इतवार के इंडियन एक्सप्रेस में पारोमिता चक्रवर्ती के साथ कन्नड़ के लेखक विवेक शानभाग की बातचीत पढ़ी। विवेक समकालीन भारतीय साहित्य के अहम और चर्चित नाम हैं। उनका उपन्यास घाचर घोचर लगभग दस साल बाद भी चर्चा में बना हुआ है। श्रीनाथ पेरूर ने इसका अंग्रेज़ी में अनुवाद किया, जिसके बाद इस किताब को ग़ैर-कन्नड़भाषी लोग भी पढ़ सके। 2017 में इसे International Dublin Literary Award के लिए नामांकित किया गया और उसी साल यह Los Angeles Times Book Prize की फाइनलिस्ट रही। 2020 में शानभाग को इसके अंग्रेज़ी अनुवाद के लिए साहित्य अकादमी का अनुवाद पुरस्कार मिला। इस उपन्यास का हिन्दी अनुवाद वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है।
लेकिन ऐसा नहीं है कि शानभाग की दिलचस्पी सिर्फ अपनी किताबों में ही है। वे लंबे समय से भारतीय भाषाओं के साहित्य को एक-दूसरे तक पहुँचाने के बारे में सोचते और काम करते रहे हैं। इसी सिलसिले में उन्होंने ‘हाइफ़न’ शुरू किया है, जो भारतीय भाषाओं के साहित्य को साथ लाने की कोशिश है।
भारतीय भाषाओं से बाहर का साहित्य पढ़ने की बात पर विवेक शानभाग रूसी और लैटिन अमेरिकी साहित्य का उदाहरण देते हैं। उनका कहना है कि इन भाषाओं का साहित्य अनुवाद के रास्ते हमारे पास आता है, इसलिए हम उसे पढ़ पाते हैं। लेकिन भारतीय भाषाओं में लिखा साहित्य हमारे पास अक्सर ही अंग्रेज़ी के रास्ते पहुँचता है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारतीय भाषाओं के बीच भी अनुवाद के जरिए सीधा रिश्ता क्यों न बने?
कन्नड़ के लेखक के रूप में शानभाग ने इस दूरी को करीब से देखा है। घाचर घोचर का उनका अनुभव भी इसी का एक उदाहरण है। अपनी लेखकीय यात्रा को जारी रखते हुए शानभाग अब चाहते हैं कि दूसरे भारतीय भाषाओं के लेखकों को भी अपनी भाषा से बाहर के पाठकों तक पहुँचने का ऐसा ही अवसर मिले। इसी सोच को केंद्र में रखते हुए उन्होंने ‘हाइफ़न’ की शुरुआत की है। यह एक साहित्यिक पत्रिका, प्रकाशन संस्था और डिजिटल मंच, तीनों ही की भूमिका निभाएगा। साथ ही भारतीय भाषाओं के साहित्य को एक-दूसरे तक पहुँचाने की कोशिश भी रहेगी।
शानभाग का मानना है कि हाइफ़न शुरू करने का उनका विचार कई साल पुराना है और वे बहुत लंबे समय से ऐसा कुछ करना चाह रहे थे। हाइफ़न उन तमाम बातचीत से निकला हुआ विचार है जो वे कन्नड़ और दूसरी भारतीय भाषाओं के लेखकों के साथ करते रहे हैं। वे कहते हैं कि “हाइफ़न किसी तरह का कोई ऐलान नहीं बल्कि पूरी तरह से बातचीत से निकला एक विचार था। भारतीय भाषाओं के लेखक जिन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बदलावों, बड़े सरोकारों और अपने समय के अंतर्विरोधों पर लिख रहे हैं, उन्हें समझना ज़रूरी है।”
‘हाइफ़न’ के पीछे की कहानी समझने के लिए शानभाग की पुरानी पत्रिका ‘देश काल के बारे में जानना ज़रूरी है। उन्होंने करीब सात साल तक इस कन्नड़ साहित्यिक पत्रिका का संपादन किया। कन्नड़ के लोगों को तमिल, हिंदी, बांग्ला और मराठी के कई लेखकों को पढ़ने का मौका मिला इसी पत्रिका से मिला। जयमोहन, उदय प्रकाश और मीना कंदासामी जैसे लेखक भी इसमें प्रकाशित हुए।
पत्रिका के संपादन के दौरान ही शानभाग ने भारतीय भाषाओं के साहित्य की विविधता को करीब से देखा। अलग-अलग भाषाओं में लेखक अपने समय और समाज को कितने अलग ढंग से देखते हैं, इसका अनुभव उन्हें हुआ। साथ ही उन्होंने यह भी महसूस किया कि कई अच्छे लेखक अपनी भाषा के बाहर के पाठकों तक पहुँच ही नहीं पाते।
शानभाग के लिए लेखकों को ढूँढ़ना और उनके काम को पढ़ना-जानना अपने आप में एक सुखद अनुभव था। वे इसे ऐसी यात्रा का नाम देते हैं जिसमें चलते-चलते कई बार ऐसी अनमोल कृति और लेखक मिल जाते हैं जिसकी आपने उम्मीद भी नहीं की होती है। लेकिन इस यात्रा में एक कमी भी बार-बार सामने आती थी। वह ये कि कई लेखकों को अंग्रेज़ी के पाठकों तक पहुँचने के लिए बहुत इंतज़ार करना पड़ता था।
शानभाग इस बात को एक सवाल की तरह रखते हैं: अगर इन लेखकों की रचनाएँ ‘देश काल’ में पहली बार छपने के समय ही अंग्रेज़ी में उपलब्ध होतीं, तो उनके साथ होने वाली साहित्यिक बातचीत कितनी अलग होती?
