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  • हव्वा की बेटियों की दास्तान- दर्दजा

                  दर्दजा(2023ई.)  एक ऐसा उपन्यास है जो स्त्रियों की सुन्नत जैसी विभत्स रूप को, पितृसत्तात्मक संरचना के विभत्स रूप को तरह-तरह से उजागर करता है। इस उपन्यास की समीक्षा की है निकिता यादव ने। निकिता दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातक करने के उपरांत हैदराबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर कर रही हैं- अनुरंजनी            

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        दर्दजा : हव्वा के बेटियों की दास्तान

    जय श्री रॉय की कृति ‘दर्दजा’ स्त्रियों की एक ऐसी दास्तान है जो हमें अंदर तक हिला कर रख देती है। हमें यह सोचने को विवश करती है कि कोई धर्म या समाज कितना बेरहम और बेदर्द हो सकता है। इस उपन्यास की कथा पूर्वी अफ्रीका के एक देश सोमालिया की है। सोमालिया, विश्व का सबसे पिछड़ा और असफल राष्ट्र माना जाता है। ‘दर्दजा’ उपन्यास में यही सोमालिया केन्द्र में है, जिसका समाज और धर्म स्त्रियों के पितृसत्तात्मक व्यवस्था में उनके संघर्ष, बहते हुए ख़ून और तकलीफ में डूबी हुई गाथा को दर्ज करता है—जहाँ अफ़्रीका के 28 देशों के साथ-साथ मध्य-पूर्व के कुछ देशों और मध्य व दक्षिण अमेरिका के कुछ धार्मिक समुदायों की करोड़ों स्त्रियों की फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (एफजीएम या औरतों की सुन्नत) की कुप्रथा का दर्दनाक व्यवहार किया जाता है। एक स्त्री की सुन्नत का मतलब है, उसके यौनांग के बाहरी हिस्से (भगनासा समेत उसके बाहरी ओष्ठ) को काटकर सिल देना, ताकि उसकी नैसर्गिक कामेच्छा को पूरी तरह से नियंत्रित करके उसे महज बच्चा पैदा करने वाली मशीन में बदला जा सके। यह पितृसत्तात्मक समाज का सबसे क्रूर उदाहरण हमारे सामने रखता है।

    अफ्रीका महाद्वीप के विभिन्न  देशों में सुन्नत की यह प्रथा प्रचलित है। ये बात अलग है कि हर जगह इसे अलग-अलग नाम से जाना जाता है। ईजिप्ट में ताहारा, सुदान में ताहुर, माली में बोलोकोली, काकिआ में बुनडु और इथियोपिया में इसे फालाशास कहते हैं। अलग-अलग देशों में अलग-अलग तरीके से सुन्नत की प्रथा को अंजाम दिया जाता है। उपन्यास उस प्रक्रिया का बेहद मार्मिक विवरण पाठक से सामने रखता हैं कि कैसे नवजात बच्ची पर यह  किया जाता है। इसे पढ़ते हुए जो चित्र मानस पर बनते हैं उसमें गोद में हुमक रही फूल-सी बच्ची, उनका कोमल अंग और उस पर चलता चाकू जैसा भयावह दृश्य पटल पर निर्मित होता है। मैं जब इसे पढ़ रही थीं तब बार-बार सोच रही थी कि कैसे झेल पाती होंगी वे बच्चियां इतना दर्द? फिर सोचती हूं कि क्या वह झेल पाती भी होंगी? यहां औरतों का जन्मने-मरने को कोई  गिनता भी होगा?

    अमहारा में आठवें दिन, अडेरे, ओरोमो में चार साल से लेकर किशोर लड़कियों तक का तथा सोमाली (जिस एक देश की यह कथा है) में साधारणतया चार से नौ साल तक की बच्चियों की सुन्नत होती है। कुछ लोग शादी से पहले भी यह करते हैं और कुछ प्रथम गर्भ के ठीक पहले या तुरंत बाद। यह सुनकर हमें हैरानी होती है कि नाइजीरिया तथा ईजिप्ट में मर्द लड़कियों का सुन्ना करते हैं। यह काम गैर मर्दों अर्थात् नाइयों से करवाया जाता है। उपन्यास में इस प्रसंग को पढ़ते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मन ही मन मैंने सोचा था ऐसा कैसे हो सकता है? कैसी जिल्लत और शर्म का सामना करना पड़ता होगा उन लड़कियों को और आपको यह जानकर और भी हैरानी होगी कि गेद्दा या सुन्ना करने वालों के अलावा लड़कियों के माएं तथा दादियां भी यह काम करती हैं। परम्परा के नाम पर माएं अपनी बच्चियों को इस नर्क में फेंकती‌ है। वह स्वयं भी उन मासूम बच्चियों पर उस्तरा(razor) चलाती हैं और हां यह किताब पढ़कर यह  भी मालूम हुआ कि यह सिर्फ मुसलमानों में ही नहीं, कुछ देशों के ईसाइयों तथा अन्य धार्मिक समुदायों में भी यह प्रथा प्रचलित है।

