पिछले दिनों एक गीत बड़ा वायरल हुआ। सॉरी! सॉरी! गीत नहीं लोकगीत। शानजे सियाल नामक गायिका गा रही थीं और लशारी नामक व्यक्ति गिटार पर धुन बजा रहे थे। दोनों की जुगलबंदी ने सोशल मीडिया के एल्गोरिथम के तमाम मानक तोड़ दिए। बाढ़ जैसे रातों-रात अलग अलग देशों में तैर गया। इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब सभी प्लेटफार्म पर इस रील्स ने जलवा काट दिया। जिसके भी फ़ोन से आवाज़ आती, तो बस ‘चलरे-चलरे वाल‘ ही सुनाई देता। इसी गीत और इसकी भाषा पर यह रोचक टिप्पणी लिखी है मुशर्रफ परवेज़ ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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आपको बताता चलूँ कि यह गीत नहीं बल्कि लोकगीत है। बाक़ी लोकगीत क्या होता? आप तो बख़ूबी जानते होंगे। बोल यूँ हैं-
“तू सांवल फुल कस्तूरी
टेडी थी गई बहुं मशहूरी
झां झां ते हर झां ते
पाए देंदे लोक मिसाल
चलरे चलरे वाल
मोंढे रखदाए काली शाल
हथ चनाए रत्ता रुमाल
तेरियां रीसां कौन करे.”
शफ़ाउल्लाह खान रोखड़ी ने इसके बोल लिखे। सन् 1983 में प्रसिद्ध पाकिस्तानी लोकगायक, मुहम्मद हुसैन बाण्डियाल ने इसे गाया। उस समय इस लोकगीत को उतनी पॉपुलेरिटी नहीं मिली। हालाँकि शानजे सियाल और लशारी के जुगलबंदी ने इस लोकगीत को पूरी दुनिया में प्रसिद्ध कर दिया। जिसका परिणाम हुआ कि 100 मिलियन से अधिक बार इस रील को देखा गया।
लोकगीत की भाषा.
पहली बार सुनने पर इसकी भाषा पंजाबी लगती है। हालाँकि गहन अध्ययन के उपरांत पता चला कि इसकी भाषा पंजाबी नहीं बल्कि ‘सराइकी’ है।
सराइकी भाषा है या बोली? इसको लेकर भी कई मतभेद हैं। जिसके चक्कर में नहीं पड़ना ही ठीक जान पड़ता है। ये काम भाषाविदों के हिस्से छोड़ना उचित मालूम पड़ता है।
सराइकी, लहंदा समूह की एक इंडो-आर्यन भाषा है, जो पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में बोली जाती है। इसे पहले इसकी मुख्य बोली के नाम पर ‘मुल्तानी’ के नाम से जाना जाता था। सराइकी को ‘बेलोचकी’ अथवा ‘सिराइकी’ के नाम से भी जाना जाता है।
सराइकी का संबंध मुल्तान से है। यह पाकिस्तान के दक्षिण पंजाब के हिस्सों में बोली जाने वाली तमाम भाषाओं में से एक लोकप्रिय भाषा है। मुल्तान, रहीम यार खान, डेरा ग़ाज़ी खान व अन्य स्थानों पर बोला जाता है। एक आंकड़ा बताता है कि अकेले डेरा ग़ाज़ी खान में इसके बोलने वालों की संख्या 80% से भी अधिक है।
सराइकी का इतिहास.
सराइकी का इतिहास हज़ारों वर्ष पुराना है। इसका संबंध ‘सिंधु घाटी सभ्यता’ (Indus Valley Civilisation) से जुड़ा हुआ माना जाता है।
इसकी सबसे बड़ी विशेषता है- सूफियाना अंदाज़ और मिठास। जिसके कारण लोग इस लोकगीत के दीवाने बन गए हैं।
सराइकी भाषाविद्, असलम रसूलपुरी कहते हैं कि इसकी उत्पत्ति पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हुई। सराइकी भाषा का समृद्ध इतिहास है और क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग नामों से जाना जाता है। प्रारंभ में इसके लिए ‘ब्राह्मी लिपि’ का प्रयोग किया जाता रहा। 7वीं शताब्दी के आसपास अरब आक्रमण होने के पश्चात् इसकी लिपि ‘नस्क’ हो गई। गौरतलब है कि ‘नस्क’ एक अरबी लिपि है।
आधुनिक सराइकी मुल्तान के आस-पड़ोस में बोली जाने वाली मुल्तानी से मिलने के कारण लोग इसे ‘मुल्तानी’ भी कहते हैं।
सराइकी के प्रमुख कवि.
सराइकी साहित्य एक से बढ़कर एक कवि हुए। उनमें ख्वाजा गुलाम फरीद, इकबाल सोकरी, अकबर मखमूर, आशु लाल फकीर, लुत्फ अली, अहमद खान तारिक, शाकिर शुजा आबादी, शाकिर मेहरवी, अमानुल्लाह अरशद, अब्दुल करीम साजन, मुख्तियार लेघारी और अब्दुल रशीद उश्तर आदि प्रमुख है। इन सभी लोगों ने इस भाषा के साहित्य को समृद्ध किया।
मुल्तान से भारत का संबंध.
विभाजन से पूर्व मुल्तान भारतवर्ष का हिस्सा था। वर्तमान में यह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में ‘चेनाब’ नदी के पूर्वी तट पर स्थित है। यह पाकिस्तान का 7वां सबसे बड़ा शहर है। विभाजन के समय हज़ारों की संख्या में मुल्तानी लोग भारत आए। आकर दिल्ली के आस-पास बस गए। सन् 1175 में मुहम्मद गौरी ने जब भारत पर पहला आक्रमण किया, वो स्थान मुल्तान ही था। यहीं से वो गुजरात में प्रवेश किया।
मुल्तान को ‘संतों का शहर’ (City of Shrines) के नाम से भी जनाते हैं।
हिंदी साहित्य के प्रथम कवि को लेकर अलग-अलग इतिहासकारों की अलग-अलग राय है। इस संदर्भ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अब्दुल रहमान (अद्धमान) को प्रथम कवि माना है। इसी अब्दुल रहमान ने अपभ्रंश भाषा में ‘संदेश रासक’ नामक एक खण्ड-काव्य की रचना की। इस रचना में जिस स्थान का उल्लेख है, वो यही मुल्तान है।



