कल हिन्दी के बड़े क़िस्सागो अमृतलाल नागर की जयंती थी। इस अवसर पर पढ़िए युवा शोधार्थी, शायर अभिषेक अम्बर का यह लेख। अभिषेक के लेखन की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि वे लेखकों से जुड़े स्थलों पर जाते हैं, उनसे जुड़े स्थलों, लोगों के बारे में शोध करते हैं, फिर लिखते हैं। जैसे यह लेख- मॉडरेटर
=================
प्रतियोगी परीक्षाओं के परीक्षार्थियों को इन परीक्षाओं से नौकरी मिले या न मिले पर बहुत से शहरों में घूमने को ज़रूर मिल जाता है। हम नौजवानों ने अधिकतर शहर परीक्षा देते देते ही घूमे हैं। आगरा में परीक्षा दी तो ताजमहल घूम आए। इलाहाबाद में परीक्षा दी तो संगम देख आए। देहरादून में परीक्षा देने का मौका मिला तो मसूरी घूम आए। ‘एक पंथ और दो काज’ वाली कहावत शायद हमारे लिए ही बनी थी। पिछले साल लोक सेवा आयोग ने हमें चड़ीगढ़ घूमने का मौक़ा दिया वो भी एक नहीं दो-दो बार। पहली बार परीक्षा रद्द जो करनी पड़ गई थी। पता नहीं किस प्रोफ़ेसर ने भाँग का गोला खाकर पेपर बनाया था कि आधे से ज़्यादा पेपर त्रुटियों से भरा था।
अधिकतर ऐसा होता है कि परीक्षार्थियों को परीक्षा केंद्र चुनने का मौक़ा फॉर्म भरते समय ही मिल जाता है। पिछली कुछ परीक्षाओं में ऐसा नहीं देखा जा रहा शायद इसलिए कि आयोग को यह पता चल गया है कि इस बहाने परीक्षार्थी उन शहरों को चुनते हैं जो उनकी घूमने की लिस्ट में शामिल हैं। ऐसे में एक घाटा और भी होता है मान लीजिए मैंने परीक्षा सेंटर आगरा भरा और ताजमहल घूम आया। वहीं मेरे दोस्त ने देहरादून परीक्षा दी और वो मसूरी घूम आया। जब हम मिलेंगे तो यह संभावना रहेगी कि एक दूसरे की ट्रिप को कमतर और अपनी को बेहतर दिखाते हुए लड़ाई भी हो सकती है। इस समस्या का सबसे अचूक नुस्ख़ा हमारे लोक सेवा आयोग ने इस बार निकाल लिया।
आयोग ने कोई प्रेफरेंस नहीं पूछी और स्वयं ही सेंटर दे दिया। उस पर ग़ज़ब यह किया कि एक विषय वाले सभी परीक्षार्थियों को एक शहर। फ़र्ज़ कीजिए सभी अंग्रेज़ी वाले गोरखपुर में परीक्षा दे रहे हैं। इतिहास वाले अलीगढ़ तो राजनीतिक विज्ञान वाले आगरा में आदि- आदि। ऐसे में आयोग ने हिन्दी वालों को इस बार लखनऊ घूमने का मौक़ा दिया। हिन्दी का परीक्षार्थी चाहे मेरठ का हो या सोनभद्र का, कश्मीर का हो चाहे कन्याकुमारी का। परीक्षा देनी है तो उसको लखनऊ तो आना पड़ेगा।
ख़ैर जल्दबाज़ी में जैसे-तैसे मैं भी सुबह की शताब्दी एक्सप्रेस पकड़ने के लिए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचा तो एक बार को भरम हुआ कि कहीं विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में तो नहीं आ गया या फिर नींद में ही कोई सपना देख रहा हूँ। हर डिब्बे के बाहर हिन्दी के विद्यार्थियों-शोधार्थियों की भीड़ देख कर विश्वास हो गया कि हिन्दी-पढ़ने लिखने वालों की संख्या कुछ कम नहीं हो रही उल्टा हमारी आबादी की तरह बढ़ती जा रही है।
