पुरानी दिल्ली की रंगत: मीना बाज़ार

दिल्ली में जामा मस्जिद के पास मीना बाज़ार है। एक जमाने में हम मीना बाज़ार में हम पाकिस्तानी गायकों के कैसेट ख़रीदने जाते थे। बाद में सीधी के दौर में पाकिस्तानी क़व्वालों के वीडियोज़। कई बार ऐसी चीजें भी ख़रीदने गये जिनके बारे में लिख नहीं सकता। बहरहाल, उसी मीना बाज़ार के इतिहास और वर्तमान पर लिखा है युवा लेखक मुशर्रफ परवेज़ ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर 
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भारतीय बाज़ार अपनी विविधता, कलाकृतियों, रंग-बिरंगे सामान एवं चहल-पहल हेतु प्रसिद्ध है। इन बाज़ारों से केवल हमारी मूलभूत आवश्यकताएँ ही पूरी नहीं होतीं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती हैं। जो देश की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध बनाती है। ठीक ऐसा ही बाज़ार स्थित है पुरानी दिल्ली में, जिसे हम ‘मीना बाज़ार’ के नाम से जानते हैं।
पुरानी दिल्ली महज़ एक स्थान नहीं है, अपितु भारतीय विरासत, संस्कृति, इतिहास, विभिन्नता आदि की प्रतीक भी है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि पुरानी दिल्ली ‘गंगा-जमुनी’ तहज़ीब को अपने दामन में सदियों से समेटे हुई है। जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते जा रही है। इस शहर को मुग़ल शासक, शाहजहाँ ने बसाया और सँवारा था। आज भी ये स्थान अपनी संकरी गलियों, ऐतिहासिक इमारतों, रंगीन बाज़ारों के लिए प्रख्यात है। चाहे वो जामा मस्जिद हो, लाल क़िला हो, चाँदनी चौक हो या फिर मीना बाज़ार हो। सबनें अपने अंदर अनेकों कहानियों को छिपा रखा है। ‘पराठे’ वाली गली का नाम तो आपने सुना ही होगा!
उन्हीं तमाम कहानियों में से ‘मीना बाज़ार’ की अनसुनी कहानी आज आपके समक्ष प्रस्तुत है। हम जानते हैं कि भारतीय बाज़ार अपूर्व होते हैं। विभिन्न देशों से आए पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। उनको भारतीय संस्कृति से रुबरु भी कराते हैं। ठीक वैसा ही है ये मीना बाज़ार। ख़ैर, इस बाज़ार की इतनी ख्याति क्यों है? इसकी चर्चा आगे सिलसिलेवार ढंग से की जाएगी।
‘मीना’ मूलतः संस्कृत का शब्द है। जिसके कई अर्थ हैं। मुकुंदीलाल श्रीवास्तव द्वारा संपादित ‘ज्ञान शब्दकोश’ में इसका अर्थ है- ‘रंग-बिरंगा शीशा, शराब की बोतल, सुराही’। एक ‘मीना’ उषा की कन्या हैं, जिनका विवाह कश्यप से हुआ था। एक तीसरा राजपूतों से संबंधित है, जिसमें ‘मीणा’ लिखा जाता है। जो कि राजपूताने की एक प्रसिद्ध योद्धा जाति है।
अब ये जानते है कि कैसे इस बाज़ार की नींव रखी गई? हुआ ये कि 16वीं शताब्दी के मध्य में मुगल साम्राज्य का 5वाँ शासक, जिसे हम शाहजहां के नाम से जानते हैं। उन्होंने पश्चिमी एशिया के कवर्ड बाज़ार (Roof Top) का नाम सुन रखा था। इतिहासकार बताते हैं कि सन् 1646 के आसपास शाहजहाँ को पेशावर जाने का मौक़ा मिला। वहाँ उन्होंने कवर्ड बाज़ार को देखा। उन्हें दिल्ली के गर्मी का बाकायदा अंदाज़ा था। परिणामस्वरूप उन्होंने भारत में भी ठीक वैसा ही बाज़ार बनाने का निर्णय किया। उन दिनों ‘लाल क़िला’ का निर्माण चल रहा था। ‘मुकरमत खान’ नामक व्यक्ति की देख-रेख में लाल किले का निर्माण ज़ारी था। उन्हें ही शाहजहां ने मीना बाज़ार बनवाने का जिम्मा दे दिया।
इतिहासकार, के० के० मुहम्मद बताते हैं कि ‘मीना बाज़ार को इजिप्ट (Egypt) में ‘खान-ए-खलीली’ कहते हैं। यहाँ इसे ‘बाज़ार-ए-मुसक्कफ’ और ‘छत्ता बाज़ार’ (Covered Baazar) कहते हैं।’ छत्ता यानी ढंका हुआ।
क्यों आकर्षित करता है मीना बाज़ार का ढांचा?
