• समीक्षा
  • स्मृतियाँ जहाँ समकालीन हैं

    श्रीधर करुणानिधि का हाल ही में तीसरा काव्य-संग्रह प्रकाशित हुआ है ‘दिन की परछाँई धुंधली है। जानकीपुल पर इससे पहले हम उनकी कहानी ‘एक जिग जैग मुहब्बत’ पढ़ चुके हैं, आज उनके ‘काव्य-संग्रह’ की समीक्षा प्रस्तुत है, समीक्षक हैं युवा लेखक महेश कुमारअनुरंजनी

    ===================================

    स्मृतियाँ जहाँ समकालीन हैं

    स्मृतियाँ प्रायः नॉस्टैल्जिक हुआ करती हैं। एक सामान्य व्यक्ति जब अतीत को याद करता है तब बहुत सम्भव है कि वह अतीत में ही खोया रहे, उसी का गुणगान करे और वर्तमान को कोसता रहे। इससे वर्तमान के प्रति उसके भीतर एक अलगावबोध बना रहता है। यही अतीत की स्मृतियाँ जब समकालीनता से जुड़ती हैं तब इसका रचनात्मक रूपांतरण कविता, कहानी, उपन्यास और अन्य विधाओं में दीखता है। 

    श्रीधर करुणानिधि का कविता संग्रह ‘दिन की परछाँई धुँधली है’ में स्मृतियाँ अतीत के साथ वर्तमान की समकालीनता से संवाद करती है जिससे कविता में कई जीवन बोलने लगते हैं। वे लिखते हैं:-

    “किस्सों में दिन और पहर से अधिक मौसम होते हैं

    सुनाते हुए उन्हें ऋतुएँ ही याद आती हैं”

    किस्सों में दिन की तुलना में ऋतुओं का याद रहना वही समझ सकता है जिसने बचपन में अपने बुजुर्गों से कहानियाँ सुनी हों या जिनके यहाँ गप्प का संस्कार रहा हो। नई पीढ़ी तक यह बात संप्रेषित करना थोड़ा चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि तकनीक और एकल परिवार व्यवस्था ने इस तरह की स्मृतियों को असंभव सा बना दिया है। यह स्मृति की ताकत है (जिसका बहुत सारा हिस्सा हमारी शारीरिक स्मृतियों या ‘बॉडी मेमोरी’ में स्थायी हो जाता है) कि ठंड में गर्मी और गर्मी में बरसात के प्रसंगों की याद आ सकती है या इसका उल्टा भी होता है। यानी स्मृतियाँ इतनी ताकतवर होती हैं कि किस्सों के बहाने हमें उस दुनिया या अनुभव को पुनः एहसास करने में मदद करती हैं। यही वजह है कि कवि स्मृतियों के महत्व के बारे में लिखते हैं:- “ स्मृतियाँ किस्सों का लाभांश हैं/ जो मौसम के पेड़ पर आम की तरह फलता है/ और गुठलियों की तरह धरती में उग आता है।” 

    किसी भी विधा को पढ़ते हुए यह जरूर देखना चाहिए कि वह बन कैसे रही है। यदि कोई कविता है तो उसमें कविताई की प्रक्रिया क्या है और कैसी है, जिसे स्थापत्य कह सकते हैं। एक उदाहरण के जरिए इसे समझा जा सकता है। इस संग्रह की एक कविता ‘ऊबना’ की यह पंक्ति :-

    ”पेड़ अपने उम्र से नहीं ऊबते/ और न यह धरती ऊबती है बोझ से/ ये पेड़ भी जानते हैं कि/पत्तों के पीले होने से ऊब शुरू नहीं होती/ ऊबने के बाद ठूँठ और ठूँठ हो जाता है।” 

    यहाँ केवल प्रकृति की बात हो रही है। ऊबने की क्रिया का सारा सम्प्रेषण प्रकृति के इर्दगिर्द से लिया गया है। लेकिन, क्या यह प्रकृति की कविता है? नहीं। यह कविता है मनुष्य के भीतर की रचनात्मकता के खत्म होने की प्रक्रिया की। एक व्यक्ति आज के भागदौड़ और कामकाज में अत्यंत व्यस्त है। इतना कि खुद की रुचि और अन्य जरूरी इच्छाओं की ओर ध्यान ही नहीं दे पा रहा है। ऐसे में एक रोबोटिक जीवन (जो ठूँठ की तरह ही है) में यदि रचनात्मकता के लिए समय न निकाल पाए और यह लगने लगे कि वह अपने को खुश रखने और अभिव्यक्त करने के लिए कुछ नहीं कर सकेगा तब ऊब होगी। जीवन-रस सूख जाएगा और वह सचमुच एक जड़ ठूँठ की तरह हो जाएगा। यह कविता के स्थापत्य की मजबूती है कि मनुष्य का जिक्र न होते हुए भी मनुष्य केंद्र में है। एक सजग पाठक का हमेशा स्थापत्य की मजबूती की ओर ध्यान जाता है। 

