ऋतुओं का महाद्वीप : भारत के छह मौसम और महाद्वीप की सांस्कृतिक स्मृति

दो दिन पहले मैंने एक्स(ट्विटर) पर शरद ऋतु पर लिखा तो वरिष्ठ लेखक-पत्रकार त्रिभुवन जी ने लिखा कि आज से हेमंत ऋतु शुरू हो चुकी है। हम अपने ऋतुओं को भूलते जा रहे हैं। मेरे आग्रह पर त्रिभुवन जी ने ऋतुओं पर यह लेख लिखा जिसमें भारत ही नहीं इस पूरे उप महाद्वीप के ऋतुओं के बारे में विस्तार से चर्चा है। त्रिभुवन जी का एक और विद्वत्तापूर्ण लेख पढ़िए- प्रभात रंजन  

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लेख से पहले एक नोट : यह लेख लेख नहीं है। कुछ साल पहले लिखी गई कई टिप्पणियों का एक घालमेल है। गुरुवार सुबह साहित्यकार प्रभात रंजन ने शरद ऋतु को लेकर एक ट्वीट किया तो याद आया कि शुक्रवार से हेमंत ऋतु शुरू हो रही है। ऐसे में मुझे वे टुकड़े कंप्यूटर की ड्राइव में तलाश करने पड़े और अंतत: सफलता मिली। अब उनका यह जल्दबाजी में किया गया एक अपडेटेड वर्जन आपके लिए -त्रिभुवन

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ऋतुओं का महाद्वीप : भारत के छह मौसम और म्यांमार  से ईरान तक प्रकृति की सांस्कृतिक स्मृति

ऋतु केवल मौसम का परिवर्तन नहीं, मनुष्य, प्रकृति और समय के बीच उस प्राचीन संवाद का नाम है, जिसमें पृथ्वी अपना रंग बदलती है और मनुष्य अपनी संवेदना। भारतीय उपमहाद्वीप ने वर्ष को छह ऋतुओं में बाँटकर केवल कालगणना नहीं की; उसने प्रकृति को पढ़ने, उसके साथ रहने और उसके सौन्दर्य को समझने की एक विलक्षण बौद्धिक परंपरा विकसित की। इसकी प्रतिध्वनियाँ बंगाल, नेपाल और म्यांमार  से लेकर प्राचीन ईरान की सांस्कृतिक स्मृति तक सुनाई देती हैं।

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ऋतुओं का वास्तविक इतिहास और हमारी सांस्कृतिक स्मृति

ऋतुओं का वास्तविक इतिहास समझना हो, तो मौसम विज्ञान के उपकरणों से पहले भाषाओं की स्मृति में उतरना होगा। वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत से लेकर अरबी, फ़ारसी, पंजाबी, कश्मीरी, नेपाली, राजस्थानी, ब्रज, अवधी और उर्दू तक फैली साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत का अध्ययन हमें प्रकृति और मनुष्य के संबंधों का एक अद्भुत संसार दिखाता है। संस्कृत का शायद ही कोई बड़ा कवि हो, जिसने ऋतुओं के बदलते रूपों में मनुष्य के जीवन, प्रेम, विरह और सौंदर्य को न पहचाना हो। ऋग्वेद के उषा-सूक्तों से लेकर कालिदास के ऋतुसंहार और मेघदूत तक, प्रकृति केवल काव्य की पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि उसकी जीवंत नायिका है। ब्रज के सूरदास, बिहारी और केशवदास तथा अवधी के जायसी से लेकर सेनापति और पद्माकर तक, यह संवेदना नए सौंदर्यबोध के साथ विकसित होती है। बारहमासा की परंपरा में तो वर्ष के बारहों महीने मानवीय भावनाओं के बारह अलग-अलग संसार बन जाते हैं।

अरबी के रबीअ, सैफ़, ख़रीफ़ और शिता; फ़ारसी के बहार, ताबेस्तान, पाईज़ और ज़ेमेस्तान; उर्दू के मौसम-ए-गर्मा, मौसम-ए-सरमा, मौसम-ए-बहार और मौसम-ए-ख़िज़ाँ; पंजाबी के सावण-भादों और पोह-माघ तथा नेपाली की ऋतु-संबंधी शब्दावली बताती है कि मौसम केवल धरती पर ही नहीं बदलते, भाषाओं के भीतर भी अपना एक अलग जीवन जीते हैं। प्रत्येक भाषा ने वर्षा की अपनी ध्वनि, ग्रीष्म का अपना ताप, शीत की अपनी अनुभूति और वसंत की अपनी कामना सुरक्षित रखी है।

इसी परंपरा में राजस्थानी के विलक्षण कवि चंद्रसिंह बिरकाळी की ‘बादळी’, ‘बसंत’, ‘डांफर’ और ‘लू’ जैसी काव्यकृतियाँ विशेष महत्त्व रखती हैं। ‘बादळी’ में मरुभूमि पर घिरता बादल केवल आकाश का दृश्य नहीं, बल्कि प्यास से व्याकुल समूचे जीव-जगत की आकांक्षा है। इसके विपरीत, ‘लू’ में तपती धरती, झुलसती वनस्पतियों, पशु-पक्षियों और मनुष्य के जीवन का ऐसा सजीव अनुभव मिलता है, जिसमें राजस्थान का कठोर भूगोल स्वयं कविता बन उठता है। राजस्थानी भाषा में ऋतुओं का इतना सूक्ष्म और विशिष्ट वर्णन मिलता है कि वर्षा के विभिन्न रूपों के लिए चालीस से अधिक शब्द प्रचलित हैं। ये शब्द एक-दूसरे के पर्याय मात्र नहीं, बल्कि वर्षा के अलग-अलग रूपों, स्थितियों और अनुभवों को अभिव्यक्त करते हैं।

यह अकारण नहीं है कि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा जैसे हिंदी के महान कवियों ने ‘बादळी’ की प्रशंसा की थी। बिरकाळी की कविता हमें यह भी याद दिलाती है कि जिस बादल का सौंदर्य किसी जल-समृद्ध प्रदेश के कवि के लिए रोमानी अनुभूति हो सकता है, वही मरुस्थल के कवि के लिए जीवन और मृत्यु के बीच खड़ी एक सम्मोहक संभावना है। वस्तुतः ऋतु-बोध का यही सबसे गहरा सांस्कृतिक सत्य है। मौसम प्रकृति में घटित होते हैं, लेकिन उनका अर्थ मनुष्य के भूगोल, श्रम, स्मृति, भाषा और संवेदना में जन्म लेता है।

