अनामा माँ के भीतर एक गुमशुदा स्त्री की तलाश

आज मदर्स डे पर प्रसिद्ध लेखिका गीताश्री का लेख पढ़िए। पढ़ते पढ़ते अपनी माँ से मिलने का मन होने लगा-

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मां, मेरी माय

-गीताश्री

जन्म लेने के लिए एक स्त्री की कोख ढूंढता है ईश्वर

“अंतरिक्ष के आखिरी छोर पर खड़ी एक स्त्री

पक्षियों को पंख / पेट को अन्न, आंखो को दृश्य / कवियों को बिंब देती है

उसकी सार्वभौमिक उदारता में / उत्ताल समुद्र नतमस्तक हो जाते हैं

पृथ्वी की चंचल और भंगुर वनस्पतियां

उसके सत्कार में कोमल दूब की आकृति धारण कर / धरती पर लेट जाना चाहती है

कविता के लिए भाषा आलोक की तरह आसमान से उतरती है

फिर वह कविता खत्म हो जाने तक समुद्र दूब और पक्षियों के साथ

उसके अंतरिक्ष से पृथ्वी पर आविर्भूत होने की निष्फल प्रतीक्षा करती है

सन 1968 से मैं / उस स्त्री का ऋणी हूं।“

-हेमंत शेष

जहां पर यह कविता खत्म होती हैं, मैं अपनी बात वहीं से शुरु करना चाहती हूं। समूची मानवजाति उस स्त्री की ऋणी रहेगी जिसने उसे पैदा करने के लिए अपना कोख दिया।

हमारी माएं सदा अनामा रहीं। हम सबकी मांओं के नाम से पुकारी गईं।

अनामा माँ के भीतर एक गुमशुदा स्त्री की तलाश। जो हमेशा “केयर ऑफ ” रहीं, किसी न किसी की। लल्ली, पप्पू, झूलन, फूलन, फूलो की मां, माई, अम्मा। सबका कोई एक नाम होगा। इन सबके भीतर कोई खास बात होगी, जिसकी तलाश न हो सकी। उनके भीतर की प्रतिभाशाली स्त्री कहीं दुबक गई, उसके साथ ही मर गई उन संभावनाओं की तलाश, वे गुण सूत्र जिनसे आज की बेटियां, नयी पीढी तैयार हुई है। जिन्हें वरिष्ठ कवयित्री अनामिका भामती की बेटियां कहती हैं।

“लिखने की मेज़ वही है, वही आसन/पांडुलिपि वही, वही बासन

ग्रंथ लिख रही हैं पर/भामती की बेटियाँ/आपके जाने के बाद

मैने पढ़ाया इन्हें/पाठशाला भेजकर

दीये से नहीं, नहीं छाया से/इन्होंने अपनी क़लम से लिखा है जो

आपके समानांतर –

भाष्य उसका/करने बैठेंगे जब/सारे ये दिग्दिगांतर

मैं चैन की साँस लूँगी –

कृपा नहीं, प्रेम का प्रासाद भी नहीं लेंगी/भामती की बेटियाँ

ग्रंथ अपने स्वंय ही रचेंगी/लगातार, इसी तरह/हर युग में !”

पाश्चात्य स्त्रीवादी विचारक वर्जिनिया वुल्फ भी कहती हैं कि साहित्य की तमाम महानतम रचनाओं में स्त्री को अपने लिए कुछ नहीं मिलेगा। ये किताबें पुरुष संसार को लिखती हैं, पुरुष मूल्यों का उत्सव मनाती हैं। स्त्री के पास कोई परंपरा नहीं है। अगर है तो वह इतनी छोटी है और अपर्याप्त है कि उसका कोई अर्थ नहीं है।

उनका प्रसिद्ध कथन है- “स्त्रियां अपनी माताओं के जरिए विचार करती हैं। महान पुरुष लेखकों के पास सहारे के लिए जाना व्यर्थ है।“