    कविता पढ़ते हुए जो दूसरी बात ध्यान देने की है वह है कविता जिस तरह बन रही है उसका स्रोत क्या है? इस संग्रह के कविताओं का स्रोत ‘स्मृतियाँ’ और ‘समकालीनता’ है। स्मृति और कविता के संबंध पर ऊपर की पंक्तियों में बात हो चुकी है। समकालीनता के साथ आजकल दिक्कत यह है कि कविताओं में यह बहुत उलाहनों, उठापटक, तनातनी वाली भाषा में आ रही है। एकदम आर-पार वाली भाषा सम्प्रेषणीय तो होती है, उसकी तात्कालिकता लोकप्रिय लगती हैं लेकिन उससे यथार्थ की जटिलता का भी सरलीकरण हो जाता है। श्रीधर जी के संग्रह की खासियत यह है कि इन सरलीकरणों और आर-पार की भाषा से मुक्त है। उनकी समकालीनता में जीवन के छोटे-बड़े भावुक क्षणों और राजनीतिक यथार्थ दोनों का मिश्रण है। उदाहरण के लिए इस संग्रह का शीर्षक देखिए ‘दिन की परछाईं धुँधली है’। इस शीर्षक की भाषा में एक आमंत्रण है कि इसमें थोड़ा ठहरकर सोचिए। दिन की परछाई ‘धुँधली’ है तो क्यों है? यहाँ पाठक को समकालीन जटिलता में पैठने के लिए कहा जा रहा है। यह धुँधलापन हमारे समय के अंधेरे, अस्पष्टता, घटती हुई संवेदनशीलता और हिंसा के बढ़ते अँधेरेपन का है। कवि जिस समकालीन प्रवृत्तियों को दर्ज करना चाहता है उसमें उसे लगता है कि ‘बंदिशों के इश्तेहार नहीं होते’ हैं। इसलिए वह लिखता है:-”जब भी रिसता है इंसाफ/ तो आदमी चुपचाप महसूल देता हुआ/ एक अदना सा डरा हुआ रैयत नहीं हो जाता!/ बंदिशों से बाहर नहीं गए लोग / अपनी ही दुनिया के कैदी हो जाते हैं।”

    हालाँकि, आज के समय में बंदिशों के लिए कई इश्तेहार हैं। सरकार और पूँजी तंत्र हमें बार-बार योजनाओं और विज्ञापनों के माध्यम से बताती रहती है कि आपकी आजादी और सुरक्षा हमारी नीतियों को मानने में है। अब तो कल्याणकारी योजनाओं को भी वो इश्तेहार की तरह इस्तेमाल करते हैं और बंदिशों की तरह थोपते हुए यह बताते हैं कि जबतक वे हैं तभी तक हम यानी जनता आजाद है। यहाँ कविता के शीर्षक से सहमत नहीं हुआ जा सकता है। अब इश्तेहार आजादी का भ्रम बहुत जोर शोर से देते हैं। खाने, पहनने, स्वस्थ रहने, सुंदर दिखने यहाँ तक कि साफ पानी पीने तक के लिए इश्तेहार हैं जो इस कदर हावी हैं कि उन विज्ञापित उत्पादों को इस्तेमाल न करने पर कभी-कभी कम आजाद महसूस करते हैं और करवाया जाता है। पूँजीवाद और विज्ञापन का आपस में कितना गहरा संबंध है इन पंक्तियों में देखिए:-”विज्ञापन के बैनर तले/पहाड़ों को झुकाया गया/ नदियों की देह को छीलकर/ साफ पानी का उद्योग लगाया गया/ फिर एक दिन उत्सव मनाकर/ एक दिन श्रम दिवस मनाया गया/ और एक दिन पृथ्वी दिवस।” 

