आज पढ़िए जाने-माने लेखक पंकज सुबीर की नई कहानी। पंकज सुबीर की कहानियों में हर बार कुछ नया होता है जो अपने कथ्य और शिल्प से हमें प्रभावित करता है और कहानी पढ़ते हुए हम उसमें डूब जाते हैं। आप कहनी पढ़िए और बताइए कि मैंने झूठ बोला क्या? यह महज़ संयोग है कि आज पंकज सुबीर का जन्मदिन भी है- प्रभात रंजन
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समय-नदी के उस पार
नमस्कार,
इस समय जब यह पत्र लिखने बैठा हूँ तो मुझे भी पता नहीं कि यह पत्र पहुँच पायेगा भी या नहीं। इस बात की संभावना अभी तो बहुत कम ही नज़र आ रही है कि यह पत्र कभी ठिकाने तक पहुँचेगा। मगर फिर भी मैं इस पत्र को लिख रहा हूँ… लिख रहा हूँ यही सोच कर कि किसी के लिए लिखे गये या बोले गये शब्द अंतत: उस तक पहुँच जाते हैं। कहा जाता है कि वे सारे शब्द ईथर में रहते हैं… हमारे चारों तरफ़ जो जो कुछ है वह सब ईथर ही तो है। कहे गये या लिखे गये शब्द इसी में सुरक्षित हो जाते हैं, और फिर सही समय पर उसके सामने आ जाते हैं, जिसके लिए कहे या लिखे गये थे। मैं भी इस पत्र को लिख कर समय की ख़ला, इस ईथर के हवाले कर दूँगा, फिर इसके बाद मेरे अंदर की बेचैनी थोड़ी कम हो जायेगी। मैंने कहीं पढ़ा था कि इसी ईथर में एक तेज़ नदी हमेशा बहती रहती है, उसे समय की नदी कहते हैं… यह बहुत तेज़ गति से बहने वाली नदी है, एक पल के सौवें हिस्से के लिए भी कभी नहीं रुकती। सब कुछ अंतत: इस नदी में ही बह जाता है। मगर हमें न तो यह नदी दिखाई देती है और न ही इसके बहने की आवाज़ सुनाई देती है। असल में यह नदी परादृश्य नदी है और इसकी आवाज़ पराश्रव्य होती है… मतलब यह नदी हमारी देखने की क्षमता से परे होती है और सुनने की क्षमता के भी। यह नदी इस दिशा से उस दिशा की तरफ़ लगातार बहती है, भविष्य से अतीत की तरफ़… और वर्तमान इसका चौड़ा पाट है, जो अनंत तक फैला हुआ है। इस नदी में हर वर्तमान अतीत की लहर पर सवार होकर बीत जाता है, और हर भविष्य वर्तमान हो जाता है। हैरत है न कि यह नदी उल्टी बह रही है… भविष्य से अतीत की तरफ़… जबकि होना तो यह चाहिए था कि इसे अतीत से आते हुए भविष्य की तरफ़ बहना चाहिए। मगर ऐसा नहीं होता है, यह भविष्य को बहाते हुए वर्तमान तक लाती है और अगले ही पल उसे अतीत बनाते हुए बहा ले जाती है। मैं भी इस पत्र को लिख कर समय-नदी के ही हवाले कर दूँगा कि अंतत: किसी दिन यह पत्र अपने ठिकाने पर पहुँच जाये।
मैंने अपना परिचय अभी तक नहीं दिया है… जबकि होना तो यह चाहिए था कि मुझे अपना परिचय सबसे पहले ही देना चाहिए था। मेरे पिता का नाम डॉ. मदन मोहन जोशी था… था…? जी हाँ था… एक साथ दो बातें- पहली तो यह कि मैं… उन का बेटा हूँ और दूसरी बात यह कि वे अब ‘हैं’ नहीं बल्कि ‘थे’ हो गये हैं। समय-नदी कुछ महीनों पहले उनको वर्तमान से अतीत बनाते हुए बह गयी है। अब वे अतीत हो गये हैं। पता नहीं यह सूचना अब किसी काम की है भी या नहीं… सूचनाएँ भी तो समय-सापेक्ष होती हैं, जो सूचना आज किसी के लिए बहुत हर्ष या विषाद का काम कर रही है, वही सूचना दस-बीस साल बाद उसी के लिए एक सामान्य सूचना ही हो, या किसी काम की ही नहीं हो। घटनाएँ सुख या दुख का कारण नहीं होती हैं, असल में तो घटनाओं से जुड़ा हुआ समय ही सुख या दुख का कारण होता है। ख़ैर… मुख़्तसर-सी सूचना यह है कि कुछ महीनों पहले डॉ. मदन मोहन जोशी का निधन हो गया है।
इस पत्र में आगे मैं उनको, मेरा मतलब डॉ. मदन मोहन जोशी को ‘बाबा’ कह कर ही संबोधित करूँगा… अंतत: यही संबोधन उनको मिला था, जो उनके पोते-पोतियों ने उनको दिया था। एक व्यक्ति अपने जीवन में कई सारे संबोधनों से होता हुआ अंतत: इसी तरह के किसी संबोधन तक पहुँचता है। वे भी अंतत: यहीं तक पहुँचे थे। डॉ. मदन मोहन जोशी से बाबा तक का सफ़र जैसे कड़ी धूप में की गयी कोई यात्रा थी उनके लिए। जब से मैंने होश सँभाला तब से मैंने यह जाना कि बाबा बहुत ग़ुस्सैल स्वभाव के हैं। बहुत का मतलब सचमुच बहुत। इतने कि हमारे बचपन में जब वे अस्पताल से घर आते थे तो घर में कर्फ्यू लग जाता था। बचपन में तो मैं बस यही सोचता था कि बाबा का स्वभाव बहुत ग़ुस्सैल है, यह तो बहुत बाद में जब मैं बड़ा हुआ और मैंने मनोविज्ञान को कॉलेज में विषय के रूप में लिया, तब मुझे पता चला कि बहुत अधिक ग़ुस्सैल होना कोई स्वभाव नहीं होता, असल में तो यह एक मनोरोग होता है। इसके पीछे कोई न कोई ग्रंथि काम करती है। अतीत के नकारात्मक अनुभवों के कारण ही ऐसा होता है कोई व्यक्ति ग़ुस्सैल स्वभाव का होता है। बाबा अच्छे खाते-पीते परिवार से थे, जहाँ आर्थिक समस्या होने का कोई प्रश्न ही नहीं था। बाबा का यह ग़ुस्सैल स्वभाव शुरू से अंत तक वैसा ही बना रहा। यह बात अलग है कि बड़े होने के बाद हम बच्चे इस ग़ुस्से की ज़द से बाहर निकलते गये, मगर माँ हमेशा उनके ग़ुस्से की ज़द में बनी रहीं, बाबा के चले जाने तक। ऐसा नहीं है कि बाबा माँ पर केवल ग़ुस्सा ही करते थे, उन दोनों के बीच प्रेम भी बहुत था। मगर वह प्रेम हमेशा अव्यक्त ही रहता था और ग़ुस्सा तो अव्यक्त रहने वाली चीज़ ही नहीं है। इसलिए सबको बस ग़ुस्सा ही दिखता था।
मनोविज्ञान पढ़ने के बाद मैं बाबा के ग़ुस्सैल होने के पीछे मुख्य कारण मानता रहा उनकी माँ के नहीं होने को। वह समय जब माँ अपने बच्चे को मानसिक रूप में तैयार करती है, उसे लोक-व्यवहार सिखाती है, अच्छे-बुरे का ज्ञान करवाती है, उस समय बाबा को छोड़ कर उनकी माँ चली गयी थीं। पत्नी के मरने के कुछ समय बाद ही बाबा के पिताजी ने दूसरी शादी कर ली थी। बाबा की दूसरी माँ आ गयी थीं। दूसरी माँ… सौतेली माँ… इन संबोधनों में ही बहुत कुछ छिपा हुआ है- डर, घृणा, विरक्ति, डाह… मुझे बाबा के दूसरी माँ के आने के बाद के बचपन के बारे में अधिक तो पता नहीं, मगर हाँ मैं इस निष्कर्ष पर पहुँच गया था कि वह समय ज़रूर बहुत ख़राब रहा होगा और उसी ग्रंथि के कारण बाबा का स्वभाव एक प्रकार आक्रामक रूप से ग़ुस्सैल हो गया था। मनोविज्ञान में हमें यह सिखाया जाता है कि सब कुछ यूँ ही नहीं हो जाता है, हर बर्ताव, हर स्वभाव, हर आदत के पीछे कोई न कोई कारण होता है, कोई न कोई ग्रंथि होती है। मैं विज्ञान को मान कर ही यह मानता रहा कि दूसरी माँ ने बाबा के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया होगा इसलिए बाबा ऐसे होते चले गये। मनोविज्ञान यह भी कहता है कि आठ से पन्द्रह साल के बीच की उम्र में जो कुछ भी आपके साथ घटता है, वही आपके व्यक्तित्व का निर्माण करता है, आपके स्वभाव को, आपकी आदतों को तय करता है।
