़ जाते हैं- सीताराम की खिचड़ी फरोश दुकान से- एक छोटी शीशी में सौ ग्राम सरसों का तेल लेकर

भईया इ पैर में कैसे?बदमाश है सीताराम, जानता है सारी बात लेकिन …..

अरे बच्चे में गिर गेलियो न सूटी ( सहजन ) गछवा से – सहजन के पेड़ पर आरोप मढ़ते हुए चले गए मँझले।

बड़ी हरामी हौ इ कुरअँखा। जेने-तेने मुँह मारे के चक्कर में ….. सौ में सूर हजार में काना …. सुनते है न – सीताराम ने मँझले पांड़े के जाने के बाद मंगल को बताया।

       बड़कू पांड़े नाराज रहते थे सहजन के पेड़ से। उन्हें बताया गया था कि अगर समय रहते उन्होने सहजन खाया होता तो उन्हें चेचक का प्रकोप नहीं झेलना पड़ता। सहजन  की तासीर ऐसी होती है इसलिये तो सहजन उसी वक्त फलता है जब चेचक फैलती है। लेकिन बड़कू पांड़े को माता का प्रकोप उस वक्त हुआ था जब सहजन फले नहीं थे। तो बड़कू मानते थे कि सहजन के पेड़ ने साजिशन ऐसा किया था और चेचक ने तो उनका चेहरा नष्ट किया ही, जीवन भी। शाम होते ही लकड़ी की पुरानी कुर्सी पर बैठकर दोनो हत्थों को पकड़कर पूरी ताकत से दबाते थे और बुदबुदाकर गालियाँ बकते रहते थे। गले की नसें फूल जाती थी। चेहरा विकृत हो जाता था पूरे बदन में ऐंठन आ जाती थी- ये तकरीबन 15 से 20 मिनट तक चलता। यही बड़कू पांड़े  का संध्या वंदन था- कोई कहता वो चेचक माता की गालियाँ देते हैं लेकिन बहुतायत का यह मानना था कि वो लछमी को गालियाँ देते हैं जो ब्याह के कुछ ही दिनों के बाद उन्हें इस तोते के साथ छोड़ गई थी। जबतक बड़कू गालियाँ निकालते अंधा तोता भी टें-टें की आवाज से पूरी अंधेरी कोठरी गुंजाता रहता था- संध्या वंदन में आर्केस्ट्रा उपलब्ध कराता रहता।

       वो सहजन के फूलों से दिन थे। सहजन के फूलों को बेसन के घोल में लपेटकर जब लछमी कुरकुरे पकौड़े तलकर ले आती तो जैसे चेचकरू बड़कू पांड़े के पूरे दाग चमकने लगते। रात भर की ड्राइवर की ड्यूटी वो भी राज्य परिवहन की खराब बस को सीधे भागलपुर से हजारीबाग लाने का दुष्कर कर्म। वैसे सब्जी की कटौती हो गई थी- दाल-भात और साथ में सहजन के फूलों के पकौड़े – उसी स्वाद के सहारे गाड़ी भगाये लिये जाते थे – कंडक्टर सिंह जी कहते – ‘माने पड़तो बाबा, तोर हाथ। स्टीयरिंग एकदम मक्खन’।

उत्साह से हिलोरित बड़कू पांड़े- साहब लोग मोबिले नाय देहो ना तो हम ….सिंहजी अपनी चिरपरिचित मुद्रा में – मर सरवैन, कफनचोर हथु सार। डिपाट के बैठा के मानथु। बुझला बाबा। अब हमनियों अपन रस्ता देखा। बीच-बीच में एकाध ठो टायर-फायर …. कब सरवा तनखा-उनखा बंद हो जैतो…

