स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर, उसकी समकालीन जटिलताओं को लेकर लकी राजीव ने बहुत अच्छी कहानी बुनी है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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गमले से निकला पौधा भी हैरान ही होगा..अब यहाँ से निकलकर कहाँ? मैं उसकी जड़ें देख रही हूँ, सघन,कड़क, अनियंत्रित..इतनी बड़ी कि गमले में समा नहीं पा रही हैं। पौधे से मन ही मन मैंने कहा है,
“बदलाव ज़रूरी है, कुछ बेहतर होने के लिए”
पांच पौधे अभी भी बचे हैं। छोटे गमले में घुटते पौधों को बड़े बड़े गमलों में स्थानांतरित करके भी मुझे इनके सुख की बजाय,बचे हुए पांच पौधों का दुख ज़्यादा महसूस हो रहा है। जीवन का यही तो खेल है, जो हुआ उसमें चैन नहीं, जो नहीं हो पाया उसकी बेचैनी ही सिर पर सवार रहती है।
“कल बारह इंच वाले पांच गमले और ले आना”
माली को समझाते हुए मैं उठी ही हूं कि छत के दूसरे कोने से मां जी की आवाज़ मुझे भेदती हुई चली आयी है,
“तुम कोई भी गमला न उठा लेना, याद है न पिछली बार..”
अरे,कुछ नहीं हुआ था पिछली बार। तारीख से पांच दिन ही पीरियड लेट हुआ था, घर में घी का हलुआ बन गया था..और पीरियड शुरू होते ही हलुआ बेस्वाद हो गया था । बच्चा रुका नहीं, खराब हो गया, वजन उठा लिया, सीढ़ी चढ़ ली, किसी की बात नहीं सुनती जैसी बातें करके मां जी रो भी लीं थीं, विनय का भी मूड ऑफ ही था। मैं हैरान थी,
“विनय, तुम तो ऐसे रिएक्ट मत करो.. प्रेग्नेंसी थी ही नहीं!”
“अपना ध्यान तो रखो, अभी नहीं थी आगे तो होगी, तुम्हारा रवैया ऐसा ही रहेगा तब भी”
“प्लीज़ विनय, लाइफ को इतना कॉम्प्लिकेटेड मत बनाओ”
“और कुछ बचा है क्या कॉम्प्लिकेटेड होने में? पिछला सब भूल गई हो क्या? हम दोनों के लिए कुछ भी आसान नहीं रहा है”
विनय को सुबह थायराइड की गोली लेना भले न याद रहे लेकिन हर दिन हमारे अतीत की चादर झटककर धूल उड़ाना ज़रूर याद रहता है। वो धूल, जिसके कीटाणु मेरे भीतर घुसकर हलचल मचाते रहते हैं..बहुत देर तक!
ये मेरी दूसरी शादी थी। विनय की भी। मेरी पहली शादी साल भर तक टिकी रही, टिकना तो नहीं कहेंगे लड़खड़ाती ही रही..लड़का हीन भावना से ग्रस्त था। उसके बड़े भाई अच्छा पढ़ लिखकर, अपने नाम के आगे डॉक्टर, इंजीनियर लिखे बैठे थे, लेकिन वो किसी तरह घिसट घिसट कर बारहवीं पास हुआ तो बिज़नेस ही एकमात्र विकल्प बचा था, वहां नाम और पैसा तो ख़ूब कमाया लेकिन मन की कुंठा, फांसी के फंदे की तरह हमेशा गला पकड़े रही..और वही फंदा पहली ही रात में,मेरे गले में भी डाल दिया गया था।
“तुम भले ही बहुत पढ़ी लिखी हो, बड़े स्कूल में टीचर हो, लेकिन इस वजह से मुझ पर हावी मत रहना”
गुलाब की कलियों से सजे कमरे में,हीरे की अंगूठी पहनाते मेरा दूल्हा मुझसे ये बात कह रहा था।
“आप ऐसा क्यों सोचते हैं? आप तो ख़ुद ही इतने सफ़ल हैं, इतना नाम..”