एक कारण और भी था यह मानने का और वह कारण यह था कि बाबा की माँ के मरने के बाद उनकी परवरिश, उनका लालन-पालन उनकी बुआ ने किया। बाबा की बुआ बाल-विधवा होकर मायके लौट आयी थीं, उसके बाद पढ़-लिख कर स्कूल में शिक्षक तथा बाद में प्रिंसिपल भी बनीं। आर्थिक रूप से सक्षम थीं इसलिए बाबा को उन्होंने ही पाला। इसी वजह से मैंने यह मान लिया कि बाबा की दूसरी माँ उनके साथ ठीक नहीं थीं, इसलिए ही बुआ ने भतीजे की परवरिश अपने सिर पर ले ली थी। हालाँकि बाबा की दूसरी माँ, मतलब मेरी दादी, दादाजी की मृत्यु के बाद हमारे ही साथ आकर रहीं, और उनके स्वभाव में मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा जो मेरे इस नतीजे की पुष्टि करता कि दादी किसी समय में फ़िल्मों की ललिता पँवार जैसी सौतेली माँ रही होंगी। वे बहुत प्रेमिल स्वभाव की थीं, बाबा उनके सौतेले बेटे थे, लेकिन वे बाबा को ‘भैया’ कह कर पुकारती थीं। बाबा से डरतीं भी बहुत थीं, वह तो ख़ैर सभी डरते थे, यहाँ तक की बाबा के बाबूजी मतलब मेरे दादाजी भी बाबा के ग़ुस्सैल स्वभाव के कारण उनसे डरते थे। यदि बाबा बैठे होते थे तो दादी वहाँ आकर नहीं बैठती थीं, जाने किस बात की मर्यादा पालती थीं वे बाबा को लेकर। सौतेले माँ-बेटे के बीच मैंने कोई कड़वाहट कभी नहीं देखी। बाबा भी उनके प्रति हमेशा सम्मान रखते थे। बाबा उनको ‘बाई’ कहते थे, जो हमारे यहाँ माँ को प्यार से पुकारने का एक संबोधन हुआ करता था। ऐसे में मुझे लगता था कि अगर इन्होंने बाबा के साथ बचपन में कुछ भी बुरा किया है, तो बाबा इनके प्रति इतना सम्मान कैसे रख सकते हैं। मुझे अपनी मनोविज्ञान की स्थापना उस समय दरकती हुई लगती थी। मगर एक स्थापना को ख़ारिज करने का मतलब है दूसरी स्थापना प्रदान की जाये, और दूसरी स्थापना मेरे पास कुछ नहीं थी, इसलिए मैं यही मान कर चलता रहा कि दोनों अब एक-दूसरे के प्रति सहज हो गये हैं या सहज होने का अभिनय कर रहे हैं।
ग़ुस्सैल स्वभाव के अलावा बाबा के अंदर एक प्रकार की विरक्ति भी थी। विरक्ति हर उस चीज़ से, जिसे हम सुख-सुविधा कहते हैं। मैंने तो जब से होश सँभाला तब से उनको ऐसा ही देखा। लगभग हर चीज़ से विरक्त। परिवार से नहीं… हम लोगों से नहीं, मगर हर अच्छी चीज़ से विरक्ति… और हाँ हर समय बस काम… काम और काम। सरकारी अस्पताल में डॉक्टर थे… और सरकारी अस्पताल ही उनका दूसरा घर था। दिन का अधिकांश समय अस्पताल में ही बीतता था। ऐसा लगता था जैसे काम का जुनून सा सवार है उन पर। काम का भी और शायद दुनिया से कट कर रहने का भी। ऐसा लगता था जैसे दुनिया से अलग वे अपनी दुनिया बसा कर उसमें ही रहते हैं। मगर इस स्थापना में भी एक अंतर्विरोध सामने आता था, अंतर्विरोध यह कि वे परिवार के प्रति लापरवाह या उदासीन नहीं थे, बल्कि कुछ अधिक ही केयरिंग थे परिवारजनों के प्रति। अपनी दुनिया में व्यस्त रहने के कारण हमारे साथ उनका संपर्क बहुत कम रहता था, मगर हमारे प्रति उनकी परवाह से हम अनभिज्ञ नहीं थे। कभी-कभी मुझे ऐसा लगता था जैसे उनके ग़ुस्से को लेकर मेरी पहली स्थापना ग़लत है, असल में तो वे अपनी दुनिया में रहना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने ग़ुस्सैल स्वभाव का आवरण ओढ़ रखा है, कि लोग दूर-दूर ही रहें। अस्पताल, मरीज़, दवाइयाँ, बस इनसे ही बनी थी उनकी दुनिया। उनके पास से हमेशा तरह-तरह की दवाओं की गंध आती थी। बहुत बाद में मैंने विंस्टन ग्रूम के उपन्यास पर बनी फ़िल्म ‘फॉरेस्ट गम्प’ देखी और उसमें टॉम हैंक्स को लगातार भागते हुए देखा, पागलों की तरह बस भागते हुए… तो मुझे लगा कि बाबा भी शायद भाग ही रहे हैं, मगर उनका यह भागना उनके अपने तरीक़े से हो रहा है। कोई ज़रूरी तो नहीं है कि भागना भौतिक तरीक़े से ही हो, कई बार आदमी बाहर से ठहरा हुआ नज़र आ रहा होता है, मगर अंदर ही अंदर भाग रहा होता है। बाबा भी फॉरेस्ट गम्प की तरह जैसे दुनिया से विरक्त होकर भाग रहे थे, भागते ही जा रहे थे।
यह सब लिखते हुए मेरे दिमाग़ में बार-बार विचार आ रहा है कि मैं यह किस प्रकार का पत्र लिख रहा हूँ, जिसमें बस बेसिरपैर की बातें ही कर रहा हूँ। मगर मेरे साथ एक मुश्किल यह है कि यह पत्र समय-नदी के हवाले कर रहा हूँ कि वही डाकिये की भूमिका का निर्वाह करते हुए इस पत्र को पहुँचाए। ऐसे में अभी तो यही तय नहीं है कि यह पत्र पहुँचेगा भी या नहीं ? पहुँचा भी तो कब पहुँचेगा। इसीलिए यह पत्र कुछ लंबा लिख रहा हूँ कि बाबा के बारे में सब कुछ बता सकूँ। सब कुछ का मतलब जीवनी नहीं, बल्कि यह कि उनका जीवन कैसा रहा। और जो कुछ बातें मैं इस समय-पत्र में लिख रहा हूँ, वे बातें मेरे विचार में बेसिरपैर की नहीं हैं। ये बातें असल में फारेस्ट गम्प की वह दौड़ ही है, जिसे देखते हुए शायद कुछ दर्शक बोर हो जाते होंगे, कि यह दौड़ आख़िर कब तक चलने वाली है ? मगर कुछ दर्शक यह भी चाहते होंगे कि यह दौड़ और चले, चलती रहे।