भीड़ को चीरते हुए थोड़ा आगे बढ़ता तो कोई न कोई परिचित मिल जाता। कोई एक दूसरे से हाथ मिलाता, तो कोई गले मिल रहा होता। ऐसा लगता जैसे सभी कुंभ में बिछड़े भाई-बहन, दोस्त-यार सब नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लाकर छोड़ दिये गए हैं। आज के दिन रेलवे चाहे तो शताब्दी एक्सप्रेस का नाम बदल कर हिन्दी एक्सप्रेस भी रख दे तो कोई घाटा नहीं होगा। बल्कि आगामी परीक्षा के लिए एक करेंट अफेयर का सवाल ही बनेगा। रास्ते भर सब लोग गप्प मारते जा रहे थे। सभी का कोई न कोई परिचित मिलने से छोटे-छोटे ग्रुप बन गए। 4-5 परिचित मुझे भी मिल गए।
जैसे-जैसे परीक्षा का अंतिम समय नज़दीक आता जाता है लगने लगता है कि मैंने तो कुछ पढ़ा ही नहीं। यह भी छूट गया, वह भी छूट गया। जो पढ़ा भी होता है वह भी भूलने लगते हैं। ऐसे में हिन्दी के कुछ नर-पिशाच सक्रिय हो जाते हैं जो ख़ुद तो दसियों साल से एक परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाए किन्तु दूसरे के आत्मविश्वास को डिगाने के लिए ज़ोर-ज़ोर से ऐसे सवाल पूछेंगे कि जिस व्यक्ति के कान में भी उनकी आवाज़ जाए वह सवाल सुनते ही डर कर धराशायी हो जाए। ऐसे दो-चार नर पिशाच हमारे कोच में भी सक्रिय थे। ख़ैर हम भी रामचंद्र शुक्ल एवं सरस्वती पांडे, गोविंद पांडे का नाम रटते रहे ताकि हिंदी के यह नर-पिशाच हमें भयभीत न कर सकें।
जब शताब्दी चारबाग पहुँची तो सूरज महाराज एकदम सर पर सवार थे दोपहर का एक बजा था। अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए लखनऊ मेट्रो का सहारा लिया। मेट्रो स्टेशन एकदम ख़ाली जो कुछ लोग थे भी वह अभी अभी ट्रेन से उतरे थे। एक बार फिर मन में ख़याल आया शायद लखनऊ मेट्रो घाटे में चल रही है जिसकी भरपाई करने के लिए हम छात्रों को लखनऊ बुलाया गया हो! रास्ते भर अपने भीतर उगते व्यंग्यकार को घुड़की दी और सीधे विकास भाई के कमरे पर पहुँचा। आधी रात इसी क़यास में बीती शायद अब पेपर लीक की ख़बर आ जाए। एक बार यह ख़बर उड़ी भी कि इलाहाबाद में बच्चों के पास पेपर आ गया है लेकिन इसमें कितनी सच्चाई थी भगवान जाने।
सुबह फिर लखनऊ मेट्रो के राजस्व में वृद्धि करते हुए आलमबाग़ में परीक्षा केंद्र पर पहुँचा। परीक्षा सम्पन्न हुई तो हम दोस्तो ने इमामबाड़ा घूमने का प्लान बनाया। लखनऊ में नवाबों के वैभव का जीता जागता नमूना। दोपहर तक हम इमामबाड़ा घूमे। इमामबाड़े में जैसे ही मुझे पता चला मैं चौक से महज़ कुछ दूरी पर ही हूँ। तो दिल से निकलकर अमृतलाल नागर की दुनिया आँखों के सामने आने लगी। मैंने विकास से कहा। अब हम चौक तो ज़रूर जाएँगे। इमामबाड़ा तो बहुत घूम लिए।
“अरे चौक तो जाना ही पड़ेगा भाई। सभी को भूख लगी है और सबसे पास का बाज़ार चौक ही है।” विकास ने कहा।
बस अंधा क्या चाहे दो आँखें। मैंने विकास से कहा भाई फिर नेक काम में देरी किस बात की। अभी चले चलते हैं।
चौक पहुँचे तो अमृतलाल नागर चौक के बीच में ही विराजमान मिले। आँखें मिची हुई, खरगोश सरीखे हँसते हुए दाँत और होठों के एक कोने से बहती पान की लाल पीक। जैसे कोई हँसता मुस्कुराता अपने घर के दरवाज़े पर स्वागत करता है बिल्कुल वैसे।
मुझे एक क़िस्सा याद आता है। जिसका जिक्र रामविलास शर्मा जी ने अपनी पुस्तक ‘पंचरत्न’ में किया है। रामविलास शर्मा ने नागर जी से कहा: “अब तुम पीएच.डी. कर डालो।” इस पर नागर जी बोले : “पहले इंटर करना पड़ेगा, फिर बी.ए, फिर एम.ए.। बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी । और पढ़कर करूँगा भला क्या ?”