       बड़कू पांड़े ‘जब होगा तब देखा जायेगा’ वाली मुस्कान देकर नरेशवा की बनाई खैनी दबा लेते और खडखड़ाते गेयर को टाइट करके पकड़ लेते थे-सरवा गीयर बक्सवो जवाब दे रहलो – बड़कू पांडे के खुरदरे ललाट पर पसीना चुहचुहा आता जो घर जाकर बँसखट पर बैठकर ही सूखता जब सहजन की डालियाँ हिलहिलकर हवा करती थी। आखिर डिपो में बस लगाकर पूरे तेरह किलोमीटर साइकिल चलाकर घर पँहुचना वो भी पूरे तीन दिनों के बाद – लछमी की उपत्यकाओं में ही सुकून मिल पाता था। उस वक्त उस कोठरी में रोशनी हुआ करती थी- छोटकू पांड़े की अंकुशी पास से गुजरने वाले पोल पर सटीक बैठती थी-  लंबे से बाँस की लग्गी में तार फँसाकर हर शाम को रोशन करने का इंतजाम होता था जो सुबह होते ही उतार लिया जाता था ताकि उड़नदस्ते की नजर न पड़े। भौजी की प्रंशसा भरी नजरों को ताड़कर हर शाम छोटकू पांड़े के भदरोयें खिल जाते थे जो मूँछों का रूप अभी धर नहीं पाये थे। बाड़ी के बेला फूलों से सजी भौजी की वेणी को देखकर उन्हें ‘बस एक सलम चाहिये आसिकी के लिए’ गाने को मन करता था और भौजी के एक इशारे पर सीताराम की दुकान तक दौड़ जाने को हमेशा आतुर रहते। वही भौजी जब… कितना रोये थे छिप-छिपकर मतलब सहजन के पेड़ के तने के पीछे छिपकर छोटकू पांडे़। किसी काम में तबियत ही नहीं लगती उसके बाद। बहुत दिनों तक यही आलम रहा बल्कि अब तो आदत ही बन गई है। तबियत ही नहीं लगती किसी काम में। बस मन होता है कि ताश खेलते ही रहें सहजन के पेड़ के नीचे ‘बैठे रहें तसव्वुरे जानाँ किये हुए’ की तर्ज पर। हालाँकि अब छोटकू पांड़े बाकायदा एक पत्नी के पति और एक बच्चे के पिता है फिर भी। बड़का भैया के आने का दिन होता था तो भौजी बैगन- टमाटर का चोखा बनाती थी फिर हाथ-मुँह धोकर बालों में दो-तीन बेला के फूल खोंसकर सहजन पेड़ के नीचे खड़ी हो जाती थी जहाँ से सड़क दिखती थी। तोता तब सहजन पेड़ की डाली से लटके पिंजरे में टें-टें करता रहता जिसे सब के-है समझते थे, फिर सीटी जैसा बजाता जिसे छोटकू माना जाता था और छोटकू पांड़े खुश हो जाते थे कि तोते ने उनका नाम रटना सीख लिया है।

       आज बड़ी देर…? के जबाब में बड़कू पांडे़ पूरी रामकहानी सुनाने लगते जिसमें हँसहीहा के पास ही गाड़ी का टाना रॉड टूटने से लेकर पैसेंजर से सिहं जी का झगड़ा- परिवहन निगम को दी गई सैकड़ों गालियाँ- यही से ट्रांसपोटवा जा रहलो हाथी के गाँड़ मेंका सर्टीफिकेट, फिर सिंह जी द्वारा अनुमोदन- जब उपरे वाला सब भेज रहा है तो हमिन का करें। अब इन सब की आदत होती जा रही है बड़कू पांड़े को। खलासी को मिस्त्री लाने भेजकर निश्चिंत हैं। पैसेंजर सब को निगम के दूसरे बस में मेल दे दिया गया। हेडक्वार्टर में ब्रेकडाउन रिपोर्ट कर दिया गया। अब दो दिन निश्चिंत। सहजन पेड़ के नीचे बँसखट बिछी थी। उस पर उमस की चादर पड़ी थी। बड़कू पांडे बैठे उस पर। लछमी पानी ले आई। उत्साह देखकर मन बुझ गया बड़कू का। फिर थोड़ा जबर्दस्ती मुस्कराते हुए अंगूठा दिखाया।

आजो नाय!! – लछमी हैरान थी-फगुआ के समय हो आर तिवारी पाहुन भी आयल हथु।

इ काहे आ जाता है – झुंझलाहट ने घेर लिया था बड़कू को।

अरे पाहुन हथि। दीदी के मोरला पर भी संबंध बनैले हथु। के करो हे।

बेकार के। बहिने जब नहीं रही तो पाहुन कोनची का।

तिवारी पाहुन प्रकट भए – पान से काले पडे़ दाँतों का समूल दर्शन कराते – गोड़ लागते हैं दादा ।

हँ, ठीक है, ठीक है। नश्ता पानी हुआ कि नहीं?

