इस साल पढ़ी गई कहानियों में जिस कहानी का असर मेरे ऊपर सबसे गहरा रहा वह कहानी है प्रियदर्शन की बारिश धुआँ और दोस्त. यह कहानी किसी विराट का ताना-बाना नहीं बुनती बल्कि नई कहानी आन्दोलन की कहानियों की तरह अपने समकालीन जीवन के बहुत करीब है. संबंधों की एक धूपछाँही दुनिया के होने न होने के द्वंद्व के बीच लगभग काव्यात्मक भाषा में लिखी गई यह कहानी एक तरह से समकालीन कहानी के प्रस्थान बिंदु की तरह है- टर्निंग पॉइंट. यूँ ही मैं नहीं कहता कि प्रियदर्शन को कहानियां ही लिखनी चाहिए, कविताएं नहीं- प्रभात रंजन
===============================================
वह कांप रही है। बारिश की बूंदें उसके छोटे से ललाट पर चमक रही हैं।
`सोचा नहीं था कि बारिश इतनी तेज होगी और हवाएं इतनी ठंडी।`उसकी आवाज़ में बारिश का गीलापन और हवाओं की सिहरन दोनों बोल रहे हैं।
मैं ख़ामोश उसे देख रहा हूं।
वह अपनी कांपती उंगलियां जींस की जेब में डाल रही है। उसने टटोलकर सिगरेट की एक मुड़ी सी पैकेट निकाली है।
सिगरेट भी उसकी उंगलियों में कुछ गीली सिहरती लग रही है।
उसके पतले होंठों के बीच फंसी सिगरेट कसमसाती, इसके पहले लाइटर जल उठा।
फिर धुआं है जो उसके कोमल गीले चेहरे के आसपास फैल गया है।
`आपको मेरा सिगरेट पीना अच्छा नहीं लगता है न। `उसकी कोमल आवाज़ ने मुझे सहलाया।
`सोचा नहीं था कि बारिश इतनी तेज होगी और हवाएं इतनी ठंडी।`उसकी आवाज़ में बारिश का गीलापन और हवाओं की सिहरन दोनों बोल रहे हैं।
मैं ख़ामोश उसे देख रहा हूं।
वह अपनी कांपती उंगलियां जींस की जेब में डाल रही है। उसने टटोलकर सिगरेट की एक मुड़ी सी पैकेट निकाली है।
सिगरेट भी उसकी उंगलियों में कुछ गीली सिहरती लग रही है।
उसके पतले होंठों के बीच फंसी सिगरेट कसमसाती, इसके पहले लाइटर जल उठा।
फिर धुआं है जो उसके कोमल गीले चेहरे के आसपास फैल गया है।
`आपको मेरा सिगरेट पीना अच्छा नहीं लगता है न। `उसकी कोमल आवाज़ ने मुझे सहलाया।
यह जाना-पहचाना सवाल है।
जब भी वह सिगरेट निकालती है, यह सवाल ज़रूर पूछती है।
जानते हुए कि मैं इसका जवाब नहीं दूंगा।
लेकिन क्यों पूछती है?
लेकिन क्यों पूछती है?
‘मत दो जवाब,’ इस बार कुछ अक़ड के साथ उसने धुआं उड़ाया।
मैं फिर मुस्कुराया।
’आपकी प्रॉब्लम यही है। बोलोगे तो बोलते रहोगे, चुप रहोगे तो बस चुप हो जाओगे।‘
’आपकी प्रॉब्लम यही है। बोलोगे तो बोलते रहोगे, चुप रहोगे तो बस चुप हो जाओगे।‘
मैंने अपनी प्रॉब्लम बनाए रखी। चुप रहा तो चुप रहा।
वह झटके से उठी, लगभग मेरे मुंह पर धुंआ फेंकती, कुछ इठलाती सी चली गई।
सिगरेट की तीखी गंध और उसके परफ्यूम के भीनेपन ने कुछ वही असर पैदा किया जो उसके पतले होठों पर दबी पतली सी सिगरेट किया करती है।
वह झटके से उठी, लगभग मेरे मुंह पर धुंआ फेंकती, कुछ इठलाती सी चली गई।
सिगरेट की तीखी गंध और उसके परफ्यूम के भीनेपन ने कुछ वही असर पैदा किया जो उसके पतले होठों पर दबी पतली सी सिगरेट किया करती है।
यह मेरे भीतर एक उलझती हुई गांठ है जो एक कोमल चेहरे और एक तल्ख सिगरेट के बीच तालमेल बनाने की कोशिश में कुछ और उलझ जा रही है।
…………..