मैं नये सिरे से अपनी मां को ढूंढ रही हूं। वो भले इस दुनिया में नहीं हैं। लेखक बनने से पहले तक उनके बारे में कुछ न सोचा था। वे मेरे लेखन की परंपरा से नहीं जुड़ती हैं। न वे लेखिका थीं न टीचर। न विदुषी। किताबें नहीं, जिंदगी की अध्येता थीं वे। मैं बेहिचक स्वीकारती हूं कि मैं एक अनपढ़, अँगूठा छाप माँ की बेटी हूँ। उन्हें अक्षर ज्ञान नहीं था। वे प का नाम मुंह से नहीं ले सकती थीं। वे साइन भी नहीं कर सकती थीं। हमलोग उन्हें छेड़ते थे- “बोलिए उमा”

मां उच्चारती- “उमा”

फिर हम कहते- “अब बोलिए कांत”

मां तुंरत झिड़क देती- “ दुर जो, हमको सब पता है, धोखे से बाबूजी का नाम लिवाना चाहते हो तुमलोग…”

मां अच्छी तरह से हिंदी नहीं बोलती थीं। वे बज्जिका में हिंदी मिक्स करके एक प्यारी भाषा में बोलती थीं। हम कितनी तरह से बात बदल कर उन्हें समझाते कि उमा तो पार्वती जी का नाम है, क्यों नहीं ले सकती…”कांत” का मतलब स्वामी है, यानी शिव…उमा के “कंत से बना कांत…

मजाल है कि मां “उमा” के बाद “कांत” बोलें। उमा बोल कर ठिठक जातीं…पूरा नाम नहीं लेतीं। मेरे बाबूजी का नाम उमाकांत शर्मा था।

ऐसी थी मेरी मां यानी माय। मैं तो तो माय कहती थी, बड़ी दीदी उन्हें दीदी कहती थी। एक भैया माई कहते थे। जिसे जो मन हो, अलग-अलग कारणों से उन्हें संबोधित करता था।

हम लोग “गे” कहते थे, बाबूजी आदर से पुकारते थे- “हे न सुनइछि। तुम ही कहते मगर हे कहते। हमारी बोली में “हे” आदरसूचक माना जाता है।

माय गे, दीदी गे, माई गे….इसी से पूरा घर गूंजता था। समूचे घर की धुरी थीं वे। बाबूजी को कभी उनका अनादर करते नहीं देखा। हल्की झड़पे देखीं, जो अक्सर छोटे भाई के व्यवहार को लेकर होती। माई छोटे भाई को लेकर कुछ नहीं सुन सकती थीं। एक शब्द नहीं। बाबूजी कभी कभी टोकते तो वे झगड़ पड़तीं। बस यही एक मुद्दा था दोनों के बीच। बाकी सब शांति थी। हर मुद्दे पर दोनों एकराय। बाबूजी सबकुछ पूछकर करते, कभी थोपते नहीं देखा। उस समय ऐसा लगता था। अब सोचती हूं तो लगता है, उनके पास रास्ता क्या था, चुपचाप हामी भरने के। बाबूजी मुख्तार थे घर के, जो तय करते , माई चुपचाप मान लेती थीं। फिर काहे का झगड़ा बालम…सहमति की प्रीत रे।

पढ़ी लिखी न होने के वाबजूद वे कथा रस, लोक मुहावरा और लोक तत्व का भंडार थीं। सामंती समाज की दूरदृष्टि वाली अनपढ़ औरत, बेहतर किस्सागो हो सकती थी, नहीं हो पाई। घर-आँगन में ही कथा बाँचती रही, और आगामी पीढी को शिक्षित कर आर्थिक ताक़त हासिल करने लायक़ बना दिया।

माई से मेरा रिश्ता हमेशा अबूझ रहा। मैं बहनों में सबसे छोटी थी। मेरे बाद एक भाई है। मुझसे पहले चार भाई बहन माई का प्यार भरपूर लूट चुके थे। मुझे लगता है, मेरे पैदा होते होते माई को बच्चों के प्रति ममता कम होती चली गई होगी। क्योंकि मेरे हिस्से अक्सर वे रुखी मिलीं।

