अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और ‘वोटर माता की जय’

हिंदी का दुर्भाग्य है कि स्त्री लेखन के नाम पर महज कविता-कहानियों की चर्चा होती है. किसी नए विषय पर कोई लेखिका कुछ काम करती है तो क्या उसको स्त्री लेखन नहीं माना जाना चाहिए? इटैलियन भाषा की प्राध्यापिका प्रतिष्ठा सिंह की किताब ‘वोटर माता की जय’ की तरफ आज ‘विमेंस डे’ के दिन ध्यान दिलाना चाहता हूँ. बिहार में हुए चुनाव और उसमें महिला मतदाताओं के बदलते रुझान को लेकर, बदलती ‘वुमनिया’ जैसे दुर्लभ विषय को लेकर हिंदी में अपने ढंग का अकेला काम है वाणी प्रकाशन से प्रकाशित ‘वोटर माता की जय’.  आज के दिन प्रस्तुत है इसी पुस्तक का अंश- मॉडरेटर

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“भारत! भारत माता की जय! भारत वर्ष की जय! हिन्दुस्तान एवं इंडिया की भी जय! भारत के स्वरूप को सदियों से एक नारी का समरूप माना गया है। मातृभूमि जो जननी है, मातृभूमि जो पालन करती हैं और पोषण के साथ-साथ स्नेह भी देती है। दुनिया में एैसी भी कई भाषाएँ हैं जिनमें मातृभूमि शब्द ही नहीं है। वहाँ इसे पितृभूमि कहा जाता है। पहली बार जब हमने सुना तो कुछ अजीब सा लगा। उन संस्कृतियों कि कमी लगी जो ये तक नहीं समझ पाईं थी कि जन्म तो माता ही दे सकती है। आज हम ऐसा नहीं सोचते। आज लगता है कि शायद पितृभूमि शब्द में दोगलापन नहीं है क्येांकि चाहे कोई कुछ भी कह ले, भूमि पिता की ही होती है और माँ के लाल का नाम भी पिता का ही होता है। जिस माता को ये अधिकार भी नहीं कि वे अपने बच्चों को अपना नाम दे सके, उसे बरगलाने हेतु तो सम्मान नहीं दिया जा रहा? मानो वे कह रहें होः ‘‘सुनो, तुम्हारा यहाँ कुछ नहीं! नाम नहीं, ज़मीन नहीं, कुँआ नहीं, घर भी नहीं लेकिन इससे पहले कि तुम आवेग में आो, तुम्हे कुछ तो देना ही होगा। लो! जय-जयकार तुम्हारी है! भावनाओं का नहीं तो कम-से-कम शब्दों का सम्मान ही ले लो! और खुश रहो।’’ खुश रहना भी एक आज्ञा प्रतीत होती है।

भारत माता या भारत अम्मा यदि कहीं होती तो देश में महिलाओं को सुरक्षा का खतरा कभी नहीं होता। माता कुछ भी देखती लेकिन अपनी पुत्री का निरादर कभी नहीं। भारत हमारी जड़ों का नाम है। हमारा मानना है कि वे जड़ें पुल्लिंग हैं।

भारत यदि पिता भी है तो उसकी भी जय होनी ही चाहिए लेकिन जो भी हमारी माता है, उसका विरचित ही तिरस्कार नहीं होना चाहिए। फिर आदर तो उनका भी होना चाहिए न जो निस्संतान हैं? या अविवाहित हैं? विधवा हैं? बदसूरत हैं? बांझ हैं? बस इसलिए कि वे महिला हैं? मगर क्या ऐसा होता हैं? माँ के पेट से ही कन्या दुराचार को भोगती है। समझदार हो तो इस को चुपचाप विधि का विधन मानकर सह जाती है और यदि आत्मसम्मान का शिकार हो तो जूझती है, परास्त होती है, परास्त करती है लेकिन अशांतियों से घिरी रहती है।