शर्मा जी उन्हें एकटक निहारते रहे।
नागर जी ने हौले से मुस्कराते हुए कहा : “आपको तो पता ही है, चौक हमारी युनिवर्सिटी है और हम उसके वाईस चांसलर।”
आज चौक चौराहे पर वाइस चांसलर साहब को देखकर मैं फूला नहीं समा रहा था। बोर्ड पर भी उन्हें चौक यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर के ख़िताब से नवाज़ा गया है।
पिछले कई महीने रज़ा फॉउंडेशन के युवा 2026 कार्यक्रम के लिए नागर जी को पढ़ते हुए बीते। नागर जी से एक अंजाना सा रिश्ता बन गया था। मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और झट से ट्रैफिक के बीच से निकल कर नागर जी के बोर्ड के साथ जा खड़ा हुआ और विकास को इशारा किया। उसने नागर जी के साथ मेरी तस्वीरें फोन में क़ैद कर लीं। सभी को ज़ोरों से भूख लगी थी। पेपर देने के बाद से हम ऐसे ही घूम रहे थे। सबसे पहले पेट-पूजा की गई। चौक की लस्सी पीकर मन और तन को जो ठंडक मिली वह बयान नहीं की जा सकती।
मैंने दोस्तों से कहा, जब चौक आए हैं तो अमृतलाल नागर के घर को देखे बग़ैर नहीं जाएँगे।
वो तो ठीक है। मगर हमें उनको घर मिलेगा कैसे?
लोगों से पता करके और कैसे ?
“लोग जानते भी होगे उन्हें। आज कल साहित्य पढ़ता ही कौन है और अमृतलाल नागर को तो तो यह दुनिया छोड़े कितना समय हो गया है।” अद्वितीय ने कहा ।
एक से पूछेंगे, दो से पूछेंगे, चार से पूछेंगे। कोई न कोई इंसान तो उनको जानता होगा।
मैंने बराबर में बड़े सब्जी वाले से ही पूछा। भझ्या अमृतलाल नागर का घर कहाँ होगा?
“आप बस इसी रोड पर सीधा चले जाइए कोई 200-300 मीटर आगे बाएँ हाथ पर पतली सी गली होती उसी में है।”
हम सब उनके चेहरे को देखते रह गए। कहाँ हम परेशान हो रहे थे कि घर कैसे मिलेगा यहाँ तो एक सब्ज़ी वाले ने ही पूरा पता ऐसे बता दिया कि कोई बिल्कुल सटीक नक्शा बना सकता है उसके बताए पते का।
हम आगे बढ़ने लगे।
“देखा अद्वितीय यहाँ सब जानते हैं अमृतलाल नागर का पता।” रोहित बोला।
“अरे! वो उनकी गली या मुहल्ले में ही रहता होगा। इसलिए ठीक-ठीक बता दिया। वरना लोग इतना भी साहित्य नहीं पढ़ते।
‘मैंने मन ही मन सोचा अमृतलाल नागर ने साहित्य लिखा ही कब जो यह लोग साहित्य पढ़ें। उन्होंने तो इन लोगों के जीवन को ही लिखा है। चौक के लोगों के क़िस्से कहानियाँ उनकी किस रचना में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नहीं आतीं।
हम लोगों को चलते हुए 3-4 मिनट हो चुकी थीं। बाएं हाथ पर हर गली पतली सी ही थी तो अब मुझे यह डर लगने लगा था कि कहीं हम आगे न बढ़ जाएँ। मैंने मंदिर के बाहर फूल बेचने वाली औरत से पूछा। “यह अमृतलाल नागर का घर किए तरफ़ होगा।”
“बेटा! तीन-चारि गली आगे बढि जाउ। छंगामल की दुकान के बराबरि में छोटि गली मिली। वहे म अंदर चले जायेऊ। दस क़दम पहुंचतइ कोठी आइ जइ।” वह अवधी में बोलीं।
मैं आगे बढ़ते हुए मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। ऐसा पहली बार हो रहा है कि मैं किसी शहर में लेखक का घर या उससे जुड़े स्थान ढूँढ़ रहा होऊँ और लोग विस्तार से पता बता दे रहे हैं। वरना कई बार मुसे घंटों घूमना पड़ा है।
