वोल्गा इलाके में भारतीय बस्ती थी

इन दिनों प्रसिद्ध लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक ‘हिंदी सराय- अस्त्राखान वाया येरेवान’ की बड़ी चर्चा है. उसका एक दिलचस्प अंश आज ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ में छपा है. आपके लिए- जानकी पुल.
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अस्त्राखान वोल्गा के डेल्टा में तो बसा ही है, शहर का एक इलाका तो कहलाता ही वोल्गा है। इसी वोल्गा इलाके में भारतीय बस्ती थी, और तातार बाजार आज तक है। भारतीय व्यापारियों का सबसे घनिष्ठ संपर्क तातारों से ही था। रक्त-मिश्रण की हद तक। ऐसे रक्त-मिश्रण से जन्मे बच्चे इंजित्सकी(भारतीय)  अगरिज़ान कहलाते थे। इन अगरिज़ानों के वंशज आज भी इंडियन तातार कहलाते हैं। हिन्दियों के  तातारों से ऐसे संबंधों के कारण थे। ‘शासक’ रूसी जाति के बरक्स हिन्दी और तातार दोनों ही ‘विदेशी’ थे। रूसी व्यापारी तो इन ‘पैगन’ व्यापारियों की चतुराई और उद्यमशीलता में अपने लिए खतरे की घंटी भी सुनते थे। मारवाड़ और मुल्तान से आने वाले हिन्दू व्यापारियों के लिए भी, बौद्ध या मुसलमान तातार सांस्कृतिक तौर पर उतने अजनबी नहीं थे, जितने कि ईसाई रूसी। मुसलमान तातारों की आस्था भी ‘शुद्ध’ रूप से इस्लामी नहीं थी, बौद्ध पद्धतियाँ जस की तस या थोड़ा सा रूप बदल कर उनके जीवन में बनी रही थीं। 

यही हिन्दी सराय मेरी मंजिल थी। शुरु में सचमुच कारवाँ-सराय, लेकिन बहुत जल्दी ही आढ़त और निवास-स्थान में बदलती सराय। यही विकास-क्रम बाकी सरायों के साथ भी जुड़ा रहा है, लेकिन हिन्दियों की खास हैसियत थी, इसमें शक नहीं। रूसी शासक भारत के साथ नियमित और सुरक्षित व्यापार चाहते थे, यह तभी संभव हो पाया जब, तातार शासित कजान 1552 में और तातारों द्वारा ही शासित अस्त्राखान 1556 में रूसी साम्राज्य में शामिल कर लिए गये।  तब से मॉस्को की हर सरकार की चिंताओं में भारत के साथ व्यापार के अधिकाधिक सुरक्षित और लाभप्रद मार्ग खोजना, अस्त्राखान के व्यापार को बढ़ावा देना शामिल रहा। स्थानीय रूसी व्यापारी भारतीयों की बढ़ती से परेशान रहते थे, जार से माँग करते थे अपने लिए सुविधाओं और भारतीयों पर प्रतिबंधों की। सरकार का रवैया आम तौर से रूसी व्यापारियों की माँगें पूरी करने वाले कानून बनाने लेकिन उनके अमल में ढीलेपन का रवैया अपना कर साँप को मार कर भी लाठी को टूटने से बचा लेने का होता था। 

जारशाही कायम होने के बाद ही आज के अस्त्राखान का नक्शा बना। क्रेमलिन के आस-पास बस्तियाँ बनाई गयीं। इनमें से किले के सबसे करीब इलीट की, श्रेष्ठि जनों की बस्ती थी– बेली गोरद। गोरद याने संरक्षित बस्ती और बेली याने फ्रेंच भाषा का बेले—ललित, श्रेष्ठ। 17 वीं सदी के शुरु तक बन चुकी इस बस्ती में सबसे पहले हिन्दी व्यापारी ही आकर बसे थे।  जिमिलिनो (याने जमीन से जुड़े लोगों की) गोरद-बस्ती, बेली गोरद से  पहले ही बस गयी थी, सोलहवीं सदी में, लेकिन किले से काफी दूर।  
    