    इस किताब तथा तमाम अन्य स्रोतों से पता चलता है कि इसमें कुछ भी मज़हबी नहीं है। लोग अपनी अज्ञानता से इसे एक धार्मिक रीति मान लेते हैं जबकि इसका धर्म से कुछ लेना-देना नहीं है। कुछ धार्मिक गुरुओं ने तो इसका विरोध भी किया है तथा कई महिला संगठन भी इस प्रथा की रोकथाम के लिए वर्षों से काम कर रहें हैं जिसमें विदेशी औरतें भी शामिल हैं।

     

    अब हम आते हैं उपन्यास के केंद्रीय कथानक पर। माहरा नाम की स्त्री इस उपन्यास की केंद्रीय पात्र है। उसका परिवार एक बड़ा परिवार है। परिवार में कई लोग हैं—मां, पिता, भाई, बड़ी बहन, छोटी बहन(मासा), कई छोटे भाई। लगभग आठ-नौ भाई बहन हैं इसके बावजूद मां का गर्भ धारण करना रुकता नहीं है और अंत में गर्भावस्था में ही प्रसव के दौरान मां की मृत्यु हो जाती है।

    माहरा की जिंदगी को इस उपन्यास में दो भागों में बांटा जा सकता है। एक शादी से पहले और दूसरा शादी के बाद। उपन्यास पढ़ते हुए एक जगह ठहर जाने को मन हुआ। एक रात माहरा का परिवार यानी उसके मां-पिता उसकी बहुत खातिरदारी कर रहे थे। मां ने खाना परोसते हुए उसकी थाली में ऊंट का मांस, रोटी और खीर सबसे ज्यादा परोसी थी। ऊंट की पीठ का गुमड़वाला हिस्सा माहरा को हमेशा बहुत स्वादिष्ट लगता था, जिसके लिए मासा और उसके भाई दोनों जिद करते लेकिन उस दिन यह सब केवल माहरा के हिस्से था और यहां तक कि उसके सोने की जगह भी साफ़-सुथरी, नए बिस्तरों के साथ बाकी लोगों से अलग थी। यह सब माहरा को अच्छा तो लग रहा था लेकिन कहीं न कहीं उसके जहन में एक डर भी बन रहा था, जो वह समझ नहीं पा रही थी। इसी दौरान मां ने उससे कहा था कि अब तू खास बन जाएगी और औरत का दर्जा पाएगी। औरत का दर्जा! यह सब बातें माहरा को समझ नहीं आ रही थी और देर रात तक वह बस सोचती और डरती रही। देर रात बाद उसका यह डर सच में बदल गया। जब वह उठी तो उसने अपने आपको जंगलों के बीच सुन्ना करने वाली औरत, मां और दो-तीन औरतों से घिरा हुआ पाया था। वह गेद्दा जब अपनी चीज़ों—पत्थर के नुकीले टुकड़े, भोथरा चाकू, हैंडल टूटी कैंची, ब्लेड का टुकड़ा सबको जमीन पर फैलाकर कहती है—“अब पकड़ो इसे…देर हो रही है।”

    उसकी बात पर  उसकी मां माहरा की ओर मुड़ी है और कहती है—“माहरा! मेरी अच्छी बेटी….आज वह खास मौका आ गया है जिसका इंतजार इस देश के हर नेक मुसलमान औरत को होता है! पाकीज़ा और खास होने का अवसर।औरत होने, निकाह के और मां होने के काबिल होने का कीमती मौका है। तुम्हें हिम्मत और सब्र रखना है और बस। सब कुछ आसान और जल्द हो जाएगा। अल्लाह तुम्हारा निगहबान है।” लेकिन माहरा डर से भाग जाती है और भागती ही जाती है और सुबह जब उसकी आंख खुलती है तो सामने वह अपने पिता और भाई को देख डर जाती है। वह उसे घर ले जाते हैं।और दूसरे दिन फिर वही औरतें जबरदस्ती माहरा को धर दबोचती हैं और आखिर उसका सुन्ना कर डालती हैं। जैसे ईद-बकरीद पर हम जानवरों को हलाल होते देखते हैं—उसी तरह माहरा को भी दर्द का प्याला पिला दिया गया।कितना दर्दनाक होता है यह सब। माहरा कहती है कि— “जब जाबरा(बंजारन औरत गेद्दा) के हाथ में चाकू होता है, कभी पत्थर के टुकड़े तो कभी ब्लेड, भय और पीड़ा से अवश होते हुए मैंने देखा था, उसने अपने दोनों गंदे हाथों के लंबे नाखूनों को मेरे भीतर ख़ुबा दिए थे  और मैंने खुद को दर्द के अथाह समुद्र में डूबते हुए मैंने महसूस किया था। वह अपने नाखूनों से मुझे नोच-खसोट रही है, चीड़-फाड़ रही है और कुतर रही है। इतनी नाजुक जगह पर इतना वार कैसे हो सकता है? पढ़ते हुए मेरा दिमाग़ सुन्न हो गया यह सोचकर कि कैसे झेल पाई होगी माहरा यह दर्द। माहवारी का दर्द क्या कम होता है? जो लोग इतना भयंकर दर्द देते हैं। इस आह के आगे मृत्यु भी कांप जाए।‌ इस जघन्य पीड़ा से कही बेहतर तो नरक है। सुन्नत के बाद एक महीने तक माहरा को घर से दूर जंगल में एक झोपड़ी में रखा गया था।