क्योंकि इसका ढाँचा वाकई में अजूबा है। पूरे भारत में न ऐसा ढाँचा बना और न आगे बन पाया। लाल किले के ‘लाहौरी गेट’ से प्रवेश करते ही दो तरफ़ा बाज़ार शुरू हो जाता है। बाज़ार पूर्वी (Eastern) और पश्चिमी (Western) दो सिरों में विभाजित है। दोनों सिरों को खुला अष्टकोणीय (Open Octagonal Space) भाग विभाजित करता है। इस अष्टकोणीय स्थान को बनाने का उद्देश्य था बाज़ार में स्वच्छ हवा और धूप आ सके। इस अष्टकोणीय स्थान को ‘छत्तर मंजिल’ (Chhatar Manzil) कहते हैं। पूरा बाज़ार ऊपरी और निचली दो मंज़िलों में बंटा हुआ है। अर्थात दो मंज़िला (Double Storey) बाज़ार। मुग़ल काल में दोनों मंजिलें संचालित थीं, वर्तमान में केवल निचली मंज़िल संचालित है। वहाँ के दुकानदारों ने बताया कि अभी ऊपरी मंज़िल गोडाउन अथवा भाड़े के लिए प्रयोग किया जाता है। 
प्रो० चंद्रशेखर बताते हैं कि “यहाँ के समान जेनरल मार्केट में नहीं मिलते हैं। मीना बाज़ार मुख्य रूप से हरम के लोगों, राजा व रानियों के द्वारा प्रयोग किया जाता था।” उनका कहना एहदम सही है क्योंकि इसमें बाहरी लोगों को जाने का मौक़ा नहीं मिलता था। राजशाही परिवार की स्त्रियाँ ही दुकान लगाया करती थीं। सिर्फ़ राजशाही परिवार के पुरुषों का प्रवेश था। इस बाज़ार से जुड़ा एक प्रसिद्ध किस्सा भी है, जिसकी चर्चा आगे करेंगे। वही किस्सा जिसनें देश को सातवें अजूबों में शुमार कर दिया।
मुग़ल काल में इस बाज़ार में सोने व चांदी के ज़ेवर मिलते थे। हाथ से बनाई हुई सुंदर-सुंदर घरेलू चीज़ें मिलती थीं। सिल्क (Silk) के लिए तो प्रसिद्ध था ही बाज़ार। वहीं बेहतरीन शॉल, कार्पेट, वेलवेट, जाफरान, कस्तूरी आदि भी मिलता था।
ब्रिटिश शासन कल में इस बाज़ार को ‘एग्रेशन बाज़ार’ (Aggression Baazar) कहा जाने लगा। जो मुख्यतः ब्रिटिश मिलिट्री के लिए था। वहाँ वे ही शॉपिंग करते थे। ब्रिटिश काल में भी ये सामान्य लोगों के लिए नहीं था।
परंतु भारत के स्वतंत्र होने के पश्चात् इस बाज़ार को सभी के लिए खोल दिया गया। जो आज तक संचालित है। वर्तमान समय में वहाँ चूड़ियाँ, झोले, खिलौने, मोतियां, कपड़े, चश्मे, घड़ियाँ आदि खूबसूरत से खूबसूरत चीज़ें मिलती हैं।
ताजमहल जिनकी याद में बनवाई गई। वे दोनों इसी बाज़ार में मिले थे। हम पहले कह आए हैं कि इस बाज़ार को शाहजहां ने दिल्ली के गर्म मौसम को मद्देनज़र रखकर बनवाया था। वे अक्सर वहां जाया करते थे। बात सन् 1607 की है, जब शाहजहां अपने रथ पर सवार होकर बाज़ार में घूम रहे थे। अचानक उनको एक लड़की ‘सिल्क’ बेचते हुए दिख पड़ी। जिसका नाम ‘अर्जुमंद बानो बेग़म’ था। जिसकी एक झलक ने शाहजहां को प्रेम में डूबा दिया। फ़िर क्या था? कुल 5 साल बाद वे दोनों एक हो गए। दोनों ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे। आपको बताता चलूँ कि अर्जुमंद बानो बेग़म शाहजहां की तीसरी पत्नी थीं। अर्जुमंद बानो बेग़म ने 13 बच्चों को जन्म दे दिया था। लेकिन 14वीं बच्ची को जन्म देते ही उनकी मृत्यु हो गई। जिनकी याद में शाहजहां ने ताजमहल बनवाया। इसी अर्जुमंद बानो बेग़म को बाद में ‘मुमताज महल’ कहा जाने लगा। यूनेस्को (Unesco) के अनुसार सन् 1631 ई० में ताजमहल बनना शुरू हुआ और सन् 1648 ई० में पूर्ण हो गया। कुल 17 हेक्टेयर में फैला ये इमारत समूचे विश्व के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
मीना बाज़ार प्रत्येक सोमवार को बंद रहता है। सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक जगमगाता रहता है। पिछले दिनों मैं घूमने गया हुआ था। तो मेरी एक टूरिस्ट से बात हुई। उन्होंने क्या कुछ कहा आपको पढ़वाता हूँ।
वे कहते हैं- “It looks like an Old Tradition. It seems like market of Past Time. It doesn’t like Modern Market.”
वो कहते हैं न हर चीज़ की अच्छाइयां होती हैं, कुछ तो बुराइयाँ भी। अच्छाईयों के साथ बुराइयाँ न हों, ऐसा हो ही नहीं सकता! वक़्त के पहिये ने इस बाज़ार को इम्पोर्टेड सामानों का अड्डा बना दिया। दूसरे देशों के सामान चोरी-छिपे बिकने लगे। वे सारी कैसेटें बिकने लगीं, जो प्रतिबंधित थीं।
इन सबके बावजूद मीना बाज़ार की ऐतिहासिकता आज भी बरक़रार है। ये इतिहास और आधुनिकता के बीच की कड़ी है। ये हमें हमारे अतीत से जोड़ता है। अपने कलाकृतियों से पर्यटकों को लुभाती है। 
ग़ालिब साहब का एक शेर कह देना चाहिए। वे कहते हैं-
“समझ के करते हैं बाज़ार में वो पुर्सिश-ए-हाल,
कि ये कहे कि सर-ए-रहगुज़र है क्या कहिए.”

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