“हाँ वही तो याद रखना.. तुम्हारे दो तीन साल की तनख्वाह जितनी क़ीमत की तो ये अंगूठी ही है”
रात भर वो अंगूठी मुझे चुभती रही। मम्मी की बात याद आती रही, कितना विरोध किया था उन्होंने इस शादी का..पापा अडिग थे। क्या हुआ जो लड़का कम पढ़ा लिखा है, इतने मंज़िल का बंगला है,ये वाली कार है,वो वाली कार भी है, बिटिया राज करेगी अपनी।
इस राज-पाट में मेरी क्या हालत थी, मैं ही जानती थी। आस पास बस सवाल ही घूमते रहते थे मेरे,
तुम बड़े भइया से क्या बात कर रही थी? मंझले भइया तुमको ज़्यादा अच्छे लगते हैं क्या? मेरा मैनेजर आया,तो बाहर क्यों आयी थी? तुम्हारे स्कूल का प्रिंसिपल तुमको मैसेज क्यों भेजता है?
हर पढ़ा लिखा आदमी, मेरे पति का दुश्मन था।
वो गले तक कीचड़ में धंसा हुआ था,जिसको बाहर निकालने के लिए मुझे ही हाथ बढ़ाना था।
“सोच रही हूं नौकरी छोड़ दूँ”
मेरे कहते ही उसने मुझे बांहों में भरकर चूम लिया,
“मैंने तो कितनी बार कहा, तुम मानती ही नहीं थी..घर पर आराम करो, किस बात की कमी है तुमको? रानी हो तुम”
मैं सच में रानी ही थी। वो रानी, जो रहती तो महल में थी लेकिन हवा भी जाली लगी खिड़की से ही आती थी। वो रानी जिसका हुक्म बजाने के लिए बीसों लोग थे लेकिन साँस लेने से पहले राजा से पूछना पड़ता था। मेरी पहली शादी का ये कड़वा सच था..और विनय?
विनय की शादीशुदा ज़िंदगी की उम्र कुल दस दिन ही रही। लड़की ने दसवें दिन ऐलान कर दिया था कि लड़का शारीरिक रूप से शादी लायक़ नहीं है, तलाक़ चाहिए..
ये एक झूठ था। लड़की ने घरवालों के दबाव में शादी की थी। घरवालों ने साज़िश रची कि अपने प्रेमी से शादी करोगी तो हम सब ज़हर खा लेंगे,जिसके चलते इसने इससे भी भयंकर साज़िश रच डाली। शादी हुई,नौ दिनों तक विनय से कटी कटी रही और दसवें दिन विनय पर नपुंसकता का आरोप लगाकर, दोनों परिवारों को झकझोर, अपना सूटकेस उठाकर चली गयी। मुझे याद है, जब मैं और विनय पहली बार मिले थे तब सारी बात बताकर उसने क्या कहा था..
“मुझे तो शादी नाम से घिन आने लगी थी , इसीलिए तलाक़ बाद लंबे समय तक कुछ सोचा नहीं,अब लगता है लाईफ अकेले काटना मुश्किल है..”
मैं भी सहमत थी। एक अंधेरे कुएं से निकलकर रोशनी देखना मेरे लिए भी जल्दी संभव नहीं हुआ था, समय तो मैंने भी लिया था।
“आपकी क्या उम्मीदें हैं अपने लाइफ पार्टनर से?”
यही सवाल हम दोनों ने एक दूसरे से पूछा था, जिसके जवाब में हमने अपने अतीत के दुख साझा किए थे। दोनों की कड़वाहट फीकी होकर, ज़िन्दगी को मीठा कर जाए, यही उम्मीद लिए दो लोग एक बार फ़िर विवाह संस्था नामक छत के नीचे इकट्ठा हुए थे, वो छत जो तेज़ हवा, बारिश से बचाती है,वो छत जो कुछ कमरों को मिलाकर घर बनाती है।
“विनय,इतना मीठा क्यों खिलाते हो मुझे, वज़न बढ़ जाएगा मेरा,फूल जाऊंगी गुब्बारे जैसी”
प्यार से मुझे देखते हुए विनय ने एक और रसगुल्ला मेरी ओर बढ़ा दिया था,
“वही तो चाहता हूँ”
“क्या चाहते हो, फूल जाऊं?”
