• पुस्तक अंश
  • मनोहर श्याम जोशी और लखनऊ मेरा लखनऊ’

    आज मनोहर श्याम जोशी की जयंती है। उनकी लिखी किताबों में ‘लखनऊ मेरा लखनऊ’ बहुत अलग किताब है। इसमें उन्होंने उन दिनों के बारे में लिखा है जब वे लखनऊ में पढ़ते थे और लेखक बनने के लिए संघर्ष कर रहे थे। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब का आज एक रोचक अंश पढ़िए- मॉडरेटर

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    ख़ैर साहब, तो जोशी जी लखनऊ गये थे वैज्ञानिक बनने और बन गये लेखक। और सो भी तब जबकि उन्हें बाकायदा ‘कल का वैज्ञानिक’ घोषित किया जा चुका था। लगे हाथ इस किस्से को भी निपटा लिया जाय। हुआ यह कि शिक्षामन्त्री सम्पूर्णानन्द जी ने हर विश्वविद्यालय से एक-एक ‘कल का वैज्ञानिक’ चुनने और उसे रुपया दो सौ मात्र पुरस्कार में देने की घोषणा की।

    यह प्रतियोगिता बी.एस-सी. के छात्रों के लिए ही थी। तो जोशी जी सीधे रवीन्द्र पुस्तकालय पहुँचे और वहाँ से तब के बिल्कुल नये-नये विषय ‘एटॉमिक्स’ और ‘इलेक्ट्रॉनिक्स’ पर प्रोफेसर गेमाओ-जैसे नामी-गिरामी वैज्ञानिकों की लिखी हुई लोकप्रिय पुस्तकें उठा लाये। फिर उन्होंने उनका चरबा निकाला और उस पर एक निहायत साहित्यिक शीर्षक जड़ दिया- ‘रोमांस ऑफ द इलैक्ट्रान्स’। लीजिए हो गया ‘शोधपत्र’ तैयार। अब जोशी जी उसे सचित्र बनाने के सवाल से जूझे क्योंकि वह बेचारे खुद तो ‘फुटे’ की मदद से भी लगभग सीधी रेखा तक नहीं खींच पाते थे। लिहाजा उन्होंने नजाकत के धनी और ड्राइंग में बेजोड़ अपने एक सहपाठी को पकड़ा। उसने चित्र बना देने की कृपा की। बदले में कुछ दिनों के लिए जोशी जी की रेसिंग साइकिल माँग ली। तमाम शोध-पत्र पढ़ने के बाद निर्णायक प्रोफेसर महोदय को कुल दो पसन्द आये। एक जोशी जी का और एक ऐसे लड़के का जो सचमुच कल का वैज्ञानिक बना और जिसने बाद में अमेरिका में बहुत नाम कमाया। तो प्रोफेसर साहेब ने दोनों को ‘वाइवा’ के लिए अपने ऑफिस में बुलवाया।

    उन्होंने डपटकर जोशी जी से पूछा, ‘यह कहाँ से लिख लाये?’ तब जोशी जी ने सहज स्वीकार किया कि गेमाओं की किताबों में से टीप लाये। इस साफगोई से वह खुश हुए और फिर उन्होंने जोशी जी से आइंस्टाइन और नील्स बोहूर की उपलब्धियों के बारे में पूछा। सामान्य ज्ञान बढ़ाए रखने में यकीन करनेवाले जोशी जी ने सापेक्षवाद और क्वाण्टम थ्योरी का जिक्र कर दिया। अब बारी आयी दूसरे लड़के की। उसने प्रोफेसर महोदय को बताया कि ‘लखनऊ के ऊपर के अयनमण्डल के बारे में यह शोध-पत्र मैंने स्वयं प्रयोग करके लिखा है।‘ प्रोफेसर साहेब उखड़ गये और बोले, ‘नहीं, तुम्हारा बड़ा भाई रिसर्च स्कॉलर है। उससे तुमने यह लिखवाया है।‘ लिहाजा उन्होंने जोशी जी को ‘कल का वैज्ञानिक’ घोषित करवा दिया।