अंग्रेज़ी का भारतीय जीवन में प्रभुत्व स्थापित होने से बहुत पहले, इस उपमहाद्वीप की अनेक सांस्कृतिक परंपराओं में वर्ष के छह चेहरे हुआ करते थे। ये केवल मौसमों के नाम नहीं थे, बल्कि पृथ्वी की बदलती देह, प्रकृति की लय और मनुष्य के जीवन में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों की छह अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ थीं। वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर के बीच हमारे पूर्वजों ने वे अंतर पहचाने थे, जिन्हें आधुनिक मनुष्य अपनी सुविधाजनक श्रेणियों में अक्सर खो देता है।

अंग्रेज़ी भाषा जिस ब्रिटेन से आई, वहाँ वसंत, ग्रीष्म, पतझड़ और शीत चार ऋतुओं का प्रचलन था। भारत में औपनिवेशिक शिक्षा के विस्तार और उसके बाद आधुनिक पाठ्यक्रमों के विकास के साथ मौसमों को समझने की एक दूसरी प्रवृत्ति प्रभावशाली हुई। कहीं वर्ष को गर्मी, बरसात और सर्दी के तीन व्यापक खंडों में समझाया जाने लगा, तो कहीं मौसम विज्ञान के आधार पर मौसमों का वर्गीकरण किया जाने लगा। हमारी छह ऋतुओं से जुड़ा सांस्कृतिक और पारिस्थितिक ज्ञान धीरे-धीरे पाठ्यपुस्तकों के हाशिये पर जाने लगा।

यह परिवर्तन केवल छह से तीन या चार तक की गणना का मामला नहीं था; यह प्रकृति को समझने वाली एक विस्तृत संवेदनात्मक शब्दावली के संकुचन का भी प्रश्न था। हालाँकि आज अंग्रेज़ी माध्यम की अनेक पुस्तकों में भी छह भारतीय ऋतुओं का उल्लेख मिलता है, फिर भी विद्यालयी शिक्षा में स्थानीय ऋतु-अनुभव और वैज्ञानिक मौसम-वर्गीकरण के बीच पर्याप्त संवाद का अभाव दिखाई देता है।

मैं 1980 से इस विषय पर ख़बरें और टिप्पणियाँ करता रहा हूँ। तब भी मेरा प्रश्न यही था और आज भी है: क्या आधुनिक ज्ञान की भाषा अपनाने के लिए अपनी सभ्यता की पुरानी ज्ञान-परंपराओं को विस्मृत करना अनिवार्य है? विज्ञान ने हमें मौसम को मापने के अधिक सटीक उपकरण दिए हैं, लेकिन क्या इसके साथ हमें उन शब्दों, अनुभूतियों और पारिस्थितिक अंतरों को भी खो देना चाहिए, जिन्हें हमारे पूर्वजों ने सहस्राब्दियों के अनुभव से अर्जित किया था? आधुनिकता का अर्थ ज्ञान का विस्तार होना चाहिए, उसकी स्मृति का संकुचन नहीं।

मनुष्य ने समय की खोज घड़ी बनाकर नहीं की थी। उसने पहली बार समय को वृक्षों पर आती नई पत्तियों में देखा। फूलों में महसूस किया। उसका प्रभाव अपनी देह के भीतर उतरता देखा। नदी के जल को उतरते हुए, पक्षियों को लौटते हुए, मिट्टी से उठती पहली वर्षा की गंध में या एकाएक शीतल होती गई हवा के स्पर्श में अनुभव किया। भारत हमेशा से दो परंपराओं में रहा है। एक ज्ञान परंपरा का भारत और दूसरा अज्ञान परंपरा का। अज्ञान परंपरा भी अपने अापको ज्ञान परंपरा ही बताती है। अज्ञान के अँधेरे के गहन आभ्यंतर में निरंतर झरते तिमिर की मनोहरता आनंद लेता अज्ञान कुल भारतीय विज्ञान की शिक्षाओं को अविज्ञान की हदों तक लेता चला गया और अर्थ के अनर्थ करता रहा, लेकिन साहित्य में वर्णित मौसमों ने ज्ञान, सौंदर्य, प्रकृति और संंवेदना को स्वप्न सा विस्तार दिया। यह वेदों की ऋचाओं से कालिदास के मेघदूत तक जिस तरह अविरल बरसता है, एक अकथ कथा है।

आज हमारी कलाइयाें पर घड़ियां बंधी रहती हैं। लेकिन यह देखना ज़रूरी है कि एक मनुष्य की छवि को प्रियतर बना देने वाली घड़ी समय को मापती है; लेकिन ऋतु उसे अर्थ देती है।समय का गणित और समय का सौन्दर्य दो भिन्न उपलब्धियाँ हैं। एक बताता है कि कितने दिन बीत गए; दूसरा यह कि उन दिनों में संसार कितना बदल गया।भारतीय सभ्यता की एक विशिष्ट उपलब्धि यह है कि उसने वर्ष को केवल तापमान, वर्षा अथवा सूर्य की गति से नहीं समझा। उसने समय के भीतर प्रकृति के छह अलग-अलग स्वभाव पहचाने : वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर। इस साल शरद कल यानी गुरुवार को समाप्त हो गया और आज यानी 23 अक्टूबर 2026 से हेमंत शुरू हो गया। इन छह ऋतुओं में पृथ्वी छह बार अपनी देह और अपना व्यवहार बदलती है।

वसंत में प्रकृति की कोमलता है, ग्रीष्म में उसका ताप और कठोरता, वर्षा में उसका उन्मेष, शरद में उसका निर्मल सौन्दर्य, हेमंत में उसकी संकुचित होती ऊष्मा और शिशिर में उसका संयमित, निर्वस्त्र अस्तित्व।यही वह ऋतुचक्र है, जिसमें मनुष्य का जीवन, कृषि, भोजन, वस्त्र, पर्व, प्रेम, संगीत और साहित्य अपनी-अपनी जगह प्राप्त करते हैं। हम कवींद्र रवींद्र को पढ़ें या हजारीप्रसाद द्विवेदी को, निराला को या वेदों की ऋचाओं को तो वह ज्ञनेंद्रपति के ‘गंगाबीती’ जैसे संग्रह में ‘बस, हवा का रुख बता रहा था, हमारी बीड़ियों का धुआँ और वह हवारोही गीत हमारी प्राणवायु बनता हुआ’ तक पहुँचता है।

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लेकिन भारतीय ऋतु-बोध को समझने के लिए एक सावधानी आवश्यक है। छह ऋतुओं की व्यवस्था कोई ऐसा अपरिवर्तनीय प्राकृतिक विधान नहीं है जिसे समूचे एशिया ने एक ही तरह अपनाया हो। यह एक दीर्घ सांस्कृतिक और पर्यावरणीय अनुभव से विकसित वर्गीकरण है।म्यांमार  से ईरान तक हमें समानताओं के साथ भिन्नताएं भी मिलती हैं। सभ्यताओं की वास्तविक निकटता उनकी एकरूपता में नहीं, प्रकृति को समझने की उनकी अलग-अलग विधियों के संवाद में रहती है।