मैंने तकिया फेंकते हुए झूठा गुस्सा दिखाया था, विनय ने मेरे पेट पर अपना हाथ रख दिया था,
“यहां से फूल जाओ..मोटा सा पेट लेकर ज़िद करो कि अब ये खाने का मन है, अब वो लाकर दो”
भावुक होकर मेरी आंखें भर आयी थीं। क्या मैं नहीं चाहती थी कि ये पल मेरे जीवन में आएं? मैं विनय से कच्चे अमरूद के लिए झगड़ पड़ूं और बच्चे के नाम को लेकर हममें बहस होती रहे..
लेकिन आने वाले कल के सपने बुनने का सौंदर्य अलग है, उनको साकार होते देखने की चाह भी ग़लत नहीं है, ग़लत है उन सपनों को इस क़दर अपने ‘आज’ पर हावी कर लेना कि वो सपने, सपने न रहकर बोझ लगने लगें।
“इस महीने भी पीरियड आ गया क्या?”
मां जी तो बेबाकी से पूछ लेती थीं, लेकिन मुझे असहज कर जाती थीं। मुश्किल से महीना भर भी नहीं बीता था कि ये सवाल मेरे पीछे भूत की तरह लग गया था। उसके बाद हर महीने इसी सवाल का पूछा जाना, उसके बाद एक लंबी सांस खींचकर चुप हो जाना..ये मां जी ने तय कर रखा था, मुझे ये सब चौंकाता नहीं था।
चौंकी तो मैं तब, जब इस महीने विनय ने भी एक लंबी सांस भरी,
“चलकर दिखा देते हैं डॉक्टर को, पूरा चेकअप करवा लेते हैं तुम्हारा”
दो तीन महीने टालकर अंततः ये भी हो ही गया। डॉक्टर ने आराम से कहा,
“कोई प्रॉब्लम नहीं है..सब ठीक है।कभी कभी टाइम लगता है, अभी तो कुछ ही महीने हुए हैं शादी को, घूमिए फिरिए, बेबी अपने टाइम से ही आएगा”
इसी भरोसे पर अगले कुछ महीने भी बीते..लेकिन फिर वही सब! मां जी तो अलग ही इलाज कर रही थीं मेरा,कभी ये पत्थर गले में पहनो, कभी वो ताबीज़ बांह पर बांध लो, कभी बाएं पैर से आटे की गोली उछाल दो,कभी चार बजे सुबह उठकर ये खा लो। उस दिन तो हद हो गयी थी,
“ये अपने खाने में मिलाकर खा लो, किसी भी तरह..काटकर,पीसकर”
अपने पर्स से निकालकर एक पुड़िया उन्होंने मुझे थमा दी।
“ये..ये क्या है, छि:”
पुड़िया में किसी जानवर का बाल था! मैंने एक झटके में ज़मीन पर फेंक दिया था, वो गुस्से से उबल पड़ी थीं,
“पता भी है, कहां से ला रहे हैं ..कितना तरसते हैं लोग इसके लिए”
बाल को वापस उसी पुड़िया में सहेजकर वो रुआंसी हो गयी थीं, केवल वो ही नहीं, मैं भी रोने लगी थी। ये क्या पागलपन था? एक इच्छा मन में हो, तो उसकी पूर्ति के लिए कितना नीचे गिरा जा सकता था? उस दिन मैंने विनय से सीधे पूछ लिया था,
“ये सब तुम रोकोगे या नहीं?”
“रिलैक्स.. मैं समझाता हूं उनको। अच्छा कहीं ऐसा तो नहीं कि स्कूल का स्ट्रेस बहुत हो तुमको, इसीलिए कंसीव करने में दिक्कत हो रही हो”
एक बार छोड़कर,दुबारा पकड़ी नौकरी इस बार तो नहीं हाथ से जाने दूंगी,ये तो तय था, मैंने पलटकर सवाल पूछा,
“कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम अपनी जॉब का स्ट्रेस ले रहे हो? या फिर कुछ और प्रॉब्लम हो?”