    माहरा के शब्दों में कहें तो—”उस झोपड़ी में मुझे कमर से लेकर टखने तक कस कर बांध दिया गया था ताकि ज़ख्म ठीक से भर सके। हिलना-डुलना तक संभव नहीं था। मां दलिया या कोई दूसरा नरम और गला हुआ खाना मेरे मुंह में डाल देती थी। टट्टी-पेशाब भी उसी अवस्था में। पहली बार जब अपने ताजे घाव के साथ मैंने पेशाब किया था, लगा था कि किसी ने ज़ख्म पर तेज़ाब डाल दिया है। तभी मुझे पहली बार पता चला था, मेरा गुप्तांग पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। बस एक माचिश की तीली की नोक बराबर छेद, पेशाब और माहवारी के रक्तस्राव के लिए छोड़ दिया गया है। बड़ी दीदी जमीन पर एक छोटा गड्ढा बना दी हैं, जिसमें एक करवट लेटकर मुझे पेशाब करना पड़ता है।एक-एक बूंद गिरने में 15-20 मिनट तक लगते हैं। अंत तक मैं इतनी निढाल हो जाती हूं कि मेरी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगता। इन दिनों मैं लगभग हर वक्त रोती ही रहती थी।”(  पृष्ठ संख्या -18 )

     

    ज़माना धर्म और परम्परा के नाम पर इन मासूम बच्चियों को कितनी असहनीय पीड़ा देता है जिसका किसी को कोई खेद भी नहीं होता। अचानक से एक हंसतीं-खेलती लड़की की पूरी दुनिया उजाड़ देते हैं। मैं सोचती हूं कि क्या दर्द, डर, उदासी और अकेलापन….औरत होना इसी को कहते हैं? दर्द से पैदा होना और दर्द में मर जाना।

    उपन्यास के इस अंश को पढ़ते हुए लगा कि मैं सोमालिया की उसी लड़की में बदल गई हूं। मेरे पैर में कंपकंपी और आंखों में भय तिरने लगा- “एक दिन जब मैं तेज बुखार में अचेत—सी पड़ी थी, अपनी बड़ी बहन की चीख सुनकर बड़ी मुश्किल से आंख खोल पायी थी और फिर गहरे आतंक में मैंने देखा था। मेरे शरीर के निचले हिस्से में चींटियां ही चींटियां बड़े—बड़े थक्कों में लगी हुई हैं—लाल, विषैली, बिज़बिजाती हुई। मेरे शरीर से खून बह रहा था, मगर मैं कुछ महसूस नहीं कर पा रही थी।अब मुझे दर्द नहीं होता था। सब कुछ जैसे शून्य हो गया था।”( पृष्ठ संख्या-19 )

     

    ऐसे सुन्नत के बाद बहुत-सी लड़कियां इन्फेक्शन, टिटनस, खून में जहर आदि फैल जाने से मर जाती हैं। इस उपन्यास में यह भी दिखाया गया है कि औरतों के गुप्तांग के जो बाहरी हिस्से हैं वे सब मर्दाना हिस्से हैं। जो अंदरूनी कोमल हिस्सा है केवल वही जनाना हिस्सा है। वही ऊपरवालों ने औरत को मां बनने के लिए दिया है। समाज यह मानता है कि उन्हें उनके जिस्म का इस्तेमाल सिर्फ मां बनने के लिए करना चाहिए, न कि यौन का विकृत आनंद उठाने के लिए।