बहरहाल छंगामल की दुकान हमारी आँखो के सामने थी। और उसके बराबरी वाली गली से चौक की वह दुनिया शुरू होती है जो मेरे लिए बूंद और समुद्र में जाकर खुलती है। ताई, नंदो. सज्जन, वनकन्या, मनिया, बड़ी, विरहेश आदि इसी दुनिया के ही तो किरदार है।
गलियाँ एकदम संकरी हैं जिनमें चलते हुए मुझे मुश्ताक़ अहमद युसूफ़ी याद आने लगे कि इन गलियों में अगर एक तरह से औरत और दूसरी तरह से मर्द आ रहा हो, तो बीच में बस निकाह की गुंजाइश बचती है।”
मुहल्ले की संकरी गली से जरा सा भीतर जाने पर ही सामने कोठी दिखाई दी। जर्जर हो जाने के बावजूद वह अपनी भव्यता का पता देती है।
गली में प्रवेश के बाद सबसे पहले कोठी का जो कोना दिखाई देता है उसकी पहली मंजिल की दीवार में बरगद का नौजवान दरख़्त उग आया है। कैसी विडंबना है ना। अपनी अंतिम साँसे गिनती कोठी के अवशेष से ज़िंदगी के नए सपने संजोता दरख़्त। इस दुनिया में सब कुछ नश्वर है। मैं, आप, यह कोठी, यह दरख़्त । फिर भी नश्वर की स्वयं को अनश्वर बनाए रखने की चाह कभी खत्म नहीं होता।
यह कोठी हो सकता है कुछ समय बाद धराशायी हो जाए इसका नाम और निशान न बचे किंतु यह दीवार से निकला दरख़्त तब तक ज़मीन पकड़ चुका होगा और इस जगह सीना ताने खड़ा रहेगा। लोग इसी पेड़ की तरफ इशारे किया करेंगे कि अमृतलाल नागर की कोठी यहीं थी। कोठी का प्रवेश द्वार मेहराबदार बना है जैसे पुराने किलों के होते हैं और उसमें लकड़ी का दरवाज़ा लगा है। दरवाज़ा तब भी थोड़ा मजबूत दिखाई दे रहा था किन्तु मेहराबदार द्वार की दीवार का तन सीमेंट के लिबास में पूरी तरह नहीं ढक पा रहा है स्थान स्थान से लाल ईटों की हड्डियाँ उसकी जर्जरता ज़ाहिर कर रही थीं। दरवाजे पर एक मोटा-सा ताला लटका था। यानी कोठी में कोई नहीं रहता। अब किस से पता किया जाए कोठी की चाबी के बारे में? हम कोठी के उधर-उधर देखने लगे पर कोई दिखाई नहीं दिया। सामने केवल एक कपड़े की दुकान थी।
“दोस्तो। क्यों ना दुकान में बैठे अंकल से पता किया जाए चाबी के बारे में।” मैंने कहा।
“वो तो ठीक है, पर पहले यह तो पता करो कि अमृतलाल नागर का घर यही है या नहीं? पता चला तुम किसी और के घर की चाबी माँग लाए।
मैं दुकानदार के पास गया। वह तकरीबन 60-65 बरस का आदमी था।
नमस्ते अंकल, मैं अभिषेक अम्बर, दिल्ली से आया हूँ। अमृतलाल नागर जी का घर क्या यही है?
“हाँ बेटा! यह सामने वाला घर नागर जी का ही है।”
“दरवाज़े पर ताला लगा है। ताले की चाबी किसके पास होगी?”
“इस कोठी के चौकीदार तो पंडित जी हैं। उन्हीं के पास होगी।”
“वह कहाँ मिलेंगे”
“चौक चौराहे से अंदर जो गली जाती है। उसी में चाय की दुकान है उनकी। किसी से भी पूछोगे बता देगा पंडित जी की दुकान कौन सी है।”
“उनको धन्यवाद देकर मैं जाने लगा। तभी वह बोले। “बैठो बेटा, थोड़ा आराम कर लो बहुत दूर से आये हो। छोटू ज़रा मेहमानों के लिए पानी तो ला।
हम दोनों की बातचीत होती देखकर विकास, अद्वितीय और रोहित तीनों भी अंदर आ चुके थे। मैंने उनसे पूछा। अंकल आप चौक में ही रहते हैं क्या?