    जोशी जी परम प्रसन्न हुए। लेकिन इसके बाद उन्हें एक के बाद दो झटके लगे। पहला यह कि नजाकत के धनी ने बड़ी नफासत से रेसिंग साइकिल लौटाने से इनकार कर दिया और उसे अपना मेहनताना मान लिया। दूसरा झटका जोशी जी को तब लगा जब उन्होंने पुरस्कार के चेक को भुनवाने के लिए कृष्ण नारायण कक्कड़ से मदद माँगकर अपने विशुद्ध फर्स्ट ईयर-फूल होने का प्रमाण दिया। कक्कड़ साहब घनघोर इण्टेलैक्चुअल थे और लखनवी इण्टेलेक्चुअल भावुकता के सख्त विरोधी हुआ करते थे। व्यक्तित्व या कृतित्व में भावुकता प्रदर्शित करनेवाले को मूर्ख समझा जाता था और नादान इण्टेलेक्चुअलों को भावुक बातचीत के सहारे बेवकूफ बनाने का एक खेल-सा हुआ करता था तब। खैर, तो कक्कड़-मण्डली जोशी जी को फौरन हजरतगंज ले गयी जहाँ उन्होंने उनका चेक भुनवा दिया। फिर हमेशा दूसरों के पैसों से कॉफी पीनेवाले जोशी जी को उन्होंने मजबूर किया कि पुरस्कार पाने के उपलक्ष्य में छोटी-मोटी दावत दें। सुखी-दुःखी मन से उन्होंने सीनियरों की मण्डली को कॉफी हाउस ले जाकर सैण्डविच-बड़ा-काजू कॉफी की दावत दे डाली।

    वह सुखी इसलिए हो रहे थे कि अपनी कंगाली के दौर से उबरकर पार्टी दे रहे थे और दुःखी इसलिए हो रहे थे कि उनकी जेब हल्की हुई जा रही थी। यहाँ तक भी गनीमत थी। फिर क्या हुआ कि इस पार्टी के दौरान कक्कड़ साहेब ने अपने खिलन्दड़ तेवर को ताक पर रखते हुए भावुक जोशी जी को एक अदद मार्मिक-मार्का बात सुनायी। सो यह कि फैजाबाद में उनकी किसी लाड़ली छोटी बहन का विवाह होनेवाला है, जिससे उन्होंने कभी यह कह दिया था कि जिस दिन तेरी शादी होगी उस दिन मैं तुझे जरी-बूटेवाली बनारसी साड़ी और जेवर का सैट दूँगा। अब परेशानी यह है कि इसके लिए चाहिए रुपया। पचास-सौ पास में है नहीं। इसलिए अपनी लाड़ली बहन की शादी में जा ही नहीं रहे हैं बेचारे।

    कक्कड़ साहब ने यह दुःखद प्रसंग उठाया और महेश पन्त वगैरह ने उनके साथ बेहतरीन जुगलबन्दी की। यह भावुक बन्दिश एक खूबसूरत तीए पर खत्म हुई-जोशी से माँग, जोशी से माँग, जोशी से माँग। कक्कड़ साहब ने जोशी जी की ओर देखा और बहुत सकुचाते हुए बोले, “अगर दे सको तो दे दो। गरमी की छुट्टियों के बाद तुम्हें लौटा दूँगा।” जोशी जी ने भाव-विह्वल होकर दे दिये। मगर अपनी शंकालु बन्दिश इस तीए के साथ खत्म की-लौटा दोगे ना, लौटा दोगे ना, लौटा दोगे ना! कक्कड़ साहेब ने पूरा आश्वासन दिया और जोशी जी गर्मियों की छुट्टी में घर चले गये, जहाँ कक्कड़ साहेब द्वारा प्रेरित भावुकता से उन्होंने अपनी माँ और बहनों के लिए पुरस्कार के पैसे से कुछ-कुछ लिया।