    हम देखते हैं कि इस उपन्यास के माध्यम से उस समाज का यथार्थ हमारे सामने प्रस्तुत किया गया है, जहां लोग औरतों के वैजाइना को एक गंदी चीज मानते हैं और कहते हैं कि औरत का शरीर ही उसका पाप है और वो इस पाप से निजात पाने के लिए सभी औरतों, बच्चियों का सुन्ना करवाते हैं। लोग रीति-रिवाजों और मज़हबी कायदे-कानूनों में इतने डूबे हैं कि उनको उसके विरोध में की गई सारी चीजें अपमानजनक लगती हैं। वह इस पर किसी भी तरह की आंच नहीं आने देना चाहते। वह कहते हैं कि हमारी संस्कृति के सौंदर्य बोध में स्त्री के शरीर के इस हिस्से के लिए कोई स्थान नहीं है।

    यह हम अपने देश में भी देख सकते हैं कि माहवारी के दौरान एक स्त्री मंदिर में नहीं जा सकती, धार्मिक कामों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती और घर में बने पूजा-गृह में भी प्रवेश नहीं कर सकती। उदाहरण के रूप में, मैंने स्वयं ब्राह्मण समाज के घरों में यह देखा है कि अगर कोई स्त्री माहवारी में है तो वह घर के किचेन में नहीं जा सकती। उसे प्रतिदिन सुबह और शाम दोनों समय नहाना पड़ता है। कोई-कोई लड़की तो इसी में अपने आपको सहज पाती है कि चलो कम से कम मुझे एक हफ्ते घर की जिम्मेदारियों और किचेन से छुटकारा मिलेगा। मेरे घर में एक पूजा का कमरा अलग से है, जहां मम्मी कभी-कभी पूजा करती  हैं तो उस घर में मम्मी किसी को चप्पल पहनकर नहीं जाने देती।

    मैंने कई बार दुर्गापूजा के दौरान अपने गांव में देखा है कि कोई लड़की अगर गलती से पंडाल में अपने पीरियड्स के दौरान आ गई है या फिर अपने मन को वहां जाने के लिए रोक नहीं पा रही है तो उसको औरतों द्वारा अपशगुन कहा जाता और उसे भला-बुरा सुनाया जाता है। इन सबसे कभी-कभी लड़कियां इतनी उदास हो जाती हैं कि फिर कभी उधर जाने की उसकी हिम्मत नहीं होती।

    उपन्यास के दो अन्य पात्र के दुखों को साझा करते हैं। जुब्बा (माहरा की बड़ी बहन) एक रात घर से भाग जाती है। वह किसी मर्द के साथ नहीं भागती है बल्कि वह भागती है अपने समाज द्वारा बनाए गए झूठे, गंदे रीति-रिवाजों से, स्त्री को दिए जाने वाले बेमतलब के दुखों-पीड़ाओं से। सुबह परिवारजनों में अफरा-तफरी मचती है। वह ऐसा इसलिए करती है कि जब उसको पता चलता है कि उसकी शादी किसी रईस बूढ़े व्यक्ति से की जा रही तो वह यह बर्दाश्त नहीं कर पाती। बंजारों की बेटियों की अधिकतर यही नियति होती है। अपने मां-बाप के घर चार-पांच साल की उम्र से कड़ी मेहनत करती हैं और फिर थोड़ी बड़ी होने पर अच्छे पैसे या जानवरों के बदले किसी रईस बूढ़े से ब्याह दी जाती हैं। इस लोभ के कारण न जाने उन्होंने कितनी मासूम बच्चियां अपनी जान गवाती हैं।

    जुब्बा भी इसी का शिकार हुई थी। बाद में बीच जंगल उसका शव मिलता है जो टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित हो चुका है चिंदी-चिंदी कपड़े, आसपास कुछ हड्डियां, मांस और चमड़ी भी मिलती है। चारों तरफ बाल ही बाल फैले हैं। साथ ही लम्बी, नाजुक उंगलियां। शायद शहर की तरफ भागते हुए उसे रास्ते में कोई शेर खा गया था। सबा( माहरा की पड़ोसी सहेली) एक ऐसी औरत है, जिसका सुन्ना कर दिया गया है। उसने बहुत कम उम्र में बच्चा पैदा किया और प्रसव के दौरान उसका अविकसित शरीर हमेशा के लिए कहीं न कहीं से ज़ख्मी हो गया है। खासकर उसका मूत्राशय। बच्चे को जन्म देते हुए मूत्राशय में चोट पहुंचने की वजह से इनसे लगातार पेशाब रिसता रहता है। लगातार सालों-साल इस दशा में दिन भर पड़े रहने से इनके पावं, घुटने अशक्त हो जाते हैं। इनका चलना-फिरना दूभर हो जाता है। ऐसी कितनी औरतें हैं यहां, जिनकी जिंदगी बचपन से सीधे बुढ़ापे में बदल जाती है। सबा की तरह तमाम औरतों के साथ यह घटना होती है। उनके पति उन्हें छोड़ देते हैं और उन्हें गांव से दूर किसी झोपड़ी में रहना पड़ता है। सब इन्हें गंदी औरतें कहते हैं। इन्हें चुड़ैल करार दिया जाता है कि ये अच्छी औरतें नहीं है क्योंकि वे दुख नहीं झेल पाईं।