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ईसा से आठ सदी पहले बौधायन नाम का एक शिक्षक यज्ञवेदियों के निर्माण करने वाले शिल्पकारों से समझकर शुल्व सूत्र विकसित करके रेखागणित का ईजाद करते हैं। लेकिन इसी ज्ञान परंपरा में एक अज्ञान परंपरा ऐसी मिलती है कि वह रेखागणित को वापस यज्ञवेदी पर ले जाकर शुल्वसूत्र के समग्र ज्ञान को जला देती है। ऐसे हालात का वर्णन कुमार अंबुज ने ‘थलचर’ में कहीं किया है, ‘और अपार ठंड भी न पड़ती हो। एक कस्बा, जिसमें अनंत गलियां हों और सुनसान रात। यह यूटोपिया है। नॉस्टेल्जिया भी है। जो अभी नहीं है, उसके प्रति रोमांटिक ख़याल है। लेकिन है। एक कस्बे में जीवन की अनंत छवियां, आसानियां और मुश्किलें एक किलोमीटर की परिधि में ही दिख जाती हैं।’ हम एक किलोमीटर की परिधि में आज भी ‘बीड़ियों का धुआँ’ नहीं, किसी यज्ञकुंड में धू-धू जलते शुल्वशास्त्र को देख सकते हैं। शुल्व यानी रस्सी। आज का रेखागणित उसी रस्सी-शास्त्र का विस्तार है।

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मौसमों का मसला ऋतु तक ही नहीं, ऋत तक भी जाता है। भारतीय चिंतन में समय की दार्शनिकता भी बताता है। इसीलिए भारतीय ऋतु-बोध की जड़ें वैदिक साहित्य तक मानी जाती हैं। संस्कृत के ‘ऋतु’ और ‘ऋत’ के बीच एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक तथा भाषिक संबंध है। ऋत उस विश्वव्यापी व्यवस्था का बोध कराता है जिसके अंतर्गत प्रकृति के कार्य एक नियमबद्ध क्रम में घटित होते हैं। ऋतु उस व्यवस्था की कालगत अभिव्यक्ति है। प्रकृति का अपना उपयुक्त समय।अर्थात् संसार केवल घटनाओं का संग्रह नहीं; उनके घटित होने का एक क्रम भी है। बीज का अंकुरित होना, फूल का खिलना, फल का पकना और वृक्ष का पत्ते गिराना। इन सबका अपना समय है। प्रकृति की यह लय ही ऋतु की अवधारणा के मूल में है।

प्राचीन वैदिक साहित्य में ऋतुओं की संख्या हमेशा छह नहीं मिलती। कहीं तीन, कहीं पाँच और कहीं छह ऋतुओं की गणना दिखाई देती है। इससे एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है। ऋतु-विभाजन किसी एक क्षण में निर्मित सिद्धांत नहीं था। वह भूगोल, कृषि, जलवायु और सामाजिक अनुभव के विस्तार के साथ विकसित हुआ। यानी लोग जाने कहाँ कहाँ से आ रहे थे और भारत में बस रहे थे और अपने अनुभवों के अनुसार ज्ञान को गीतों में ढाल रहे थे।

प्रारम्भिक वैदिक समाज के लिए वर्ष का व्यापक मौसमी विभाजन पर्याप्त रहा। लेकिन जैसे-जैसे कृषि, बस्तियों और विविध भौगोलिक क्षेत्रों से उसका परिचय बढ़ा, मौसमों के अधिक सूक्ष्म अंतर पहचानने की आवश्यकता भी बढ़ी। उत्तरवर्ती वैदिक और शास्त्रीय परंपराओं में बारह महीनों के साथ छह ऋतुओं का संबंध अधिक सुव्यवस्थित होता गया।चैत्र और वैशाख का वसंत, ज्येष्ठ और आषाढ़ का ग्रीष्म, श्रावण और भाद्रपद की वर्षा, आश्विन और कार्तिक का शरद, मार्गशीर्ष और पौष का हेमंत तथा माघ और फाल्गुन का शिशिर।यह परंपरागत विन्यास है। इनके ग्रेगोरियन महीनों से संबंध क्षेत्र और पंचांग के अनुसार कुछ बदल सकते हैं। भारतीय चिंतन ने उन संक्रमणों को भी पहचाना जिन्हें सामान्यतः एक मौसम से दूसरे मौसम में प्रवेश का अस्पष्ट अंतराल मान लिया जाता है। मसलन हेमंत और शिशिर। दोनों शीत से संबंधित हैं, लेकिन भारतीय अनुभव ने उनमें अंतर किया। शरद् वास्तव में सर्दी नहीं, वह वर्षा और हेमंत के बीच का सेतु है। हेमंत शीत के आगमन और विस्तार का समय है; शिशिर उसकी अधिक गहरी, प्रायः कठोर अनुभूति का।इस विभाजन के पीछे एक सूक्ष्म पर्यावरणीय चेतना है। प्रकृति अचानक नहीं बदलती। उसके परिवर्तन की प्रस्तावना होती है, उसका उत्कर्ष होता है और फिर उसका अवसान।भारतीय ऋतुचक्र वस्तुतः परिवर्तन की इन्हीं छह अवस्थाओं का सांस्कृतिक छंद शास्त्र है।

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छह ऋतुएँ वास्तव में प्रकृति की छह अलग संवेदनाएँ हैं।वसंत को ऋतुराज कहने के पीछे केवल पुष्पों का सौन्दर्य नहीं है। यह उस क्षण का उत्सव है जब शीत की जड़ता से मुक्त होती प्रकृति अपने भीतर फिर से जीवन की सक्रियता अनुभव करती है।लेकिन भारतीय वसंत यूरोपीय वसंत का अनुवाद नहीं है। उसका भूगोल और उसकी वनस्पति अलग है। कहीं पलाश का दहकना है, कहीं आम्र-मंजरियों की गंध, कहीं सरसों के खेतों का पीताभ आँचल और कहीं नई पत्तियों के बीच से छनती धूप।वसंत में प्रकृति को देखकर मनुष्य अपने भीतर भी एक नूतनता का अनुभव करता है।

ग्रीष्म इसके विपरीत प्रकृति की उदारता का नहीं, उसकी कठोरता का अनुभव है। पानी की तलाश, तपती हुई धरती, लंबी दोपहरें और वृक्षों की छाया का अचानक बहुत मूल्यवान हो उठना।भारतीय काव्य ने ग्रीष्म को केवल कष्ट के रूप में नहीं देखा। उसमें रात की शीतलता, जल का सुख, पुष्पों की सुगंध और मानवीय स्पर्श की एक दूसरी तीव्रता भी पहचानी। मैं