ऐसा मुझे लगता रहा। हालांकि दिल्ली आ जाने के बाद उनका स्नेह खूब बरसा मेरे ऊपर। इतना ज्यादा कि मैं निहाल हो उठी। मुझे लगता कि मैं माई-बाबूजी को सदा अपने पास रखूं। हमारे समाज में न कोई बेटी रख पाती है न मां बाप रहना चाहते हैं। मगर मेरा मन तड़पता रहा उनके लिए। जब तक वहां रही, होस्टल में रही। छुट्टियों में आती तो माई ज्यादातर अनुपस्थित होती। उन्हें गांव जाना पड़ता था। मेरे बाबा को देखने, खेती बाड़ी देखने। बाबूजी नौकरी में थे, कहां फुरसत। माई का ही आना जाना लगा रहता था। मेरी माई को तीर्थ करने का भी बहुत शौक था। भैया को साथ लेकर वे चारो धाम घूम आईं थी। गंगा सागर भी हो आईं। बाबूजी के भरोसे नहीं रहती थीं. बाबूजी ने कभी रोका नहीं। तीर्थ करने वाली स्त्रियों के प्रति समाज बहुत उदार होता है। धर्म उनकी मुक्ति का सबसे पहला रास्ता है। बुद्ध काल में ही देख लें। बौद्ध भिक्षुणियों की जीवन-गाथा पढ़िए, सब की सब गृहस्थ जीवन से ऊबी हुई स्त्रियां थीं, जो गुलामी से तंग आ गई थी। उससे मुक्ति का एकमात्र रास्ता धर्म था। कुछ नहीं तो पुजारिन बन जाओ। मंदिर में डेरा जमा लो। भक्ति में लीन हो जाओ। ये अलग ही किस्म की मुक्ति थी। और कोई रास्ता नहीं मालूम था। उनका संसार बहुत छोटा, ज्ञान बहुत कम। भाग कर जाएं कहां।

खैर..।

तो मैं बता रही थी कि मेरी माई खूब यात्राएं करती थीं, बेटो को साथ लेकर। उनकी यात्राएं मुझे बहुत लुभातीं। मेरा मन तरसता कि साथ जाएं। हम तो होस्टल के बंदी ठहरे। छुट्टियों में गांव जाएं या जहां बाबूजी पोस्टेट हो, वहां जाएं। मौसम और त्योहारो के अनुसार हमारा गांव जाना तय होता था। जैसे गरमी छुट्टी में आम खाने गांव जाना ही है। छठ पूजा में समूचा खानदान जुटता था। तब जाना ही होता था। कुल मिलाकर हमारा गांव ही हमारे लिए शिमला, नैनीताल था।

दिल्ली तो सपने में भी नहीं आती थी । कोलकाता को लेकर खास रुमानियत बसती थी।

माई का साथ जितनी देर भी रहता, उसमें वे हमें भली लड़की बनने का गुर सीखातीं। कैसे चले, कैसे बोले, लड़की जात हो, जोर से न हंसे, ज्यादा न बोले। दूसरे घर में वास कैसे होगा। बहुत चिंतित रहा करती मुझे लेकर। सभी भाई बहनों में मैं ही सबसे ज्यादा चंचल, शरारती और विद्रोही स्वभाव की थी। उन्हें मुझे लेकर डर भी रहता था कि कुछ अपनी मर्जी का जीवन ना चुन लें। कंट्रोल से बाहर न चली जाए।

मुझे तो जाना ही था। जहां इतनी बंदिशें होंगी, पाबंदिया होगीं, उसकी प्रतिक्रिया कैसी होगी। बहुत पहरों में रही हूं। उन पर बात फिर कभी।