    मासा(माहरा की छोटी बहन) का सुन्ना बहुत कम ही उम्र लगभग सात साल की अवस्था में कर दिया जाता है ताकि वह माहरा की तरह सुन्ना के समय परेशानी न पैदा करे। विरोध न कर पाए। मासा दो महीने तक उस झोपड़ी में रही। बेचारी छोटी सी बच्ची मासा इतना दर्द कैसे झेल पाई होगी? यही वजह थी कि इन दो महीनों में मासा बुखार, दर्द, ह्रदय को चीर देने वाले रुदन से लड़ती रही। आखिरकार अंत में पता चलता है कि मासा को एड्स हो गया है और वह बेचारी बहुत कम ही उम्र में अपने जीवन से विदा ले लेती है।

    एक दिन अचानक माहरा को बुलाकर उसके अब्बू द्वारा यह कहा जाता है कि “माहरा! इनको सलाम करो, यह तुम्हारे होने वाले शौहर हैं-जहीर मियां!”( पृष्ठ संख्या-54 ) जहीर बिल्कुल बूढ़ा है। लगभग 60 साल की उम्र। मैं या कोई और लड़की इतने बड़े उम्र अंतराल में शादी की कल्पना भी नहीं कर सकते उसी तरह माहरा को भी यह उम्मीद न थी। माहरा को यह सुनकर झटका लगा था। जहीर को वह नाना कहकर बुलाती थी। माहरा का सौदा इस आधार पर कर दिया था कि बदले में उन्हें दहेज नहीं देना पड़ेगा और जहीर की तरफ से ही उन्हें अच्छे और महंगे तोहफ़े तथा कई पालतू जानवर मिलेंगे और माहरा के विरोध करने पर उसे यह दिलासा दिया जाता है कि बूढ़ा आदमी अपनी बीवी से बहुत प्यार करता है, तू वहां खुश रहेगी किसी भी प्रकार की कमी नहीं होगी वगैरह-वगैरह।

    इस समाज में पितृसत्ता इतनी हावी है कि स्त्री की अस्मिता की कोई जगह ही नहीं है। उसे हर दिन-रात मानसिक यंत्रणा से रूबरू होना पड़ता है। उसकी मर्जी या नामर्जी का किसी को कोई खास मतलब नहीं है। यहां दहेज और बेमेल विवाह का दौर इतना चलन में है कि इंसान उससे ऊपर सोच ही नहीं पाता है। मां-बाप को दहेज न देना पड़े इसके लिए बेचारी बच्चियों को कितनी बड़ी रकम चुकानी पड़ती है। इसका किसी को कोई ख्याल नहीं बल्कि यह कहा जाता है कि तू ससुराल जाकर राज करेगी। माहरा इस फैसले से नाखुश और दिन ब दिन भीतर ही भीतर कुढ़ती और रोती रहती है।

    उपन्यास में एक जगह वह कहती है—‘कितनी अकेली हो गई हूं यकायक। मैं खुश होना चाहती हूं, खुलकर हंसना चाहती हूं, गहरी नींद सोना चाहती हूं और रंग-बिरंगे सपने भी देखना चाहती हूं। खुसरंग मौसम, फूल-सब कुछ फीका और जर्द हो गया है। कोई जायका, कोई स्वाद नहीं अब जीवन में। हर चीज़ का माने बदल गया है सिरे से। मेरे औरत होने ने मुझे खत्म कर दिया है जैसे। मैं खुद को ढोती हूं, अपने औरत होने को ढोती हूं और प्रतिपल जीने की कोशिश में मरती हूं। जाने क्यों इस दुनिया के बाशिंदों ने जीवन को मृत्यु का पर्याय बनाकर रख दिया है। मौत के पहले भी मौत। एक बार नहीं, कई बार…..बार_बार।”( पृष्ठ संख्या-60 )

    आखिरकार माहरा का बेमेल बाल-विवाह कर दिया जाता है। परिवार की मर्यादा बचाए रखने की कड़ी में वह अपनी बड़ी दीदी की तरह भाग नहीं पाती और अपने आपको और अपनी न पहचानी जाने वाली अस्मिता को बलि चढ़ा देने का विरोध वह नहीं कर पाती। सुहागरात के दिन कमरे में अकेले बैठी माहरा को डर सताए जा रहा था कि किसी भी क्षण जहीर आ जाएगा। जब जहीर आता है और बिना कुछ कहे, बिना कुछ पूछे माहरा को एकटक देखते हुए अचानक उसके कपड़ो में हाथ डालकर उसका शरीर टटोलने लगता है।

    और फिर वही सवाल आते हैं कि क्या औरत के शरीर पर उसका कोई हक नहीं? क्या वह सिर्फ मर्दों के लिए है? मर्दों को खुश करना और बच्चे पैदा कर देना मात्र है?