विनय ने तुरंत अपने फोन को मेरे सामने लाकर पटक दिया था, आँखें चमकाते हुए एक फोल्डर खोला जिसमें दुनिया भर के टेस्ट की रिपोर्ट्स थीं,
“ये देखो, मेरा सब नॉर्मल है.. बहुत पहले दिखा चुका हूं”
उस रात कुछ आधा अधूरा मैंने अपने रिश्ते के भीतर महसूस किया…ये सब टेस्ट हुए, विनय ने बताया तक नहीं! छुपाने का मतलब क्या था? और भी कुछ ऐसा था क्या जो मेरे सामने अब तक आया नहीं था? कहीं ऐसा तो नहीं कि जो कुछ मां जी करती हैं, उसमें विनय की सहमति भी रहती हो!
मन में खटास आ गई थी। वही खटास मेरे चेहरे पर, मेरी ज़बान पर और मेरे व्यवहार में भी दिखने ही लगी थी। विनय शायद सतर्क हो गए था, एक शादी टूटने के बाद दूसरी को बचाए रखना कितना जरूरी था,ये उसको पता था। उस दिन के बाद से बच्चे को लेकर हममें कोई बात नहीं हुई.. मैं भी कुछ दिनों तक बिखरी पड़ी रही,फिर खुद ही जुड़ गयी।
“जालंधर चलो न, तुम्हारे बिना मेरा मन नहीं लगेगा..चार दिन की बात है, छुट्टी ले लो”
किसी रिश्तेदार की शादी में जाने की बात पर हममें पहले भी बहस हो चुकी थी,इस बार फिर मैंने वही कहा,
“तुम्हारे यहां सब वही,एक ही सवाल पूछेंगे”
“मैं जवाब दूंगा सबको, तुमको टेंशन लेना ही नहीं है इस बात का”
विनय के आश्वासन पर मैं तैयार हो गयी थी। वहां जाकर पता चला कि ये सिर्फ आश्वासन भर नहीं था, सच में उसने सब संभाल लिया था। इतना ही नहीं, मुझे प्यार से निहारती उसकी नज़रें मुझे एक बार फिर यकीन दिला गयी थीं कि हमारा रिश्ता उतना कमज़ोर नहीं है,जितना मैं डरती हूँ।
“कुछ भी कहो, मेरी बीवी सबसे ज़्यादा सुंदर दिख रही है”
उस शाम विनय की तारीफ़ मुझे गुलाबी कर गयी थी.. लेकिन उसके बाद बार बार आकर मेरी तस्वीरें खींचना, सबके सामने मुझे गले लगा लेना, चूम लेना, मुझे परेशान करने लगा था। ये विनय का असली चेहरा था ही नहीं..ये सब क्यों हो रहा था? ऊपर से वो स्टेटमेंट,वो तो हद हो गयी थी।
“तुम लोग नाचो गाओ,मुझे एक अलग कमरा चाहिए,मेरी बीवी के साथ”
विनय ने कई लोगों के सामने मुझे आंख मारते हुए कहा था, मैं खिसियाकर रह गयी थी, लेकिन विनय की कज़िन ने टोक दिया था,
“ये क्या भइया? आज रात की ही तो बात है, कल सब लोगों को होटल में रूम मिल जाएगा। आज तो सारी लेडीज़ का प्रोग्राम चलेगा रात भर, आप सब जेंट्स उधर..”
“बाकी जेंट्स अपना देखें, मुझे तो नींद नहीं आती बिना अपनी बेगम के”
ओहो..ये देखो..वाह..ऐसे हल्ले गुल्ले के बीच मेरा हाथ पकड़ते हुए विनय ने मुझे अपनी ओर खींच लिया था। ये क्या था? जो भी था सच नहीं था! विनय को कितनी बार ऑफिस के काम से शहर से बाहर रहना पड़ता था, तब तो कभी फोन पर नहीं कहा कि नींद नहीं आ रही..मिस कर रहा हूं। वो भी छोड़ो, विनय का ऐसा स्वभाव भी नहीं था कि भीड़ भाड़ में सबको परेशान करके बस अपना
आराम देखे।
“ये क्या बोलकर आए हो बाहर?”
खीझती हुई मैं कमरे में दाखिल हुई थी, विनय बिस्तर पर लेटकर बस इतना बोला था,
“सो जाओ आराम से, क्या करोगी रात भर वहां”
रात में कई बार मेरी आंख खुली! इसको प्यार कहेंगे? प्यार करने वाला तो पूछता है कि बताओ तुम क्या चाहती हो..वो ये नहीं बताता कि मैं ये चाहता हूं तो यही तुम करोगी!