कुछ वर्ष पहले पश्चिमी राजस्थान में लू के आगमन पर ‘दैनिक भास्कर’ के लिए दस दिनों तक रिपोर्टिंग करते हुए बाड़मेर और जैसलमेर के गाँवों में मुझे ग्रीष्म की एक ऐसी रहस्यमय भाषा सुनने को मिली, जिसने मुझे अवाक् कर दिया। पशुपालकों ने बताया कि वर्षा आने से कई सप्ताह पहले ही गायें और ऊँट सूखी वनस्पतियों से मुँह मोड़ने लगते हैं। लोग कहते हैं, ‘इन्हें लीलो सूझ रहा है।’ राजस्थानी में ‘लीलो’ अर्थात् हरा। धरती पर अभी हरियाली का एक तिनका भी नहीं उगा होता, लेकिन मानो इन पशुओं की चेतना में पूरा सावन उतर आया हो।

गायें, ऊँट, भेड़ें और बकरियाँ उन दिनों बार-बार मुँह आकाश की ओर उठाकर हवा में कुछ सूँघती रहती हैं। यह लोकानुभव वैज्ञानिक परीक्षण का विषय अवश्य है, लेकिन इसकी काव्यात्मकता अद्भुत है। मनुष्य जिस वर्षा की प्रतीक्षा आकाश की ओर देखकर करता है, उसका पूर्वाभास पशुओं को हवा की गंध में मिलने लगता है। क्या प्रकृति की कोई ऐसी भाषा भी है, जो हमारी इंद्रियों की सामान्य पहुँच से परे है? हमारे मौसम वैज्ञानिकों और भूगोल शिक्षकों ने जाने क्यों इस तरफ कभी विस्तृत अध्ययन की कोशिश नहीं की।

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वर्षा इस पूरे ऋतुचक्र का सबसे नाटकीय मोड़ है।बादलों का आना केवल आकाश की घटना नहीं। वह किसान की अर्थव्यवस्था, पशुओं के जीवन, नदियों के प्रवाह और मनुष्य की कल्पना में एक साथ परिवर्तन लाता है।वर्षा में पृथ्वी की प्यास बुझती है, लेकिन उसी के साथ बाढ़ का भय भी पैदा होता है। वही जल जो जीवन का आधार है, विनाश का कारण भी बनता है। इस प्राकृतिक वरदान को न समझने के कारण आज का कथित विकास मनुष्य के लिए एक आपदा का निर्माण करता है। ऐसा विकास सच में विध्वंस है। जिस आदिम मनुष्य ने नदियों आैर झरनों का संवर्धन होने दिया, आधुनिक मनुष्य उन्हें विनाश के कगार पर ले आया है।

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शरद में वर्षा का उद्वेग शांत होता है। आकाश अपने विस्तार में अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगता है। प्रकाश का स्वरूप बदलता है। जल की सतह पर प्रतिबिंब स्थिर होने लगते हैं। हेमंत का सौन्दर्य अधिक घरेलू है। सुबह की ठंडक, बदलता भोजन, धूप की उपयोगिता, फसलों का पकना और रात का कुछ अधिक लंबा महसूस होना।पंजाबी लोकगीतों में आज भी चैत की धूप की तुलना रूपसी की देह से की जाती है।  शिशिर इन परिवर्तनों को उनकी तीक्ष्णता तक पहुँचाता है।

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ऋतुओं का जिक्र आता है तो कालिदास सहसा स्मरण हो आते हैं। उन्होंने ऋतुओं को काव्य की नायिकाएँ बना दिया था। भारतीय ऋतु-बोध का सबसे विलक्षण साहित्यिक प्रतिफल ऋतुसंहार है,जो कालिदास की अप्रतिम रचना है। यह केवल प्रकृति-वर्णन का काव्य नहीं। इसमें प्रकृति और मनुष्य की कामनाएँ एक-दूसरे से संवाद करती हैं।इसकी संरचना अत्यंत रोचक है। कवि छह ऋतुओं का वर्णन वसंत से नहीं, ग्रीष्म से आरम्भ करता है और वसंत पर समाप्त करता है।अर्थात् काव्य की यात्रा ताप और कठिनाई से सौन्दर्य और पुनरुत्थान तक पहुँचती है।ग्रीष्म में सूर्य प्रचंड है तो चंद्रमा वांछनीय हो उठता है। वर्षा में बादलों का घिरना प्रेम और विरह दोनों का भाव बदल देता है। शरद की निर्मलता में दृष्टि का सौन्दर्य है, जबकि शिशिर मनुष्य को शरीर की ऊष्मा की ओर लौटाता है।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण सौन्दर्यशास्त्रीय प्रश्न उपस्थित होता है।क्या मनुष्य अपनी भावनाओं को प्रकृति पर आरोपित करता है अथवा प्रकृति सचमुच उसकी भावनाओं को बदलती है?कालिदास के काव्य में दोनों प्रक्रियाएँ एक साथ चलती हैं।मेघ केवल जल नहीं लाते, वे स्मृति भी लाते हैं। हवा केवल तापमान नहीं बदलती, वह अंतरंगता की अनुभूति बदलती है। वर्षा की रात्रि और ग्रीष्म की रात्रि में प्रेम का स्वर एक जैसा नहीं रहता।मेघदूत में आषाढ़ के मेघ का संदेशवाहक बनना इसी व्यापक भारतीय संवेदना का विस्तार है।प्रेम में प्रकृति का प्रवेश यहाँ अलंकार मात्र नहीं है। वह मनुष्य के अस्तित्व की उस स्थिति का प्रमाण है जिसमें बाहरी संसार और भीतरी जीवन परस्पर अविभाज्य हैं। संस्कृत काव्य का अधिकांश ऋतु-वर्णन पुरुष कवियों की दृष्टि से है। उसमें स्त्री का शरीर कई बार ऋतु के सौन्दर्य का माध्यम बनता है।आज इस परंपरा का पुनर्पाठ करते हुए स्त्री को केवल ऋतु की उपमा बनने से मुक्त कर उसकी अपनी दृष्टि, अपनी इच्छा और अपने श्रम को भी प्रकृति के इस विशाल आख्यान में स्थान देना होगा।

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मुझे एक तमिल शिक्षक बताया करते थे कि भारतीय ऋतु-बोध का दूसरा विराट संसार उनके यहाँ है। छह ऋतुओं की अवधारणा केवल संस्कृत साहित्य की उपलब्धि नहीं है। प्राचीन तमिल परंपरा में वर्ष को छह बड़े कालखंडों पेरुम्पोझुतु में बाँटने की अपनी व्यवस्था रही है। यह विभाजन भारतीय बहुलता को समझने के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।