    अमृता प्रीतम ने सही कहा है, “सभ्यता का युग तब आएगा जब औरत की मर्जी के बिना कोई औरत के जिस्म को हाथ नहीं लगाएगा(अमृता प्रीतम, उद्धृत: अमर उजाला, 30 अगस्त 2024)” जहीर माहरा को नोचता है। वह पूरी तरह उसके भीतर प्रवेश पा लेना चाहता था लेकिन माहरा का सुन्ना पूरी मजबूती के साथ किया गया था, जिस कारण जहीर चाह कर भी कुछ नहीं कर पाया था। उसकी सुन्ना को तोड़ने के लिए दोबारा बंजारन बुलाई जाती है। माहरा के सिले हुए भाग को काटा जाता है और फिर जहीर प्रवेश पाने की कोशिश करता है।

    आगे उपन्यास में एक जगह माहरा कहती है— “उस रात फिर जहीर ने मुझ पर आक्रमण कर दिया था। मर्दों की इस मामले में सब्र से काम लेने की नसीहत दी जाती है मगर जहीर में कोई सब्र नहीं। पहली रात वह मुझमें पूरी तरह से प्रविष्ट नहीं हो पाया था। इस बार वह कसम खाकर आया था शायद कि अपनी कोशिश में जरूर सफल होकर रहेगा। मुझे बुरी तरह रौंदते हुए उसने कहा था—अब तक मैंने चौदह बच्चे पैदा किए हैं, तीन औरतों को मां बनाया है! तू क्या चाहती है, तेरी वजह से लोग मुझे बूढ़ा और नामर्द समझने लगें? मेरा भी नाम जहीर है। तुझे महीने भर के अंदर गर्भवती न किया तो एक बाप की औलाद नहीं।”( पृष्ठ संख्या-89 )

    इसी तरह हर रात माहरा को खून से लतपथ होना पड़ता है। दर्द की अथाह पीड़ा से गुजरना पड़ता है।

    जहीर के अत्याचार उस पर बदस्तूर जारी रहते हैं। ऐसा नहीं कि माहरा को अब दर्द नहीं होता था मगर धीरे-धीरे यह उसकी आदत में बदल जाता है। जब कोई बात जिंदगी का हिस्सा बन जाती है, तब वह सह भी जाती है। वह दर्द जिसमें वह रात-दिन जीने के लिए अभिशप्त है, उस पर वह ध्यान देना ही छोड़ देती है। अपने घर-परिवार से निराशा हाथ लगने के बाद ससुराल में माहरा को एक प्रकार के साथी मिलते हैं—खाला और फातिमा बी(जहरी की तीसरी बीवी) के रूप में।यह तीनों औरतें आपस में एक-दूसरे से देश-दुनिया के रीति-रिवाजों और अपने साझे दुखों की बातें करती हैं।कभी-कभी तो माहरा और फातिमा बी एक दूसरे को देखकर ही रोने लगती हैं। उस दुःख में भी एक तरह का अपनापन और सुख है। इस अकेलेपन और अपनों द्वारा दिए गए दुखों ने माहरा को इतना तोड़ देता है कि अपनी यह साथी उसे दुःख में भी सुख देती है। यहां हम देख सकते हैं कि लेखिका ने मूक संवाद द्वारा ही दोनों पात्रों को जोड़ा है। बिना कुछ कहे वह आपस में बहुत कुछ कह डालती हैं और एक-दूसरे के दुखों को समझती हैं।

    इस उपन्यास में लेखिका ने स्त्री पक्ष पर विशेष रूप से बात की है। यह उपन्यास नारी-जीवन के दुखों और पीड़ाओं की कहानी है। इस उपन्यास में वह दर्द छिपा हुआ है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, भोगना तो दूर की बात है। इसमें लेखिका जय श्री रॉय, माहरा जैसी उन तमाम औरतों के दुखों का राज खोलती हैं जो उनका समाज उन्हें गुप्त तरीके से देता है। ऐसे विषय पर लिखना भी कोई हिम्मतदार और सशक्त व्यक्ति ही कर सकता है। जिसको एक स्वरूप और लिखित रूप देने का काम लेखिका जयश्री रॉय ने किया है।