हमारे बीच 18 साल का फासला है। मैं ४२ का हूं, वह २४ की।
बाकी फासले और बड़े हैं।
फिर भी हम करीब है। क्योंकि इन फासलों का अहसास है।
कौन सी चीज हमें जोड़ती है?क्या वे किताबें और फिल्में जो हम दोनों को पसंद हैं?या वे लोग और सहकर्मी जो हम दोनों को नापसंद हैं?या इस बात से एक तरह की बेपरवाही कि हमें क्या पसंद है और क्या नापसंद है?आखिर मेरी नापसंद के बावजूद वह सिगरेट पीती है।
बाकी फासले और बड़े हैं।
फिर भी हम करीब है। क्योंकि इन फासलों का अहसास है।
कौन सी चीज हमें जोड़ती है?क्या वे किताबें और फिल्में जो हम दोनों को पसंद हैं?या वे लोग और सहकर्मी जो हम दोनों को नापसंद हैं?या इस बात से एक तरह की बेपरवाही कि हमें क्या पसंद है और क्या नापसंद है?आखिर मेरी नापसंद के बावजूद वह सिगरेट पीती है।
फिर पूछती भी है, मुझे अच्छा लगता है या नहीं।
मैं कौन होता हूं टोकने वाला।
टोक कर देखूं?
अगली बार देखता हूं।
………………………….
………………………….
इतना पसीना कभी उसके चेहरे पर नहीं दिखा।
वह थकी हुई है, लेकिन खुश है।
शूट से लौटी है।
’पता है, राहुल गांधी से बात की मैंने?’
‘अच्छा? आज तो जम जाएगी रिपोर्ट।‘
’रिपोर्ट नहीं, कमबख्त कैमरामैन पीछे रह गया था।
मैं घेरा तोड़कर पहुंच गई थी उसके पास।‘
‘क्या कहा राहुल ने?’
’कहा कि तुम तो जर्नलिस्ट लगती ही नहीं हो।‘
’वाह, क्या कंप्लीमेंट है! और क्या खुशी है।‘
मैं हंस रहा हूं।
उसे फर्क नहीं पड़ता।
फिर उसके हाथ जींस की जेब टटोल रहे हैं।
फिर एक सिगरेट उसके हाथ में है।
और जलने से पहले धुआं मेरा चेहरा हो गया है।
उसे अहसास है।
वह फिर पूछेगी- उसने पूछ लिया।
’आपको अच्छा नहीं लगता ना?’
’क्या?’ मैं जान बूझ कर समझने से बचने की कोशिश में हूं।
‘मेरा सिगरेट पीना।‘ वह बचने की कोशिश में नहीं है।
‘मैं बोलूं, फेंक दो तो फेंक दोगी?’ मेरे सवाल में चुनौती है।
’हां’, उसके जवाब में संजीदगी है।
’हां’, उसके जवाब में संजीदगी है।
‘फेंक दो।‘ मेरी आवाज़ में धृष्टता है।
उसने सिगरेट फेंक दी हैं।
उसने सिगरेट फेंक दी हैं।
मैं अपनी ही निगाह में कुछ छोटा हो गया हूं।
अक्सर ऐसे मौकों पर वह हंसती है।
लेकिन वह हंस नहीं रही।
उसके चेहरे पर वह कोमलता है जो अक्सर मैं खोजने की कोशिश करता हूं।
उसे बताते-बताते रह जाता हूं कि जब उसके हाथ में सिगरेट होती है, यही कोमलता सबसे पहले जल जाती है।
लेकिन यह कोमलता अभी मुझे खुश नहीं कर रही।
अपना छोटापन मुझे खल रहा है।
’दूसरी सुलगा लो।‘
’वाह, मेरे ढाई रुपये बरबाद कराकर बोल रहे हैं, दूसरी सुलगा लो। फिर मना क्यों किया था?’