‘हाइफ़न’ इसी सवाल से आगे बढ़ने की यात्रा के प्रयास का नाम है। फर्क इतना है कि इस बार शानभाग कन्नड़ और दूसरी भारतीय भाषाओं के बीच सीधे अनुवाद के रास्ते खोलना चाहते हैं। उनके लिए यह सिर्फ भाषाओं के बीच आने-जाने का मामला नहीं है। इससे यह भी तय होता है कि हम दूसरे भारतीय समाजों और उनके अनुभवों को कितना जानते हैं।
शानभाग मानते हैं कि अलग-अलग भारतीय भाषाओं के साहित्य तक पहुँचने का सबसे सीधा रास्ता अनुवाद ही है। उनके शब्दों में, “अलग-अलग भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद हमारे लिए एक-दूसरे के साहित्य तक पहुँचने का सबसे प्रभावी रास्ता हो सकता है।”
‘हाइफ़न’ इसी काम को अलग-अलग स्तरों पर आगे बढ़ाएगा। प्रिंट पत्रिका में अलग-अलग भारतीय भाषाओं का लेखन एक साथ आएगा। वेबसाइट पर किताबों की समीक्षाएँ, कविताएँ, कहानियाँ और नाटक प्रकाशित होंगे। प्रकाशन संस्था का काम दूसरी भारतीय भाषाओं की पूरी किताबों को अंग्रेज़ी और अन्य भाषाओं में उपलब्ध कराना होगा।
शानभाग के लिए इस पहल का महत्व इसी में है कि भारतीय साहित्य की अलग-अलग धाराएँ एक-दूसरे के सामने आएँ। उनके अनुसार, इससे पहले भारतीय साहित्य की इतनी विविध परंपराओं को एक साथ रखने और उन्हें दुनिया के पाठकों तक पहुँचाने की ऐसी कोशिश नहीं हुई है।
‘हाइफ़न’ की नज़र भारत से बाहर के पाठकों पर भी है। पिछले कुछ सालों में भारतीय भाषाओं से अंग्रेज़ी में अनूदित कुछ किताबों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली है। गीतांजलि श्री के ‘रेत समाधि’ के अंग्रेज़ी अनुवाद Tomb of Sand को 2022 में International Booker Prize मिला। 2025 में बानू मुश्ताक की ‘Heart Lamp’, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद दीप भास्ती ने किया, Booker Prize जीतने वाली पहली कन्नड़ किताब बनी।
लेकिन शानभाग की दिलचस्पी सिर्फ पुरस्कारों में नहीं है। उनके लिए ज़रूरी यह है कि पाठकों को भारतीय भाषाओं के लेखकों की एक बड़ी दुनिया तक पहुँच मिले। पुरस्कार किसी एक किताब पर ध्यान खींच सकते हैं, लेकिन साहित्य का रिश्ता तभी मजबूत होगा जब अलग-अलग भाषाओं के लेखकों की किताबें लगातार पढ़ी और अनूदित की जाएँ।
उनका मानना है कि भारतीय भाषाओं में ऐसे बहुत-से लेखक हैं जिन्हें दुनिया के पाठकों को पढ़ना चाहिए। उनकी अपनी भाषा, अपनी शैली और अपने अनुभवों के साथ। ‘हाइफ़न’ का मकसद इन्हीं लेखकों और पाठकों के बीच रास्ता बनाना है।
शानभाग के लिए अनुवाद का अर्थ केवल एक भाषा की बात दूसरी भाषा में कह देने तक सीमित नहीं है। यह एक साहित्यिक दुनिया को दूसरी साहित्यिक दुनिया से मिलाने का काम है। यह एक ऐसी मुलाकात है जिसके ज़रिए पाठक दूसरे समाजों, दूसरे अनुभवों और दूसरे ढंग से लिखे गए साहित्य को समझ सकते हैं।
(पारोमिता चक्रवर्ती के साथ विवेक शानभाग की बातचीत पर आधारित यह लेख कुमारी रोहिणी ने लिखा है। कुमारी रोहिणी को हाल में ही ऑर्बिटल के अनुवाद के लिये वैली ऑफ वर्ड्स अवार्ड मिला है)