जब बाबा सरकारी अस्पताल से रिटायर हुए, तब तक हम बच्चे अपनी-अपनी दुनियाओं में व्यस्त हो चुके थे। हालाँकि हम घोंसला छोड़ कर कहीं उड़ नहीं गये थे, घर में ही थे। एक बेतरतीब संयुक्त परिवार के रूप में। बाबा ने रिटायर होने से पहले जो घर बनवाया था, उस घर में हम सब रहने आ गये थे सरकारी नौकरी के दौरान बाबा को मिले सरकारी घर को छोड़ कर। बाबा भी हमारे साथ घर आ गये थे, मगर घर आकर भी वे घर नहीं आये। डॉक्टर और वकील कभी रिटायर नहीं होते, वे जब तक ज़िंदा रहते हैं, तब तक डॉक्टर और वकील बने रहते हैं। रिटायरमेंट वाले दिन भी तो बाबा सुबह आठ बजे रोज़ की तरह काम पर पहुँच गये थे। ऐसे में रिटायरमेंट के बाद वे घर पर कैसे रह सकते थे ? उनके कानों में तो अभी भी आवाज़ आ रही थी- ‘रन फॉरेस्ट, रन’। रिटायरमेंट के ठीक अगले दिन उन्होंने फिर अपनी दिनचर्या को अपना लिया। पहले सरकारी अस्पताल था, अब अपना क्लीनिक था। लेकिन दिनचर्या वही थी, सुबह आठ से शाम छह बजे तक वही मरीज़, वही दवाएँ… कुछ भी बदला नहीं था। घनघोर बरसात हो रही हो, कड़ाके की ठंड हो… मगर सुबह आठ बजे घर से निकलना है तो निकलना ही है, आठ बज कर पाँच मिनट भी नहीं। मित्रों-परिचितों, नाते-रिश्तेदारों के दुख-सुख में शामिल होने का ज़िम्मा पहले भी माँ का ही था और बाबा के रिटायरमेंट के बाद भी उनका ही रहा। बाबा रिटायर तो हुए पर कार्यमुक्त नहीं हुए… घर भी वैसा का वैसा ही रहा, जैसा उनके रिटायरमेंट के पहले था… शाम को बाबा के आने से पहले घर को व्यवस्थित कर के सब अपने-अपने कमरों में चले जाते रहे। इस समय तक उनके पोते-पोती आ चुके थे, और उनके प्रति बाबा का प्रेमिल झुकाव था। हम लोग जो उनके बच्चे थे, हमें अपने बच्चों से रश्क होता था कि बाबा का जो स्नेहिल दुलार, जो प्यार हमें इस प्रकार उमड़ कर नहीं मिला, वह हमारे बच्चों, मलतब उनके पोते-पोतियों को मिल रहा है। हमारे और उनके बीच तो डर का रिश्ता था। जब पोते-पोती कुछ बड़े हो गये थे तब वे क्लीनिक से लौट कर सारे पोते-पोतियों को लेकर घर से कुछ दूर स्थित दुकान पर ले जाते और वहाँ से जिसे जो कुछ पसंद है, वह दिलवा कर लौटते। बाबा का यह बिलकुल नया रूप हमारे सामने आया था। हम सब के लिए यह रूप कुछ आश्चर्य का विषय था।
रिटायरमेंट के लगभग दस साल बाद मुझे पहली बार उनमें ऑब्सेसिव-कंपल्सिव डिसऑर्डर के लक्षण दिखाई दिये थे। जब चीजों को यथास्थिति बनाये रखने के लिए दुराग्रही होने लगे थे। यद्यपि वे पहले भी ऐसे ही थे, मगर अब आक्रामक रूप से ऐसे हो गये थे। चीज़ें जगह से क्यों हटाई गईं… हर बात पर अविश्वास… किसी भी वस्तु को छू देने पर तुरंत जाकर हाथ धोना… बार-बार किसी बात की पुष्टि करना… शाम को घर से बाहर गया घर का कोई सदस्य जब तक नहीं लौट आये, तब तक बार-बार उसके बारे में पूछते रहना… यह सब उनके स्वभाव में दिखाई देने लगा था। ग़ुस्सैल स्वभाव के साथ मिल कर इस ओसीडी ने उनको बहुत उग्र बना दिया था। उग्र और अविश्वासी। और इसी बीच वे बहुत कट्टर धार्मिक भी हो गये थे। लड़ जाने के स्तर तक कट्टर और आक्रामक धार्मिक। बाबा के पुरखे मंदिरों के पुजारी हुआ करते थे, उनके दादे-परदादे कर्मकांडों पर कट्टरता से विश्वास रखने वाले थे। मैंने उनमें से कुछ को देखा है इसलिए कह सकता हूँ कि बाबा अचानक ही अपने पुरखों के जैसे हो गये थे। जैसे वे डॉक्टर बनने के बाद से अब तक नहीं थे। वे इस समय देवी-देवताओं से डरने भी बहुत लगे थे। उनके अंदर देवी-देवताओं के प्रति जो श्रद्धा थी, असल में वह श्रद्धा नहीं डर था। शायद वे इस बात से डरने लगे थे कि ये देवी-देवता उनके परिवार, मतलब हम लोगों का कुछ बुरा कर सकते हैं। कुछ विचित्र-सी बातें भी उनमें इस डर के कारण आ गयी थीं, जैसे कहीं से भजन की आवाज़ सुनाई देने पर तुरंत पैरों की चप्पल उतार देना, या कुछ खा रहे हों तो तुरंत खाना बंद कर देना। जिस दीवार पर किसी देवी-देवता की तस्वीर लगी हो उस तरफ़ पैर करके नहीं सोना। इन बातों का कारण पूछने पर कहना- इनको नाराज़ नहीं करना चाहिए।
ग़ुस्सैल, कट्टर धार्मिक और उस पर ओसीडी… यह संगम कितना ख़तरनाक रहा होगा। परंतु चूँकि वे घर में रहते ही बहुत कम थे, इसलिए अक्सर तो उनके क्लीनिक से आने के समय शाम छह से रात को उनके सो जाने के समय नौ बजे तक ही घर में अघोषित कर्फ्यू लगता था। यह कर्फ्यू उनके पोते-पोतियों के लिए नहीं होता था, अब इसका शिकार अधिकतर तो माँ ही होती थीं, हम जो उनके बच्चे थे, हम तो उनके सामने आते ही नहीं थे। हैरान-कुन बात यह थी कि इसके बाद भी उनके मरीज़ों को उन पर अटूट विश्वास था। वे अपने मरीज़ों को बुरी तरह से डाँटते-डपटते थे, बेइज़्ज़त करते थे, मगर उसके बाद भी वे मरीज़ उनके पास ही लौट कर आते थे। उनके मरीज़ उनके हर बुरे व्यवहार को हँस कर झेलते थे, और शायद वे यह चाहते थे कि घर के सदस्य भी ऐसा ही करें। मगर ऐसा संभव नहीं था, मरीज़ों की अपनी आवश्यकता थी, वे अपने विश्वास के कारण उनके पास लौटते थे। घर के सदस्यों की ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी। यही वह समय था, जब उनको सँभालना धीरे-धीरे मुश्किल होता जा रहा था। उनकी धार्मिकता भी विचित्र होती जा रही थी, वे समाचार पत्र में छपी हुई देवी-देवताओं की हर फ़ोटो को प्रणाम करते थे, और हर फ़ोटो के सामने बुदबुदा कर कुछ बोलने लगे थे। घर में टँगे हुए कैलेंडर में भी यदि किसी देवी-देवता की तस्वीर है तो वहाँ से आते-जाते हर बार वहाँ रुक कर प्रणाम करते, कुछ बुदबुदाते और फिर ही आगे बढ़ते। उनके बुदबुदाने को यदि ध्यान से सुना जाता था, तो उसमें जाने किस कारण से क्षमा माँगी जा रही होती थी, और प्रार्थना की जा रही होती थी कि मेरे परिवार को बुरा मत करना। ओसीडी उनको यथास्थिति के प्रति कठोर बनाती जा रही थी।