फिलहाल माई की बातें।

छोटे कद की, गेंहूंआ रंग, बड़ी –बड़ी भूरी आंखें। तीखे नाक। थुलथुल-सी थीं। बाद में बहुत पतली हो गईं। सीधा पल्लू करती थीं। साड़ी में प्लेटस नहीं बनाती थीं, चुन्नट बनाती थीं। लहंगा जैसा सामने से दिखता था। दूरदर्शी बहुत। दहेज जोड़ने में दक्ष। हम सबके नाम से साड़ी की पेटियां तैयार हो रही थीं, जो शादी में देने वाली थीं। गहने बनवा कर रखे जा रहे थे।

फिल्मों की शौकीन थीं। मगर जब हमें लेकर जाना हो तो धार्मिक फिल्में चुनती थीं। आज भी याद है कि एक धार्मिक फिल्म में किसी राक्षस का गला कटने का सीन था तो मैं रोने लगी, हॉल में हिचक हिचक कर। मैं दृश्य को वास्तविक समझ कर रो रही थी कि अब ये आदनी कभी नीहं लौटेगा। मर गया। मुझे ऐसी चीज नहीं देखनी। मैंने धार्मिक फिल्में देखने से मना कर दिया। माई तो माई…संस्कार भरना था मेरे भीतर।

कोई भी धार्मिक फिल्म न छूटने दें। कण-कण में भगवान फिल्म से लेकर संतोषी माता तक दिखा लातीं। हॉल में हाथ जोड़ लेतीं। ठीक वसे ही जब गंगा पार कर रहे होते तो हमारे हाथ में सिक्का देकर कहती कि पानी में फेंको और हाथ जोड़ो।

वो दौर ऐसा था जब मैंने देखा कि संतोषी माता फिल्म में जनता ने खूब सिक्के परदे पर फेंके थे। हम तो लेडी कूपे में बैठते थे। औरते इतन भाव विह्वल होती कि उन्हें देख कर मेरे आंसू निकल आते।

माई का सितम इतना ही नहीं। आगे सुनते जाइए….

सावन भर सुबह सुबह जगा कर डलिया पकड़ा कर फूल लोढने भेज देतीं। गोपालगंज में हम तीन सहेलियों का ग्रुप था जो सुबह फूल लोढ़ने निकलती थीं। दूसरों के प्रांगण से फूल लोड़ते थे। सड़क के किनारे कोई पौधा मिल जाए, पार्क में चले जाते थे । किसी घर का गेट बंद हो तो चहारदीवारी फांद कर फूल लोढ़ लेते थे। एकाध बार पकड़े गए तो धुनाई भी हुई। मगर क्या परवाह। डलिया भर कर फूल घर लेकर जाना होता था। इसके बाद की डयूटी सुनिए। थोड़ी और बड़ी हुई तो किसी अन्य कस्बे में घर के सामने मंदिर था। माई मुझसे मंदिर धुलवाती, बेलपत्र तोड़ कर लाने को कहतीं और मंदिर में बिठा कर चंदन घिसवातीं, तीनों पत्ते पर राम नाम लिखवातीं। सावन की सोमवारी व्रत करवातीं। इसके अलावा जितने व्रत संभव हो सकते थे, कुमारी कन्या कर सकती थी, वो करवातीं। जन्माष्टमी का उपवास आज भी याद है, दिन भर बिना दाना पानी के सूखते रहते। रात बारह बजे कृष्ण पैदा होते तो मुंह में पानी का घूंट जाता।

क्या क्या न सहे हमने सितम आपकी खातिर…माई।

सावन बीते तो राहत की सांस ली। जैसे ही कार्तिक का महीना आया, कार्तिक स्नान शुरु। सुबह अंधेरे में चापाकल का भपाता हुआ पानी जो ऊपर से ठंड़ा रहता, भीतर गुनगुना। पूरी बाल्टी उठा कर सीधे माथा से उड़ेल कर अंदर भाग जाते। कंपकंपाते हुए। पूरा महीना वैसे ही चलता। माई भी करती थीं। बड़े आराम से। उन्हें कोई दिक्कत न होती। हमें सुबह वही जगाती, हम आज्ञाकारी बच्चे, उठते और बाल्टी उड़ेल लेते।