    यह पूँजीवाद का विकास मॉडल है जो पहले संकट पैदा करता है। विज्ञापन के जरिए संकट से होने वाली समस्याओं के बारे में बताता है। उसके बाद समाधान का विज्ञापन करके उत्पाद बेचता है फिर संकट पैदा करता है। इस तरह यह चक्र चलता रहता है। ताजा उदाहरण है आईपीएल में एक डॉट गेंद पर एक पेड़ लगाने की नीति। इस तरह के फर्जी पर्यावरणीय दृष्टि की यह कविता पहचान करती है। इस तरह की नीतियाँ पर्यावरण नहीं पर्यटनीय दृष्टि कही जाती हैं। पूँजीवाद के लिए सरकारें दलाल हैं जो उनके लिए सेवा कार्य करती हैं और बदले में पूँजीवादी व्यवस्था सरकारों के लिए छवि निर्माण करती है जिसमें मीडिया, पीआर एजेंसी आदि अपनी सशक्त भूमिका निभाती है। इस छवि निर्माण की पूरी प्रक्रिया को कवि इस तरह कहता है:- “सिर्फ एक आदमी की इच्छा इतनी बड़ी हो कि/ सारे चैनलों को चिल्ला-चिल्लाकर/ हर नागरिक के माथे पर/ मैं राष्ट्रप्रेम हूँ गोबर की तरह थोपना पड़ा।” यहाँ देखिए कि इस छवि निर्माण में सिर्फ एक आदमी की इच्छा नहीं है बल्कि एक व्यवस्था की इच्छा है जो फिलहाल उसके लिए सबसे सर्वोत्तम सेवक की भूमिका है। सबसे त्रासदपूर्ण स्थिति है कि इसमें जनता के विवेक को भी ‘मैनिपुलेट’ करने में सरकार और पूँजीवाद सफल हो जा रही है। भारत के संबंध में यह इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहाँ कि जनता का बहुत बड़ा हिस्सा अशिक्षित, अर्धशिक्षित, कुशिक्षित होने के अलावा  तकनीक से मिलने वाली जानकारियों की सीमाओं से पूरी तरह परिचित नहीं है। इसका फायदा सत्ता उठाती है। कोरोना के समय यह बहुत स्पष्ट होकर आया जब आपदा में अवसर, पहली बार फ्री टीका, ये हैं तो हम हैं , थाली-दीया जैसे उपक्रम आए और शिक्षित कही जाने वाली जनता की कुशिक्षा सामने आई। ऐसे में कवि जनता के पास अपने पूर्वज कवि की कविता का पुनर्पाठ लेकर जाता है और ‘खजूर की छाँह’ कहकर इस पूरे छवि निर्माण की प्रक्रिया का ध्वंस करते हुए लिखता है:- “प्रसंगवश एक कवि/ वर्षों पहले आगाह कर गया था/ एक दिन होकर रहेगा/कि लंबे होने पर कोई बड़ा नहीं होगा/ फल अगर दूर हों तो कोई फायदा नहीं होगा/ एक पेड़ जो/ लंबा होने का दावा करेगा/ रहेगा खजूर ही।” कवि जनता के पास ‘लंबा’ और ‘बड़ा’ का विवेक लेकर जाता है। कविता का काम यही है कि जो सतह के नीचे है उसकी पहचान करना। कवि सतह के यथार्थ के पीछे की पूरी प्रक्रिया को पकड़ने के लिए लोक में मौजूद दुखों को अभिव्यक्त करने वाली विधाओं की ओर भी रुख करता है। वह ‘बिरहा’ को किसानों की पीड़ा से जोड़ता है और बिरहा सुनकर सैडिस्टिक प्लीजर लेने वाले भड़वों और दलालों को धिक्कारते हुए लिखता है :-”गँवाने के लिए जिनके पास कुछ भी नहीं होता/ वे मिट्टी में अपना दुख रोप देते हैं/  एक दिन वे सुबह-सुबह/ ट्रैक्टरों में लदे अपने सुखों के साथ/ मंडियों में पहुँचने की उम्मीद में/ पहुँच जाएँगे भड़वों और दलालों की गलियों में/ सामाजिक बाध्यता में वे/ गला साफ कर बिरहा गाना शुरू करेंगे/ बिरहा के लालची साहूकार के मसनद के ठीक आगे।” यहाँ बिरहा केवल बिरह की तरह नहीं आता है। यह उस व्यवस्था के दमनकारी स्वरूप की तरह आता है जो किसानों और गाँवों के देश को विज्ञापन की तरह प्रस्तुत तो करता है पर उससे काम ‘कॉन्ट्रैक्ट’ मजदूर की तरह लेना चाहता है। वह बार-बार अपनी नीतियों में सब्सिडी, एमएसपी और मुआवजा को किसानों के हित के विरुद्ध बताता है। वह दावा करता है कि कॉन्ट्रैक्ट खेती और खुली मुंडी व्यवस्था से उनकी खरीद, व्यय और मोलभाव की क्षमता बढ़ेगी। इस तरह की नीतियों के बहाने वह बंदिशों का इश्तेहार का इस्तेमाल करता है। जब इन बातों को किसान नहीं मानते तब उसे शोषण के च्रक में पीसने के लिए छोड़ दिया जाता है। 