अगले दस साल भी इसी प्रकार ओसीडी के बढ़ते प्रभाव के साथ बीते। इसी प्रकार मतलब हालात धीरे-धीरे और ख़राब, और ख़राब होते चले गये। उनकी उम्र भी बढ़ रही थी, मगर वे अपनी दिनचर्या को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। क्षमा कीजिए, पत्र कुछ अधिक लंबा होता चला जा रहा है। हालाँकि मैं बहुत मुख्य-मुख्य बिंदु ही लेकर चल रहा हूँ, मगर फिर भी चीज़ें विस्तार पाती जा रही हैं। हाँ तो मैं बात कर रहा था कि दस साल इसी प्रकार धार्मिक कट्टरता तथा ओसीडी के बीच बीते। दस साल और मतलब बाबा के रिटायरमेंट को अब बीस साल हो चुके थे। रिटायरमेंट के बीस साल का मतलब उम्र के अस्सी साल हो चुके थे। अस्सी साल की उम्र में भी वे अपनी दिनचर्या को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। सुबह आठ बजे क्लीनिक पहुँचना तथा शाम छह बजे वहाँ से लौटना बदस्तूर जारी था। हाँ यह ज़रूर हो गया था कि वे रात नौ बजे की बजाय आठ बजे ही सोने चले जाते थे। कमज़ोर दिखने लगे थे। हम सब कहते थे कि अब क्लीनिक बंद कर दीजिए, हो गया बहुत काम, मगर वे तैयार नहीं थे। कभी-कभी मुझे ऐसा लगता था कि घर उनको असहज करता था, वे घर से बाहर ही रहना चाहते थे। उधर उनके मरीज़ भी उनको छोड़ने को तैयार नहीं थे। पहले लगभग तीस साल सरकारी नौकरी में तथा उसके बाद बीस साल प्राइवेट क्लीनिक में इलाज, मतलब पचास साल की सेवाएँ उनकी हो चुकी थीं, परिवारों का विश्वास हो चुका था उन पर। तीन-तीन पीढ़ियों का इलाज उनके हाथों हो चुका था। यह ज़रूर हुआ था कि इन दस सालों में वे कुछ शिथिल हो चुके थे। शरीर अब अपने ढलने की निशानियाँ देने लगा था। इसी बीच उनके पोते-पोती भी कुछ पढ़ने और कुछ जॉब करने बाहर चले गये थे। बाबा को घर से जोड़ने वाली कड़ी फिर से टूट गयी थी, वे अब एक बार फिर घर में अकेले हो गये थे। बीच का वह समय जब पोते-पोती उनके जीवन में थे, शायद वही वह समय था जब उन्होंने जीवन को अच्छे से और शायद कुछ उत्साह से जिया था।
उनके रिटायरमेंट के बाद का वह बाईसवाँ वर्ष था, जब उनकी दिनचर्या एकदम से रुक गयी थी। रुकने का कारण कोई बीमारी, अशक्तता या उम्र नहीं बल्कि वह महामारी थी, जो एकदम काल की तरह पूरी दुनिया में फैल गयी थी। इस महामारी के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी। बस यह पता था कि यह हर तरीक़े से फैल सकती है, छूने से, संपर्क में आने से, हवा के द्वारा, पानी के द्वारा… और इस महामारी के विषाणु किसी भी प्रकार मरते नहीं हैं। पहले तो लोगों ने इस महामारी को भी मज़ाक में ही लिया… इसको लेकर चुटकुले बनाये गये, मगर फिर यह हुआ कि महामारी ने मौत का खेल दिखाना शुरू कर दिया। बाबा डॉक्टर थे, ऐसे समय में वे अपनी सेवाएँ देना चाहते थे, मगर इस बार घर के सदस्य अड़ गये। अड़ गये थे तो उसके पीछे शायद अपना भी स्वार्थ था। महामारी संक्रामक थी, एक से दूसरे को आसानी से लग जाती थी। इधर भरा-पूरा संयुक्त परिवार था। वे अगर रोज़ क्लीनिक जाते और वहाँ मरीजों को देख कर वापस घर आते तो इस बात की संभावना थी कि संक्रमण उनके साथ घर पहुँच जाता। शुरू के कुछ दिन तो उनको प्रयास कर के रोका गया, मगर फिर अंतत: महामारी के कारण घरों से निकलने पर रोक लगा दी गयी, पूरी दुनिया एक ही जगह पर ठिठक कर रुक गयी। पूरी दुनिया में तालाबंदी की जा चुकी थी, जो जहाँ है वहीं रहे, अपने-अपने घरों में। बाबा को भी रुकना पड़ा। कहा यह जा रहा था कि इस महामारी से सबसे ज़्यादा ख़तरा बच्चों, बीमारों और बूढ़ों को ही है। वैसे चिकित्सकों को आने-जाने की छूट थी पर बाबा की उम्र अस्सी से अधिक थी, इस उम्र में संक्रमण का ख़तरा अधिक था, इसलिए वे चिकित्सक के रूप में भी बाहर नहीं जा सकते थे। और अंतत: लगभग पचास-पचपन साल बाद अपनी दूसरी दुनिया में रहने के बाद बाबा घर लौट आये थे। तालाबंदी धीरे-धीरे और लंबी और लंबी होती गयी और बाबा अब घर में ही रहेंगे, यह भी तय हो गया।
मगर बाबा की वापसी भी उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ के गजाधर बाबू की ही तरह हुई थी। बाबा पचपन साल बाद घर लौटे थे, और इन पचपन सालों में दुनिया बहुत आगे निकल चुकी थी। हम सब परिवारजन भी अपनी-अपनी दुनियाओं में रहने लगे थे। यह दुनिया बहुत व्यक्तिगत थी, इसमें सार्वजनिक या पारिवारिक कुछ अधिक नहीं था। बाबा इस दुनिया में लौट कर गजाधर बाबू की ही तरह असहज थे। उनको समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या है। चूँकि सारी दुनिया रुक गयी थी, घरों से निकलने पर रोक लग गयी थी, इसलिए बाहर पढ़ रहे, जॉब कर रहे बच्चे, मतलब उनके पोते-पोती भी घर पर लौट आये थे। पूरा परिवार घर पर था, मगर बाबा उनके साथ कोई संपर्क स्थापित नहीं कर पा रहे थे। बातों के विषय बदल गये थे, वे जब भी बात करने की कोशिश करते तो उनके विषय बहुत पुराने होते थे। बाक़ी लोग उन विषयों से कनेक्ट नहीं कर पाते थे। बाबा और परिवार के दूसरे सदस्यों के बीच संपर्क के सारे पुल पचपन साल में लगातार समय-नदी के धारों से कट-कट कर बह चुके थे। बाबा घर में एक अजनबी की तरह थे। उनके लिए सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि उनको यह पता लग चुका था कि आगे का जीवन उनको इसी अजनबी की तरह गुज़ारना है। क्लीनिक अब जाना नहीं हो पायेगा, अब घर पर ही रहना है। पचास साल बाद अपनी बनायी हुई किसी दूसरी दुनिया में रहने के बाद वे घर लौटे थे, और घर उनको अजनबी की तरह देख रहा था। वही घर, जिसे उन्होंने ही बनाया था, बरसों-बरस तक घर से दूर रह कर। बाबा को इस बात पर विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि पचास सालों में दुनिया कितनी बदल चुकी है, समय कितने आगे निकल चुका है। वे पचास साल पहले की दुनिया में स्थिर थे। वे जब भी हमसे बात करने की कोशिश करते तो उनके विषय तीस से पचास साल पुराने ही होते थे। हमें उन विषयों में अब कोई दिलचस्पी नहीं बची थी। पोते-पोतियों को ज़रूर उनसे लगाव था, प्रेम था, इसलिए वे उनके पास बैठते थे, बातें करते थे, मगर बाबा की बातों के सिरे उलझे होते थे, पोते-पोती उन बातों का सिरा नहीं पकड़ पाते थे। यह पीढ़ी बस वर्तमान और भविष्य की बातें करना चाहती थी और बाबा के पास तो केवल अतीत था।