    लौटकर आये तो पैसे माँगने पर कक्कड़ साहेब और उनके साथियों ने उनका भरपूर मजाक उड़ाया। बोले, “साले तुम्हें किसने कल के वैज्ञानिक का पुरस्कार दे दिया। तुम्हारे नजरिए में हमें तो वैज्ञानिकता कहीं नजर नहीं आयी। पाँच मिनट तुम्हें तीसरे दर्जे की सेण्टीमेण्टेलिटी की डोज पिलायी और तुमने पचास रुपये हमें थमा दिये। हम तो तुम्हें इण्टेलेक्चुअल समझे थे तुम तो कोरे कस्बा छाप भावुक लौंडे निकले। खैर, अगर इस हादसे से तुम जिन्दगी के बारे में कुछ अहम सबक हासिल करोगे, उसे देखते हुए पचास रुपये का चला जाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है।

    जोशी जी बाकायदा रो पड़े। तब कक्कड़ साहेब ने कहा, “ठीक है धीरे-धीरे लौटा देंगे।” उन्होंने आसान किस्तों में लौटाये और हर किस्त के दिये जाने के समय इण्टेलैक्चुअल जोशी जी की भावुकता का प्रसंग नये सिरे से छिड़ा। उनकी कहानियों में निहित भावुकता भी रेखांकित की गयी। किसी आधुनिक लेखक का भावुक होना इस कदर अजूबा समझा जाता था कि लखनऊ कॉफी हाउस में धर्मवीर गया कि जैसे ही पाण्डे जी तारीफ शुरू करें फौरन चाय मँगवा लो। इस तरह के दिलचस्प लोगों और खेलों से दिलचस्पी जोशी जी के लिए विज्ञान का डटकर अध्ययन करने में बाधक सिद्ध हुई। “कल का वैज्ञानिक” पुरस्कार मिल जाने के बाद विज्ञान संकाय में प्राध्यापकों का ध्यान बैकबेंचर जोशी की ओर गया और वे आशा करने लगे कि जोशी जी फ्रण्ट बैंचर हो जाएंगे। जोशी जी स्वयं भी अपने में ऐसे किसी चमत्कारी परिवर्तन की प्रतीक्षा करने लगे। उनकी प्रतीक्षा लम्बी खिंचती चली गयी। अपनी साख बनाये रखने के लिए उन्होंने रसायन विभाग वालों की सोसाइटी की सेवा में ‘फलोरो कार्बन्स’ पर यहाँ-वहाँ से टीप-टाप कर एक पर्चा प्रस्तुत कर डाला। जाहिर है कि विभागाध्यक्ष प्रोफेसर चटर्जी ने जहाँ जोशी जी की पीठ थपथपायी वहाँ इस ओर भी ध्यान दिलाया कि ये सब बातें हाल में ‘नेचर’ में छप चुकी हैं। इसके बाद जोशी जी शोध-वोध भूल गये!

    बहरहाल जोशी जी ‘कल के वैज्ञानिक’ भले ही न बने हों, और शायद इसीलिए न बने हों कि बकौल कक्कड़ एण्ड कम्पनी उनमें वैज्ञानिक दृष्टि का अभाव था, उन्हें यह सोच-सोचकर बहुत खुशी होती रही है कि मैं कल का वैज्ञानिक हो सकता था। इसके चलते वह अपने को ‘डिफरेन्ट’ महसूस कर पाते हैं। विज्ञान के गूढ़ विषयों की लोकप्रिय पुस्तकें वह बराबर पढ़ते रहे हैं और अन्य साहित्यकारों पर अपनी विज्ञान-सम्बन्धी जानकारी का रोब गालिब करते रहे हैं। उन्हें बाद में इस बात से बहुत खुशी हुई कि उनके साहित्यिक गुरु नम्बर दो स. ही. वात्स्यायन अज्ञेय भी विज्ञान के स्नातक हैं। जोशी जी सोचते रहे हैं कि कभी अपने किसी नायक को अज्ञेय के नायक की तरह वैज्ञानिक बनाएँ। साहित्यिक गुरु नम्बर दो का जिक्र छिड़ने से मुझे जोशी जी के साहित्यिक गुरु नम्बर एक की याद हो आयी है। मैं समझता हूँ कि अब लखनऊ में नागर जी के श्री चरणों में बैठकर जोशी जी के लेखक बन जाने की कहानी गतांक से आगे बढ़ाने का वक्त आ गया है।

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