क्या जयकारा लगा देने भर से भारत की तरफ या माताओं की तरफ हमारी जो जिम्मेदारी हैं, वह पूरी हो जाती है? क्या यह नारेबाजी बेमानी नहीं। यह नारेबाजी आपत्तिजनक नहीं परन्तु बेमानी अवश्य है।” (पेज १७-१८)

“हमारा पुरुष प्रधान समाज आज कुछ हद तक ये मानता है कि महिला शक्ति के बिना वो स्वयं भी अधूरा है। यदि समाज की एक व्यापक संकल्पना को सोचें और उसके लोकतांत्रिक ढांचे को सोचें तो चुनाव इस दृष्टि से बहुत रोचक होते हैं। चाहे महिला हो या पुरुष, चुनाव प्रचार के दौरान एक अतिथि के सत्कार भाव से सबकी खारितदारी की जाती है। आम आदमी (एवं आम औरत) की इज़्जत-अफज़ाई का ये एक महत्वपूर्ण क्षण होता है। जो लोग केवल अखबारों आदी के परम्परागत और रुढ़िवादी लेखों से राजनीति को समझने का दावा करते हैं, वे यह कभी नहीं मानेंगें की आज की आम महिला अपने अधिकारों को लेकर कितनी संजीदा है और उन्हें कितनी जिम्मेदारी से निभाती है।

जब राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव प्रचार की रणनिति रच रही होती हैं, तब वे महिला वोटरों को लुभाने के खास प्रयास करती हैं। चुनावी जुमलों एवं वायदों में सदैव महिलाओं को आकर्षित करने के लिए कुछ सामग्री मिलेगी। आज के दौर की ये विशेषता है कि महिलाऐं आज न केवल इन वायदों को समझती हैं, वे इनकी गहराई को माप कर मतदान के लिए उतरती हैं। महिला वोटर जाति-धर्म एवं रिश्तेदारी निभाने के एिल वोट न देकर, अपने परिवार का जीवन बेहतर बनाने के लिए वोट देती हैं। जहाँ एक पुरुष वेाटर को जाति-धर्म के नाम पर बहाकया जा सकता है, वहीं महिलाऐं अमूमन इससे अछूती हैं। देश में कई बार ये भी देखा गया है कि पैसे या शराब की घूस देकर पुरुषों को वोट देने के लिए बाध्य किया जाता है। एैसा कभी भी महिलाओं के साथ नहीं किया जा सकता। प्रथम तो इस प्रकार की रिश्वतखोरी रात के अंधेरे में की जाती है और महिलाऐं उस समय विचरण नहीं करती। दूसरा, जो शराब पिलाकर उनके घर के पुरुष को बहकायेगा वह ये नहीं जानता कि उसने घर कि महिला का वोट खो दिया। जिस पार्टी की वजह से आदमी शराब पीकर या जात बेसुध पड़ा रहे या फिर घर में दंगा करे, उसे महिलाओं का वोट कभी हासिल नहीं हो सकता।” (पेज १८-२०)

“हम न देब वोट। न जाईम वोट देए खाती। सब हमरा बुडबक समझेला वोट मांगे आइहें अ फिर गाईब हो जाइहें। न देब वोट। आईल बाड़ी मैडम जी?!! हूंह!” (पेज ४६)