बाबा को घर आये हुए साल भर हो चुका था, तथा महामारी बीतते-बीतते एक बार फिर पूरी ताक़त बटोर कर दूसरी लहर के रूप में अधिक भयावह तथा अधिक जानलेवा होकर लौटी थी। हर तरफ़ कीड़े-मकोड़ों की तरह लोग मर रहे थे। बाबा टीवी पर सूचनाएँ देखते और डर जाते थे। उनको अब अपने परिवार की चिंता रहने लगी थी। जो पिछले एक साल से उनकी दूसरी दुनिया बन चुका था। परिवार के प्रति लगाव तो उनको पहले भी था, लेकिन पिछले साल भर में यह लगाव बहुत बढ़ चुका था। इसी समय बाबा के अंदर दो और रोगों के लक्षण एक साथ प्रकट होने प्रारंभ हो गये थे- पार्किंसन तथा डिमेंशिया। अब तीन रोग हो चुके थे- ओसीडी, पार्किंसन और डिमेंशिया। उनको चलने-फिरने, उठने-बैठने में तकलीफ़ होनी शुरू हो गयी थी, साथ ही याददाश्त भी बुरी तरह से प्रभावित हो रही थी। शायद ऐसा महामारी की दूसरी लहर की भयावहता के कारण दिमाग़ को लगे शॉक के कारण हुआ था। इस जानलेवा लहर में उनके बहुत से अपने जा चुके थे, उनके भाई-भाभी, समधी, कुछ परिचित और भी बहुत से रिश्ते। वे इन ख़बरों से डर गये थे, और शायद इसी ख़ौफ़ में उनके दिमाग़ को सदमा लगा था। डॉक्टरों का कहना था कि उनका दिमाग़ सिकुड़ रहा है। ऐसा हमें दिखाई भी दे रहा था, अब वे ख़ुद चलने में अक्षम होने लगे थे। दिमाग़ से संबंधित दो अलग-अलग रोगों ने एक साथ आक्रमण किया था। एक ने शरीर पर और दूसरे ने दिमाग़ पर, मन पर। लगभग पचास साल तक लगातार पूरी सक्रियता से काम करने वाले शरीर ने उत्तर दे दिया था। महामारी नहीं आती तो शायद वे अभी भी नहीं रुकते, लेकिन शायद महामारी भी उनको रोकने के लिए ही आयी थी। अब उनको अभी हाल में हुई बातें याद नहीं रहती थीं, हाँ बरसों पुरानी बातें अब ज़्यादा अच्छे से याद आने लगी थीं। बल्कि वे अपने बचपन और जवानी की बातों को अब ज़्यादा अच्छे से याद कर पा रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे दिमाग़ की वर्तमान को सहेजने वाली मेमोरी पूरी तरह निष्क्रिय हो चुकी हो और अतीत को स्टोरेज करने वाला हिस्सा अचानक पूरी तरह से सक्रिय हो गया हो। उनको अपने बचपन की सारी बातें अच्छे से याद आ रही थीं, लेकिन उनको यह याद नहीं रहता था कि उन्होंने कुछ देर पहले खाना खाया कि नहीं खाया। कभी-कभी वे परिवार के लोगों को कुछ और समझ कर बातें करने लगते थे। उनको ऐसा लगता था जैसे वह सदस्य असल में उनके अतीत से जुड़ा हुआ कोई पात्र है, वे उससे अतीत की बातें इस प्रकार करने लगते थे, जैसे वह अतीत न होकर वर्तमान ही है। वे कभी वर्तमान में होते थे तो कभी अतीत में होते थे। ऐसा लगता था जैसे समय नदी के दोनों तरफ़ आने-जाने लगे हैं, अतीत और वर्तमान में आवाजाही कर रहे हैं। बिना माँ के उनका बचपन कैसा बीता, यह हमें उनसे ही उस समय पता चला। इस समय वे डरे-से रहने लगे थे, रात को अचानक उठ कर हम बच्चों को नाम ले-लेकर पुकारने लगते थे। हम दौड़ कर आते पूछते कि क्यों आवाज़ दे रहे थे, तो एकदम मना कर देते- ‘मैंने कब आवाज़ दी, मैं तो चुपचाप सो रहा था’। एक बात थी, वे रात को अपने पोते-पोतियों को नहीं पुकारते थे, बल्कि अपने बच्चों को ही नाम लेकर बुलाते थे।
ऐसे में ही एक दिन कुछ अप्रत्याशित जानकारी उन्होंने अपने पोते-पोतियों को प्रदान कर दी थी। असल में तो हमें… हमें मतलब हमारे परिवार को… या किसी को इस बारे में कुछ भी पता नहीं था। उस दिन उनको ऐसा लग रहा था कि जैसे वे अपने पोते-पोतियों से नहीं बल्कि कॉलेज के दोस्तों से बात कर रहे हैं। और बातों-बातों में पूरी कहानी खुलती चली गयी थी। वे अपने बड़े पोते को अपने कॉलेज का दोस्त सुरेंद्र मान रहे थे और उससे बातें कर रहे थे। जब बातें खुलती गयीं तो हम सब भी बहुत उत्सुकता से सुनते गये। तब पता चला था कि आपका नाम सुरेखा सक्सेना है। बाबा के मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के अगले साल ही बाबा और आपके बीच प्रेम हो गया था। यह भी पता चला कि आपकी और बाबा की शादी नहीं हो पाने के पीछे कारण आपके ऊपर आपके पूरे परिवार की निर्भरता का होना था। आपके पिताजी नहीं थे और आप घर में सबसे बड़ी थीं, डॉक्टर बनने के बाद आपको अपने छोटे भाइयों का भी जीवन बनाना था। उनको भी पढ़ा-लिखा कर बड़ा करना था। इसलिए आप तब तक शादी नहीं करना चाहती थीं, जब तक भाइयों का जीवन व्यवस्थित न हो जाये। बाबा ने सुरेंद्र बने हुए अपने बड़े पोते को बताया था कि सुरेखा के घर वालों को इस विवाह से कोई दिक़्क़त नहीं है, वे तो तैयार हैं, मगर सुरेखा ही अड़ी हुई है कि अपने छोटे भाइयों को जब तक पैरों पर खड़ा नहीं कर देती, तब तक शादी नहीं करूँगी। अपने परिवार के बारे में बाबा का कहना था कि मेरा परिवार तो एकदम खाँटी ब्राह्मण परिवार है, वहाँ तो कोई भी इस शादी के लिए कभी तैयार नहीं होगा, इसलिए मैं शादी करने के बाद ही उनको बताऊँगा शादी के बारे में, फिर भले उसके बाद वे इस शादी को और मुझे स्वीकार करें चाहे न करें। बाबा ने बड़े पोते से बहुत अनुनय के स्वर में कहा था- ‘तुम एक बार बात करो न सुरेखा से, तुम्हारी बात मान जाये शायद।’ बड़े पोते ने आश्वासन दिया था कि वह ज़रूर बात करेगा और उसे समझाने की कोशिश करेगा। कुछ उदास स्वर में बाबा ने कहा था- ‘मेरा एम.बी.बी.एस कम्प्लीट हो रहा है और वहाँ घर में मेरी शादी की बात चल रही है, अब ज़्यादा दिन नहीं हैं, जो करना है जल्दी करना। यदि मेरी शादी तय हो गयी तो मैं अपने घर के लोगों को मना नहीं कर पाऊँगा।’ बड़े पोते ने बहुत प्रेम से आश्वासन दिया था कि मैं बिलकुल बात करूँगा सुरेखा से, तो वे निश्चिंत हो गये थे। मगर थोड़ी देर बाद बड़े पोते से कुछ उदास स्वर में बोले थे- ‘मैंने कहा था न, कि मैं घर जाऊँगा तो कुछ न कुछ गड़बड़ होगी, मेरी शादी तय कर की दी गयी है, सगाई का नारियल, कपड़े और शगुन के पैसे मेरे छोटे भाई ने झेले हैं और अब मुझे जाकर बस शादी करनी है।’