तमिल ऋतुचक्र के छह रूप हैं इलवेनिल, मुदुवेनिल, कार, कूदिर, मुनपनि और पिनपनि। इलवेनिल अपेक्षाकृत कोमल गर्मी का समय है, जबकि मुदुवेनिल परिपक्व अथवा तीव्र ग्रीष्म का। कार वर्षा और मेघों का काल है। कूदिर ठंडक का और मुनपनि तथा पिनपनि ओस और शीत की अलग-अलग अवस्थाओं का संकेत करते हैं। यहाँ प्रकृति के वर्गीकरण का आधार गंगा के मैदानों के शास्त्रीय विन्यास से कुछ अलग दिखाई देता है।तमिल समाज ने गर्मी के भीतर दो अलग अवस्थाएँ देखीं। उसने ओस के आगमन और उसके बाद के काल में भी अंतर पहचाना।और भी महत्त्वपूर्ण यह कि प्राचीन तमिल काव्य में भू-दृश्य तथा मानवीय भावना का एक असाधारण संबंध निर्मित हुआ।

प्रख्यात पत्रकार मधुकर उपाध्याय की पुस्तक ‘खिलो कुरिंजी’ पढ़ते हैं तो उसका एक छोटा-सा लेख हमें बहुत दूर तक ले जाता है। कुरिंजी का पर्वतीय संसार, मुल्लै के वन और चरागाह, मरुतम की कृषि भूमि, नेयदल का समुद्री तट और पालै का शुष्क भू-दृश्यकेवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, प्रेम और जीवन की अलग-अलग परिस्थितियों के भी सांस्कृतिक संकेत हैं।इससे हमें समझना चाहिए कि भारतीय ऋतु-बोध किसी एक ग्रंथ अथवा एक भाषिक परंपरा का उपनिवेश नहीं है। यह अनेक भौगोलिक अनुभवों और भाषाई सभ्यताओं का संयुक्त, किंतु बहुवचनात्मक विकास है।

भारतीयता का सौन्दर्य उसकी छह ऋतुओं में जितना है, उतना ही इस तथ्य में भी है कि अलग-अलग भारतीय समुदाय उन्हें अलग तरह से अनुभव, ज्ञानानुभूत और अभिव्यक्त करते आए हैं।

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ऋतुओं पर बात करें तो न बंगाल को भूल सकते और न ही नेपाल और कश्मीर को। न उत्तराखंड और न हिमाचल को। जहाँ छह ऋतुओं की स्मृति आज भी जीवित है। भारतीय उपमहाद्वीप का पूर्वी संसार छह ऋतुओं के सांस्कृतिक महत्व को विशेष स्पष्टता से सामने लाता है। बांग्लादेश की सांस्कृतिक पहचान में छह ऋतुओं का उल्लेख इतना गहरा है कि उसे षड्ऋतु का देश कहा जाता है। बांग्ला में ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, हेमंत, शीत और वसंतवर्ष के छह पारंपरिक विभाग हैं।

रवींद्रनाथ ठाकुर के संगीत और साहित्य में ऋतुओं की उपस्थिति इस सांस्कृतिक स्मृति को असाधारण विस्तार देती है। वर्षा केवल बरसने का नाम नहीं रहती और वसंत केवल खिलने का। वे मनुष्य की प्रतीक्षा, आनंद, विषाद और पुनरुत्थान की आवाज़ें बन जाते हैं। नेपाल में भी छह ऋतुओं की परंपरागत गणना जीवित है बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर। हिमालयी भूगोल इन ऋतुओं को मैदानों से अलग रूप देता है।कश्मीर का अपना छह ऋतुओं वाला लोक-वर्गीकरण हैसोंथ, ग्रिश्म, वहरात, हरुद, वंध और शिशुर। यहाँ हरुद का अर्थ मात्र शरद नहीं है। वह चिनार के बदलते रंगों, फलोत्पादन, फसल और पहाड़ी जीवन की एक विशेष अवस्था से जुड़ा हुआ है।

कश्मीर में ऋतु का रंग आँख से अधिक स्मृति में बसता है। चिनार की लाल होती पत्तियाँ एक दृश्य हैं, लेकिन उनका झरना समय के बीतने का बोध भी है। इसलिए ऋतु की वास्तविक इकाई केवल महीना नहीं होती। उसमें एक समूचा स्थानीय भूगोल और उस भूगोल में रहने वाले मनुष्यों का इतिहास समाहित होता है।

ऋतुएँ हमें इतिहास का एक ऐसा सत्य भी बताती हैं, जिसके सामने राजनीतिक भूगोल की सारी रेखाएँ छोटी पड़ जाती हैं। सिरिल रेडक्लिफ़ ने भारतीय उपमहाद्वीप के वक्ष पर जो विभाजन-रेखा खींची, उसका निर्णय 17 अगस्त 1947 को सार्वजनिक हुआ। लेकिन प्रकृति ने उस रेखा को कभी अपनी स्मृति में दर्ज नहीं किया।

पंजाब आज भी अपनी सांस्कृतिक चेतना में ‘चढ़दा पंजाब’ और ‘लहँदा पंजाब’ के रूप में जीवित है। एक ओर उगते सूर्य का पंजाब, दूसरी ओर ढलते सूर्य का। कश्मीर में भी नियंत्रण रेखा के दोनों ओर की साझा स्मृतियों में इस पार के लिए ‘यिपोर’ और उस पार के लिए ‘अपोर’ जैसे आत्मीय शब्द प्रचलित हैं। वहाँ राजनीतिक विभाजन की अपनी अलग ऐतिहासिक कहानी है, लेकिन चिनार का पतझड़, केसर का खिलना और हिमालय से उतरती शीतल हवाएँ किसी सरकारी नक़्शे की आज्ञा नहीं मानतीं।

पंजाब के दोनों ओर सावन एक ही सांस्कृतिक स्मृति में बरसता है। रावी और चिनाब के जल में किसी राष्ट्र की नागरिकता नहीं बहती।

बंगाल तो इस अविभाज्य सांस्कृतिक भूगोल का और भी विस्मयकारी उदाहरण है। ज़रा सोचिए, भारत के पूर्वी छोर पर स्थित होने के बावजूद बंगाल आज तक ‘पश्चिम बंगाल’ क्यों कहलाता है? इसलिए कि उसके नाम में प्रयुक्त ‘पश्चिम’ भारत के नक़्शे की दिशा नहीं, बल्कि अविभाजित बंगाल की ऐतिहासिक स्मृति को अभिव्यक्त करता है। सन् 1947 में विभाजन ने जिस पूर्वी बंगाल को उससे अलग किया, वह पहले पूर्वी पाकिस्तान कहलाया और फिर 1971 में स्वतंत्र बांग्लादेश बन गया।

लेकिन बंगाल के दोनों ओर वर्षा आज भी ‘बर्षा’, शरद ‘शरत्’ और वसंत ‘बोशोंतो’ की सांस्कृतिक अनुभूतियों में जीवित हैं। रवींद्रनाथ के ऋतुगीतों को किसी सीमा चौकी पर पासपोर्ट नहीं दिखाना पड़ता। पद्मा और गंगा के दोनों ओर काश के फूल खिलते हैं, आषाढ़ के मेघ उमड़ते हैं और शरद का आकाश अपनी निर्मलता बिखेरता है।