“दरअसल हम बिहार के हर गाँव में ये गौर कर रहे थे कि फिल्मी अभिनेत्रियों के नाम व चेहरे वाले कई छोटे-बड़े ब्यूटी पार्लर यहाँ-वहॉं खुले थे। साधना जी की टिप्पणी ने हमारा ध्यान इस ओर फिर से खींच दिया था। बात सौन्दर्य से कुछ गहरी थी। क्या ऐसा था कि बिहारी महिलाऍं ज्यादा सैर-सपाटा करने लगीं थीं? क्या अचानक सरकार या समाज के द्वारा कोई ऐसा कदम उठाया गया था कि महिलाएँ दिखावटी सौन्दर्य को निखारने पर मजबूर हो गई थीं? ऐसा कुछ नहीं है, न था! महिलाओं में स्वयं ही कुछ ऐसा बदलाव देखने को मिलता है, जो उन्हें ये स्वतंत्रता देता है कि वे खुद पर समय एवं कुछ धनराशि खर्च कर सके। इसका सीधा संबंध पतियों की बढ़ती आय से हो सकता है या स्वयं महिलाओं के कमाने से भी। लेकिन हमें लगा कि ये सिर्फ एक और जरिया था जिससे महिलाओं की सामाजिक सक्रियता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। संभव है कि बाकी के राज्यों में भी ब्यूटी पार्लरों की संख्या बढ़ गई हो। परन्तु बिहार जैसे राज्य में ये बढ़त कहीं ज्यादा विचारणीय है। ये देश का वो राज्य है जहाँ किसी की सम्पत्ति का आकलन इस बात से नहीं होता कि वो व्यक्ति कितना खर्च करता है, बल्कि इस बात से होता है कि वो कितना बचा लेता है। राज्य में आज भी इस बात पर काफ़ी ध्यान दिया जाता है कि बचत ज़्यादा हो सके। तब ऐसा क्यों है कि एक फिजूल कारोबार (जिससे पुरुषों का सीमित रूप से ही फायदा हो सकता है।) इतना फल-फूल रहा है। लेकिन ये बदलाव सीधे सीधे सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक न होकर, मनोवैज्ञानिक है। महिलाओं को शायद ये आभास हो गया था कि इसी बहाने अन्य महिलाओं के साथ बातचीत करने का कुछ वक्त मिलेगा। यानी पारिवारिक परिवेश से बाहर की महिलाओं से कुछ बोलचाल हो सकेगी।” (पेज ८१)

“तीन पुलिसकर्मीयों ने गाड़ी की डिक्की खुलवा ली थी और हमारे दोनों साथियों के बस्तों की जाँच कर रहे थे। बेवजह रूखेपन से बात कर रहे थे और हक़ से सामान की नाकद्री भी कर रहे थे। हम भी वहीं जा पहुँचे। उपस्थित पाँचों पुरुषों ने सर ऊपर उठा कर देखा। पी.एस.ओ. जी और ड्राईवर साहब ने कुछ निराशा से हमारी ओर देखा। वे नहीं चाहते थे कि हम गाड़ी से ऊतरें। पुलिस वाला तो मानो हमारा जन्मजात बैरी हो। उसने मुँह चिढ़ाया और बोला, “ये सूटकेस किसका है?”

“हमारा है!” हमने शान से कहा मानो सूटकेस नहीं कोई ख़ज़ाना हो।

“हाँ तो खोलिए इसे, मैडम!”

हम सूटकेस की ओर बढ़े और सहजता से जब ज़िप को आधा खींच चुके थे, तभी हमें कुछ याद आया और हमने उसे वापस बंद कर दिया।

“अरे, क्या कर रही हैं आप? हम खोलने को न बोले थे?”

“हम नहीं खोल सकते! ये हमारा सूटकेस है, इसके अंदर हमारा सामान है।”

“तो? आप कौन हैं कि हम आपका बैग नहीं देख सकते? चुनाव चल रहे हैं, मैडम! किसी को रिआयत नहीं है। कलेक्टर की गाड़ी भी हम चैक कर सकते हैं!”

“आप तीनों के आलावा कोई और भी है इस पोस्ट पर?”

“यहाँ तो हम ही हैं! आप किसे ढूँढ रही हैं? आप हैं कौन?”

“एक महिला! किसी महिला पुलिसकर्मी कि अनुपस्थित में हम बैग नहीं खोलेंगे!” कहकर हम गाड़ी में आकर बैठ गए। पी.एस.ओ. जी काफ़ी प्रसन्नता से हमारे पीछे पीछे चले आए और चंद लमहों में हम फिर से अपनी मंज़िल कि ओर अग्रसर थे।” (पेज १२२)

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