आजकल जिस भगवानदास मोरवाल को हम हिन्दी के प्रमुख उपन्यासकारों में एक मानते हैं उनसे मेरा पहला परिचय कवि के रूप में हुआ था। स्कूल में पढ़ता था जब कादम्बिनी पत्रिका के एक अंक में ‘प्रवेश’ स्तंभ के अन्तर्गत एक युवा कवि से मेरा परिचय हुआ था, नाम था भगवानदास मोरवाल। ‘प्रवेश’ स्तंभ में युवा कवियों की कविताएँ छपती थीं। तब मैं उनकी कविताओं से बहुत प्रभावित हुआ था।बाद में जब कॉलेज की पढ़ाई के लिए दिल्ली आया तो मन में यह आस थी कि एक दिन भगवानदास मोरवाल से मुलाक़ात होगी। हालाँकि जब उनसे भेंट हुई तब तक वे ‘काला पहाड़’ नामक चर्चित उपन्यास के लेखक हो चुके थे। अभी हाल में वाणी प्रकाशन से उनका कविता संग्रह आया है ‘घर की किसी दीवार पर’। उस संग्रह में वे कविताएँ दिखीं जिनको संभवतः मैंने 1985 में पढ़ा था। आइये पढ़ते हैं उन कविताओं को। साथ में कादम्बिनी के संपादक का वक्तव्य भी और कवि का आत्मकथ्य भी- मॉडरेटर
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भगवानदास मोरवाल की इन कविताओं के बारे में पत्रिका के संपादक ने लिखा था-
‘प्रवेश’ के अंतर्गत इस बार हम अपने पाठकों का परिचय करा रहे हैं भगवानदास मोरवाल से। उनकी कविताएँ एक रहस्यात्मकता का आवरण लेकर चलते हुए विसंगतियों को पहचानकर उकेरने की कोशिश करती प्रतीत होती हैं। यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी चार कविताएँ।
इस स्तंभ में कवि का एक संक्षिप्त ‘आत्म-कथ्य’ भी प्रकाशित हुआ करता था। अपने आत्म-कथ्य में भगवानदास मोरवाल लिखते हैं-
अब तक जीवन की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर मिले कुछ कसैले अनुभवों और गुनगुने अहसासों ने प्रेरणा दी, कुछ लिखने की। और यही कसैले अनुभव और अहसास अवतरित होने लगे-कविता के रूप में।
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उम्र
उम्र तो पूछो सरहदों पर बिछे
काँटेदार तारों में फँसी
उन उँगलियों से जिनके नाखूनों से
रिसता है बुझा बारूद।
क़तार-दर-क़तार
गड़े उन सरकंडों से पूछो
जिनकी देह से बनता है मृत ताबूतl
अपंग कुर्सियों पर पसरी
उन टाँगों का तो हाल ही न पूछिए
जिनकी धमनियाँ लगी हैं हाँफने
मरु के हिरण की तरहl
खजूर की मिसाल अलग है
उसके बौनेपन ने तो झुठला दिया है
इस कहावत को कि-
आदमी आसमान से गिरकर
खजूर पर अटकता है कभी!