रात मुश्किल से बीती ही थी कि अगली सुबह थोड़ी और कठिन लगी। नाश्ते के बीच बार बार आकर मेरी प्लेट में झांक कर देखना, फिर अपने हाथ से निवाला बनाकर मुझे खिला देना, फिर मुझे आवाज़ देकर अपने बगल वाली कुर्सी पर ही बिठाना.. हमें आए हुए दो दिन भी नहीं हुए थे कि लैला मजनू, लव बर्ड्स, तोता मैना जैसे नामों से हमे बुलाए जाने लगा था। प्रेम की गहराई उसमें डूबने में है न कि इस प्रदर्शन में…वो भी ऐसा प्रदर्शन जिसमें दोनों शामिल न हों।
“बहुत अच्छा लगा तुम दोनों को ऐसे देखकर,
विनय के लिए हम लोग बड़ा परेशान थे”
वहां से आते समय मिला ये आशीर्वाद मेरे सारे सवालों के जवाब दे गया था! अच्छा ,ये सब इसीलिए हो रहा था? ये सब करके उस दाग़ को रगड़ रगड़ छुड़ाया जा रहा था जो विनय की पहली पत्नी लगाकर गई थी। मुझे याद आई, मेरे परिवार की एक बेमेल शादी..जिसको लेकर बड़े कयास लगाए गए थे कि इनमें कभी प्यार होगा ही नहीं। वो जोड़ा भी तो यही करता था, लेकर घूमता था अपने प्रेम पगे किस्सों की टोकरी.. अपने प्रेम प्रदर्शन का एक मौका नहीं छोड़ता था।
मुझे स्पष्ट हुआ, मेरी भी तो यही स्थिति थी। विनय के लिए मैं एक ऐसा मेडल थी जो पिछली रेस में मिली हार को भुलाने में सहायक थी। जितना सोचती जाती,मन और डूबता जाता।
डूबता मन तलहटी में जाकर एक बात और निकाल लाया..बच्चा होना भी कहीं इसी जीत की
ट्रॉफी जैसा तो नहीं लगता विनय को?
बार बार दिमाग़ तराज़ू उठा लेता,दोनों शादियों को
अलग अलग पलड़े में रखकर कहता कि देखो,बराबर ही तो हैं! फिर दिल इस बात को नकार देता। देखो न, अब विनय में बच्चे को लेकर वो उलझन है नहीं। मुझे समझकर इतना बदलाव उसमें आ गया, ये बड़ी बात नहीं है क्या?
बड़ी बात तो है..मैं एक बार फिर सब कुछ भूलकर समय की रफ्तार के साथ चलने लगी थी, अपने को भी समझाया था, दिमाग़ को भी “ए, ज़्यादा मत सोचा करो।”
दिमाग़ अगर ये बात ही मान लेता तो उसका नाम दिल न हो जाता? जालंधर से लौटे महीना भर भी नहीं हुआ था कि मां जी ने एक नयी ज़िद पकड़ ली थी, किसी प्रसिद्ध जगह जाकर झाड़ फूंक करवाने की।
मैंने साफ़ मना कर दिया था, विनय ने भी मना कर दिया था। मां जी ने बहुत सारे उदाहरण दिए, वहां से आए तो फलाने के बच्चा हो गया,ढिकाने के तो जुड़वां हो गए। विनय ने रात को मुझे समझाने की कोशिश की,
“मुझे ख़ुद भी विश्वास नहीं है इन सब पर.. लेकिन एक बार चलने में क्या हो जाएगा, ज़्यादा दूर नहीं है,कार से तीन घंटे मान लो”
“लेकिन..”