इस तरह भारत के पूर्व में स्थित ‘पश्चिम बंगाल’ का नाम ही एक अद्भुत ऐतिहासिक रूपक बन जाता है। राजनीति ने जिस भूगोल को दो देशों में बाँट दिया, उसकी भाषाएँ, ऋतुएँ और सांस्कृतिक स्मृतियाँ आज भी एक-दूसरे को पहचानती हैं। मनुष्य ने धरती को बाँट लिया, लेकिन ऋतुओं ने विभाजन स्वीकार नहीं किया। इतिहास ने सरहदें खींचीं; प्रकृति आज भी उनके आर-पार अपना प्राचीन, अविभाजित संसार रचती है।

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भारतीय उपमहाद्वीप में ऋतुओं का संसार म्यांमार से ईरान तक करीब-करीब एक जैसा है। म्यांमार धरती पर बौद्ध परंपराओं, पंचांग, धार्मिक उत्सव और कृषि-जीवन के अनेक रूप इस संबंध की स्मृतियाँ हैं। बर्मी (म्यांमार) भाषा की वर्णमाला को देखकर हैरानी होती है कि उसके अनेक वर्णों की ध्वनियाँ हमारी प्राचीन भारतीय वर्णमाला से बहुत ही मिलती हैं। बर्मी लिपि के अक्षरों की बनावट भले ही देवनागरी से अलग हो, लेकिन उनकी अनेक ध्वनियों और उनके वर्गीकरण में एक साझा ऐतिहासिक परंपरा की झलक दिखाई देती है।

दिलचस्प बात यह है कि समानता के ऐसे सूत्र केवल भाषा और लिपि में ही नहीं, प्रकृति और ऋतुचक्र में भी दिखाई देते हैं। अक्षरों की आकृतियाँ अलग होने के बावजूद अनेक ध्वनियों में समानता और भौगोलिक भिन्नताओं के बावजूद ऋतुचक्र के कुछ साझा अनुभव हमें भारत और म्यांमार के बीच ऐतिहासिक सांस्कृतिक संपर्कों तथा प्रकृति से जुड़े समान जीवन-अनुभवों की याद दिलाते हैं। मानो लिपि और प्रकृति, दोनों अपने-अपने ढंग से इस साझा विरासत की कहानी कह रहे हों।

भारतीय उपमहाद्वीप के सुदूर पश्चिम में ईरान की स्थिति और भी रोचक है। आधुनिक ईरानी कैलेंडर वर्ष को चार प्रमुख ऋतुओं में विभाजित करता है।  बहार, ताबेस्तान, पाईज़ और ज़ेमेस्तान। लेकिन प्राचीन ईरानी, विशेषतः पारसी या ज़रथुश्त्री धार्मिक परंपरा में छह मौसमी कालखंडों से संबंधित उत्सवों की एक व्यवस्था है। इन्हें गाहम्बार अथवा गाहानबार कहा जाता है। ईरानी धर्म और इतिहास की विदुषी मैरी बॉयस के अध्ययन के अनुसार ये छह पर्व प्राचीन ज़रथुश्त्री वर्ष के छह मौसमी खंडों की समाप्ति से जुड़े थे। इनके अवेस्ताई नामों में मैद्योज़रेमय वसंत का मध्य; मैद्योशेम ग्रीष्म का मध्य; पैतिशह्य अनाज समेटने का समय; अयाथ्रिम पशुओं के लौटने या आश्रय में आने से जुड़ा अवसर; मैद्यैर्य वर्ष का मध्य तथा हमसपथ्मेदय शामिल हैं। अंतिम नाम का निश्चित अर्थ विद्वानों में निर्विवाद नहीं है। ये पर्व कृषि, पशुपालन, खगोलीय समय और सामुदायिक जीवन के विभिन्न प्रसंगों से संबंधित थे।

विशेषतः आश्चर्यजनक यह है कि इन छह पर्वों का संबंध ज़रथुश्त्री सृष्टि-विचार की छह अवस्थाओं से भी स्थापित हुआ। आकाश, जल, पृथ्वी, वनस्पति, पशु और मनुष्य का सृजन धार्मिक उत्सवों के अर्थ-संसार में प्रवेश करता है।

भारतीय वैदिक संसार और प्राचीन ईरानी धार्मिक संस्कृति के बीच भाषिक तथा वैचारिक संबंधों का एक गहरा इतिहास है। अवेस्ताई रतु और संस्कृत ऋतु की तुलना भी इसी भारत-ईरानी अध्ययन का विषय है। प्राचीन भारत और ईरान दोनों ने समय को प्रकृति के ऐसे आवर्ती अवसरों में समझने का प्रयास किया जिनसे कृषि, उत्सव और सामुदायिक जीवन का संचालन होता था।

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ऋतुएँ भौगोलिक या राष्ट्र-राज्यों की हरबंदियों को ही नामंजूर नहीं करतीं, भाषाओं की सरहदें भी पार करती हैं। भारतीय ऋतु-बोध की सबसे दिलचस्प यात्राओं में एक यात्रा भाषा के भीतर घटित हुई है। हिन्दी-उर्दू का “मौसम’ अरबी के मौसिम से संबंधित है। “ऋतु’ संस्कृत की विरासत है और “रुत’ उत्तर भारतीय बोलियों तथा उर्दू काव्य के भाव-संसार का अत्यंत आत्मीय शब्द है। फ़ारसी-उर्दू अभिव्यक्ति में हमें मौसम-ए-गर्मा, मौसम-ए-सरमा, मौसम-ए-बहारां, मौसम-ए-सरदां, मौसम-ए-ख़िज़ाँ और मौसम-ए-बाराँ जैसे प्रयोग मिलते हैं। भारतीय शरद में निर्मल आकाश और शीतल प्रकाश का सौन्दर्य प्रबल है, जबकि फ़ारसी-उर्दू काव्य की ख़िज़ाँ में पत्तों के झरने, सौन्दर्य के क्षय और प्रेम की अस्थिरता का रूपक अधिक प्रचलित रहा है। इसी तरह बहार महज़ वसंत नहीं। वह प्रेम, यौवन, उम्मीद और नवीकरण की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। पाकिस्तान में आज भी “बसंत’ बहुत लंबे समय तक मनाया जाता है, जबकि हमारे यहाँ बिलकुल नहीं। हमने उसे बस वसंत पंचमी और सरस्वती पूजा तक सीमित कर दिया है, जबकि वसंत पंचमी वसंत में नहीं, शिशिर में आती है। जैसे इस साल (2026 में) वसंत पंचमी 23 जनवरी को थी, लेकिन वसंत ऋतु शुरू हुई थी 20 मार्च से।