“हाँ बेटा, चौक में ही बचपन बीता, जवानी गुजरी अब बुढापा भी यहीं काट रहे हैं।” कहते हुए वह हँसने लगे।
“फिर तो आपने नागर जी को भी देखा होगा।”
“अरे! नागर जी को तो ख़ूब देखा है। बग़ल में पान से भरा डब्बा रखे आराम कुर्सी पर नागर जी अब भी याद हैं। यूँ तो उनके घर पर दिन भर महफ़िल जमी रहती लेकिन शाम 5 बजे उनकी महफ़िल का रंग ही कुछ और होता। उनके सभी दोस्त-यार लेखक मित्र अद्वि इकट्ठे हो जाते। और कोठी के चौक में नागर जी की चौपाल सजती। उनके दो मित्र तो प्रतिदिन आते। एक कोई जैन साहब थे दूसरे का मैं नाम भूल रहा हूँ।
“कभी आप की नगर जी से बातचीत भी हुई। कभी उनके साथ बैठे हों।”
“बेटा हम उस समय बमुश्किल 8-10 साल के थे। हमें खेलने से ही कहाँ फ़ुर्सत रहती और फिर नागर जी हमारे लिए मुहल्ले के बाक़ी बुजुर्गों की तरह दादा जी हुए। हम दिन भर खेलते फिरते कभी उनको कोई सामान मंगवाना होता तो हमें ज़रूर बुला लेते थे। वह बच्चों से बहुत प्यार करते थे। हम को खाने की चीजें देते। हम उनकी लाइब्रेरी में किताबों का विशाल भंडार देखते तो आश्चर्यचकित हो जाते। कभी-कभी वह हम बच्चों को कोई किताब पढ़ने के लिए भी देते। हम थोड़ी देरे बैठ कर पढ़ने का नाटक करते और उनके सामने से हटते ही खेलने भाग जाते ।”
“नागर जी के बाद क्या इस कोठी में कोई नहीं रहता।” मैंने पूछा।
“उनके सभी बच्चो उनके रहते ही लाइफ में सैटल हो गए थे। एक बेटा पारिजात नागर प्रोफेसर बन गया, बेटी अचला नागर बॉलीवुड में सफल पटकथा लेखक बन गई। दादी जी के जाने से यह टूट गए थे। दोनों में बहुत प्रेम था। दादी जी के बाद वह ज्यादा समय न रहे। उनके जाने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार में लालजी टंडन ने इस कोठी को अमृतलाल नागर की स्मृति में एक पुस्तकालय बनाने का ऐलान किया था। न तो यह पुस्तकालय बना और न ही रहने लायक कोठी बची। तब से पंडित जी ही इस घर की चौकीदारी करते हैं।” अरे मैं तो बातों मैं भूल ही गया आपको पंडित जी के पास चाबी लेने जाना है। आप पहले पंडित जी से चाबी ले आइए कहीं वे घर न निकल जाएँ।
हम फिर से चौक के चौराहे पर खड़े थे पंडित जी का पता पूछते । एक-दो लोगों से पूछा तो कोई कहने लगा सामने जाओ। वहाँ पूछा तो वह बोला चौक चौराहे के दूसरे तरफ़ जाओ। ऐसे में हमने चौराहे के चक्कर काट लिए। लेकिन पंडित जी का पता नहीं चला। आखिर में हमें पान की दुकान पर एक सज्जन मिले जिन्होंने बताया कि बाज़ार की गली में जाइए। थोड़ा भागे जाकर दाहिने हाथ पर पंडित जी की दुकान मिल जाएगी।
गली में प्रवेश किया तो देखा कि यह बाज़ार चौक का सबसे पुराना बाजार है हर तरफ दुकानें ही दुकानें, कपड़ों की दुकाने, राशन की दुकानें, जूतों की दुकानें, फोन की दुकानें, घड़ी की दुकानें। अब्बी के अंदर गलियाँ, गलियों में भी दुकाने।
इन्हीं गालियों में मियाँ नज़ीर कभी कोई सामान बेचते तो कभी महिलाओं से हँसी डिबेली करते पाए जाते होंगे। बहरहाल हमें सभी पंडित जी की तलाश थी। एक के बाद एक हम तीन चायवालों से पूछ चुके थे जब चौचे से पूछा तो बोले। “हो मैं ही हूँ पंडित जी चायवाला!”
“पंडित जी मैं अभिषेक, दिल्ली से आया हूँ। अमृतलाल नागर का प्रशंसक हूँ। उनका घर देखने चौक गया था लेकिन वहाँ ताला लगा था लोगों से ख़बर हुई कि चाबी आपके पास मिलेगी।
“अभिषेक जी, चाबी तो बहुत पहले ही मैं उनके परिवार को वापस दे चुका।”
“उनका परिवार कहाँ रहता है।”
“उनका परिवार तो बाहर ही रहता है।”
“फिर अब चाबी के बारे में हमें कहाँ से पता चलेगा?”
“यह तो मैं नहीं जानता।”
उनकी उदासीनता देखकर मैंने आगे बात नहीं की। हम लोग वापस चौक चौराहे की तरफ़ बढ़ने लगे। थकान और उदासी के मिश्रित भाव हमारे चेहरों पर छाए थे।”
‘तो अब आगे क्या करना है। वापस चलोगे कोठी या अब घर की तरफ चलें?’ विकास ने मुझसे पूछा।
‘यार इतनी दूर दिल्ली से लखनऊ आया हूँ। दोबारा जाने कब मौक़ा मिले। ऐसे ही वापस गया तो मन में एक कसक रह जाएगी।’
हाँ। यह तो ठीक कह रहे हो।”
“तो फिर..??”