“वैसे वो जगह हिल स्टेशन है,हम दोनों का एक और हनीमून भी हो जाएगा”
दिल का काम ब्लड पंप करना तो है ही, मूर्खता करने में सहयोग करना भी है। उसने किया भी वही, थोड़ी बहुत ना नुकुर के बाद मैं तैयार भी हो गयी थी। इसके पीछे केवल दिल की मूर्खता, विनय की ज़िद और हिल स्टेशन जाने का लालच ही रहा होगा शायद, लेकिन घर से निकलते समय मां जी का सूटकेस भी हमारे साथ देखकर लगा कि हनीमून जैसा शब्द, हनी ट्रैप से ज़्यादा कुछ नहीं था।
“इसकी कोख पर कब्जा है जिन्न का”
मुझे देखते ही उस लाल आंखों वाले आदमी ने कह दिया था। मुझे तो ख़ुद ही किसी प्रेत से कम नहीं लग रहा था। ऊपर से नीचे तक काले कपड़े, उलझे सिकुड़े बाल, चेहरे पर सफ़ेद काले निशान और आंखें अस्वभाविक आकार लिए, डरावनी।
कमरे में किसी जानवर की खाल, हड्डी जैसा कुछ और उसके अगर बगल दो कटोरों में लाल,पीला पानी।
“ये पी लो एक घूंट, उसके बाद लाल वाला दो घूंट”
मेरी ओर वो पीला पानी उसने बढ़ा दिया, मुझे लगा यहीं मुझे उलटी हो जाएगी..
“नहीं,ये सब नहीं”
मैंने साफ़ मना कर दिया था।
विनय ने मां जी को देखा, उन्होंने उस आदमी को।
वो हँसा,
“मुझे पता था,वो जिन्न इसको कुछ भी अच्छा करने नहीं देगा “
वो उठकर मेरे पास आया,
“कपड़ा उठा लो ऊपर,पेट दिखाओ”
उसका इशारा मेरे कुर्ते की तरफ़ था, मैंने फिर मना कर दिया। हाथ में पानी लेकर वो कुछ बोला और छपाक से मेरे कुर्ते पर फेंक दिया। पानी की नमी मेरी आंखों में तैर गयी..ये करने क्यों दे रही हूं मैं अपने साथ? वो आदमी मेरे चेहरे की ओर झुकता चला गया,
“पूरा शरीर उसके शिकंजे से मुक्त करना पड़ेगा”
मुँह से तेज़ दुर्गंध का भभका निकालता हुआ और आंखों में वासना की लाल लपटें लिया हुआ,वो मेरे इतना क़रीब क्यों था? इससे पहले कि मुझे अपने आप से घिन आने लगती, मैं पूरी ताक़त लगाकर वहां से भाग खड़ी हुई थी। मुझे याद ही नहीं कि मैं कब तक भागती रही..एक भी बार पीछे मुड़कर नहीं देखा कि विनय भी पीछे पीछे आ रहा था कि नहीं! अनजान शहर, अनजान सड़कें, ऐसा कोई डर मन में था ही नहीं, या कह लो अभी अभी जिस बड़े डर की गिरफ्त से निकली थी उसके आगे ये डर बेहद मामूली थे..
मैं पल भर को ठहरी, लंबी लंबी सांसे खींचकर यक़ीन किया कि मैं उस जगह पर नहीं हूं, सच में ऐसा हुआ है। वो आदमी यहां नहीं है, वो पीला लाल पानी मेरे पास नहीं है..हां, सच में नहीं है, रुके कदम फिर से चलने लगे।
“एक बोतल पानी..”
दुकान पर रुककर, बस हांफते हुए इतना ही बोल पाई। पेमेंट करने के लिए फोन निकाला तो कितनी सारी मिस्ड कॉल दिखीं ,विनय की, मां जी की!
“हां बोलो”
“तुम कहां हो? ऐसे कैसे चली आई थी, फोन भी नहीं उठा रही हो..तुरंत होटल आओ”
उसकी आवाज़ में रोष था, चिड़चिड़ाहट भी,चिंता नहीं थी।
“मैं डर गई थी, कितनी अजीब जगह थी..वो क्या क्या कर रहा था,तुमने उसको रोका भी नहीं”
मेरी आवाज़ भर गई थी। शिकायत उस अजनबी से नहीं, शिकायत तो उससे थी जिसके भरोसे मै वहां गई थी।
“मेरी बात सुनो, आई एम सॉरी..मुझे भी नहीं अच्छा लगा था”
ठंडा पानी गले को ठंडक देता, भीतर उठती आग भी शांत करता जा रहा था। विनय माफ़ी मांग रहा था, वो खौफनाक चेहरा धूमिल होता जा रहा था।
“तुम होटल आ जाओ, प्लीज़”
“हां,मैं आ रही हूं, फिर हम लोग तुरंत वापस चलेंगे घर..मुझे नहीं रुकना यहां”
विनय ने हामी नहीं भरी। मैंने एक बार फिर पूछा, जवाब वही,
“तुम आओ पहले”
हाथ में बोतल लिए मैं सुस्त कदमों से होटल की ओर बढ़ने लगी थी, कॉल कट चुकी थी। मुझे अपना पहला पति, पहली शादी,वो अंधेरा, वो घुटन एक एक करके याद आते गए..वो प्रहार याद आते गए जो मेरे ऊपर एक के बाद होते गए, मुझको कमज़ोर करते गए..और वो रात जो मुझको पूरी तरह नष्ट करने पर आमादा थी,वो भी याद आती गई..