उस दिन से पोते पोतियों को उनसे बातें करने का एक विषय मिल गया था। अब बातें सुरेखा के नाम से शुरू होने लगी थीं। जब माँ वहाँ बैठी होतीं तो वे आपके बारे में बात करने से भी परहेज़ करते थे। कभी-कभी तो ग़ुस्सा हो जाते थे, कहते थे- ‘उसने तो मुझे धोखा दिया, उसका नाम मत लो, मेरा साथ तो तुम्हारी दादी ने दिया है, मुझे इतना अच्छा परिवार दिया है। इतने अच्छे बच्चे दिये हैं मुझे।’ ऐसा कहते समय माँ के चेहरे की तरफ़ देखते जाते थे कि इन बातों से उनको क्रोध तो नहीं आ रहा है। दाम्पत्य के साठ साल साथ बिताने के बाद अब पति की पुरानी प्रेमिका के नाम पर माँ क्या ग़ुस्सा करतीं, वे भी बच्चों की ठिठौली में शामिल हो जाती थीं। सच कहूँ तो आपके कारण बाबा के और हमारे बीच थोड़ा-थोड़ा संवाद शुरू हुआ था, हमारे पास आपके रूप में एक विषय आ गया था उनसे बात करने का। हमारे बच्चों ने इंटरनेट पर, सोशल मीडिया पर आपके नाम से बहुत तलाश करने की कोशिश की मगर आपको कहीं भी नहीं पाया। बच्चे चाहते थे एक बार आपकी और बाबा की बात करवाना। जब माँ नहीं बैठी होती थीं तो बच्चे बाबा से कहते थे कि हमने सुरेखा सक्सेना को तलाश लिया है, वह दिल्ली की बहुत बड़ी डॉक्टर हैं अभी, हम उनका नंबर तलाश रहे हैं। इस बात पर बाबा के झुर्रियोंदार चेहरे पर गुलाब खिल जाते थे। वे कुछ कहते तो नहीं थे, मगर अंदर ही अंदर जैसे मुस्कुरा रहे होते थे।
डिमेंशिया के बाद भी उनको याद रह जाता था कि किसी ने सुरेखा के नंबर तलाशने के बात कही थी, वे हर किसी से पूछते थे- ‘मिला नंबर ?’। कुछ दिनों पहले मैंने शेफ़ाली छाया की एक अद्भुत फ़िल्म देखी- ‘थ्री ऑफ़ अस’, इसमें डिमेंशिया की शुरुआती अवस्था से ग्रस्त नायिका शैलजा देसाई अपने पहले प्यार प्रदीप कामत को तलाशने निकलती है, उससे मिलती है और प्रेम की यादों को ताज़ा करती है। शैलजा सब कुछ भूलने से पहले एक बार प्रदीप से मिलना चाहती है, इससे पहले कि वह प्रदीप को भी भूल जाये। मुझे उस फ़िल्म को देखने के बाद बाबा में शैलजा देसाई दिखाई देने लगी थी। आपके बारे में जानने के बाबा के उत्सुक चेहरे में मुझे शेफ़ाली छाया का अक्स उतरता नज़र आता था। दुनिया में जाने कितने प्रदीप कामत और शैलजा देसाई हैं, जो इसी प्रकार किसी समय में स्थिर होकर जी रहे हैं, और अंत से पहले एक बार पहले प्रेम के पास पहुँचना चाहते हैं।
डिमेंशिया तो जानलेवा नहीं था, मगर पार्किंसन तो शरीर को घुन लगाने वाला रोग था ही। बाबा का शरीर और मन दोनों एक साथ कमज़ोर होते जा रहे थे। जब वे वर्तमान में होते थे, तो बच्चों से बस आपके बारे में ही बातें करते थे। उनको लग रहा था कि बच्चे एक दिन उनको आपसे मिलवा देंगे। यह उनके जाने के क़रीब पाँच-छह महीने पहले की बात है। उस समय तक महामारी की दूसरी लहर भी बीत चुकी थी और जीवन सामान्य हो रहा था। मगर अब काम करने का एक नया तरीक़ा सामने आ गया था- ‘वर्क फ्रॉम होम’, बच्चे अपने-अपने काम पर लौट चुके थे, मगर काम घर से ही कर रहे थे। अपने-अपने लैपटॉप, मोबाइल तथा टैब लेकर कमरों में बंद हो जाते थे और सारा दिन काम करते रहते थे। कभी शाम को तो कभी रात को ही फ्री हो पाते थे। बच्चों को अब यह भी लगने लगा था कि बाबा अब उनके साथ ज़्यादा दिन नहीं हैं, इसलिए वे समय मिलते ही बाबा के पास आकर बैठ जाते थे। आपके बारे में बातें कर उनको बहलाने की कोशिश करते थे। अब बाबा क्षीण होते जा रहे थे, जैसे घुलते जा रहे हों समय की नदी में। मगर अभी भी आपके बारे में बातें करना उनको अच्छा लगता था। ऐसे ही एक बार बात करते हुए उन्होंने आपके साथ बिताये गये अच्छे समय के बारे में बातें की थीं। बहुत याद करने पर भी वे फ़िल्म का नाम तो याद नहीं कर पाये थे, मगर इतना बता पाये थे कि उसमें वह गाना था- ‘जिया हो जिया कुछ बोल दो’, यह फ़िल्म पहली बार आप दोनों ने साथ देखी थी, ऐसा उन्होंने बताया था। बच्चों ने तुरंत इंटरनेट पर गाने से सर्च कर फ़िल्म का नाम बता दिया था- ‘जब प्यार किसी से होता है’। फ़िल्म का नाम सुन कर उनके चेहरे पर चमक आ गयी थी। याद करते हुए हुए बोले थे, इस फ़िल्म के बाद देव आनंद के काले कपड़े पहनने पर रोक लगा दी गयी थी। फिर माँ न सुन पायें इस प्रकार दबे स्वर में बच्चों से बोले थे- ‘इस फ़िल्म का एक गाना सुरेखा हमेशा गाती रहती थी’ फिर बहुत सोचने के बाद बता पाये थे ‘सौ साल पहले हमें तुमसे प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा’। शायद आपके द्वारा इस गाने को गाने के कारण ही उनको यह फ़िल्म याद रह गयी थी। या शायद उस समय की आप दोनों की अवस्था और इस फ़िल्म के शीर्षक के कारण। हैरत की बात यह थी कि उनको छह मिनट पहले की बात याद नहीं थी मगर साठ-पैंसठ साल पहले की बात उनको याद थी।
यह बाबा के जाने से शायद बस दस-पन्द्रह दिन पहले की ही बात है। अब वे एक गठरी समान ही शेष थे। दिन भर या तो लेटे रहते थे या किसी का सहारा लेकर थोड़ी देर को बैठते थे। अभी भी आते-जाते पोते-पोतियों से हाथ के इशारे से पूछ लेते थे कि सुरेखा का कुछ पता चला क्या। वे हम परिवार वालों के नाम भी भूल चुके थे। हाँ हमें पहचानते थे, मगर हमारा नाम क्या है, इसका उत्तर नहीं दे पाते थे। यदि नाम बताते भी थे तो ठीक नहीं बताते थे, कोई अतीत के रिश्ते का नाम बता देते थे। हाँ बस एक नाम उनको याद था, उनकी सबसे बड़ी पोती की बेटी का नाम। पोती ने बाबा की तीसरी पीढ़ी को गोद में रखते हुए मज़ाक में कह दिया था कि बाबा इसका नाम मैंने सुरेखा रखा है, उन्होंने इसे सच मान लिया था, और उस बच्ची को सुरेखा नाम से ही पुकारते थे। बस यही एक नाम था, जो वे ठीक-ठाक लेते थे। और हाँ एक और नाम अपनी पत्नी का नाम, मेरी माँ का नाम… यह नाम भी वे नहीं भूले थे, दिन भर माँ के नाम की पुकार लगाते रहते थे।