“फिर क्या, पकड़ो ग्यारह नंबर की बस और घुमाओ स्टीयरिंग को कोठी की ओर। हम सब इस बात पर खिलखिलाते हुए कोठी की ओर बढ़ने लगे।
बीते रोज़ मैं प्रख्यात कथाकार शिवमूर्ति जी से मिलने गोमती नगर गया था। यह उनसे मेरी पहली मुलाक़ात थी और जिस गर्मजोशी के साथ वह मिले लगा ही नहीं मैं इतने बड़े कथाकार से मिल रहा हूँ।
बातों-बातों में नागर जी की बात चल पड़ी। शिवमूर्ति जी ने एक किस्सा सुनाया। नागर जी के घर पर मिलने वालों का तांता लगा रहता था। जिसकी वजह से कई बार उन का लेखन बाधित हो जाता था। एक बार नागर जी ने अपनी पत्नी से कहा कि “हम कुछ लिखने जा रहे हैं अपने कमरे में। कोई भी आए कह देना हम घर पर नहीं हैं बाहर गए हैं।”
इतना कहकर नागर जी कमरे में गए ही थे कि कुछ देर बाद धर्मयुग पत्रिका के संपादक धर्मवीर भारती दरवाज़े पर आवाज लगाने लगे। “घर में कोई है?”
अंदर से नागर जी की पत्नी निकलीं। कहने लगी, “बताइए क्या काम है।”
“जी। मुझे अमृतलाल नागर जी से मिलना था।”
“नागर जी तो यहाँ नहीं हैं। वह तो कानपुर गए हैं”
“कब तक आएँगे कानपुर से”
“कुछ कर बताकर नहीं गए”
धर्मवीर भारती मायूसी के साथ कहने लगे। जब वो आएँ तो कहिएगा कि बंबई में धर्मवीर भारती आया था। भारती जी की आवाज़ नागर जी के कानों तक पहुँच गई।
“अरे ठहरो ठहरो धर्मवीर! नागर जी रफ़्तार के साथ कमरे से बाहर आए। नागर जी को देखकर धर्मवीर भारती हक्के-बक्के रह गए।
नागर जी उनके मन की बात समझ गए। “अरे भई! जब हम कुछ लिख रहे होते हैं तो हमारा कमरा ही कानपुर हो जाता है। श्रीमतिजी को हमने ही कहा था सबको मना करने के लिए। अब हमें क्या ख़बर थी बंबई से तुम आ टपकोगे। पान के लाल रंग से सने दाँत दिखाते हुए वह खिलखिला उठे।
आज हम नागर जी की कोठी के बाहर बिल्कुल ऐसे ही खड़े थे लेकिन आवाज़ देने पर भी आज कोई नहीं बाहर निकलेगा। कोठी के सामने वाली दुकान भी बन्द हो गई है। धीरे-धीरे दिन भी रात की आगोश में समाता जा रहा है। हम नागर जी के दरवाज़े की चौपाल पर मायूस बैतह थे। तभी सामने वाली गली के दूसरे मकान से तक़रीबन 80 बरस की बुज़ुर्ग औरत बाहर निकलीं।
घर के द्वार से ही चुंधियाई आँखें पर ज़ोरे डालते हुए वह इन देखने लगीं। उनको इस तरह देखते मैं स्वयं को न रोक सका और सीधे बात करने चला गया।
“नमस्ते अम्मा। हम दिल्ली से आए हैं। नागर जी की कोठी घूमने।”
“ख़ुश रहो! मैं देखते ही समझ गई थी परदेसी हो। तो कोठी घूमे?”
“कहाँ!!! पता चला चाबी पंडित जी पर होती है। उनको ढूँढ़ते हुए चौक भी गए। उन्होंने मना कर दिया कि चाबी हम पर नहीं है।”
“तो फिर?”
“बस तब से बैठे हैं कि कोई दिखे तो चाबी का पूछें। सबसे पहले आप ही दिखी।
“बेटा! चाबी का तो हम कुछ नहीं बता सकते।”
फिर अम्मा नागर जी की कोठी की चाबी न सही नागर जी के बारे में ही बता दीजिए। आपने तो उनको देखा होगा।”
“देखा तो बहुत है। उनके पड़ोसी जो ठहरे। और यह नागर जी की नहीं शाह जी की कोठी है।”
“शाह जी की कोठी?” हमारे चेहरों पर प्रश्नवाचक चिह्न उभर आए।
“यह शाहजी की कोठी है। हम तो दिन से नागर जी की कोठी के भरम में इसके चक्कर काटते रहे।” मैंने उदासीन होकर कहा।
“बेटा! कोठी तो यह शाह जी की ही है। नागर जी तो उनके किरायेदार थे। अब भी लोग इसे शाह जी की कोठी कहकर ही कहते हैं बस जो अमृतलाल नागर को पढ़ कर आता है वह तुम्हारी तरह नागर जी की कोठी कहता है।” वह थोड़ा मुस्कुराईं।
“आप नागर जी की कुछ बातें बताइए ना”
“बेटा नागर जी तो हमारे चौक की जान हैं। उन्हीं जब हम छोटे थे तो उन को हमेशा लोगों से घिरे पाया। दूर-दूर से लोग उनसे मिलने आते। बचपन में उनके घर के आँगन में खेलने जाते। उनकी कोठी में सात आँगन थे। एकआँगन में उन्होंने मछलियाँ पाली हुई थीं। हम मछलियों से घंटो खेलते।
“अंदर से नागर जी का घर कैसा था?”