“होटल के मैनेजर के पास तुम्हारा फोन नंबर क्यों है?”
हम लोग दुबई में थे, वो अपने बिज़नेस के सिलसिले में दिन भर बाहर था, शाम को आया तो पहला सवाल यही था।
“मुझे यहां आस पास के बारे में कुछ पूछना था, उसने कहा पता करके बताएगा, तो मैने नंबर दे दिया”
उसकी मुट्ठियां भिंच गयी थीं,
“दिन भर मैं यहां नहीं था, सही सही बताओ, यहां इस बीच हुआ क्या? वो रूम में भी आया था?”
“नहीं.. मैं रिसेप्शन पर गयी थी”
मेरी आवाज़ धीमी होती जा रही थी,उसकी तेज़।
“मैं सीसीटीवी चेक करूं? मान लो वो मुझे दिख गया यहां आते, फिर यहां से निकलते..तो?”
मेरे जवाब का इंतज़ार किए बिना वो कमरे से निकल गया था, जब वापस आया तो नशे में धुत्त था। पहले मेरे बाल खींचकर देर तक चेहरा देखता रहा, फिर मुझे सोफे पर ढकेलकर मुझ पर चढ़ गया था, जानवर की तरह मुझे चूमता रहा, मैं रोती रही। बार बार यही पूछता रहा,
“मेरी हो न तुम,बस मेरी हो न”
मैं उस समय तो हां हां कहती रही, लेकिन भीतर ही भीतर हर हां का जवाब, न न में कैसे बदलेगा ये सोचती रही। अपने को बिल्कुल सामान्य दिखाते हुए, दुबई से निकल कर इंडिया आना, उसके बाद बहाना बनाकर अपने मायके जाना, सब कुछ प्लान के तहत ही हुआ..उसके बाद उस फैसले पर अमल हुआ, जो फैसला मैने दुबई के होटल के उस सोफे पर लिया था। घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना के आधार पर मैंने, तलाक़ की अर्जी डाल दी थी, दुनिया भर के दबाव भी मेरा फैसला नहीं बदल पाए थे,
“मुझे एक मौका और दो, तुमको पता है कि मेरे अंदर सड़ा हुआ कुछ है”
एक दिन उसका फोन मेरे पास आया था, आवाज़ में पश्चाताप था, मैंने बस इतना ही कहा था,
“आपके भीतर जो सड़ा हुआ है, उसके छींटे मेरे ऊपर क्यों आने चाहिए?”
आज इतने सालों बाद सब कुछ फिर से,कुछ उसी तरह होता जा रहा था। मेरी दूसरी शादी, दूसरे पति के भीतर भी एक अंधेरा है,जिसको दूर करने के लिए मैं कितने भी बल्ब जला लूं, वो कालापन जाता ही नहीं।
“विनय, मैं होटल के नीचे खड़ी हूं, आकर बात करो, मां जी के सामने मैं बात नहीं करना चाहती”
होटल पहुंच कर मैने फोन किया था। विनय ने आते ही मुझे गले लगा लिया था,
“तुम कहां चली गई थी? मैं कितना डर गया था..”
बाहों का वो घेरा जो हमेशा मुझे सुरक्षा का एहसास दिलाता था,आज मुझे बेहद कमज़ोर लग रहा था, ये घेरा तब कहां था जब वो आदमी मेरे चेहरे पर था?