    ‘बिरहा’ कृषि समूहों से निकली हुई विधा है और इस तरह यह किसानों के दुख की विधा बनती है कविता में। साहित्य का काम है सभी पक्षों को रखना, उसे ज्यादा लोकतांत्रिक बनाना और छूट गए समूहों को आवाज देना। कविता भी इसे अपने तरीके से करती है। कवि इसे ऐसे दर्ज करता है:- “आदमी से पूछोगे तो वह कहेगा कि/ चिड़ियाँ की चोंच पर कविताएँ लिख रहा है/ धूप से पूछो तो कहेगी/ उसने धरती को एक लंबी कभी न खत्म होने वाली/ कविता की तरह लिख दिया है/ चिड़िया से भी पूछो भाई!” यहाँ चिड़िया से पूछने का मतलब है कि उसका पक्ष जानना। किसी का पक्ष जानने का मतलब है कविता में नए सौंदर्यबोध, शिल्प, अंतर्वस्तु और दृष्टि का विस्तार करना। यह कविता के जनतांत्रिक होने के लिए अनिवार्य शर्त है। यहाँ ‘चिड़िया’ उन समूहों का प्रतिनिधित्व करती है जिनपर अबतक दूसरों ने खूब लिखा है लेकिन उनको प्रतिनिधित्व देने से हिचकते रहे। बिना अवसर और विकल्प दिए आजादी का कोई मतलब नहीं है। यहाँ चिड़िया को अवसर देने के लिए कवि प्रतिबद्ध है। यह कविता बनने की प्रक्रिया और पक्ष को उभारने वाली विचार है। पक्ष भाषा में ही अभिव्यक्त होता है। भाषा के जरिए ही किसी समूह का छवि निर्माण किया जाता है। किसी को सभ्य और असभ्य का न्याय भी भाषा के जरिये ही होता है। हम जिसकी भाषा समझते हैं उसे सभ्य कहते हैं, जिसकी नहीं समझते उसे असभ्य और बर्बर। कई बार भाषा अपनी सोच और व्यवस्था के अनुकूल न होने पर भी दूसरे को विरोधी मान लेते हैं। राजनीति में यह प्रक्रिया देशद्रोही, समाज द्रोही, विकास-विरोधी से होते हुए कई शब्दावलियों तक जाता है जिससे छवि निर्माण कराकर सत्ता में बने रहने की कोशिशें चलती रहती हैं। इस काम में मीडिया और कोम्प्रोमाईज़ संस्थाएं अपना योगदान देती हैं। भाषा और सत्ता के इस संबंध को कवि ऐसे दर्ज करता है :-”फाइलों की तरह अब/भाषा भी कुतरी जाने लगी/ सौभाग्यवश उसमें सेंधमारी / चूहों ने ही की थी/ चूहे हमेशा सत्ता के करीब रहे।” यहाँ ‘चूहा’ वे कोम्प्रोमाईज़ लोग और संस्थाएँ हैं जो जनता से ज्यादा अब सरकार की भाषा बोलते हैं। भाषा का यह सरकारीकरण उस भाषा की जनता का न केवल अपमान है बल्कि उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का अपहरण भी है। कवि इन्हीं चिंताओं के कारण एक ‘सवाल’ की तरह कहता है 

    “तो सवाल भाषा पर नहीं खड़े होते

    होते हैं उस साजिश के खिलाफ

    जो चिड़ियों को पेड़ से

    मछली को तालाब से

    कोसों दूर ले जाकर

    कहती है कि यह तुम्हारा घर नहीं।”

    भाषा भी घर है। जनता को अपनी माँग, अधिकार और प्रतिरोध की भाषा बचाकर रखनी चाहिए। उसके लिए यदि बुद्धिजीवी वर्ग संघर्ष नहीं करेगा तो उसकी भाषा की छवि दूसरे भाषा की नजर में वही बनेगी जो ‘सत्ता’ चाहेगी। आज तब उसकी हालत बिना घर के नागरिक की तरह हो जाएगी।

    कवि अपने तरीके से अपनी भाषा के घर को बचाने में लगा है। जरूरत है इसे सामूहिक रूप से समझने की।

    ——————————————————————-

    कविता संग्रह:- दिन की परछाईं धुँधली है।

    कवि:- श्रीधर करुणानिधि

    प्रकाशक:- सेतु प्रकाशन, 2026

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins