बड़े साहित्यिक पुरस्कार ‘महत्वपूर्ण’ साहित्य को मिलना चाहिए या ‘लोकप्रिय’ साहित्य को. वर्ष २०११ का प्रतिष्ठित मैन बुकर प्राइज़ जूलियन बर्न्स के उपन्यास ‘द सेन्स ऑफ एंडिंग’ को मिलने से यह बहस छिड़ गई है. कोई भी पुरस्कार सभी साहित्यिकों की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरा नहीं उतर सकता है. पुरस्कार जितना बड़ा होता है, अक्सर असंतोष उतना ही बड़ा होता है. ऐसा नहीं है कि फ़्रांस में अंग्रेजी के इस सबसे लोकप्रिय अंग्रेजी लेखक जूलियन बर्न्स को बुकर प्राइज़ मिलना कोई अचम्भे की बात हो. इससे पहले भी इस पैंसठ वर्षीय लेखक के उपन्यासों को दो बार इस पुरस्कार के लिए नामांकित किया जा चुका था. पहली बार तो १९८४ में उपन्यास ‘फ्लाबेयर्स पैरोट’ के लिए, जिसे अनेक लेखक उनका सबसे अच्छा उपन्यास मानते हैं. दूसरी बार १९९८ में उनके उपन्यास ‘इंग्लैण्ड, इंग्लैण्ड’ को इस पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था. लेकिन उस साल पुरस्कार इयान मैकइवान को यह पुरस्कार मिला था. यह माना जाता है कि मार्टिन एमिस, इयान मैकइवान और और जूलियन बर्न्स समकालीन इंग्लैण्ड के प्रमुख और लोकप्रिय लेखक हैं. वैसे आलोचकों का यह मानना है कि बाकी दो लेखकों से जूलियन का लेखन कमतर रहा है, उनमें साहित्यिकता नहीं, लोकप्रियता का पुट अधिक रहता है, इस विकराल दौर के उतार-चढावों की उसमें कोई झलक नहीं होती है. इसीलिए जब इस पुरस्कार के लिए कुछ महीने पहले उनका नामांकन किया गया था अनेक आलोचकों ने यह लिखा था कि बुकर का स्तर कुछ गिर गया है कि ऐसे लेखक की किताब को इस महान पुरस्कार के लिए नामांकित किया जा रहा है.
वास्तव में, जूलियन बर्न्स ने साहित्य और पत्रकारिता में अनेक तरह के छद्म नामों से अनेक प्रकार का लेखन किया है. इनमें डैन कनावाग के नाम से लिखे गए जासूसी उपन्यास भी हैं. इन उपन्यासों ने उनका एक अलग ही वितान बनाया, लेकिन अंग्रेजी की महान साहित्यिक परंपरा में इसी वजह से उनके लेखन को हमेशा संदिग्ध माना गया. इतिहास, आत्म, स्मृति के तानों-बानों से उपन्यास की रचना करने वाले जूलियन के पुरस्कृत उपन्यास द सेन्स ऑफ एंडिंग’ की कथा स्मृति के सहारे अतीत-यात्रा है. एक अकेले आदमी की स्मृतियों की कथा वैसे तो साधारण-सी प्रतीत होती है लेकिन उसकी स्मृतियों में अंतराल का द्वंद्व है, पीढ़ियों का संक्रमण है और गहराता हुआ अकेलापन जों शायद समकालीन समाज की नियति बन चुका है. इस तरह से यह उपन्यास एक बहुत बड़ा मेटाफर बन जाता है इस तथाकथित रूप से ‘कनेक्टेड’ समाज के निर्जन एकांत का, यंत्रहीन यांत्रिकता का. जूलियन बर्न्स भले कोई महान लेखक नहीं हैं, लेकिन वे निश्चित रूप से समकालीन लेखक हैं, इसीलिए पिछले करीब २५-३० सालों से वे प्रासंगिक लेखक बने हुए हैं. अपनी भाषा के, अपने समाज के.
जूलियन बर्न्स के सन्दर्भ में एक और बात ध्यान रखने की यह है कि हाल के बरसों में अंग्रेजी उपन्यासों में जो परिवर्तन आए हैं, जिस तरह से ‘बाज़ार में बिकने’ को सफलता का पैमाना माना जाने लगा है, उपन्यास फिल्मों की तरह हिट या फ्लॉप होने लगे हैं, जूलियन उसी दौर में अंग्रेजी के चमकदार चेहरे हैं. उनके अब तक प्रकाशित करीब ११ साहित्यिक उपन्यासों और ४ जासूसी उपन्यासों में और कुछ हो या न हो पाठकों को आकर्षित करने की पर्याप्त क्षमता रही है. समकालीन जीवन की पेचीदिगियाँ उनके उपन्यासों में सहजता से सुलझती चली जाती हैं, कोई गहरा जीवन-दर्शन भी उनमें नहीं होता है न ही जीवन को दिशा दिखाने वाला कोई गहरा सन्देश. शायद यही हमारे दौर का बहुत बड़ा सच है. सारी महानताएं कुंठित-लुंठित हो रही हैं, सारे आदर्श छिन्न-भिन्न हो रहे हैं- किसी ‘गोडो’ की प्रतीक्षा नहीं रह गई है. ऐसे में केवल साहित्य से ही पावनता की उम्मीद करना कितना उचित कहा जा सकता है?
एक ज़माने में बुकर प्राइज़ का सार्वजनिक मजाक उड़ाने वाले इस लेखक यह पुरस्कार मिलना अपने आप में मजेदार है. गंभीर साहित्य को ही साहित्य का पर्याय मानने वाले कह रहे हैं कि यह अब तक का सबसे कमज़ोर निर्णय है. एक प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार का असाहित्यीकरण है. दूसरी तरफ ऐसा माने वाले भी हैं कि यह देर से मिला एक उचित पुरस्कार है. एक ऐसे सक्रिय लेखक की कृति को मिला सम्मान जो अंग्रेजी भाषा के पाठकों के बदलते मिजाज को समझता है, जिसने भागमभाग के इस दौर में भी पठकों को किताबों से जोड़े रखने का काम किया है, वह भी साहित्यिक कृतियों से. केवल श्रेष्टता के पैमाने से ही साहित्य की परख नहीं की जानी चाहिए, युगबोध भी आधार होता है. यह अंग्रेजी साहित्य के बदलते युगबोध का सम्मान है.