ऐसे ही एक दिन बड़े पोते ने पूछ लिया था उनसे कि सुरेखा जी से क्यों मिलना चाहते हैं। इस सवाल पर उनकी अंदर की तरफ़ धँस चुकी आँखें पनियाली हो गयी थीं। बोलते हुए उनका गला रुँध गया था। कुछ देर तक अपनी बुझ रही आँखों से शून्य में ताकते रहे थे, जैसे जो कुछ कहना है उसे कहने की हिम्मत तलाश रहे हों। कुछ देर तक देखने के बाद जैसे अपने आप से ही बुदबुदाते हुए बोले थे- ‘मुझे सुरेखा से माफ़ी माँगनी है, आख़िरी बार जब मैं उससे मिला था, जब हम अलग हो रहे थे तब मैंने उसके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया था।’ कह कर कुछ देर को चुप हो गये थे। ‘मैं स्वार्थी हो गया था, मैं बस अपने ही मतलब की सोच रहा था। नहीं सोच पा रहा था कि उसकी शादी के बाद उसके परिवार का क्या होगा, उसके भाइयों का क्या होगा, कौन परवरिश करेगा उनकी। इसलिए मैंने उसको बहुत बुरा-भला कहा था और कभी उसकी सूरत तक नहीं देखने की बात कही थी।’ बाबा को बोलने में भी परेशानी होने लगी थी, इसलिए बहुत अटक-अटक कर बात पूरी की थी उन्होंने। बच्चों के यह पूछने पर कि फिर अब क्यों मिलना चाहते हो, उन्होंने कहा था- ‘अब मुझे पता चल गया है कि वह त्याग के रास्ते पर जा रही थी, अपना जीवन होम करके परिवार का जीवन बनाना चाह रही थी, उसके पास कोई विकल्प नहीं था। मैं प्रेम में अंधा हो चुका था, लेकिन वह आने वाले समय की परेशानियों को अच्छे से देख पा रही थी। उसने जो कुछ किया वह बिलकुल सही किया। इसलिए अब एक बार मिल कर मैं बस उससे माफ़ी माँगना चाहता हूँ। क्योंकि वह अपनी जगह बिलकुल सही थी और मैं अपनी जगह बिलकुल ग़लत था।’ बाबा की आवाज़ मानों किसी गहरे तलातल से आ रही थी, डूबती-उतराती हुई। ‘और अब मुझे अपनी ग़लती का एहसास भी हो गया है, मेरे जैसे व्यक्ति के साथ निर्वाह कर लेना सुरेखा के बस की बात नहीं थी, यह तो बस तुम्हारी दादी के बस की ही बात थी। तुम्हारी दादी मेरे जीवन में नहीं आतीं, तो मेरा जाने क्या होता। मेरे जैसे व्यक्ति के साथ तुम्हारी दादी ने उम्र के साठ से ज़्यादा साल बिता दिये। और इतना प्यारा परिवार मुझे दिया। अब मुझे सुरेखा से कोई शिकायत नहीं है। बस मिल कर उससे सॉरी बोलना है। मैं अगर नहीं भी मिल पाऊँ और मेरे बाद अगर तुम में से कोई भी सुरेखा से मिले, तो मेरी तरफ़ से सॉरी बोल देना।’ कहते हुए बाबा की आवाज़ रुँध गयी थी।
उस दिन के बाद बाबा ने आपको लेकर कोई बात नहीं की, आपको लेकर बच्चों से उनकी वह आख़िरी बातचीत थी। शायद वे अपने मन की सारी गाँठें खोल कर निश्चिंत हो चुके थे, कि उनका क्षमा का संदेश अंतत: आप तक पहुँचा दिया जायेगा। उसके बाद तेज़ी के साथ अशक्तता बढ़ने लगी थी। वे अधिकांश समय बस सोये ही रहते थे। उठ कर बैठने में भी परेशानी होती थी उनको। पार्किंसन के कारण मसल्स सख़्त हो गई थीं, और इस कारण दर्द होता था उनको। कमर को सीधा करने में, मुड़े हुए हाथों को सीधा करने में, पैरों को सीधा करने में बहुत ज़्यादा दर्द होने लगा था। वे धीरे-धीरे एक गठरी में बदलते जा रहे थे। हम चाहते थे कि वे अपने कमरे में सोयें, लेकिन वे उसी कमरे में रहना चाहते थे, जहाँ हम सब बैठते थे। ड्राइंग रूम में अपने मनपसंद सोफ़े पर गठरी बने सोये रहते थे। वे ज़्यादा से ज़्यादा समय हम लोगों के साथ बिताना चाहते थे। रात को अपने कमरे में सोने जाते तो कभी भी हमारा नाम लेकर आवाज़ देने लगते। मैं जब भी उनको देखता तो मुझे कई शेड्स में बीता हुआ एक जीवन दिखाई देता था। बिना माँ का बचपन, प्रेमिका से बिछोह, कठोर अनुशासित दिनचर्या, अत्यंत ग़ुस्सैल स्वभाव, पोते-पोतियों के आने पर कठोर नारियल के अंदर का मीठा पानी, एकदम कट्टर धार्मिक हो जाना, ओसीडी, पार्किंसन, डिमेंशिया… और अंतत: एक शरीर बस छोटी-सी गठरी बन कर सोफ़े पर सिमटा हुआ। मैं वहाँ जाने से बचने लगा था, जहाँ वे सो रहे होते। मैं उनको इतना लाचार, कृशकाय और डूबता हुआ देख नहीं पा रहा था। लेकिन सच यही था कि वे डूब रहे थे। किसी भी पुरुष के जीवन को गढ़ने का काम उसके जीवन की प्रथम दो स्त्रियाँ करती हैं- माँ और पहली प्रेमिका… बाबा इस मामले में थोड़े बदक़िस्मत थे कि उनके जीवन की ये दोनों स्त्रियाँ उनको गढ़े बिना ही चली गयी थीं। शायद इसीलिए वे वैसे होते चले गये थे- कठोर अनुशासित और ग़ुस्सैल, समाज से कटे हुए, अपनी दुनिया में सिमटे हुए से। पता नहीं उनके अंदर ये क्रोध किसको लेकर था, स्वयं को लेकर या दुनिया को लेकर। मैंने उनका उरूज देखा था, अब उनका ज़वाल नहीं देख पा रहा था।
यहाँ तक आकर एक और समस्या खड़ी हो गयी थी, वे बहुत ज़िद्दी हो गये थे। उनको नियंत्रित करना बहुत मुश्किल होता जा रहा था। ऐसे में मैंने उनके सूत्र अपने हाथों में ले लिये थे। हर काम के लिए अब उनको डाँटना पड़ रहा था। विशेष कर खाना खा लेने के लिए। वे खाना नहीं खाने को लेकर ज़िद पर अड़ने लगे थे किसी छोटे बच्चे की तरह। कितनी अजीब बात है न, कि बचपन में जिनके क्रोध से हम बुरी तरह डरते थे, वे बाबा अब खाना नहीं खाने पर बच्चों की तरह मुझसे डाँट खा रहे थे, और डाँट खाकर चुपचाप खाना भी खा रहे थे। पिछले कुछ दिनों से अमूमन वे रोज़ ही मुझसे खाना खाते समय डाँट खाते थे। बल्कि यह भी हो रहा था कि उनका खाना लेकर जा रहा सदस्य पहले मुझे पुकार लेता था कि चलो बाबा को खाना खिलाना है। मुझे उनको डाँटना अच्छा नहीं लगता था, पर उनको कुछ दिन और ज़िंदा रखने के लिए वह डाँट ज़रूरी हो गयी थी। आपने फ़िल्म ‘पीकू’ देखी होगी, उसमें नायिका पीकू जिस प्रकार अपने पिता भास्कर बैनर्जी को बुरी तरह से डाँट-डाँट कर उनको नियंत्रित करती है, मैं भी उसी प्रकार चिल्ला कर, डाँट कर उनको नियंत्रित करने लगा था। वे भास्कर बैनर्जी की ही तरह ज़िद्दी हो गये थे। मेरे डाँटने पर वे अजीब-सी नज़रों से मेरी तरफ़ देखते थे, मैं ग्लानि से पानी-पानी हो जाता था। मैं अकेले में अपने बर्ताव पर बैठ कर रो लेता था, फिर मुझे पीकू बैनर्जी का बोला हुआ एक संवाद याद आ जाता था- ‘एक उम्र के बाद माँ-बाप ज़िंदा नहीं रहते, उनको ज़िंदा रखना पड़ता है।’ मैं भी उनको ज़िंदा रखने के लिए ही सब कुछ कर रहा था। उस फ़िल्म में पीकू का पूरा संघर्ष अपने बाबा को ज़िंदा रखने के लिए था। उस समय तक मुझे भी डर लगने लगा था कि अगर ये खाना ठीक से नहीं खायेंगे तो कमज़ोरी बढ़ती जायेगी और एक दिन वे चले जायेंगे। मैं उनके मरने की कल्पना से भी डरता था, पीकू की ही तरह मेरा संघर्ष भी शुरू हो चुका था, संघर्ष उनको ज़िंदा बनाये रखने के लिए। मैंने अपने आपको पिता और उनको अपना छोटा बच्चा मान लिया था। पोटी जाने के लिए, सोने जाने के लिए, सुबह उठने के लिए, खाना खाने के लिए, पानी पीने के लिए… हर बात के लिए डाँटना पड़ रहा था। डिमेंशिया ने उनको सचमुच ही छोटा बच्चा बना दिया था। वे सचमुच मुझसे डरने भी लगे थे। मुझे आता देख कर ही चुप चाप खाना खाने लगते थे। घर के लोग अब उनको मेरे नाम से डराने लगे थे, जैसे बच्चों को डराया जाता है।
फिर एक दिन रात को उन्होंने अपनी पोती के हाथों से अपना ‘लास्ट सपर’ खाया। उस रात भी वे खा नहीं रहे थे, तो मैंने पास खड़े होकर डाँट-डाँट कर खाना खिलवाया उनको। खाना ख़त्म होने के बाद जब मैंने उनका मुँह पोंछते हुए कहा था- ‘खाना खा लिया कीजिए चुपचाप, नहीं तो कमज़ोरी बढ़ती जायेगी। खाना खायेंगे तो जल्द ठीक हो जायेंगे आप।’ मेरी इस बात पर उन्होंने मेरी आँखों में देखा था। शायद उनसे जीवन में पहली बार आँखें मिलाई थीं मैंने। और शायद आख़िरी बार भी। मैंने देखा उनकी आँखें बहुत गहरे तक धँस चुकी थीं। कहीं दूर बस दो बुझते हुए सितारे-से टिमटिमा रहे थे उन आँखों में। मैंने उनको सहारा देकर सोफ़े से उठाया था और अंदर उनके कमरे में ले जाकर सुला दिया था। सुलाते समय कहा था- ‘अब चुपचाप सो जाइए, आवाज़ मत दीजिएगा।’ और उन्होंने सचमुच उस रात आवाज़ नहीं दी। गहरी और हमेशा की नींद में सो गये। सुबह जब हम लोगों ने जगाने की कोशिश की तो बाबा जा चुके थे, बस उनका शरीर पलंग पर था। गठरी बना हुआ शरीर। एक पूरा जीवन बीत चुका था।
बाबा के जाने के बाद आज तक भी हम सब ने आपकी बहुत खोज की, मगर कहीं कोई सिरा नहीं मिला आपका। हम सब के ऊपर जैसे एक बोझ है उनकी क्षमायाचना को आप तक पहुँचाने का। वे अंत में निश्चिंत हो गये थे कि हम लोग अंतत: आपको तलाश लेंगे मगर हम असफल रहे हैं। बच्चों ने इंटरनेट, सोशल मीडिया की सारी गलियाँ खँगाल लीं, तलाश लीं…। मैंने भी आपके नाम से बहुत सर्च किया, मगर आपकी उम्र के साथ मैच करती हुई कोई प्रोफ़ाइल कहीं नहीं मिली… पिछले एक महीने से मैं इसी में लगा हुआ था कि कैसे भी इस नाम तक पहुँच जाऊँ… कैसे भी आप तक यह सूचना पहुँचा दूँ कि बाबा अब नहीं रहे… एक पूरा अध्याय समाप्त हो गया… बाबा अब अतीत हो चुके हैं। आधुनिक तकनीक की ‘सब कुछ संभव है’ की लहर पर सवार बच्चे भी हार चुके हैं। जहाँ तकनीक और विकास हार जाते हैं, वहाँ जड़ों की तरफ़ लौट कर ही समस्या का हल खोजना पड़ता है, इसलिए आज उनके जाने के इतने दिनों बाद यह पत्र आपको लिख रहा हूँ। मैं ख़ुद ही बरसों बाद किसी को पत्र लिख रहा हूँ, वह भी इतना लंबा पत्र। मैं ही क्या हमारा पूरा समय ही पत्र लिखना छोड़ चुका है, पत्र अब किसी बीते समय की बात हो चुके हैं। मगर मुझे आज उसी समय में लौटना पड़ रहा है। मैंने आपको बताया न कि बाबा ने जिस दिन अपने मन की सब गाँठें खोल दी थीं, उसके बाद आपको लेकर कोई बात नहीं की थी, वे अपना बोझ हम पर डाल पर इत्मीनान, शांति और सुकून के साथ विदा हुए थे। मुझे लगता है कि वह ग़ुस्सैल स्वभाव, वह अचानक कट्टर धार्मिकता, ओसीडी, डिमेंशिया… सब उस गाँठ के ही कारण उनके जीवन में आये थे, जैसे ही गाँठ खुली वे हल्के हो गये और अनंत में समा गये। बाबा एक दायित्व हम सब पर छोड़ कर गये थे- आपसे माफ़ी माँगने का, बस उसे ही पूरा करने के लिए यह पत्र लिखा है आपको। प्रत्यक्ष मिलने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही है। और जैसा कि मैंने शुरुआत में ही लिखा है कि यह पत्र भी आपको मिलेगा या नहीं, कुछ नहीं पता। बस उम्मीद है कि समय-नदी के उस पार यह पत्र कभी न कभी आप तक ज़रूर पहुँचेगा। इसे पढ़ लीजिएगा और बाबा को माफ़ कर दीजिएगा। मैं बाबा की तरफ़ से उनके उस समय आपके साथ किये गये ग़लत व्यवहार के लिए, आपसे क्षमा चाहता हूँ। बाबा को माफ़ कर दीजिएगा।
सादर अभिवादन
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पंकज सुबीर
प्रकाशित पुस्तकें-
उपन्यास- ये वो सहर तो नहीं, अकाल में उत्सव, जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था, रूदादे-सफ़र। कहानी संग्रह- ईस्ट इंडिया कम्पनी, महुआ घटवारिन और अन्य कहानियाँ, कसाब डॉट गांधी एट यरवदा डॉट इन, चौपड़े की चुड़ैलें, होली, प्रेम, रिश्ते, हमेशा देर कर देता हूँ मैं, ज़ोया देसाई कॉटेज, ख़ैबर दर्रा। ग़ज़ल संग्रह- यही तो इश्क़ है। व्यंग्य संग्रह- बुद्धिजीवी सम्मेलन। यात्रा वृत्तांत- यायावर हैं, आवारा हैं, बंजारे हैं। जीवनीपरक पुस्तक- ज़िंदगी की किताब। लम्बी कविता- देहगाथा। कविता संग्रह- उम्मीद की तरह लौटना तुम। संपादन- नई सदी का कथा समय, विमर्श- नक़्क़ाशीदार केबिनेट, बारह चर्चित कहानियाँ, विमर्श दृष्टि- सुधा ओम ढींगरा का साहित्य, कुछ उदास कहानियाँ।
सम्मान / पुरस्कार-
राजेन्द्र यादव हंस कथा-सम्मान, ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार, स्व. जे. सी. जोशी शब्द साधक जनप्रिय सम्मान, वागीश्वरी पुरस्कार, अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान, वनमाली कथा सम्मान, शैलेश मटियानी चित्रा-कुमार पुरस्कार, अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान, स्पंदन कृति सम्मान, आचार्य निरंजन नाथ सम्मान, स्पेनिन डॉ. सिद्धनाथ कुमार स्मृति सम्मान, शांति गया शिखर सम्मान, व्यंग्य यात्रा सम्मान, सृजन कुंज सम्मान, पूश्किन सम्मान, दुष्यंत कुमार संग्रहालय कमलेश्वर सम्मान, पृथ्वीनाथ भान साहित्य सम्मान, धर्मवीर भारती शताब्दी सम्मान।
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