जार के दरबार में भारतीय व्यापारियों की हैसियत, और रूसी सत्ता के साथ उनके संबंध का अंदाज इससे भी लगता है कि उन्नीसवीं सदी के आरंभ में हुए नेपोलियन के हमलों के दौरान इन भारतीयों ने जार की भरपूर मदद की थी, येकेतेरिना के शब्दों में, “सबसे ज्यादा”। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि नेपोलियन के हमलों के पहले ही रूस में भारतीय व्यापारियों के पराभव की शुरुआत हो चुकी थी। उनकी अलग पहचान मिटने लगी थी। अब तो हालत यह है कि सोलहवीं सदी में यहाँ आए आरमीनियाइयों का बाकायदा अलग मोहल्ला है, लेकिन हिन्दियों का न तो तातार-बस्ती में अता-पता है न हिन्दी सराय में।

जर्मनी के वैज्ञानिक पीटर साइमन पलास, कैथेरीन द्वितीय के निमंत्रण पर, 1767 में रशियन इंपीरियल एकेडमी ऑफ साइंस सेंट पीटर्सबर्ग में प्रोफेसर बन कर आए थे। पलास ने रूस के विभिन्न हिस्सों की यात्रा वैज्ञानिक अनुसंधान की दृष्टि से की थी। इसी सिलसिले में वे 1793 में अस्त्राखान आए थे, और अपनी “टिप्पणियों”  में, उन्होंने यहाँ के हिन्दू व्यापारियों के बारे में विस्तार से लिखा है।

पलास हिन्दी सराय के निवासी मुल्तानियों, मारवाड़ियों की पूजा के बारे में जो शब्द-चित्र खींचते हैं, उसके निहितार्थ ऐतिहासिक रूप से बेहद मानीखेज हैं। उनका वर्णन रामानंदी मंदिर में हो रही पूजा का है। वे बताते हैं कि ‘बड़े से बर्तन में पानी भर कर मूर्तियों को उसमें डाल दियागया, फिर निकाल कर चौकी पर रखा’। इस तरह मूर्तियों को स्नान  कराने को, वैष्णव शब्दावली में ‘मज्ज्न कराना’ कहा जाता है। विभिन्न वैष्णव आराध्यों के साथ ही पलास, इस पूजा में “यंतार” पत्थर याने शालिग्राम की बतौर आराध्य उपस्थिति नोट करते हैं, और अपने पाठक को इस आराध्य का नाम बताते हैं-“ सदीसाम”। उच्चारण सुनने और समझने की कठिनाई पलास के वर्णन में  साफ सुनाई पड़ती है- श्री नरसिंह “स्युरनुरजिंग” हो जाते हैं, और हनुमान “गनुमान’।हनुमान का वानरमुख भी पलास को श्वानमुख सा दिखता है। लड्डूगोपाल की प्रतिमा को पूजा करने वालों ने “गोपालश्री” या “श्रीगोपाल” कहा होगा, पलास को “गोपालच्छी” सुनाई दिया। उच्चारण की ही नहीं, अपनी मान्यताओं और पूर्वग्रहों को अन्यों पर आरोपित करने वाली ठेठ यूरोपियन मानसिकता भी इस वर्णन में झलक मारती है। पूजा में रखे शंख ( पलास द्वारा सुने गये उच्चारण में, “ जंग या जंकारा”)  पलास को ऐसे लगते हैं जैसे कि पूजा करने वालों ने ही इन “इन पत्थरों को स्त्री गुप्तांगों का आकार देकर, इन पर हल्दी से पीली धारियां खीच” दी थीं। ऊपर से, यह कि ये लोग “इन्हें बहुत महत्व दे रहे थे”।