“बड़ा आलीशान। बेंत का सोफा सेट जो उस जमाने में लक्ज़री माना जाता था उनकी बैठक में पड़ा रहता। उन के पास छड़ियों का भी अच्छा अच्छा कलेक्शन था। मुहल्ले भर में टेलीफोन भी सिर्फ उन्हीं के घर में था। मुहल्ले भर के फोन उनके पास आते। पूरे चौक मुहल्ले में उनके रहने से रौनक थी।”
“अम्मा, नागर जी का एक उपन्यास है ‘बूंदे और समुद्र’ जो उन्होंने चौक के मुहल्ला जीवन पर ही लिखा है। उसमें एक ताई थीं जो परित्यक्ता थीं तथा मुहल्ले भर में जादू टोने के लिए मशहूर थीं। क्या यहाँ ऐसी कोई औरत थी?”
“अरे ऐसी तो यहाँ एक ही औरत थी नागर जी की मकान मालकिन। कलावती काकी। पति ने बच्चों न होने के कारण उन्हें छोड़ दिया था।
“कहाँ रहती थीं वो? “
“शाह जी की कोठी में ही। पीछे के हिस्से में कलावती काकी रहती थी और आगे नागर जी का परिवार। पूरे चौक में में वह जादू-टोने के लिए मशहूर थीं।”
अम्मा की बातें सुनकर में रोमांचित हो उठा। नागर जी ने बूंद और समुद्र में जो ताई का किरदार गढ़ा है वह उनकी मकान मालकिन ही थीं। ताई भी तो घर के पीछे के हिस्से में रहती थीं और आगे के कमरे सज्जन को किराये पर दे दिए थे जहाँ वह मुहल्ला जीवन को समझने आया था।
अगर यही बात है तो फिर सज्जन कोई और नहीं, नागर जी ही हुए। यही बात मैंने अम्मा को बताई।
“बेटा इस बारे में तो मैं कुछ नहीं कह सकती। किंतु इतना जानती हूँ कि उन्होंने लिखने के लिए एक कमर गोमती के किनारे लाजपत नगर में लिया हुआ था।
अम्मा ने शायद ‘बूँद और समुद्र’ नहीं पढ़ा था इसलिए वह निश्चित तौर पर कुछ नहीं कह रही थीं लेकिन मुझे विश्वास हो गया कि जैसे ताई के किरदार के बारे में पता चला शायद इनसे और भी बहुत सी चीज़ों के सुराग़ मिल जाएँ।
“अम्मा, क्या यहाँ आस-पास ऐसा कोई मंदिर है जिसके पास, विशाल पेड़ हो तथा वहाँ चौक के मर्दों की जमघट भी लगती हो।”
“मंदिर तो चौक में कई हैं। पर मर्दों की जमघट तो एक ही मंदिर पर लगती थी वह था कोनेश्वर महादेव मंदिर।
“वह तो चौक की न्यूज एजेंसी था कोई भी घटना मुहल्ले में घटी नहीं कि मंदिर के चौपाल पर ख़बर पहले पहुंच गई। पूरे चौक में एकमात्र वहीं स्थान था जहाँ दिन घर चर्चाएँ होतीं। हम प्रत्येक मंगलवार को वहाँ जाते थे कीं और हनुमान चालीसा का पाठ करते। वहीं से हमने हनुमान चालीसा कंठस्थ की थी।
अम्मा की बात से पक्का यकीन हो गया कि कलावती काकी ही ताई है, नागर जी ही सज्जन हैं और कोनेश्वर महादेव मंदिर ही चौक के बड़े-बुज़ुर्गों का वह चौराहा जिसे नागर जी ने बूँद और समुद्र में चित्रित किया था।
अम्मा अपने माज़ी की गहराइयों में गोते लगा रही थीं। बोलीं, “छोटे थे तो क्या क्या शरारतें हमने नहीं कीं। लुका-छिपी खेलते तो किसी के भी घर में घुस जाते। उस समय द्वार लगाने का रिवाज ही नहीं था। नागर जी के घर के आंगन में एक चबूतरा सा था जो चारों तरफ़ से खुलता। हम लोग उसमें ‘आकाश- पाताल’ खेलते। रामलीलाएं देखने जाते। बालागंज के जंगल से जंगल जलेबी और फालसे तोड़-तोड़ खाते।
“क्या आपको भी ख़ूब डांट या मार पड़ती थी?”