भोजने हो गया पूरा, सूटी का तरकारी (सहजन की सब्जी) आर भात। मन तिरपित हो गया।

त इधर कैसे?

इधर आये थे गाछ  कटवाने तो सोचे फगुआ है भेंट करते चलें – तिवारी पाहुन ने आगमन को जस्टीफाय किया-आजे रात में निकल जाना है।

रात में कहाँ जाइयेगा, कल भोरे जाइयेगा।

नाय दादा! जरूरी है। बगले मे तो जाना है।

ठीक है।

तिवारी पाहुन के कुरते पर घोली हुई हल्दी का रंग देखकर बड़कू पांडे़ समझ गये थे – लछमी का कारनामा है। तरह-तरह के कारनामे करती थी लछमी, जैसे उस रात की बात…..कहाँ? – बड़कू पांडे़ का चेहरा प्रश्नवाचक।

बड़ी गरमी हौ, बाहरे चला – तिर्यक मुस्कान लछमी के चेहरे पर -बाहर!! – हैरान बड़कू जबतक हाँ, हाँ करके रोकते तब तक बँसखट उठकर सहजन पेड़ के नीचे -पीछे- पीछे बड़कू पांडे़।

कोठरी में रहना मुश्किल हौ- कैसे बैठल हला – पसीना पोंछकर आँचल को सरका दिया था लछमी ने -फिर तो सहजन पेड़ ही गवाह बना उस रात का। बड़कू पांडे़ के ऊपर से जैसे अंधड़ बह गया हो और इस अंधड़ के बाद दागों से भरा चेहरा थोड़ा चमकने लगा था बड़कू का। तारे डूबने से पहले फिर कोठरी शरणं गच्छामि। तोता चीखता रहा – के है! के है!

       बड़कू ने डाँट दिया अंधे तोते को – चुप सरवा। खाली टें-टें। संध्या वंदन का समय हो चुका था। लकड़ी की कुर्सी पर बैठ चुके थे बड़कू। हत्थों पर दबाव बढ़ता जा रहा था- तनखा मिलना बंद हो गिया तो हम का करें। सबके तरह हम टायर – ट्यूब तो नहीं बेचते ……(गाली) …. सरकारी नौकरी था। इ हाल होगा कौन जानता था ….. बापे का मूड़ी खा गया सब। पैसा घटलो तो कभी सीट बेच दा कभी बैटरी। आर ऊपरे वाला सब भी तो चाहता कि सोना का अंडा सब एकेबार निकाल लें – मुर्गिये का मूड़ी मोचार दिया बताओ हमरा का गलती है – (गाली)- अंधा तोता लगातार टें-टें चीखता जा रहा था – जाओ बड़ी लहर उठा है देह में तो जाओ करवाओ जाके – हाँफने लगे थे बड़कू …. संध्या वंदन समाप्त हो चुका था।

गोड़ लागते हैं दादा – तिवारी पाहुन फिर प्रकट भये थे। अंधेरी कोठरी के बाहर से ही अंधेरे में काल्पनिक पाँवों को छूते थे तिवारी पाहुन। अंधेरी कोठरी से ही – हँ-हँ-ठीक है-ठीक है- का आशीर्वाद आता था फिर तिवारी पाहुन साले-सलहजों से हंसी ठिठोली में मगन और बड़कू पांडे़ झुंझलाहट से – फेर सरवा आ गया।

तब का हाल है मैला बाबू – तिवारी पाहुन गद्गदायमान स्वर में बोले, जिसका मतलब था, उधर से ही थोड़ा गद्गदा कर आये थे।ऐसी अवस्था में रहने पर मँझले पांडे़ को हमेशा ‘मैला बाबू’ पुकारते और अपनी पत्नी को ‘मैली मैडम’।

अरे पाहुन आ गेला – प्रसन्नता में डूबी आवाज मँझले पांडे़ की। संभावित संध्या आचमन की प्रत्याशा बढ़ जाती थी जब भी तिवारी पाहुन आते।