भारतीय व्यापारियो को आश्वस्त करने के लिए, तातिशेव ने 26 दिसंबर, 1744 को आदेश जारी किया, “आने वाले व्यापारियों के साथ वैसे ही अच्छे संबंध रखे जाएंगे, जैसे आज तक रहे हैं, उन पर लगाए गये अदालती मामले उन्हीं के कानूनों के अनुसार निबटाए जाएंगे, उन पर ईसाइयत लादने की कोशिशें बर्दाश्त नहीं की जाएंगी, और वे अपनी धार्मिक गतिविधियां, अपने रीति-रिवाज अबाध रूप से जारी रख सकेंगे”। इसके पहले  सत्रह सितंबर  को तातिशेव  एक  आदेश जारी करके  ‘ यहाँ रहने वाले व्यापारियों का स्टेटस’ निर्धारित कर चुके थे । इस आदेश के अनुसार, भारतीय व्यापारी आगे से अस्त्राखान के ही  व्यापारी कहलाएंगे, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रखते हुए, “अपने मामलों को निपटाने के लिए अपने न्यायाधीश नियुक्त करने का अधिकार सुरक्षित रखते हुए”।

जाहिर है, संकेत भारतीयों के बीच प्रचलित बिरादरी पंचायतों की ओर है।

यह आदेश सत्रहवीं सदी से चली आ रही औपचारिक, प्रशासनिक स्थिति का पुन: रेखांकन ही कर रहा था।सत्रहवीं सदी में, भारतीय व्यापारी अपनी गतिविधियाँ ईरान से रूस तक बढ़ा रहे थे। इसी सदी के तीसरे दशक में रूसी शासकों ने विदेशी व्यापारियों को सक्रिय रूप से बढ़ावा देने की नीति अपनाई। भारतीय व्यापार के केंद्र के रूप में अस्त्राखान का विकास इसी नीति का परिणाम था। भारत के साथ व्यापार का अर्थ है समृद्धि, यह बात अन्य यूरोपीय ताकतों के साथ रूसी सत्ता भी जानती थी।

अस्त्राखान में बसने वाले भारतीय व्यापारियों में हिन्दू ही थे, मुसलमान रहे भी होंगे, तो इक्का-दुक्का ही। रूसी समाज के लिए मुसलमान तो जाने-पहचाने थे, लेकिन ये पैगन, मूर्तिपूजक, गोपूजक लोग, जो कि अपने मुर्दों को दफनाने के बजाय जलाते थे…इन्हें पचाना स्थानीय समाज के लिए कठिन था। राजसत्ता इन पैगनों की उपयोगिता जानती थी, इसलिए इन मारवाड़ी, पंजाबी, मुलतानी, गुजराती और सिंधी हिन्दुओं को अपने धर्म, रीति-रिवाज के पालन की छूट देना चाहती थी, लेकिन सीमित ही छूट।  इल्या वसीलिविच ने याद दिलाया  कि “उदारता का अर्थ मंदिर-निर्माण की अनुमति नहीं था”….बस, इतना ही कि आप अपनी हिन्दी सराय के किसी कमरे में, या अपने घर में अपने ढंग से पूजा करें, तो रोक-टोक नहीं है। सिद्धांतत: यह भी कि यदि कोई कट्टरपंथी आपकी पूजा आदि में व्यवधान डाले तो उसे रोका जाएगा; लेकिन, कई बार, स्थानीय प्रशासन की सहानुभूति भी कट्टरपंथियों के साथ ही होती थी। उधर मॉस्को को ‘जन-भावनाओं’ की रक्षा करने से ज्यादा चिंता धन-निर्माण की थी इसलिएस्थानीय प्रशासन के विरोध के बावजूद, 1683 में रूसी सरकार ने इन पैगनों को नगर के बाहर अपने मृतकों के शवदाह की छूट दे दी थी। इस कानूनी मान्यता के बावजूद शवदाह को सामाजिक मान्यता कभी नहीं मिली।  स्थानीय रूसी समाज की नाराजी से बचने के लिए शवदाह  नगर के बाहर जंगल में छुप कर ही करना होता था।  हाँ, केन्द्रीय सरकार के इस रवैये का यह नतीजा जरूर हुआ कि सत्रहवीं सदी तक हिन्दुओं को जबरन रशियन ऑर्थोडॉक्स चर्च में शामिल नहीं किया गया।

पपोव आगे बताते हैं, वोल्गा-जल का उपयोग गंगा-जल की जगह करने वाले इन  भारतीय व्यापारियों की बस्ती में दरवेशों को वही आदर मिलता था, जो ब्राह्मणों को। हिन्दी सराय में तीन कमरे सामूहिक गतिविधियों के लिए था, इनमें मुख्य था, “ताकुर दुआरा” ( कहने की आवश्यकता नहीं कि यह ‘ठाकुर-द्वारा’ का रूसी उच्चारण है।) सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि  “पुजारी ब्राह्मण स्थानीय भी होते थे, और बाहर से भी आते थे, बड़े व्यापारी अपने साथ ब्राह्मणों को लेकर आया करते थे”।

जाहिर है कि इनमें से कुछ यहीं रह जाते थे, लेकिन कुछ वापस भी जाते थे, वरना “स्थानीय” और “बाहर से आने” वालों के बीच अंतर करने की जरूरत नहीं पड़ती। यह भी जाहिर है कि व्यापार करने वाले बनियों में ही नहीं, धर्मोदेशों और रीति-रिवाजों का निष्ठापूर्वक पालन करने वाले ब्राह्मणों में भी ऐसे लोग थे, जो समुद्र-यात्रा निषेध की परवाह नहीं करते थे, और परवाह न करने के अपराध मे जाति-बाहर भी नहीं कर दिये जाते थे। वियतनाम, ईरान, मिश्र, रूस और ईथियोपिया तक में बसे व्यापारियों और दीगर भारतीयों की जीवन-पद्धति का गंभीर अध्ययन भारतीय इतिहास के बारे में प्रचारित किये गये अनेक अंधविश्वासों का उपचार कर सकता है।

पपोव इन हिन्दू व्यापारियों की जीव-दया के बारे में पोलिश यात्री यापतोत्स्की द्वारा 1797 में की गयी टिप्पणी उद्धृत करते हैं, “बहेलियों से पक्षी खरीद कर भारतीय उन्हें आजाद कर देते हैं, आवारा कुत्तों को भोजन कराते हैं, जीवदया का व्यवहार करते हैं”। यापतोव्स्की ने यह भी लिखा है कि “ये लोग शाम को बाग़ में हवाखोरी करते हैं। हिन्दी सराय चौकोर इमारत है, इसके  अंदर विशाल  आँगन है। यहाँ के निवासियों की दुकान में ही घर होता है, खिड़कियां नहीं बस छत में रोशनदान होता है, छोटी अंगीठी पर खाना बनाते हैं। ये लंबी बांहों वाले कुर्ते पहनते थे, उस पर सिल्क का गाउन और उस पर ठंड के दिनों में बोरी सा रंग-बिरंगा कपड़ा। पगड़ी ऐसे बाँधते थे कि चाँद दिखती थी, पुजारी लोग सफेद या लाल पगड़ी बाँधते थे”।

यापतोस्की ने भी पलास और एडेल  की तरह, हिन्दी सराय के ‘ताकुर दुआरा’  में पूजा होते देखी थी, जोकि पपोव के शब्दों में, “ उसे उतनी ही पसंद आई, जितनी कि आ सकती थी!”

विभिन्न स्रोतों से अस्त्राखान के हिन्दी व्यापारियों के नाम भी प्राप्त होते हैं। डेल की बात याद करें, इन हिन्दू नामों के उच्चारण समझने और अपनी भाषा में उन्हें दर्ज  करने में रूसी अधिकारियों को दिक्कत होती थी।  सबसे ज्यादा मार्के की बात यह है कि इस तरह दर्ज किये गये नामों में जातिवाचक शब्दों का उल्लेख तक नहीं है। इनमें से किसी नाम के साथ वह नहीं मिलेगा, जिसे आज हम ‘सरनेम’ कहते हैं। व्यक्ति के नाम के साथ जो शब्द लगाया गया है, वह या तो उसके पिता का नाम सूचित करता है, या उसके निकास का स्थान। बगारी आलमचंदोफ याने आलमचंद का बेटा बगारी, टेकचंद लालयेव याने लाल का बेटा टेकचंद; और अमरदास मुल्तानी याने मुल्तान का अमरदास, मारवाड़ी बारायेव याने मारवाड़ का बारायेव। 

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