“बहुत ज़्यादा डाँट पड़ती थी। पर बचपन में डाँटने और मरने से बच्चे कहाँ सुधरते हैं। हमारी गली के कोने में रामाश्रय हलवाई की दुकान पड़ती थी। हम बच्चे जब स्कूल जाते तो रामाश्रय हलवाई की दुकान के बाहर उसे चिढ़ाते।
“रामाश्रय हलवाई
जिसकी तेल की मिठाई
जिसके गोबर के बताशे
जिसकी बीवी करे तमाशे”
हम सभी दोस्त अम्मा की तुकबंदी पर ख़ूब हँसे। वह भी हमें बताते हुए जैसे दोबारा उन दिनों को जीने लगीं थीं। मैंने छेड़ते हुए पूछा। “इस तुकबंदी पर तो आपको ख़ूब मार पड़ी होगी?”
“कैसी मार? हम किसी के हाथों आएँ तो मार पड़े ना”
“अम्मा! आपकी बातें सुनकर तो कोठी को भीतर से देखने की इच्छा और बलवती हो गई है। कोई युक्ति सुझाइए न।”
“बेटा! चाबी तो मेरे पास नहीं है। और न ही मैं जानती हूँ किसके पास मिलेगी” कहते हुए वह उदास हो गईं। हमारी इच्छा पूरी न कर पाने के कारण।
लेकिन तभी तपाक से वह चहक उठीं। “बेटा एक रास्ता है जिससे तुम बिना चाबी के भी अंदर से कोठी देख सकते हो।”
“फिर बताइए ना अम्मा” हमने उत्सुकता से पूछा।
नागर जी फिल्मों के न केवल सफ़ल पटकथा लेखक रहे हैं बल्कि उनकी कोठी में ‘जुनून’ और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ आदि कई फ़िल्मों की शूटिंग भी हुई हैं। शशि कपूर, उनकी पत्नी ज़ेनिफ़र केंडल, शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह, श्याम बेनेगल यहाँ महीनों रहते थे। इन फिल्मों में कोठी को तुम अच्छे से देख सकते हो।
हमारे लिए यह भागते भूत की लंगोटी हाथ आने की तरह था। ख़ैर ख़ाली हाथ से तो यह भी अच्छा है।
दिन धीरे धीरे अपनी अंतिम साँसें गिन रहा है। सूर्य की किरणें किसी भी समय उसके प्राण पखेरू उड़ा सकती हैं। हम भी अम्मा को अलविदा कहकर चल दिए। जाते जाते मैं नागर जी की कोठी को निहार रहा था। मन में बहुत कुछ पा लेने और बहुत कुछ छूट जाने का भाव एक साथ आ रहा था। क़दम आगे बढ़ रहे थे घर की तरफ़ और मन अभी भी कोठी में अटका था। तभी मेरी नज़र कोठी के मुख्य द्वार के अलावा छोटे छोटे दरवाज़ों में से एक दरवाज़े पर पड़ी जिसके बीच की दरार से कोठी के अंदर की एक हल्की सी झलक नज़र आ रही थी।
मैंने एक आँख बंद करके दूसरी से झांकना चाहा। कोठी के अंदर का बरामदा नज़र आने लगा। सफ़ेद दीवारों का रंग मटमैला हो चुका था। आँगन में हर तरफ़ झाड़ियां ही झाड़ियाँ थीं। पिलरों पर जंगली बेलों ने अपना क़ब्ज़ा जमाया हुआ था। अब इस घर पर प्रकृति का राज था। देख कर दुख भी हुआ कि सरकार हमारे यहाँ के लेखकों से जुड़े स्थानों के संरक्षण को लेकर कितनी उदासीन है। लेकिन इस बात का संतोष भी है कि केवल लाइब्रेरी बनाने की घोषणा के कारण ही सही यह जगह बिल्डरों के हाथ से फिलहाल बची हुई है। वैसे भी हमारे चौक के वाइस चांसलर सिर्फ़ अपने घर तक ही थोड़ी सीमित हैं वह तो चौक की हर गली में हैं।