पैबंद
बिखर के कहीं कोने में
सिसकता है-मेरा जीवन
मेरे सिद्धांत, मेरी धारणाएँ
सब बंद पैबंद से बने
अपने दायरों के बाहर
झाँकती हैं और / सलीब के
खंभे से लटका समय
अपने को बाँधे हुए हैl
नितांत अकेले में साँझ कुछ
पूछकर, अपने नीड़ से
छिपकर देखती है-सारा दृश्य
सवेरे-सवेरे नंगे बदन
बिस्तर पर सिसकना
सूर्य की किरणों का हल्के-से चूमनाl
सब शहर के सैलाब में
बह गए हैं / दूर तक कहीं
नामो-निशान नहीं है-अतीत का
सिर्फ़ वर्तमान की बैसाखियों के अलावा
हाँ, यदा-कदा
कहीं दूर से गूँज उठती हैं
हमारे पूर्वजों की बोलियाँl
लेकिन बदलती इस विषाक्त आँधी में
उन आवाज़ों को पुनः
सुनने के लिए
इन बौने कानों के
पर्दे मैले हो गए हैंl
(कादम्बिनी में यह कविता ‘अतीत’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थीl)
अतीत
मैं पत्र डालूँगा तुम्हें
रोशनी का ज़िक्र भी करूँगा उसमें।
लेकिन हाँ, यदि अख़बार में लिपटा
तुम्हें मेरा चित्र कभी नज़र आए
तो समझना-मैं ठीक-ठाक हूँ।
तुम भी मुझे अवश्य पत्र डालना
उसमें अपना चित्र भी रखना।
मैं कोशिश करूँगा
तुम्हारे चित्र को रंग-बिरंगी दीवारों पर
चिपकाने की ।
मोहल्ले की सभी टूटी-फूटी
खपरैल से ढँकी छतों का हाल तो
अवश्य लिखना
मैं उनकी भी कोशिश करूँगा
तुम्हारे चित्र के साथ चिपकाने की।
भूल न जाना
छतों का हाल भी अवश्य लिखना
यदि संभव हो सके तो
दोनों की साथ खिंची तस्वीर भी भेजना।
तुम्हारा पत्र आया, साथ में तुम्हारा चित्र भी
किंतु खपरैलवाली किसी भी छत का
कोई ज़िक्र नहीं आया
क्योंकि मैं जानता हूँ
उन छतों की जगह अब बन गई होंगी
चमकते बल्बों की रोशनी से लबालब भरी
इमारतें / और संभवतः तुम्हारा और मेरा चित्र
उन्हीं छतों के साथ विलीन हो गया होगा!
(कादम्बिनी में यह ‘खपरैलवाली छत’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी )
संस्मरण
कई बार
मसखरी में
दद्दू अरावली की गंध
उँड़ेल देते थे
हमारे नथुनों में,
बातों-बातों में वे
हमें उसका मिज़ाज भी
बताते थे
और टेसुओं की गंधहीनता की चर्चा
बहुत लंबी कर देते थे।
आज दद्दू नहीं रहे / लेकिन
अरावली की देह से अब भी
सोंधी-सोंधी गंध आ रही है;
उसके स्याह होंठ कई बार
फड़फड़ा उठते हैं
जैसे बुला रहे हैं दद्दू को
फिर से पुरानी यात्रा-कथा का
स्मरण कराने के लिए।
घर की किसी दीवार पर
आँधी में भरभराकर
गिरा हुआ पेड़
होता है उस वृद्ध की तरह
जो ज़िन्दगी के बाकी बचे दिनों को
महज काटने की विवशता झेलता है।
वह चाहकर भी
माँग नहीं पाता है
सूरज से थोड़ी-सी गर्मी
मिट्टी से थोड़ी-सी नमी
और अपने नीचे खड़ी
किसी राह भटकी आकृति से
थोड़ी-सी सहानुभूति
बिलकुल उसी वृद्ध की तरह
जो खाट की पाटी से लगा
चाहकर भी बुला नहीं पाता है
यमराज के किसी दूत को
जो उसकी अन्तिम साँस को
उसकी देह से अलग कर दे।
सड़क के किनारे धराशायी पेड़
और घर के किसी कोने में
चारपाई पर पड़े वृद्ध में
कुछ भी नहीं होता अन्तर
सिवाय इसके कि गिरने के बाद
पेड़ का तना और उसकी शाखाएँ
आ जाती हैं किसी काम / जबकि
वृद्ध के गुज़रने पर
उसके अन्तिम क्रियाकर्म के बाद
एक कील ठोंककर
महज उसकी तस्वीर टाँग देते हैं
घर की किसी दीवार पर।
(17, अगस्त, 1991)
नीम की पत्ती-सा
जी नहीं चाहता है अब किसी दोस्त को
बाज़ुओं में ज़ोर-से कसकर
सीने से लगाने को
न ही मन छटपटाता है अब
किसी के बरसों मिलने के बाद।
बहुत दिनों के बाद मिलनेवाला दोस्त भी
अब लगता है इतिहास की किताब के पन्नों के बीच
दबा हुआ नीम की पत्ती-सा सूखा हुआ संवेदनहीन
या फिर लगता है पासपोर्ट आकार का
श्याम-श्वेत वह चित्र
जिसके होंठों पर मुस्कराहट हो गयी है स्थाई
और ठहाका किसी रंगीन चित्र में ग़ायब हो गया हैl
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