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ऋतुओं को लेकर भारतीय संगीत हमारी बहुत सहायता करता है। हिन्दुस्तानी संगीत में राग बसंत, राग बहार और दोनों के संयोग से निर्मित बसंत-बहार की परंपरा भारतीय तथा फ़ारसी भाषिक संसारों की एक अद्भुत कलात्मक संगत है। बसंत संस्कृत की स्मृति लेकर आता है; बहार फ़ारसी की और इस तरह दोनों एक ही संगीतात्मक अनुभव में प्रवेश करते हैं।

मध्यकालीन भारतीय संगीतशास्त्र में भी छह ऋतुओं और छह प्रमुख रागों के बीच संबंध हैं। अलग-अलग ग्रंथों में इनके वर्गीकरण भिन्न हैं, लेकिन एक प्रसिद्ध व्यवस्था में हिंडोल को वसंत, दीपक को ग्रीष्म, मेघ को वर्षा, भैरव को शरद, श्री को हेमंत और मालकौंस को शिशिर से जोड़ा जाता है। यह आधुनिक संगीत-प्रस्तुतियों के लिए अनिवार्य अथवा सार्वभौमिक नियम नहीं, भारतीय संगीतशास्त्र के ऐतिहासिक ऋतु-वर्गीकरण का एक उदाहरण है। इसका वास्तविक सौन्दर्य उस विचार में है जिसके अनुसार प्रकृति के बदलने के साथ मनुष्य के सुनने की संवेदना भी बदलती है। वर्षा में मेघ और मल्हार का आकर्षण सांगीतिक परंपरा नहीं; उसमें बादलों, गर्जन, विरह और प्रत्याशा की एक दीर्घ सांस्कृतिक स्मृति सक्रिय रहती है।

मेरे बचपन से आज तक निरंतर सुने जाने वाले दो शब्द हैं छहमासी और बारहमासी। मैं हमेशा भाग्यशाली समझा गया, क्योंकि राजस्थान के गंगानगर जिले में मेरा गांव “चक 25एमएल’ (हमारे यहाँ सभी गांवों के नाम ऐसे ही हैं। चक एक बीबी, दो बीबी, चार बीबी, पांच केके, 36 एलएनपी, 17 जेड, 36 आरबी, चक सात वाई, नौ टीके, सात जेड, सात सीसी, 11 ईईए, 12 एचएच आदि) बारहमासी नहर का चक था और बहुत से लोगों के गांव और खेत छहमासी नहर के मोघों पर। यानी छह मासी नहर में छह माह ही पानी आता था और बारहमासी में कभी बंद नहीं होता था। मुझे लगता है कि छहमासी और बारहमासी ऋतुओं की सबसे लोकतांत्रिक कविता है। बारहमासी गंगनहर के किनारे मुश्की घोड़े पर बचपन में कालिदास को गाते पिता बताया करते थे, कालिदास ने ऋतुओं को संस्कृत काव्य की कलात्मक ऊँचाइयाँ दीं तो लोकसाहित्य ने उन्हें सामान्य मनुष्य के जीवन में उतारा। इसी से उत्तर भारत की बारहमासा परंपरा इसका अनुपम उदाहरण है।

बारहमासा में वर्ष के बारह महीनों के सहारे प्रेम, विरह, कृषि, श्रम, उत्सव और प्रतीक्षा का संसार रचा जाता है। यह छह ऋतुओं का ही दूसरा नाम नहीं है; उसका अपना साहित्यिक इतिहास और स्वतंत्र लोकगत संरचना है। लेकिन ऋतुचक्र और बारहमासा का अंतर्संबंध अत्यंत गहरा है। एक अकेली स्त्री का प्रिय की प्रतीक्षा करना बारहमासा में केवल प्रेम का प्रसंग नहीं रह जाता। वर्षा आ गई, धान रोपा जा रहा है, आकाश बादलों से भर गया है, दीपावली बीत गई, पौष की रातें लंबी हो गई हैं, लेकिन प्रिय नहीं लौटा। यहाँ समय कैलेंडर से नहीं, अनुपस्थिति से मापा जाता है।

मलिक मुहम्मद जायसी का साहित्य, ब्रज और अवधी की परंपराएँ तथा विभिन्न भारतीय भाषाओं के लोकगीत इस अनुभव को अलग-अलग रूप देते हैं। इस साहित्य में ऋतुएँ राजाओं की नहीं, प्रायः साधारण जनों की दुनिया से आती हैं। खेतों, तालाबों, कच्चे घरों, आँगनों और प्रतीक्षा करती स्त्रियों से। फिर भी यहाँ एक स्त्रीवादी प्रश्न हमारा सामना करता है। ऋतु का अनुभव केवल विरहिणी की प्रतीक्षा तक सीमित है? नहीं। एक ग्रामीण स्त्री के लिए ग्रीष्म पानी लाने की दूरी बढ़ा सकता है। वर्षा घरेलू श्रम और खेती की कठिनाइयाँ बढ़ा सकती है। शीत ईंधन जुटाने की आवश्यकता पैदा कर सकता है। मेरे भीतर अपनी माँ को शीत, ग्रीष्म और वर्षा में तो अथक मेहनत करते देखने के बिंब हैं ही, कड़ाके की ठंड में तड़ातड़ बरसते आसमान के तले मुझे कंधे पर बिठाकर दौड़ने के स्मृतिपिंड भी कुछ विस्मृत ऋतु की गीतों की याद दिला जाते हैं।

ऋतु का एक सौन्दर्यशास्त्र है, लेकिन उसकी एक श्रम-अर्थव्यवस्था भी है। जब हम वर्षा को रोमानी दृष्टि से देखते हैं, तब हमें उस स्त्री को नहीं भूलना चाहिए जिसके घर में पानी भर गया है। और जब हम वसंत को यौवन का उत्सव कहते हैं, तब यह भी देखना चाहिए कि प्रकृति के इस उल्लास में सभी मनुष्य समान रूप से भागीदार नहीं हैं। प्रकृति का सौन्दर्य सार्वभौमिक हो सकता है, लेकिन उसे अनुभव करने की सामाजिक परिस्थितियाँ समान नहीं होतीं।

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और एक और दिलचस्प बात। ऋतुचर्या मौसम विज्ञान तक ही नहीं, वह स्वास्थ्य विज्ञान तक भी जाती है।  भारतीय आयुर्वेद में ऋतुचर्या का विचार भी इसी ऋतु-बोध से उत्पन्न हुआ। चरक परंपरा में वर्ष के छह मौसमी चरणों और उनके अनुरूप आहार-विहार के संबंधों पर विचार किया गया है। यह एक ऐसी चिकित्सकीय दृष्टि का ऐतिहासिक उदाहरण है जिसमें मनुष्य को उसके पर्यावरण से अलग नहीं माना जाता। हालांकि परंपरागत आयुर्वेदिक अवधारणाएं आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान का विकल्प नहीं।