    लेखिका ने सांकेतिक रूप से शिक्षा की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है कि माहरा की मां और तमाम कबीलाई औरतें शिक्षा के अभाव और मजहब की आड़ में सदियों से दर्द को अपना जीवन और नियति समझती आ रही हैं।‌वह इन सब कुप्रथाओं का शिकार होती आ रही हैं। वहीं मेम जैसी औरतें भी है, जिनके द्वारा इसका विरोध किया गया है और औरतों को सही दिशा में ले जाने का काम किया गया है। लेखिका ने कई जगह लिखा है, “ज़रूरी नहीं कि औरत हैं तो दर्द सहना ही पड़ेगा। बहुत-से दर्द कुदरत ने नहीं, इंसान ने औरत के लिए पैदा किए हैं। इंसान अपनी बनाई हुई तक़लीफ़ों का शिकार है। दुनिया की आधी से ज़्यादा तकलीफ़ें मनुष्य ने खुद अपने लिए पैदा की हैं। जिस दिन वह चाहेगा, यह दुनिया बेहतर हो सकती है।‌ इसके अधिकतर दुख मिट सकते हैं। खासकर औरतों के दुख।”( पृष्ठ संख्या -182 )

    उपन्यास की नायिका माहरा यद्यपि अनपढ़ है लेकिन उसके मन में मनुष्यता के विरुद्ध गड़े गए रीति-रिवाजों के खंडहरों प्रति आक्रोश है। वह इन सबको तोड़कर एक नयी दुनिया का स्वप्न देखती है। वह मुक्ति की कामना करने वाली स्त्री है। उसका मानना है कि ईश्वर दयालु है और वह किसी को भी पीड़ा या कष्ट पहुँचाना नहीं चाहता। उसका मानना है कि इन खूबसूरत चीज़ों को बनाने वाला मालिक बहुत उदार और दयालु होगा। ऐसे सुन्दर संसार को रचने वाला कलाकार औरतों की ज़िन्दगी को भला बदसूरत क्यों बनाना चाहेगा। आख़िर औरत भी तो उसी की बनाई हुई रचना है। उसे इस बात पर आपत्ति है कि सारे नियम-कानून केवल स्त्रियों के लिए ही क्यूं हैं? पुरुषों के लिए क्यूं नहीं?

    जहां हमारे समाज में औरतों की शारीरिक पवित्रता पर बहुत जोर दिया जाता है, उसकी इच्छाओं को नियंत्रित किया जाता है, वह डरता है कि वह किसी तरह बहक न जाए तथा चाह कर भी गलत राह पर न चले इसलिए उसकी देह को काट-छांटकर मूंद दिया जाता है। ऐसे में पुरुष अपनी जिस्मानी जरूरतों का क्या करें? उन्हें तो नकारा नहीं जा सकता। वे पूरी होनी चाहिए। इसके लिए मर्दों ने अपने में ही मिल-जुलकर रास्ता निकल लिया है। जब तक शादी न हो जाए या उसके बाद भी वे अपनी जिस्मानी जरूरतें एक- दूसरे के द्वारा पूरी करते हैं।

    यह सब माहरा को स्वीकार नहीं लेकिन क्या करे मजहब और समाज के तौर-तरीकों में फंसी स्त्री सिर्फ अपने मन से ही आज़ाद है। वह अपने मन में उठे तमाम पुरुष या समाज विरोधी तत्वों पर प्रश्न नहीं कर सकती इसलिए माहरा स्वयं ही सोचती रहती है और उसी में उलझ कर रह जाती है। वह सोचती है कि क्या मर्दों के लिए कोई नियम-कानून नहीं है? क्या उन्हें सही रास्ते पर चलना नहीं चाहिए? जो बुरा है वह सबके लिए बुरा है, फिर एक ही चीज मर्दों के लिए सही और औरतों के लिए गलत कैसे हो जाती है। हर बात में मर्दों को छूट और औरतों पर पाबंदियां क्यों?

     

    इसमें लेखिका द्वारा एक स्त्री के माध्यम से तीन खास दुःख बताए गए हैं —एक तो पहला सुन्ना, दूसरा, जब शादी की रात उसे फिर संभोग के लिए काट कर खोला जाता है और तीसरा जब बच्चा पैदा करने के लिए उसे प्रसव के समय काटा जाता है।