माई ने कोई कसर न छोड़ी कि मैं पुजारिन बन जाऊं। धार्मिक कामों में रम जाऊं। शुक्र है कि स्कूल खत्म होते ही कॉलेज जाना हुआ, होस्टल का जीवन शुरु हुआ और कई तरह की पाबंदियों से पीछा छुटा। ये अलग बात है कि होस्टल लाइफ की पाबंदियां कम दुश्वार न थीं। जब हमारे रुमानी होने के दिन थे, इश्क में पड़ने के दिन थे, होस्टल में कैद हो गए। महिला कॉलेज और होस्टल।

यहां एक बात उल्लेखनीय है, माई कभी होस्टल में मिलने नहीं आई। पता नहीं क्यों। बहनें, भाई आते। बाबूजी एकाध बार आए। सारी दोस्तो की मम्मियां आतीं, मैं तरस जाती। या मैं नहीं चाहती थी कि वे आएं। क्यों…

ऐसा क्यों सोचती थी। इसलिए कि माई देहाती स्त्री थीं। उनके मेरे बीच एज गैप बहुत ज्यादा था। आखिरी संतान जो ठहरी। मां सिर पर पल्लू रखती थीं और मुझे उनके साड़ी बांधने का तरीका बिल्कुल पसंद नहीं था। मुझे हमेशा बूढ़ी लगीं। मेरी सहेलियों की माएं वर्किंग लेडी थीं या जवान थीं, उल्टा आंचल रखती थीं। जो तब फैशन में था। आधुनिक स्त्रियां वैसे ही आंचल रखती थीं। मैंने माई को एकाध बार टोका भी। उन पर कोई असर नहीं।

मुझे उनके साथ खास दूरी हमेशा रही। मैं उनसे अपना मन कभी शेयर नहीं कर पाई। वे भी बहुत बंटी हुई थी अपने और बच्चों में। पोते पोतियां आ गए थे, तब तक। वे सास बन चुकी थीं, बहुत जल्दी। मेरे भीतर यह अभाव रहा, जैसे दो अभाव और रहे….दादी और नानी का। दोनों को नहीं देखा। मामा और मामी भी नहीं। मैं दोस्तो के मामा को जल्दी से मामा बना लेती थी। मम्मियों के गले लग जाती थी। अपनी माई के गले कभी न लग सकी। एकाध बार कोशिश की, मुझे लगा, वे असहज हो रही हैं। वे नींद में सोते हुए हमारे पैर या हाथ भी हटा दिया करती थीं।

मेरी माई के आंखो में मेरे लिए कोई स्वप्न न था। वे टिपिकल मां थी जो अपनी बेटियों की शादी का स्वप्न देखती थी, उच्च शिक्षा भी इसलिए दिलवाना चाहती थी कि अच्छे घर में रिश्ता हो जाए।

इन तमाम बातो के मध्य माई की दो बातें मुझे बहुत पसंद आई थी। जिनका मेरे जीवन पर गहरा असर पड़ा। जिसने मुझे बदल दिया। मैं अगर जाति, धर्म के बोध से ऊपर उठ पाई तो वो माई की वजह से। मुझे अब सोच सोच कर हैरानी होती है कि कैसे उस वक्त, सामंती परिवेश में रहते हुए, उन्होंने हमें इससे ऊपर उठने में मदद की। शायद वे जानती थी कि आने वाले समय में दुनिया बदल जाएगी और ये सारी दीवारें ढह जाएंगी।

मेरी और मेरी दीदी की दोस्त मुस्लिम थीं। बाबूजी के बॉस भी दलित वर्ग से थे। जिनका पानी नहीं चलता था। मतलब छुआछूत भयंकर था सवर्णों में। मेरी माई ये सब बहुत मानती थीं। उनकी कंडीशनिंग ऐसी ही थी। वे आजीवन मुक्त नहीं हो पाईं।