तब ! अजगर करे ना चाकरी पंछी करे न काम – पर टिकल है न।

आप भी पाहुन ! हम छोट-मोट काम करेला पैदे नहीं हुए हैं।

हाँ बड़ा काम तो एही एक्केगो किये हैं – मँझले बाबू के पुत्र की ओर इशारा करते हुए हँसे तिवारी पाहुन। पुत्र सहजन के पेड़ों पर रेंग रहे भुआ पिल्लुओं को एक छोटी मशाल के जरिये जलाने में व्यस्त था। काले-काले गोलियाये हुए जले पिल्लू गिर रहे थे पेड़ से टप-टप। गिन रहा था पुत्र पूरी तन्मयता एवं एकाग्रता से।

आर उ पशुगणनावाला काम?

उ तो कबे खतम हो गिया।

अच्छा! सीताराम तो रह रहा था कि बी.डी.ओ. साहेब भगा दिया तोरा। वहाँ भी टिरिक बाजी कर रहा था।

का टिरिकबाजी? गिनने का सीधा उपाय बताये तो …

       सीताराम की दुकान से ‘सीधा उपाय’ के बारे में जानकर आये थे तिवारी पाहुन। गधों की गिनती की बात चली तो बी.डी.ओ. साहेब को ‘सीधा उपाय’ सुझाया था मँझले पांडे़ ने – ‘देखिये तीन पंचायत है। सब मिलाकर तेरह गाँव। हर गाँव में एक धोबी -मतलब दो गधा। हो गया तेरह दूनी छब्बीस गधा’। बी.डी.ओ. साहब मुस्काये। क्रोध आने पर ऐसे ही मुस्काते थे। आखिर प्रशासन की खास ट्रेनिंग थी – ‘हाँ, आर छब्बीस में तीन और जोड़ लो पांडे़’।

तीन काहे मालिक? मँझले पांडे हैरान थे।

एगो तुम, एगो हम आर एगो हमरे उपरवाला, जो गधा गिनने बोला है। हो गया छब्बीस तीन उनतीस। आर कल से दर्शन देने का जरूरत नहीं है। काम खत्म… आभासी रोजगार का जो महीन तार जुड़ा था मँझले पांडे़ के साथ उसे बी.डी.ओ. साहेब ने चटकाकर तोड़ डाला था एक ही झटके में।

बड़का दा के बिसखायल (विसूख गई) तनखा से कब तक चलतौ जी-तिवारी पाहुन ने सीधा सवाल दागा।

चलवा ओन्ने कि खाली?मँझले ने वार बचाने की कोशिश की।

चलेंगे चलेंगे – तब ‘मैली मैडम’! भोजन-उजन बनेगा कि चल दें हजारीबाग-उम्रदराज पाहुन का मजाक अंदर तो पँहुच गया लेकिन लौटा नहीं। लछमी रहने से तुर्की-ब-तुर्की जवाब मिल जाता- सोचा अंधेरी कोठरी से बड़कू पांडे ने। कहीं से दाल भी निकल आती और बैगन-टमाटर-मूली की रसेदार सब्जी तो बन ही जाती बाडी के पौधों से ही। पता नहीं ये हरामखोरे पाहुन को भात-सब्जी भी खिला पायेंगे कि नहीं। पाहुन ठहरे ‘फूटल ढोल’। पाँच गाँव में भोंपू बजाते फिरेंगे- ‘अब पांड़े परिवार के अवस्था बहुत गिर गेलौजी एही से कहते हैं न -पूत कपूत तो का धन संचे। रमाधार पांडे़ के मूत से चिराग जल जा हलौ। ओकरे आस-औलाद सब के इ हाल’। बड़कू पांड़े करें भी तो क्या ? दस-बारह महीने में एकबार पेंशन मिलती थी, वो भी कटौती करके और ये पेंशन पुराने वक्तों की थी जो कभी-कभी चरणामृत की तरह मिलती थी। अब तो इसका भी आसरा खत्म होता जा रहा था, निगम के तनख्वाह पर ही आफत थी तो पेंशन-न डीजल न मोबिल तो इंजन चलेगा भी कैसे।