’तुम मान क्यों गई?’वह हंसने लगी। जवाब स्थगित है।
मैं चाहता हूं, वह कोई उलाहना दे।
’दूसरी सुलगा लो।‘
’वाह, मेरे ढाई रुपये बरबाद कराकर बोल रहे हैं, दूसरी सुलगा लो। फिर मना क्यों किया था?’
’तुम मान क्यों गई?’वह हंसने लगी। जवाब स्थगित है।
मैं चाहता हूं, वह कोई उलाहना दे।
कहे कि मैं पुराने ढंग से सोचता हूं।
लेकिन वह चुप है।
हम दोनों चुप्पी का खेल खूब समझते हैं।
चुप्पी जैसे हम दोनों की तीसरी दोस्त है।
उसकी उम्र क्या है, नहीं मालूम।
कभी वह ४२ की हो जाती है, कभी २४ की।
लेकिन वह फासला बनाती नहीं मिटाती है।
हमारे बीच चुप्पी नहीं होती तो क्या होता?शब्द होते।
वे दूरी बढ़ाते या घटाते?
चुप्पी जैसे हम दोनों की तीसरी दोस्त है।
उसकी उम्र क्या है, नहीं मालूम।
कभी वह ४२ की हो जाती है, कभी २४ की।
लेकिन वह फासला बनाती नहीं मिटाती है।
हमारे बीच चुप्पी नहीं होती तो क्या होता?शब्द होते।
वे दूरी बढ़ाते या घटाते?
वह जा चुकी है। उसके पास ऐसे सवालों से जूझने की फुरसत नहीं।
……………………..
वह एक अच्छे वाक्य की तलाश में है।
इतनी संजीदा जैसे बरसों से तप में डूबी हो।
उसे एक कहानी हाथ लगी है।
’कहानी क्या होती है?’
एक बार उसने पूछा था।
‘वह चीज, जिसके आईने में हम ज़िंदगी को नए सिरे से पहचानते हैं।‘
सवाल खत्म नहीं हुआ था।
’कहानी कहां से मिलती है?’
’जिंदगी को क़रीब से देखने से, रुक कर, ठहर कर।‘
लगता है, वह जिंदगी को बेहद करीब से देख कर आई है।
उसके चेहरे पर जर्द-जर्द सच्चाई है।
उसकी कांपती उंगलियां स्क्रीन पर एक शब्द लिखती और मिटाती हैं।
मैं पीछे खड़ा हूं।
’कहां से शुरू करूं?’ सवाल में कुछ बेचारगी है, कुछ मायूसी।
’क्या हुआ?’
‘मां-बेटे का मामला है। बेटा दो साल से पिता के पास रहा। अब ग्यारह बरस का है। मां अदालतों के चक्कर काटती रही। अब सुप्रीम कोर्ट ने बेटे को मां के पास जाने का आदेश दिया है।‘
’सही फैसला है।‘
’पता नहीं।‘ उसकी आवाज़ में मायूसी है।
‘क्यों? महिलाओं के हक की तो बात सबसे ज्यादा उठाती हो तुम?’
यह ताना सुनने की फुरसत उसे नहीं है।
वह कहानी खोज रही थी।
जो कहानी मिली है, उसने बताया है, जीवन सरलीकृत रिश्तों से नहीं बनता।