हम छोटे थे। उन्हें देख रहे थे कि कैसे वे बाबूजी के बॉस के घर जाती थीं तो झूठ बोलती- “आज मेरा उपवास है।“ फिर तो न पानी पीने को कोई कहता न खाने को। ऐसे ही वे बच कर आतीं। लेकिन मैं या बाबूजी, डट कर खाते पीते वहां। हमें कोई फर्क नहीं पड़ता था किसकी जाति क्या है। धर्म क्या है। माई ने कभी न रोका। उनके सामने हमलोग सबकुछ खाते पीते थे। इसी तरह नसीमा दीदी घर आतीं तो माई उनके हाथ से कुछ खाने में परहेज करतीं। बच निकलतीं। लेकिन क्या मजाल कि उन्होंने कभी हमें रोका हो। नसीमा दीदी, हमारे घर पर रहती थी, कई कई दिन। हम उनके घर जाते थे। माई ने कभी न रोका टोका। बल्कि वे चाहती थीं कि हम नये जमाने के अनुसार अपना आचार व्यवहार रखें। दुनिया बदलने की आहट इनको मिल चुकी थी।

वे कितनी लोकतांत्रिक स्त्री थीं, चाहती तो हम पर दबाव बना सकती थीं। लोकतांत्रिकता मुझमें माई से ही आई है ।

माई कहती थी- “ये हमारी मान्यता है, सोच है, हमारा जीवन, इतना कट गया, आगे भी ऐसे ही कट जाएगा, तुम लोग अपनी जिंदगी अपने ढंग से तय करो। हमारी तरफ से कोई रोक नहीं।“

माई इस विषय पर कोई तर्क नहीं सुनती थीं। इस मामले में विरोधाभास से भरी हुई थीं। एक तरफ जाति-पाति मानती थीं, छुआछूत में विश्वास और दूसरी तरफ सभी धर्मों के प्रार्थनागाहों में नियमित जातीं, भक्ति करतीं, दुआ मांगती।

हम लोगो की नजर उतरवाने के लिए दरगाह पर चली जाती थीं। वहां मीठा मीठा कुछ मिला था, वो खुद भी खाई, हमें भी खिलाया। तजिया घर पर आता तो बढ़ चढ़ कर दान देतीं।

हम जिस भी कस्बे में रहे, कोई चर्च और मजार न छूटा। सिर नवाने खुद जातीं, हमें भी ले जातीं।

उनका ये रुप समझ में नहीं आया। मैं कभी पूछ नहीं पाई। बस उनकी लीलाएं देखती रही। सभी धार्मिक स्थलों पर उनके साथ सिर नवाती रही, समान रुप से।

दूसरी बात जो माई की अच्छी लगती थी- उनकी देह से उठती बीड़ी-सिगरेट की गंध। छुप छुप के बीड़ी-सिगरेट पीती थीं और उनके आपूर्तिकर्ता मेरे बाबूजी थे। जो लाकर देते भी थे और झूठमूठ गुस्सा भी होते थे कि क्यों पीती हो…खराब चीज होती है। मेरी चाचियां आती तो सभी मिल कर बीड़ी फूंकती। क्या नजारा होता था। खुद तो पीती, मगर हमें छूने भी न देतीं। मन ललचाता कि एक फूंक मार लूं। हमारी पहुंच से दूर रखती। वे सो जाती तो हम पल्लू से बंधा सिक्का खोलते कि शायद बीड़ी बंधी हुई मिल जाए। मगर बीड़ी गायब। कितनी चतुर थीं। कहीं छुपा देती होंगी, सोने से पहले। उन्हें पता होगा कि उनकी शैतान औलादें ऐसी हरकत कर सकती है। बड़े भैया की सिगरेट पीते पकड़े जाने पर मां ने जम कर धुलाई की थी। हमें दूर रखा। इसे ऐब कहती, हमारे लिए…अपने लिए तो वरदान समझती थी। माई इतनी लिहाजी थीं कि बीड़ी सिगरेट सबसे छुप कर पीती थी और सिर पर पल्लू एक पल के लिए भी गिरने नहीं देती थीं। घर में भी उन्हें कभी बिना पल्लू के बैठे नहीं। उनकी लंबी चोटी हमेशा ढंकी ही रही।