तब छोटे नबाब! उठे हैं कि नहीं?तिवारी पाहुन की ललकार जारी थी।

नहीं! राते देरी से आये- ये छोटकू की पत्नी थी।

‘हुँह! साले राज-काज करने गए थे। सब आवारा लोग के साथ रात-रात भर ताश खेलना। घर में बीबी, दो बच्चा- कोई चिन्ता है- बड़कू पांडे़ ने कोठरी में बैठे-बैठे सोचा। तोते ने सुर मिलाया -टें-टें। रात को लंगडू पिल्ला कुंई-कुंई किया था तभी समझ गए थे बड़कू कि छोटकू राजकाज करके लौट रहे हैं। पिल्ला भी ऐसा मिला है कि बिना खाना पीना मिले भी यहीं लेटा रहता है सहजन पेड़ के नीचे। इधर-उधर से कुछ मिल गया तो ठीक नहीं तो सरकारी कर्मचारी के तरह संतुष्ट- हाथ गोड़ नहीं हिलायेगा।

पितरिया (पीतल का ) लोटा कहाँ गया, यहीं तो रखे थे – मँझले पांड़े की चिचियाने की आवाज मिल रही थी।

काहे, आज ओकरे नम्बर था- जहर बुझी फुसफुसाहट मँझले की बीबी की।

चुप रह, पाहुन सुनेंगे – दाँतपीसू डाँट मंझले की।

सुनेंगे तो का होगा – धृष्ट उक्ति।

जरूर इ साला  छोटका का काम होगा। राते बेच के पी लिया होगा। जाने दो पाहुन को तब फैसला होगा – मँझले की चुनौती।

हाँ आखरिये लोटा था। फेर पिछला बार के तरह सूटी (सहजन) तोड़ो। इ गछबो तो नाय मोरता (मरता) है- मँझले की बीबी का हताश स्वर।

पाहुन ओन्ने गये हैं। अभी सूटी (सहजन) का दाम भी मिल रहा है। एक बोझा तोडि़ये लेते हैं। चावल ले आते हैं। पाहुन के लिए भात-सब्जी तो बनिये जायेगा।

अरे बप्पा रे। सब सूटी (सहजन) के चोरा लिया रे ! यह मँझले की आतंक भरी पुकार थी, प्रश्न था, सबकुछ था। दौड़-भाग, चिल्ल-पों, गाली-गलौज, श्राप-श्राद्ध, सब करने के बाद रहस्य पर से पर्दा उठाया सीताराम ने – तिवारी पाहुन को अंधरिये देखे थे साइकिल पर ढेर सूटी (सहजन)  लोड करके हजारीबाग तरफ जैते । हमको लगा आपलोग दिये होंगे – संदेश में। लेकिन बेसी था तो हम पूछे- तो बोले कि यही गछवा इ लोग को निकम्मा बना दिया है। जब जरूरत पडे सूटी (सहजन) तोड़ के बेच लो। अबरी आवेंगे तो आरी लेके राते-रात गिरा देंगे गछवे को तब… बूझेगा – सरकारी कंपनी बूझ लिया है। मँझले, छोटकू सब मिलकर गालियाँ निकाल रहे थे तिवारी पाहुन को – आबे अबरी खिलायेंगे खूब सब्जी-भात। पसीने-पसीने होकर उठे बड़कू पांडे़। नींद खुल गई थी उनकी। सपने में देखा था सहजन का पेड़ गिरकर धराशायी हो चुका था। पुकारा चुन्नू को- देख के आ तो, गछवा है कि गिर गया। चुन्नू ने सूचना दी – ‘गछवाके तरे तो बाऊजी’ उर्फ मँझले पांडे़) पुरानी साइकिल को झाड़ पोंछ रहे हैं। हजारीबाग जायेंगे- कोनो एटीएम में गार्ड का काम करने।

बाद में और सूचना मिली कि छोटकू पांडे़ भी निकल गये हैं। किसी अपार्टमेंट में ठीकेदार के साथ- मतलब देखभाल और क्या-बड़कू पांडे़ बहुत दिन के बाद चुन्नू का हाथ पकड़कर सहजन पेड़ के नीचे आ बैठे हैं। तोता चीखता जा रहा है लगातार बदस्तूर- लंगडू पिल्ला उछल रहा है, बड़कू पांड़े के पाँव को चाट रहा है- बेमतलब की कुईं-कुईं कर रहा है.

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