लेकिन क्या जलवायु परिवर्तन के कारण अब हम अपनी अपनी ऋतुओं को खो नहीं रहे हैं। हमारी थाली में रखे हुए पके टमाटर, बैंगन या हरी मिर्च भी जलवायु परिवर्तन की शिकायतों का पिटारा लेकर बैठे हैं और पुराने ऋतुचक्र की अनुपस्थिति दर्ज कर रहे हैं। उनका बाहरी छिलका इतना मोटा और सख्त इसलिए हो गया है क्योंकि जलवायु में गरमी बढ़ गई है और फलों या सब्जियों के भीतरी तौर पर सुरक्षित रखने के लिए बाहरी आवरण का सख्त होना जरूरी हो गया है। इनके अभाव में कोमल छिलके वाली सब्जियां नष्ट हो सकती हैं। हमारा समय ऋतुओं की अनुभूति में एक विचित्र अस्थिरता लेकर आया है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार 2024 भारत में 1901 से उपलब्ध देशव्यापी तापमान अभिलेखों में सबसे गर्म वर्ष रहा था। 2025 भी आठ सबसे गर्म वर्षों में दर्ज हुआ। इस पृष्ठभूमि में ऋतुचक्र को केवल साहित्यिक स्मृति मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। यदि पेड़ अपेक्षित समय से पहले फूलने लगें, पक्षियों के आवागमन का समय बदले, मानसून की वर्षा का वितरण अस्थिर हो अथवा खेती की पारंपरिक समय-सारिणी प्रभावित होने लगे, तो यह केवल जलवायु का विषय नहीं होगा। यह भाषा, लोकस्मृति, भोजन, स्वास्थ्य और संस्कृति के लिए भी चुनौती होगी।

ऋतुएँ मनुष्य की स्मृति का एक प्रकार भी हैं। हम अपने बचपन को अक्सर किसी वर्ष की तारीख़ से नहीं, उसकी ऋतुओं से याद करते हैं। उस वर्ष की भीषण गर्मी, वह असाधारण वर्षा, वह ठिठुरती सर्दी, वह वसंत जिसमें किसी पेड़ पर पहली बार फूल देखे थे। यदि प्रकृति की ये लय बदलती हैं तो स्मृति और वास्तविकता के बीच का संबंध भी बदलता है। पंजाबी लोकगीत तो ऋतुओं को लेकर हृदय पर मर्मबेधक नश्तर चलाते हैं, “काले तेरे दिल दा किस्सा वे सजणा दसिए कीनूं, किद्दां कोई भुल सकता ऐ किक्करां ते वरदे मींह नूं!’।

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भारतीय ऋतु-बोध का सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश यह है कि मनुष्य प्रकृति से बाहर खड़ा हुआ कोई स्वतंत्र प्राणी नहीं है। उसका शरीर, उसकी संवेदनाएँ, उसका श्रम, उसका भोजन, उसका प्रेम और उसकी कला किसी न किसी रूप में पृथ्वी की बदलती परिस्थितियों से संबंधित हैं। यह विचार किसी एक धर्म, एक भाषा अथवा एक राष्ट्र की निजी संपत्ति नहीं है। इसकी अभिव्यक्तियाँ संस्कृत के ऋतुचक्र में मिलती हैं, तमिल के पेरुम्पोझुतु में, बंगाल के षड्ऋतु-संसार में, कश्मीर की मौसमी शब्दावली में और प्राचीन ईरान के गाहम्बार पर्वों में भी। उनके बीच इतिहास के संबंध हैं, लेकिन उनके अपने स्वतंत्र विकास भी हैं। इसलिए छह ऋतुओं को किसी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का प्रमाण बनाना उनके वास्तविक महत्व को छोटा करना होगा।

उनका महत्व इस बात में है कि प्राचीन समाजों ने प्रकृति में सूक्ष्म अंतर पहचानने की असाधारण क्षमता विकसित की थी। उन्होंने बादल को केवल जलवाष्प नहीं माना; उसके साथ जीवन की आशा जोड़ी। उन्होंने ग्रीष्म को केवल ताप नहीं समझा; उसके भीतर जल और छाया का मूल्य पहचाना। उन्होंने शिशिर में जीवन की क्षीण होती गति और वसंत में उसके पुनरागमन का अनुभव किया। इस पूरे सांस्कृतिक इतिहास में मेरे लिए सबसे सुंदर बात यह है कि ऋतु किसी स्थिर वस्तु का नाम नहीं। वह परिवर्तन का नाम है। और परिवर्तन के भीतर भी क्रम, निरंतरता और पुनरुत्थान की संभावना का।

मनुष्य ने संभवतः इसी ऋतुचक्र से सीखा कि कोई भी अवस्था अंतिम नहीं होती। ग्रीष्म अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचकर भी वर्षा की संभावना को समाप्त नहीं कर सकता। शिशिर चाहे जितना कठोर हो, उसके भीतर वसंत की तैयारी चलती रहती है। लेकिन प्रकृति का यह पुनरागमन मनुष्य और प्रकृति के संरक्षण की आवश्यकता को समाप्त नहीं करता। पृथ्वी की जैविक प्रक्रियाएँ असीमित नहीं हैं। पर्यावरणीय संकटों का समाधान ऋतुओं के लौट आने की प्रतीक्षा से नहीं होगा। हमें उस प्रकृति की रक्षा करनी होगी जिसके साथ हमारी भाषाएँ, सभ्यताएँ और संवेदनाएँ विकसित हुई हैं। अंततः भारतीय षड्ऋतु-बोध हमें छह मौसमों की सूची से कहीं अधिक बड़ी बात सिखाता है। पृथ्वी केवल वह स्थान नहीं जहाँ मनुष्य रहता है; वह उस समय की भी रचयिता है जिसमें मनुष्य अपना जीवन जीता है। इसी अर्थ में ऋतुएँ हमारी सबसे पुरानी, सबसे विश्वसनीय और सबसे सुंदर दार्शनिक शिक्षिकाएँ हैं। कैलेंडर हमें बताता है कि आज कौन-सी तारीख़ है। ऋतु हमें बताती है कि उस तारीख़ का पृथ्वी पर क्या अर्थ है। और ऋतुचक्र यह भी बताता है कि इस देश की जम्हूरियत में अगर आज ग्रीष्म की लू चल रही है तो वर्षा की तैयारी भी है, हेमंत की भी, शिशिर की भी। वह शिशिर, जिसके गर्भ में वसंत पलता है और जिसके बारे में निराला ने कभी कहा था : शिशिर की र्शवरी, हिंस्र पशुओं से भरी! (लेखक जयपुर में एक रिपोर्टर है और साहित्य, संगीत, संस्कृति और कला का विद्यार्थी)

फोन : 7300042939 ईमेल : thetribhuvan@gmail.com

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