एक बात और उनसे मुझमें आई- मेहनत करना। घरेलू काम में खुद को झोंक देना। घर में इतने नौकर-चाकर, काम करते थे, कभी कमी नहीं रही। एक ग्लास पानी तक हम खुद लेकर नहीं पीते थे। सामंतशाही का ये आलम था कि हम काम के लिए दाईयां या नौकर होते थे। थाने के चौकीदार भी हमारी खातिर में लगे रहते थे। रोज शाम को थाने में हाजिरी लगाने आते तो हमारे घर पर आकर कुछ कुछ काम निपटा जाते। फिर भी मेरी माई सबसे सुबह जगती, बिना किसी का इंतजार किए अपने काम में लग जाती। उनकी सुबह घर की सफाई से शुरु होती। बाद में बहूएं जगती, नौकर जगते, तब तक मालकिन कई काम निपटा चुकी होतीं। मैं देर से सो कर उठती थी। भाभियां भी। मां सीधे कुछ कहती नहीं, बस बड़बड़ाने लगतीं। शायद नये जमाने को कोसती होंगी। उनकी बड़बड़ाहट मेंरे कानों में पड़ती तो हम जग जाते, हम उनींदे-से आपस में फुसफुसाते- “देखो, बीबीसी रेडियो सुबह सुबह चालू हो गया।“

बाबूजी सबकुछ अनसुना कर अपने काम में जुटे रहते। किसी को उनकी बड़बड़ाहट से फर्क नहीं पड़ता। बड़े भैया जरुर उनको पटाते हुए कहते- “मदर इंडिया…किस बात पर खफा हैं। आराम करिए…क्या काम करती रहती हैं…!”

अक्सर भैया उनको मदर इंडिया कहते। फिर तो मुझे भी जब उन्हें पटाना होता था तो उन्हें मदर इंडिया कहती। वे हौले से मुस्कुराती। आंचल से झाकंते उनके काले सफेद बाल उन्हें और दिव्य बनाते थे।

गठिया के कारण चलने फिरने में दिक्कत हो रही थी। तब वे सुबह ही नहा धो कर तैयार हो जातीं, बाहर चौकी पर बैठ जातीं। बाबूजी कुर्सी पर बैठे रहते। घर के सामने बड़ा-सा प्रांगण है। वहां दोनों बैठे होते। बातें करते, आपसे में उलझते भी रहते। हम लोग सुनते रहते, मुस्कुराते रहते। दोनों दिन भर अपनी बातों से दरवाजे पर रौनक लगाए रखते।

शाम को भैया लौटते तो सबसे पहले मां के पास जाते, बैठते और छेड़ते…”क्या हाल मदर इंडिया ?” वे खिल उठती। मदर इंडिया के बारे में उन्हें पता था।

और कितनी कितनी यादें। उनकी दूरदर्शिता की कायल रही हूं। दूर का सोचती थी। भविष्य की चिंताएं थीं। मैं इस मामले में उल्टी निकली।

माई के साथ अपने ठंडे-गरम रिश्ते पर लंबा लिख सकती हूं। एक लंबा जीवन उनकी छाया में बीता है।

इस लेख के बहाने कुछ यादें बाहर आ गईं। मैं उन्हें अब एक स्त्री के रुप में देख पा रही हूं। उन्हें आज समझ पा रही हूं। उनके सारे नियम अपने लिए थे, मुझे मुक्त रखा, ये सबसे बड़ी कृपा रही। हम उनकी संगति में ही प्रगतिशील बने। उन्होंने बनने दिया। मेरे विचारो को , सभी धर्मों के प्रति समभाव पर एक तरह से मोहर लगाती रहीं। मैं कॉलेज में गले में क्रॉस पहनती थी, कई लोग मुझे ईसाई समझते थे। कभी नहीं टोका।

समय के अंधेरे में गुम हो गई अपनी मां को याद कर रही हूं और जोर से रुलाई आ रही है।

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