“हम तुरंत यहां से घर जा रहे हैं न विनय?”
विनय ने “हां” कहा ही नहीं। मेरे हाथों को थामकर, कुछ सोचकर बोला,
“मैं समझता हूं,तुम्हारे लिए ये सब बहुत मुश्किल है लेकिन क्या तुम समझती हो कि मैं किस नर्क में जलता रहता हूं?”
विनय के चेहरे पर बेचारगी थी, आवाज़ में गिड़गिड़ाहट, माथे पर पसीना,
“मुझे वो नामर्द बोलकर गई थी, दुनिया भर भी तो यही मानती होगी..एक बार बच्चा हो गया तो किसकी हिम्मत होगी मेरे बारे में ऐसा सोचने की?”
मैं किसी गड्ढे में गिरती जा रही थी, मेरा शक़ सही था। बच्चा विनय के लिए एक जीती हुई ट्रॉफी ही है बस, मुझे दिखा भी कि बच्चा होते ही विनय ने उसको गोद में लेकर पुचकारने की बजाय, हाथों में ट्रॉफी की तरह लेकर उठा दिया है,”ये देखो, सब लोग देखो, मैं जीत गया हूँ”
मैंने अपना हाथ छुड़ा लिया,
“जिनके बच्चे नहीं होते वो सारे आदमी नामर्द नहीं होते विनय, तुम सबको बदलने से पहले अपनी सोच तो बदलो”
विनय ने फिर मेरे हाथों को जकड़ लिया था,
“प्लीज,ये सब मुझसे मत कहो..बस एक बार मेरी बात मान लो”
दूर कहीं कुछ गिरने की धम धम सुनाई दे रही थी,अब कौन सी बात मानने को कह रहा है?
“प्लीज़,मना मत करना। कल सुबह तुमको वहां जाना है,वो कह रहा है कि कल तुम्हारे भीतर का जिन्न निकाल देगा.. प्लीज़,मान जाओ,एक बार और”
दूर से आती धम धम की आवाज़ मेरे पास आ गई है। स्पष्ट है, ये आवाज़ सामने खड़े विनय से ही रही है..वो एक डस्टबिन है, कचरे के भारी भारी ढेर लिए हुए, जिसमें से कचरा निकल कर मेरे ऊपर गिरता जा रहा है, मुझे सान रहा है, मुझे दबा रहा है.. पहले पति के साथ दुबई की रात और विनय के साथ इस शाम में कोई अंतर नहीं है, मैं टूट कर बिखर रही हूं, एक बार फिर!
“वो आदमी मेरे साथ कुछ ग़लत करेगा तो तुमको सहन होगा?”
“कुछ ग़लत नहीं होगा, मैं रहूंगा न बाहर कमरे के।”
अच्छा,
मेरे भीतर का जिन्न अकेले कमरे में निकाला जाएगा? और रक्षा का आश्वासन कौन दे रहा है, जो खुद ही अपने भीतर के जिन्न से इतने सालों में मुक्ति न पा सका!
मैंने बोतल में बचा पानी गट गट गट गट करके अपने भीतर उंडेल लिया है। पानी अंदर के लहू की गति बढ़ा रहा है, थके पैरों में जान आ रही है, दिमाग़ ने दिल को डपट कर चुप भी करा दिया और मुझे उकसा भी रहा है, कह दो, वही कह दो।
मैंने विनय की हथेली थपथपा दी,
“तुम रूम में जाओ, मैं एक चक्कर मार्केट का लगाकर आती हूं, सिर भारी हो रहा है”
उम्मीद से भरा एक स्वार्थी आदमी,मुस्कुराए हुए “जल्दी आना” कह रहा है, मैं हाथ हिलाते हुए मन ही मन अलविदा कह रही हूं..मार्केट की बजाय फोन में लोकेशन ऑन करके मैं बस स्टैंड की ओर बढ़ने लगी हूं। ज़िंदगी का ये अध्याय भी पिछले अध्याय की तरह अधूरा ही छोड़ना पड़ेगा,
“तुम्हारे दिमाग़ में जो सड़ा हुआ है, उसके छींटे मुझ तक क्यों आने चाहिए।”
ये बोलना पड़ेगा, एक बार फिर!