    इस उपन्यास में सोमालिया देश की प्रकृति  को भी बड़ी ही सुंदरता से चित्रित किया गया है। वहां की जलवायु विशिष्ट है। एक तरफ समंदर का किनारा,उसका गर्म, उमस भरा वातावरण और दूसरी तरफ रेत और रेत।  बारह महीने यहां मौसम कमोवेश एक-सा रहता है—गर्म और सूखा। बारिश के समय नज़ारा अलग रहता है, जब रेगिस्तान भी ताजा हरियाली से भरा होता है। तब कितने फूल, कितने पक्षी यहां खिलखिलाने लगते हैं कि लगता ही नहीं यह वही जमीन है, जिस पर महीनों सूखी रेत और गर्म हवा उड़ती रहती है। उन अच्छे दिनों में वहां की किशोर लड़कियां जंगली फूलों की माला गूंथ कर पहनती हैं। रेत पर तितलियों या अन्य पक्षियों के मनचाहे चित्र बनाती हैं। लेखिका माहरा के माध्यम से कहती हैं—”हरियाली का, बारिश का, सजलता का स्वाद, रंग-गंध कैसा होता है? कोई हम रेगिस्तान के बंजारों से पूछे।”(पृष्ठ संख्या-23 ) इसी प्रकृति के दृश्यों को प्रतीक के रूप में प्रयोग कर लेखिका ने माहरा के दुःख को जोड़ा है। माहरा कहती है कि हम पेड़-पौधों को, पशु-पक्षियों को, यहां तक कि कीट-पतंगों तक को उनके मौलिक  स्वरूप में स्वीकार करते हैं। तो फिर हम स्वयं को क्यों नहीं स्वीकार पाते? जब मैं चहचहाते हुए पक्षियों को, रंग-बिरंगी तितलियों को, नदी, सूरज, चांद, सितारों को देखती हूं तो मुझे लगता है ईश्वर है। मगर जब अपने जिस्म के दर्द में डूबती हूं, जिबह किए हुए जानवरों की तरह तड़पती हुई लड़कियों को देखती हूं, तो लगता है कि यहां शैतान की हुकूमत चलती है। बुरी आत्माओं का डेरा है इस जमीन पर। फ़रिश्ते यहां नहीं आते, ऊपरवाला भी मुंह फेर कर रहता है हमसे।” (पृष्ठ संख्या-34 )

     

    माहरा इन मनुष्य विरोधी रीति-रिवाजों का लगातार विरोध करती है और अंततः वह इससे अपनी बेटी और स्वयं को निजात पाने में कामयाब हो जाती है। इस उपन्यास की कथा को लेखिका ने बहुत ही क्रमवार और सरल तरीके से हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। लेखिका जो कहना चाहती हैं, वह अपनी तरफ से नहीं कहती हैं बल्कि उसको इस तरह से ध्वनित करती हैं कि पाठक तक वह स्वयं पहुंच जाए। कहीं-कहीं लेखिका ने अकथ्य को उभारने का काम किया है। जो कथा को और भी मार्मिक और हृदयग्राही बनाता है। मूक स्वीकृति का प्रयोग हम माहरा के संदर्भ में देख सकते हैं कि हर रात जब जहीर माहरा पर जुर्म करता था तो एक समय बाद माहरा का विरोध रुक जाता है और उसके कमरे में आते ही माहरा चुपचाप बिना प्रतिरोध के तैयार हो जाती है।

    उपन्यास में चित्रात्मकता और बिंबात्मकता प्रधान है। 21वीं सदी में भी विश्व के कई देशों में मज़हब के नाम पर होने वाले अत्याचार, शोषण, अंधविश्वास, अमानवीय कृत्य, रीति-रिवाज आदि के विरुद्ध यह उपन्यास अपने उद्देश्य की पूर्ति और समाज की संदेश देने में पूर्णतः सार्थक और समर्थ है। एक स्त्री का रूप इस तरह का हमारे समाज में नहीं होना चाहिए। यह उपन्यास वर्तमान समय में भी हमारे समाज और हमारी सोच से जुड़ता है इसलिए यह आज भी प्रासंगिक है और स्थितियों को देखते—सुनते हुए दुर्भाग्यवश यही लगता है कि शायद यह बना रहेगा। न जाने कितनी और कहानियां इसी तरह छुपी होंगी और हमसे छूट रही होंगी। कुछ को स्वरूप मिल जाने से वह हमारे सामने आ जाती हैं और न जाने कितनों से हम अनभिज्ञ हैं। एक सशक्त, बेबाक असहनीय दर्द और पीड़ाओं से भरे इस उपन्यास को पढ़कर एक प्यासा फिल्म का एक गाना याद आता है—

    “ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।”

     

    संदर्भ :

    “आज का विचार: अमृता प्रीतम।” अमर उजाला, 30 अगस्त 2024, https://www.amarujala.com/kavya/aaj-ka-vichar/amrita-pritam-quote-in-hindi-sabhyata-ka-yug-tab-ayega-jab-aurat-ki-marzi-ke-bina-2024-08-30.

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    समीक्षक

    निकिता यादव,  हैदराबाद विश्वविद्यालय

    ईमेल: ydvnikita06@gmail.com

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